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महाकवि धनञ्जयपिरविता
नाममाला
असरकी तिषिरचितमाष्योपेता
अनेका्थनिषण्डुः एकाक्षरीकोशथ
सस्पाद्फ
पं०.शम्भुनाथ त्रिपाठी व्याकरणाचार्य, सप्ततीर्थं
भारतीय ज्ञानपीठ काशी
(५५ >) १ (१५ (४ ~
पोते ति पेपर केष शिरोधरो पोते किन धर सो तोन, 7 ण न 81
प्रथम् आवृत्ति २.५ चैन, वीरनि० सं ० २४७६ यं
} वि० सं० २००७ { ध
१ अप्रेल १९५० तताठे तीन रूपये
भारतीय ज्ञानपीठ कशी
स्व ° पण्य्टोका माता श्री मूतिंदेवी की पवित्र स्मृति में
` तत्सुपुत्र. सेट शान्तिप्रसादं जी दारा
संस्थापित
ज्ञानपीठ मूर्तिदेवी जैन ग्रन्थमाला
इस ग्रन्थमाला मेँ प्राकृत संस्कत अपभ्रंश हिन्दी कन्नड तामि आदि प्राचीन भापा्ओों में
उपर्य आगमिक दार्शनिक पौराणिक सादित्यिक ओर एतिहासिक आदि विविध विपयक
जेनसाहित्य' का अनृसन्धानपूणं सम्पादन, उसका मृट यर् यथासम्भव अनुवाद
आदि के साथ प्रकादन हौगा। जन भंडारों कौ सूचिं, शिलारेख-
संग्रह, विरिष्टं विद्वानों के अध्ययनगृन्थ ओर लोकदितकारी
९ ८%{ जन साहित्य गृन्थ भी इसी गृन्धमाला मेँ प्रकाशित होगे ।
1
_ (८52९. ~
ग्रन्थमाला क्षस्पादक तर नियामक (संस्कृत बिभाग)
्रो° महैनद्रकुमार सैन, न्याया्चायै, जेन-प्राचानन्यायतीथै, आदि
बैोद्धदशैनाध्यापक संस्कृत महाविद्यालय
- न्दु विश्बविालय काशी
संस्कृत म्रन्थाङ्् ६
भृकश्क--
अयोध्याप्रसाद् गोयलीय
मन्त्री, भारतीय ज्ञानपीठ काशी,
टुर्ग॑क्कण्ड रोड, वनारस सिटी
मुद्रक--पं पुथ्वीनाथ भागेव, भार्गव भूषण प्रे, गायघाट, कारी 1
\* स्थापनान्द | (स
स्वाधिकार ( 9
4 फाल्गून कृष्णा ९ सवाधिकार सुरक्षित 1 ४
वीर नि० सं० २४७० १८ फरवरी १९४४
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४
प्ाकुकथन
(हिन्दी अनुवाद)
अपनी पूज्य माता मूत्िदेवीजी की स्मृति फे लिए ताह शान्तिप्रसाद जीजेन हारा संस्थापित
भारतीय ज्ञानपीठ वनारस ने विदत्ताधु्णं प्रकाशनों की एक उत्साहुवर्धक योजना हाय मेलीदहं।
प्राचीन भारतीय संस्कृति के चिश्ाल दृष्टि व फल्पना वले सभी अंगों का प्रकादान इस योजनां के
अन्तर्गत हं तया अव तक इस संस्या से संस्कृत, प्राकृत, पाली, यादि विभिन्न भापाों के कतिपय
ग्रन्थ प्रकाक्षित हो चुके ह। इस योजना के सम्पादन के किए काङ्नी हिन्द विद्रवविध्याल्य के संस्कृत
महाविद्यालय के सुयोग्य विद्वान् पं० महेद्रकूुमार न्यायाचायं, प्रधान सम्पादक के रूपमे प्रप्त हं।
ज्ञानपीठ से भव तक कर्द एक ग्रन्य प्रकारित्त हुए ह मौर कर्द एक प्रकादानके लिए तयार हं
वतमान ग्रन्थ मं प्रसिद्ध कोडकार धनञ्जय कौ दो कृतिं सम्मिलित हं । पहली नाममाला
कहुलातौ हं जिसमे पययिवाची शब्दों का संग्रह हं मौर इसरी अनेकां नाममाला, जिसमे यनेक भर्य॑- `
वोधक इब्दों का संग्रह हं। पहली कृति मेँ २०० श्लोक हं जव कि दूसरी छृति उसतते काफी छोरी |
हं । प्रथम कृति के सम्बन्ध में उल्लेवनीथ विशेषता यह हं कि इत्र पर लिखा गया अमरकीति का
भाष्य पटठे पहुल प्रकाश मे मा रहा हुं } ममरकीति ने नाममाला के प्रत्येक शाब्दो कौ व्ुत्पत्तिं देकर
स्पष्टीकरण किया हं ओर अपनी दृष्टि में आए कुछ मीर पर्यायवाची शदो को शामिल कर दिया ह।
उनके भाष्य की वही सरणि पदति हं जो कि अमरकोश की प्रसिद्ध टीका में क्षीरस्वामी ने भपनायौ हं ।
सम्पूणं कृति का सम्पादन ख्यातनामा पण्डित क्षम्भुनाय त्रिपाठी व्याकरणाचार्यं सप्ततीर्यं नें
वड़ी सावधानी से तया प्रमाणो का उपनुबेत उद्धरण देते हए किया हं । उनकी रिप्पणियों का अध्ययन
करने से, मुञ्ञे अनेक वार प्रतीत हुआ हं कि पण्डित् त्रिपाठी -यूक्ति मौर शुद्धि दोनों मं कर्ही-कहु भाष्यकार
को भी मातं कर गये ह, इतना ही नहु, उनके व्युत्पत्ति संबन्धी स्पष्टीकरण भौर भी अच्छे ह्।
मुके विद्वास्र हं कि विदान् लोग टिप्पणी मं त्रिपाठी जी के प्रयत कौ प्रदा करगे । ~
ग्रन्थ मं अनेक. अनुक्रमणिका लगा दी गई हू । उनर्मे सम्पादित दोनों छृतिथों की शन्द सुची
का सम्मिलित होना तो स्वाभाविक ही हँ परन्तु इसके अतिरिक्तं अमरकीति के भाष्य के अतिरिक्त
शब्दों कौ सुची, यौगिक शब्दों को सुची, उद्धूत ग्रन्थ मौर ग्रन्थकर्ताओं की सूची तथा ग्रन्थ में उदत
वाक्यों की सुची भी सम्मिलति कौ गर्ह हं । यह् सव पण्डित महादेव जी चदुर्वेदी व्याकरणाचार्यने
किया हं । सचमुच मं श्रन्य का सम्पादकोय भाग उतना पूर्णं बना दिया गया हं जितना मानवी शविति
से त्तभव था । भौर इस सवके कि मं प्रधान सम्पादक पण्डितं महैन्धकूमार न्यायाचा्यं कौ योग्यता
की सराहना करता हं जिन्होने एसे ग्रन्य फे प्रकाडान में इस प्रकार की विद्रन्मण्डली को एकत्रित किया हे ।
पी० एल ० वेय
काशी हिन्द विश्व वि्याकय एम०ए०्डीन् किट
६ सितम्बर, १९४९ मय् रभंज प्रोफेसर तथा
॥ अध्यक्ष, संस्कृत पाली विभाग।
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“शब्दब्रह्मणि निष्णातः परत्रद्याधिगेच्छति""-अ्रहयविन्दु०" " - ` ˆ" ॥
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११०४
शब्दब्रह्म भे पारंगत व्यविति परब्रह्र भ भाम्ति कर, सक्ता. हं । ९ सिदत 9४ बात कौ
सूचना देता है कि .साघक फो पहिले शन्दशापितं {रट उसकी मराद. त्था, ९नि.का, ज्ञान हे\
यदि उसे शब्द के वाच्यार्थं भागार्थं ओर तात्पय्रिन्कीपक्य क-दोघ नही हे. तो इह मर सकता हे ।
वस्तुतेः शब्द भावों फे टोने का एक रंगड़ा वाहन हं । जब तक संकेतग्रहुण न हो तब तक उसकी
कोड उपयोगिता ही नही है! एक हौ शन्द संकेतभेद से भिन्न भिन्न अर्थो का वाचक होता है ।
इसीक्एि दरशनक्ञास्नों मे एक पक्ष यह् भी उपलन्ध होता है किं ज्ञब्द केवल वक्ता कौ विवक्षा
को सूचित फरते है, पदां के वाचक नहीं हैँ । घर" शब्द का संकेत वक्ता ने जिस रूप में जितत
श्रोता को ग्रहण करा दिया है उसी अभिप्राय का योतन वह् शब्द उस श्रोता को करा देगा) शब्द
विद्यमान अथं को भौ कहता ह ओर अविदयमए्न को । एकं खरविषाण भी शब्द है जिसका अंड वाच्य
पदार्थं इस संसार मे नहीं है भौर घट शब्द भौ है जिसका वाच्य घड़ा मौजैद हं! अतः शब्द के
सम्बन्ध में पह निश्चय करना कि-यह् शब्द अर्थवाची है ओर यह अन्थवाची.-्डी सीर ह । फिर
्
भी दाव्दिकों ने यह् प्रयत्न किया है शब्द फे साथकत्व भौर अन्थकत्व फा विवेक हो जाय।
उसका सृख्य उपाय ह शक्तिग्रह था संकेतग्रहण । जिस अथं मे जिस शव्द का संकेतग्रहूण
होता है बहु उस अर्थं का वाचक हो जाता ह! यह् संकेत कब किसने ग्रहण कराया इसका निर्णय
कठिन ह । ईश्वर को संकेत ग्रहण कराने के लिए घसीटना श्रद्धा को वस्तु है। इसका इतनाही
अथं हँ कि वृद्धपरस्परा से शब्द संकेत का ग्रहण बराबर होता आया है ओर वह् अनादि ह । उसमें
विशेष हेर फर होकर भौ सामान्यतया संकेत कौ परस्परा अनादि है! जब सेयह जीव है तभीसे
शाव्दसंकेत है ! इस संकेतग्रहण के उपाय निम्न ल्िचित है :--
““शकितग्रहं व्याकरेणोपमानकोशाप्तवाक्याद् व्यवहारतदच ।
वाक्यस्य रोपाद् विवृतेवंदन्ति सा्िध्यतः सिद्धपदस्य वृद्धाः 11"
अर्थात्--व्याकरण, उपमान, कोश, आप्तवाक्य, व्यवहार, वाक्यशेष, विवरण ओर प्रसिद्ध शन्दके
सातिध्य से संकेत ग्रहण होता है! इनमे व्याकरण से यौगिक शन्दों का उयुत्पत्ति हारा संकेत ग्रहण
हो भी जाय पर रूढ ओर योगरूढ शब्दों का संकेत ग्रहण व्याकरण से नहीं हो सकता} अन्ततः
फोडश ही एक एसा उपाय बचता है जिससे सभी प्रकार के शब्दों का संकेत-ग्रहण हो जाता है!
कोश॒ अर्थात् खजाना या भंडार। व्याकरण से सिद्ध या वृद्धपरम्परा से प्रसिद्ध कैसे भी
यौगिक रूढ या योगरूढ आदि शब्दो का अनेकां के साथ संग्रह कोश में होता है। भाषा वही समृद्ध
ओर जीवितं समसी जाती है जिसका शब्द भंडार पर्याप्त हो ओर जिसमें व्यवहार भौर परमार्थं
के किए उपयोगी सभी शब्द विदयमान हों । जिसमें अन्य भाषाओं के या विदेशी शब्दों के पचाने
कौ या उन्हु स्व-स्वरूप करने को सामथ्यं हो! इस दृष्टि से संस्कृत भाषा उत्तनो समृद्ध नहीं वन
सकी 1 इसका फारण यहं रहा ह फि इस भाषा पर एक वग का प्रभुत्व रहा मौर उसने इसकी
पाचन शद्ति फो धमं अधमं के कल्पत बन्धन से जकड़ दिया था। उस वगं ने उत्त युग में प्रचलति
अपथ्रंश ओर प्राङ्त बोल्यिं का जो उस्र समय कौ जनवोलियां यीं उच्चारण करना पाप पोपित
क्रिया या। फिर-भी संस्कृत फी जो प्रकृति प्रत्यय उपस्रगे आदिं के योग से शव्दोत्पादन शक्ति थी
८ नाममा ॥
उसीफे कारण यहु वन्धनवद्र होकर भी विद्रदूभोग्य अवव्य वनी रहौ। सस्त कौ लोकभाषा का
पदया सवकी बोली होने का सौभाग्य नहीं मिल सका । दस आपा सम्बन्धौ धर्माधम विचार ने
संस्फत के कोश्ागार को भी सीमित कर दिया। |
भाषा के एकाधिकारियों ने तो यहां तक कह उस है फि यपश्चंदा या भन्य छोकभाया
फे शब्दों मे वाचक श्विति ही नहीं है। यष्टि फा यप्च ठ्ट्टीयालाटीहं। ये ्ट्टी या काटी
शब्द मे वाचकटराविति स्वीकार नहीं करना चाहुते। इनका कहना ह कि वाचकदाविति तो ष्टि
छब्द मेही रहै 1 छ्द्टी या लाटी शव्द सुनकर जौ श्रोता को छाटी पदार्थं का ज्ञान टोताह
उसकी विधि दस प्रकार ह--प्रयम ही श्रोता लाटी शब्द को सुनकर संसृत “यष्टि शव्द
कां स्मरण करता है भीर फिर उस "यष्टि" क्ञब्दं से पदाथवोध होता ह! सर्थात् एसे श्रोता को
जिसने स्वन्न में भी यष्टि" शब्द नहीं सुना उसे भी काटी श्रन्द से पार्थं योध के लिए संस्कृत
ध्यण्टि शव्द का स्मरण आवदरयक है। ५
इस भापाधारित वर्गप्रभूत्व से संस्कृत भाषा एक चि्षिष्ट वर्गे को भाषा वन कर रह गई!
पा० महाभाष्य के पस्पशा आद्भिक में चखा टै रि--“तस्माद् ब्राह्मणेन न म्लेच्छितवै, नापभापित वै,
म्लेच्छो ह वा एप भपदाव्दः।“ अर्थात् ब्राह्मण को न तो म्लेच्छ शब्दों का व्यवहार करना चािए
ओौर न अपथंश का ही । अपशब्द म्लेच्छ ह । अपशब्द का विवरण भी बहुं यहु दिया ह--'यदि
तावच्छब्दोपदेः क्रियते, गौरित्येतस्मिन्नुपदिष्टे गम्यत एतद् गाव्यादयोऽपरच्दा इति ।” अर्थात्-गौ शब्द
है मौर गावी मेया आदि भपब्द ह ।
८
यद्यपि भाषा को संस्कृत रखने के किए व्याकरण का संस्कार अवश्यक हु तभी वहु एक .
अपने निष्चित रूप में रह सक्ती है, लिगि ओौर वचन का अनुशासन भी इसीलिए मावश्यक होता -
है, परम्तु उसके उच्चारण मे किसी जाति विशेष काया वग विश्लेष का अधिकार मानने से उसकौ
व्यापकता तो स्क ही जती हं । नाटकों मं स्त्री, शूद्रो तथा दासों से प्राकृत भाषा का बुलवाया
जाना उक्त रूढि का ही साक्षी ह।
इतना ही नही, धर्मक्षेत्र मे साधू शब्द अर्थात् संस्कृत शब्द का उच्चारण ही पुण्य माना गया 1
इसका यह सहज परिणाम था कि ध्मकाव्का भी भाया प्रभुत्व के द्वारा एक वग विक्षेष को
मिला । हुमा भी यही । धम का अधिकार ओर उससे आर्थिक सम्बन्ध एक वर्ग का हौ शया
इस सम्बन्ध में मौलिक क्रान्ति महाश्रमण महावीर ओौर वद्ध ने की ¡ उनने भावा के इस
कल्पित वन्धन को तोड़ कर जनभावा में धमं का उपदेवा दिया भौर स्त्रीशूद्र तया पामर से पामर
व्यक्तियों के लिए ध्म काक्षेत्र खोला। धमं के उच्च पद के किए जाति का कोई बन्धन इनने
स्वीकार नहीं किया । इस भाषाक्रान्ति से प्राकृत भाषाभों का विकास हुमा । यह् नहीं है कि प्राकृत
भाषाएं व्याकरण आर लिगानुश्ञासन से मुक्त हों । उनके अपने व्याकरण है, अपने नियम ह, जिनके
अनुसार वे पल्लवित पप्पिति ओर फलति होती रही हँ ।
महावीर ओर बुद्ध के काल से लेकर ईसा की तीसरी सदी तक प्राकृत भाषाओं को गति
मिलती रही ! भशोक के क्षिलालेल प्राकृत भाषा मं उपलन्ध होते है। श्रासनादेक प्रकृत भाया में
चरते रहै है । पुनः संस्कृत युग में इन भापामों की गति मन्द पड़ी) इस युग मे जैन भर बौद्ध
आचार्यो ने भी ग्रन्थरचना संस्कृत मे ही की ) यही कारण है कि दोनों के विपुल साहित्य से
संस्कत का कोश्ागार भरा हभा हैँ! दाज्ञेनिक क्षेत्र मे उथल पुथ तो नागार्जुन दिग्नाग समन्तभद्र
सिद्धसेन अकलंक आदि के ग्रन्थों से ही मची। तात्पर्यं यह कि श्रमण परम्परा ने मध्यकाल में
संसृत भाषा के विक्रा मभौ अपना महस्वपु्णं योगदान किथा ।
प्रस्तावनां
प्रस्तुत ग्रन्थ-
नाममाला फो क्रा एक सुन्दर ओर स्यवहारोपयोगी मावश्यक शब्दो से समृद्ध ग्रन्थ हं) सह् ~:
कवि धनञ्जय ने २०० श्लोको मे ही संस्कृत भाषा के प्रमुल प्राव्दो फा चयन फर गागर में सागर
भर दिया ह! श्दे से शब्दान्तर बनने फौ इनकी अपनी निराली पदति हं! नेसे पृथिवी के नामों
फे आगे धरः शब्दे जोड देने से पर्वत फे तास, 'सनुष्य' के नामों के अगे पति" शन्द जोड देने से
राजा के नाम, ववक्ष फे नामों के आगे (चर' शब्द जने पर बन्दर फे नामों का बन जाना आदि
इसपर अमरकीति विरचित भाष्य सर्वप्रथम प्रकाशित क्या जा रहा है। इस भाष्य में प्रत्येक
शब्द फी व्याकरणत्तिद्ध स्युत्पत्ति सुत्ननिर्देश पूर्वक वताई गई ह! उणादि से सिद्ध हौ या अन्य रौति
से पर कोई भौ शत्द निब्पुत्पत्ति नहीं रह पाया ह! इन व्यत्पत्तियो कौ प्रामाणिकता के लिए महा-
पुराण, पदनन्दि शास्त्र, यशस्तिलक चम्पू, नोतिवाकषयामृत, दविसन्धानकान्य, वुहुत्तिक्रमण भाष्य, महाभारतः
सप्तिमुक्तावली, शब्दभेद, अनेकायेष्वनिमजञ्जरी, अमरसिहु भाष्य, आआश्ाधर महासिषेकः नीतिसार,
¦ श्ाकष्वत, हैमीनाममाला आदि ग्रन्थों तथा यश्ःकौति, अमरसिहं, आधार, इन््रनन्दि, क्षीरस्वामी;
` पदनन्दि, भीभोज, हतायुघ आदि ग्रन्थकारो फो नास निर्ेशपरवेक भ्रसाणकोटि से उपस्थित किया
^ हि! अनेक ब्धुत्यत्तियां तो अमरकीति कौ कल्पना फे अच्छे उदाहरण हैँ । यथा--
“श्चियन्ते कषदरजन्तवोऽस्य स्परोनेति मरत्“ अर्थात् जिसके स्पश से कषदर जन्तु मर जाय वह् भस्त् है !
न नन्दति भ्रातृजाया यस्यां सत्यां सा चनान्दा जिसको मौजूदगी मं भौजाई खुक्लनदहो
वह॒ ननांदया-तनद है ।
“यज्ञानां परुकारणलक्षणानामरिः यज्ञारिः” अर्थात् पदयुयत्न का पिरोधी महादेव हँ ।! आदि 1
इसके साय ही एक अनेकार्थं निघण्टु भी मुद्रित किया गया है! इसके अन्त भें निम्नलिखित
पुप्पिका लेल हं --इति महाकनिधनञ्जयङेते निषष्टुसमये शष्दसंकीर्णे अनेका्ेपररूपणो हित्तीय-
परिच्छेदः ।'* इसकौ एक सात्र अशुद्धतम प्रति पं० जुगलकिश्लोरजी मुख्तार अधिष्ठाता वीरसेवा-
मन्दिर से प्राप्त हुई थी! रचना शेलो आदि से यह् निश््वय पूर्वेक नहं कहा जा सकता किं यह्
॥ उस्हीं धनञ्जयको कृति है, यपि पप्पिका वाक्य में स्पष्ट रूपसे धनञ्जय का उल्लेख ह । इसके
त सराय ही एक अन्नातकतूंक एकाक्षरी फोप कामी मुद्रण किया ह! इसकी हस्तकलिछित प्रति भी वीर-
॑ सेचा-मन्दिरसे ही प्राप्त हृद थी।
परस्त॒त संस्करण ४
अमरकीतिङेत भाष्य को एकमात्र अशुद्ध प्रति एेलक पश्नालाल सरस्वतो भवन स्षाररा-
पाटन से प्राप्त हुई थौ) इसोके आधार से इसका सम्पादन पं० शम्भुनायजी च्निपाठी ने किया
हं संस्करण भे जो अनेक परिशिष्ठ हं वे सवं॒पं० महादेवजी चतुवेदी- व्याकरणाचार्य॑ने तैयार
कि हं । र्प्पणियां पं० क्षंभुनाय जौ त्रिपाठी ने बडे परिकषम से लिली है । मुप्ते यहु लिखिते
हए आनन्द होता है कि उनके सवेतोमृखी अमाध पाण्डित्य का परिचय दिप्पणों मे पद पद पर
भिता ह)
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ग्रन्थकार
[ महाकवि धनञ्जय ]
नाममाला के कर्ता महाकवि धननज्जय हू । इन्हे स्वयं भपने किसी ग्रथ में अपने समय भादि
के वारे मेँ निर्देश हीं किया हं! ये गृहस्य थे। द्िसन्यानकाव्य के भन्तिम द्लोक की व्या्या में
उसके टीकाकार ने धनञ्जय के पिता कानाम वसुदेव, माता का नाम श्रीदेवी मीर गृह का नाम
दशरय सुचित किया ह! इनकी ख्याति द्विसन्धानकवि' के नाम से थी) नाममाला के अन्त में
पाया जानेवाला यह शक स्वयं इसका साक्षी ह :--
श्रमाणमकलद्भुस्य पूज्यपादस्य लक्षणम् ।
दिसन्धानकवेः काव्यं रत्नवरयमपद्चिमम् 11
अर्थात्-मकल देव का प्रमाण शास्त्र, पूज्यपाद फा लक्षण~व्याकरण शास्त्र सौर द्िसन्धानकवि का
दिसन्धानकान्य ये तीनों मपुवं रत्नत्रय ह । यह् इटोक नाममाला के भाष्यकार अमरकीति के सामने
था, उनने इसकी न्याद्या भी कौ ह । इसमें इनका उप-नाम् ्िसन्धानकवि' समुचित किया गया हं !
ठीक भी ह; व्योकि महाकवि धनञ्जय की सर्वश्रेष्ठ चमत्कारिणी कृति द्विसन्ानकाव्य ही ह
वादिराज स्रि ने पादर्वनाय चरित के प्रारंभ मे द्विसन्धान कान्य कौ प्रशंसा करते हृएु ल्वा ह :-
“जनेकभेदसन्धानाः खनन्तो हृदये मुहुः ।
वाणा धनञ्जयोन्मुक्ताः कर्णस्येव प्रियाः कथम् ।“
अर्थात् घनञ्जय के वारा कहे गए भनेक सन्धान-मर्थभेद वाजे मीर हृदयस्य चचन कानों कौ ही
त्रिय कैसे ल्गेगे जसे कि भर्जुन के वारा छोडे जाने बति अनेक लक्ष्यो के भेदक मर्मभेदी वाण कर्णं
को प्रिय नहीं लगते?
द्विसन्धान काव्य अपने समय सं पर्थाप्ति प्रसिद्धि प्राप्त कर चूका था। इसका उल्लेख धारा-
धीश्च भोजराज के समकालीन भाचायं प्रभाचन्द्र ने अपने प्रमेयकमलमार्तष्ड (पृ० ८०२) मेंकियाहे।
जल्हण (१ २वीं सदी) विरचित सूक्ति मुक्तावल्यी में राजशेखर कं नाम से धनञ्जय को ध्र
शंसा में निम्नलिखित पद्य उदृत ह:-- |
“द्िसन्धाने निपृणतां स तां चक्रे धनचञ्जयः।
यया जातं फलं तस्य सतां चक्रे धनञ्जयः ॥“ ।
इस शलोक में राजशेखर ने धनञ्जय के द्विसन्धानकान्य का मनोमुग्धकर सरणि से उल्लेख
कियाहं 1
धनञ्जय कवि के हारा एक विपपहार स्तोत्र भी वनाया गया ह । यहु अपने प्रसाद भन
सर गाम्भीर्यं के चिए प्रसिद्ध ह! कहते हँ फि यह स्तोत्र कवि ने अपने सपदष्ट पुत्र का चिप
उतारने के चिए बनाया था। ।
समयविचार-
इनके समय निणय के लिए निम्नलिखित प्रमाण हं :--
(१) प्रमेयकमलमार्तेण्ड आदि के रचयिता प्रभाचन्द्र (ई० श्वौ सदी) ने इनके द्िसन्धान-
1
काव्य का उल्लेख किया हं सतः ये र्वी सदी के घाद के बिद्रान् तो नहीं हे।
भस्तावनता
(२) इसी तरह वादिराज सूरि ( सन् १०३५ ) ने पाइ्वेनाथ चरित में धनञ्जय मार
हविसन्धान का निर्दे किया हं अतः यें श्श्वीं सदी फे बाद के नहीं हं)
(३) लल्हण (रवौ सदी) ने राजशेखर फे नाम से सूवितमुवेतावली मं जो पछ उद्धृत
किया हैः चहु राजशेखर कात्यसीमांसाकार राजशेखर हे! इनका उत्लेख सोमदेव
(ई६० ९६०) के यशस्तिलक चभ्परु मे पाया जाता हं अतः राजशेखर का समय ई०
१०बीं सदी सुनिश्चित है । राजज्ञेखरफे द्वारा रशंसित होने के कारण धनञ्जय का समय
श०्वौं सदी के वाद क! नहीं हौ सकता!
(४) डं° हौरालाल्जौ ने षट्रंडागम प्रथम भाग कौ प्रस्तावना (पृ०६२) में यहु सूचित
किया है कि जिनसेन के गुर वीरसेन स्वामी ते धवला टीका (पृ० ३८७) में अने-
काथं नाममाला फा निम्नलिखित शलोक प्रमाणल्प मं उदेत क्या हे:--
““हेतावेवं प्रकाराचैः व्यवच्छेद विपर्यये ।
परादुभप्वि समाप्तौ च इतिरब्दं विदुर्बुधाः 1"
यह श्लोक अनेकाथं नाममाला का है! धवबलाटीका विण सं० ८७३ सन् ८१६ में
समाप्त हई थी अतः घनज्जय का समय श्वी सदी के बाद नहीं हो सकता ।
(५) धनञ्जय ने अकलंक देवं का उल्लेख श्रमाणमकलङ्स्य' शलोक में क्या ह 1 अकलक
का समय ई० ऽव सदी निश्चित् है" अतः धनञ्जय ७वीं सदी से पूर्वं के नहीं हो सकते ।
संस्कृत साहित्य का संक्षिप्त इतिहास कं लेखकर्हेय ने धनञ्जय का समय ई० श१२वां शतक
का मध्य निर्धारित किया हं! (प० १७४) उने अपने इस मत की पुष्टि के च्िषएु ० के०ची
पाठक महाशय का यह मते भौ उद्धृत किया है कि--“"धनज्जय ने द्िसन्धान महाकाव्य कौ रचना
ई० ११२३ र ११४० के मध्य मे फी है" । पर उपरोक्त प्रमाणो के आधार से धनञ्जय का समय
ई० ८ वों सदी का अन्त ओर नवीं क। पूर्वां सिद्ध होता ह । जल्टण की सुक्तिमूक्तावली में जो ई०
श्वी सटी कौ रचना है" राजशेखर कं नाम से उद्धत सन्धाने निपुणतां! शलोक काव्थमीमांसा-
कार राजशेखर काही हो सक्ता हः न कि प्रदन्धकोदा के कर्तां राजशेखर का। संस्कृत साहित्य
के इतिहास के रेखकद्य यह भ्रान्ति कर वैठे है, वे स्वयं जल्हूण -को श्र्वीं सदी का चिरान्
लिखकर भी उसमें उद्धृत राजशेखर फो श४्वीं सदी का जेन राजशेखर घतते हें
अतः धनञ्जय का समय उपर्णुक्त प्रमाणोके आधार से ई० थवीं कः उत्तर भाग ओर नवीं
का पूवं भाग प्रमाणित होता हे।
भाष्यकार अमरकीति-
महापण्डित अमरकोति ने नाममाला के भाष्य के अन्त भै यह् पुष्पिका वाक्य लिखा हैः--
“इति महापण्डितश्नीमदमरकौरत्तिना नैवियेन श्रौ एेद्वंशगत्यन्तेन शब्दवेधसा कताय घनञ्जयनाम-
मालायां प्रथमकाण्डं व्याद्यातम्'" इससे इतना ही ज्ञात होता हे कि अमरकीति श्रैविद्यः उपाधि से
विभषित ये ओर वे सेन््रवंश्ष (सेनवंश) में उत्पन्न हुए ये।
रोने अपने को शन्दवेधा' उपाधि से अलङ्कृत क्या हं
सगल श्लोकों में पुज्यपाद अकलङ्कः विधानन्दि आर समन्तभद्र के पाय ही साये एक कत्याण-
१. इसी के जाधार से कल्पद्र्कोस की प्रस्तावना ( ?. अर्ता ) मेंश्री रामावतार शर्मानेभी
भी धनञ्जय का समय रवौ सदी क्सि ।
4. । नाममाला
#
फोति फो भौ नमस्कार किया ह। इन्दनिं ग्रन्थ फे वीच में जहां भावदयकता भी नहीं ह वहां भी
अपना नाम देने में संकोच नहीं फिया ह। फर स्थानों पर धनञ्जय के दलोकों फी उत्थानिका में
भी “सम्प्रति मनृष्यवगं आरभ्यते भमरकौ्तिना” (पृ० १३) वदि लिलाहं।! जो स्पष्टतः ओम
उत्पन्न करता हं! एक जगह तो घनञ्जय फे इस शलोकांश कौ व्याख्या करते हृए स्वयं पना ही
नाम लिखि दिया है--“वारिधिर्वण्यतेऽधुना। अधुना इदानीं वारिधिरवण्यते कथ्यते । केन भाष्यकर्ना
श्रीमदमरकीतिना । स्पष्टतया यहां "केन का उत्तर धनञ्जयेन" होना चाहिए था!
अमरकीति नाम फे तीन विद्रानों का पता लगता ह :--
(१) शछवकम्मोवएस' आदि ग्रन्यों के रचयिता जमरकीति! । इन्दने वि० सं० १२४७ भदों
सुदी १४ के दिन छ्कम्मोवएस ग्रन्थ समाप्त किया था । अर्थात् ये ईसवीय १२ वौं
सदी फे अन्तिम भाग गीर तेरहवीं के प्रारम्भे गे विद्यमान थे। ये अमित्तमति याचाय
की परम्परा मे हृद हैँ! इनकौ गुरु परम्परा यह् ह --अमितगति, शान्तिपेण, ममरसेन,
श्रीपेण, चन्द्रकोत्ति ओौर चन््रकौति के दिष्य अमरकीति।
(२) वर्धमानं के प्रगुरं अमरकोति । इनको परम्परा इस भ्रकार ह * 1. , . देवेन विज्ञालकीत्ति,
शुभकीति, धर्मभूषण, अमरकोति,. . . ° -धर्मभूषण वर्धमान । वधमान ने शक संवत्
१२९५ वैशाल सुदी ३ बुधवार को धरमभूषण कौ निषधा वनवाई थी} इस शिलाेख
के अनुसार अमरकीति का समय शक १२५० क आसपास सिद्ध होता ह। ये ईसवीय
शण्वीं सदी के विदान् थे। इनके इस समय का समर्थन शक १३०७ मे उत्कीर्ण वि-
जयनगर के शिलाकेख से भी होता है!
दशभक्त्यादि महाशरास्त्र के रचथिता वर्वमान के समकालीन, विद्यानन्द के पुत्र विजाल-
कीति फ सधर्मा अमरकीति । इनके सम्बन्ध में दज्ञभक्त्यादिज्ञास्त्र में ल्वा ह :--
“जीयादमरकीत्यस्यिभद्रारकरिरोमणिः।
विशाककीतियोगीन््रसधर्मां शास्वकोविदः ॥
अमरकीतिमुनिविमलारयः कुसुमचापमदाचर्वजभृत् ।
जिनमतापहतारितमार्च यो जयति निर्मक्धरमेमुणाश्रयः ।1'
अयत्-शास्त्रकोचिद विमलाशय कामजेता नि्मेलगुण ओर धमं के भाश्रय तया जिनमतके
प्रकाञ्चक जमरकौति भेटरारक विश्ाठकोति के सधर्मा ये।
विशालकौति के पिता विद्यानन्द का स्वर्गेवास्त श्षक १४०३ सन् १४८१ मं हुमा था। यह
उल्लेख द्भक्त्यादि महाशस्त्र मेँ विद्यमान हैः । भतः उनके पुत्र विद्ालकीति के सधर्मा अमरकीति
का समय करीव सन् १४५० अर्थात् ईसनीय १५ वीं शताब्दौ सिद्ध ॒होता है" । दह्ाभक्त्यादि शास्त्र
का समाप्तिकाल १४०४ शक अर्यात् १४८२ ई० हे ।
१. देखो डा० हीरालाठ का “अमरकीतिगणि मौर उनका पट्कर्मोपिदेदा' केव । जैन सि० भास्कर
भाग २ क ३।
२. जैन रिकाठेख संग्रहका ११ वा दिलाक्ख।
प्रयास्तिसंग्रह के सम्पादक प° कै° भुजवी शास्त्री ते श्वाके वद्धिलराव्धिचनद्रकरिते संवत्सरे
का अयं शक १४६३ किया हँ । जव कि दरभक्त्यादि शास्त्र की समाप्ति सचक यावे वेद रान्ि-
चन्द्रककिति' का अयं १४०४८ क किया है । दोनों जगह ख का शून्य ठेना चाहिये । यदि दशभ-
नत्यादि यास्व शक १४०४ मे समाप्त हुमा हँ तो उसमें शक १४६३ भे हई विद्यानन्द कौ मृत्यु कौ
चर्चा कंसे मा सकती हँ ¡ ४. देखो प्रद्स्तिसंग्रह, प० १२८
44
(३
\
ग्रन्थकार
दनं तीन असरकीति में प्रस्तुत ग्रन्थ फे रचयिता छक्कम्मोवएस फे रचयिता नहीं हो सकते
यकि उनका काल वि० १२४७ फे आसपास है, जव कि नाममाला के भाष्य (पु० ६२) मं आक्ञा-
धर के महाभिषेक से उद्धरण दिया ह। आज्ञाधर ने अपना अनगारधर्मामूत वि० १३०० मे समाप्त
किया था! अतः प्रथम अमरकोति इस ग्रन्थ फे रचयिता नहीं हौ सकते ।
स से यह् निष्कषं निकलता हे फि प्रस्तुत ग्रन्य फे भाष्यकर्तां अमरकीति वि० १३०० अर्थात्
ईसवीय १२४२ तेरहवी सदी के पहिले फे विदान् तो नहीं है । इन्होने भाष्य में भोज (श्वी
सदी) इन्धनन्द (१० सदी) पदमनन्दि (१२वीं सदी) सोमप्रभ (१२वीं सदी) हेमचन्द्र (१२-१३बी
सदी) आदि के ग्रन्थों से श्यौ नामोतल्टेख पूर्दक अवतरण लिए हैँ! शेष दो अमरकौति पृथक् भ्यवित
तो है ही। द्वितीय अमरकौति की प्रशंसा मे विजयपुर के शिलाकेख में निम्नलिखित पद्य मिलते हँ -
“रिष्यस्तस्य गुरोरासीदनगेरतपोनिधिः।
श्रीमानमरकीत्यर्य देशिकाग्रेसरः रामी ॥
निजपक्षपुटकवाटं घटयित्वानलरोधतो हृदये 1
अविचकितबोधदीपं तममरकीति' भजे तमोहरणम् 1॥"
अर्थात्-अमरकीति महान् तपस्वी ज्ञान्त ओौर म्बी समाधि ऊगानेवाले योगौ थे ।! इस वर्णन से
ज्ञात होता है फि ये अमरकीति शास्त्रकार की अपेक्षा योगी ओर तपस्नी ष्टौ विज्ञेष रूप से थे।
नाममाला भाष्य में जिस प्रकार कौ यशोलिप्सा टपक्ती है वहु एक योगी ओर तपस्वी में नहीं
हो सक्ती 1 अतः मेरे विचर से द्वितीय अमरकौति भी प्रस्तुत ग्रन्थ के रचयिता नहीं है ।
तुतीय अमरकौति के वर्णन सें “शास्त्रकोविद' विशेषण उनके पाण्डित्य का निर्देश कर रहा है।
अतः हमारे प्ररत भ्रन्थकार दशभवत्यादि महाशास्त्र फे रचयिता वधमान के समकालीन, विद्यानन्द के
पुन्न विशालकोति फे सधर्मा अमरकीत्ति हं \ ये सन् १४५० के आसपास अर्थात् प्रह्वी सदी के
विद्वान् ये 1 इस समय का साघक एक प्रमाण यह भी हो सक्तां है कि इनने कत्याणकौति को
नमस्कार किया ह 1 कल्याणकौति का एक जिनयन्तफलोदय ग्रन्थ मिलता ह!" उसकी प्रशस्ति से
ज्ञात होता हे कि ये भेटारकं ललितिकीति के शिष्य थे! कल्याणकीति ने जेठ सुद ५ शक संवत्
१३५० में जिनयज्ञफलोदय समाप्त किया था \ अर्यात् सन् १४२८ में यह् म्रन्थ समाप्त हुमा था ।
यदि यही कर्याणकीति अमरकीति के हारा स्मृत हुए है, तो मानना होगा कि अमरकीत्ि पन्दरहुवीं
सदी के विद्वान् हें!
अभार्
इस श्रन्थ के सम्पादक पं० शम्भुनाथजी त्रिपाठी स्याकरणाचायं सप्ततीर्थं अनेक शस्त्रो
के गंभीर विद्वान् हैँ! वर्णो तक उनने जेन विद्यालय इन्दौर मेँ साहित्य ओर व्याकरण का
अध्यापन कराय! है! वे जेन परम्परा से पुरी तरह परिचित हँ! उनके जसे अगाच ज्ञानी निरह्डगरी
ओर विद्याजीवी विद्वान् विरल हं । उनके तलस्पर्शी गंभीर पाण्डित्य का निदर्ञंक यह संस्करण हं ।
ज्ञानपीठ इस ग्रन्थ के सम्पादक के शूप में उन्दुं पाकर गौरवान्विति ह 1
डोँ° पौ० एल० वेय ने इस प्रन्थ का प्राक्कथनं लिखकर हमे उपकृत क्या है । पं० हर-
गोविन्दजी शास्त्री व्याकरणाचा्यं ने अनेकां निषण्ट् का सम्पादन किया है 1 पं महादेद चतुर्वेदी
ने सम्पादन परिशिष्टनिर्माण ओर भूर संशोधन में पूरायोग दिया ह! पं० त्रजनन्दनजी मिध
व्याकरणाचायं ने नी प्रेत फापो जादि में पूरा सहयोग दिया हे ! गुलावचनरजी व्याकरणाचायं एम० ए०
१ देखो प्रशस्ति संग्रह प्० १६1
१४ नाममाला
ने प्राक्कथन का हिन्दी अनुवाद किया हं । १० जुगकिश्नोर जी मुष्तार ने भनेका्यनिधण्डु मीर
एकक्षरी कोकश्च को प्रति भेजी । पण श्रीनिवात्तजी वास्त्री ने माप्य कौ प्रति भेज कर अनुगृहीत
कियादहू। । |
भारतीय ज्ञानपीठ के संस्थापफ सेठ शान्तिप्रसाद जौ तया भध्यक्षासी० रमा रानीजीकी
संस्कृतिनिष्ठा, उदार दृष्टि, ज्ञानानुराग मौर सौजन्य इत सस्या के जीवन हं । भमपनी स्व पृण्यदलोक्रा
माता मृत्तिदेवी के स्मरणार्थं मूतिदेवौ ग्रन्थमाला के संस्कृत विभाग का यह् छां ग्रन्य प्रकाशित हो
रहा हं। दस भग्र दम्पति से एसे ही अनेक लोकोदयकारी संस्कृत्तिक कार्यो कौ भान्ना ह।
इस संस्था के कर्मनिष्ठ मन्नौ श्रौ अयोध्याप्रसाद जी गोयल्ठीय की कायंदृष्टि, सस्परेरणा मीर प्रयत्न
सेइस संस्था का इस रूप मे सञ्चालन होरहा हैं) में इन सव कामाभार मानताहूं।
भारतीय ज्ञानपीठ काशौ,
पीप शुक्ल १५ महेन्द्र कुमार जैन
वीर ° २४७६ ग्रन्थमाला सम्पादक
३।१।५० |
प्रकदान-न्यय
४००) कागज २० रौम २९०८२९/३२ पौण्ड ५४५।1\) कार्यालय व्यवस्या प्रूफ संशोधन आदि
९७९५) छपाई पृष्ठ १९६ दर ५०) प्रति फामं ४२६} सम्पादन
२००) निल्द वेधाई ५००५} मैट आलोचना, विक्ञापन आदि
६०} कवर छपाई ७८७11) कमोडन
४०) कवर कागज
कुल जागत ३९३४}
१००० प्रति छपी । जागत एक प्रति २।।)}
भूत्य ३।।)
=~~~--------------------~-
सभ्या नाममा
अनेकाथनिघरटुः एकात्तरी कोशश्च
पहाकविधनञ्चयप्रणीता
नानमनल -
~) स् श्व्छ न न
प्रसर्छीलिविरवितमाष्योपेता
----<==~९* <~ - - --
श्षीपूञ्यपादमकलङ्कमनन्तोधं विच्यादिनन्दिनिमिनं च समन्तभद्रम् ।
कल्याणकीर्तिममलं अ्रणिपव्य वीरं भाष्यं करोमि परमं बुधतुदधिसिद्धये ॥ १ ॥
सरस्वत्याः प्रसादेन रच्यतेऽमरकीरतिना ]
भाष्यं घनज्जयस्येदं वालानां धीविब्रदये 1 २॥
यद्यपि धनज्ञयो ८ येनो ) क्तो भावो वक्तुं न शक्यते ।
तथाऽप्यहं प्रवच्यामि वाग्देव्याश्च प्रसादतः ॥ ३॥
पू्वाचाय॑कृता पायो ब्युत्पत्तिरुपदिर्यते ।
क्वापि क्वापि स्वनरुदवाऽपि कम्यतामच मे बुधैः ॥ ४ ॥
शिष्टासमाचार ( ष्टचार ) परिपालना नमस्कारसमुद्गतघमंदारेण निर्विष्नशास्रसमाप्त्य्थं
च धनञ्जयः इष्टाधिक्रतदेवतानमस्कारायें श्लोक्माह--
तन्नमामि परं ज्योतिरवाद्सनसगोचरम् ।
उर्मृरयत्यवियां यद् विद्यसुन्मीरयत्यपि ।१॥
तत्परं उ्योतिः-
(णमो अरहंताणं णमो सिद्धाणं णमो आइरियाणं । णमो उवञ्मायाणं णमो लोए सन्बसा-
हूं ॥'* ईटम्विधम् ] नमामि नमस्करोमि 1 किंविशिष्टम् १ छवाङ्मनसगोचरम् वाक् च वाणी मनसं?
च चित्तं वाङ्मनसे तयो्वाङ्मनसयोन गोचरं न प्रत्यद्तीभूतम् श्रवाङ्मनसगो चरम् अ्नलक््यघ्वरूपत्वात् ।
तथा चोक्तं शब्दभेदे--
-^नभन्तु 3 नभसा साधं मनसं मनस्राऽपि च । तमसेन तमः प्रोक्तं तपन्तु तपसा सह् ॥"
तथा च पद्चनन्दिशाघ्र-- ।
““भस्वानुमूर्ये भवेद् गम्यं रम्यं यचाटमवेदिनाम् । जाने तत्परं ज्योतिरवाङ्मनसगोचरम् ।+'
९ एततखनमस्कारातकमन्त्रप्रतिपायमहेस्सिद्धा चार्योपाध्यायसवंसाधुरूपमन ज्योतिः । २ नमं तु
नभसा साधंमित्यादिशन्दमेदोक्तप्रमाणतोऽकारान्तोऽपि मनसशव्द्ः साधुः 1 ३ सम्परतं निर्णयसागरयन्तरा-
लयमुद्रिते सब्दभेदग्रकाशभन्ये एतत्पयं किंञ्चिदन्यथोपलन्धम् । तदित्थम्-
ङ्मुदं मुदा चापि योपित्स्याद् योषिता सहं । तमस्तु तमसा प्रोक्तं रजखाऽपि रजः स्मृतम् ॥ ३५॥
स्तर कालप्रकपायदयपि मनसशब्दः प्रभरष्टस्तथापि तदानीन्तनमूलपुस्तके तत्तथेवासीदिति भषम् ।
ध, प० १० २२।९१।
१०
१५
०
१०
१५
१५
२ जअमरकीर्विविरचितमाप्योपेतां
यत् श्रविद्रां पापविद्राम्, चाटरकारसू्तम्, येयकसू्म्, चिच्रकर्मादिसूचम्, दत्यवरूचम्, गन्धरयै
सूत्रम्, पर्दसूचम्, ्रगदसूत्रम्, यौद्धस्जम्, मच्रसू्रम ग्रुतसूचम्, सजनीतिसचम्, चतसङगंस्चन्व \ गज-
तरगपुरपल्ली्रगोलड्गदण्डाच्जनानां [ च विद्या पाषविच्रा ] कथ्यते, ताम् उन्मूलयति मूलादुज्छेदयति ।
यत्* विद्यामपि उन्मीलयति स्थापयतीत्य्थैः ।
हयं दितयञुमयं यमलं चुगल युगम् ।
युग्मं हन्द यमं हतं पादयोः पातु जंनयोः ॥२॥
द्श युग्मे | हौ श्रवयवौ यस्य तद् द्यम्, 'द्वित्रिभ्यामयड् वा^ । द्धितयम् दवौ श्रवयवो
यस्य तद् द्वितयम् । उभयम् उभौ श्रवयवं यस्य श्द्ित्रिम्यामयद्” इत्यनुवतंमाने “उभाग्यां नित्यम्”
इत्ययट् न तु तयर् । यमं यमं लातीति यमलम् । युगं युगं लातीति युगलम् । युगडं युगडकं च । युं
युज्यते धर्मया युगम ¦ समाश्रयलन्यं युगम् । युग्मम् युनक्ति दवितीयेन युज्यते श्लिष्यते युग्मम् ।
"्युजिरचितिजां ष्मक्" 1; इन्द्म् दौ द्वावियर्थः दरनद्म् । यच्छुयुपरमत्यकत्वात् यमम् । दयाम्यामितं
द्वीतम्, दतमेव दतम् । पातु स्देद ।
ऋपिथनियतिरभिक्षस्तापसः संशितो व्रती
तपस्वी संयमी योगी वणी साधुश्च पातु वः ॥३॥
द्राद्त मुनौ । ऋपरति कालचयं जानातीति ऋषिः। ^रिपिशुचिगृनाम्युपधात्किः९* । तथा
केऽ--
॥ ""रेपणात्लेशराशषीनाण्पिमाहुमेनीपिणः 1
यतिः यो देदमात्रारामः सम्यग्वि्यानौलामेन तवरष्णासरित्तर्णाय योगाय शुक्लध्यानधर्म-
ध्यानाय यतते स यतिः । तथा च यशस्तिलकेः -- ।
“ध्यः पापपाशनाश्चाय यतते स यतिर्भवेत् ।”
मुनिः, तपःप्रमावात् सवं्मन्यते मुनिः 1 “मन्यतेः किरत उच्च ° ।" तया च--
८११मान्यत्वाद्प्तविद्यानां महद्धिः कीर्यते सुनिः ।
भियः भिक्षते इत्येवंशीलो भिक्षुः । “सन्न्ताशंसिमिक्षामुः"‡ ।“ तापसः, तपो विद्यते यस्य
स तापसः । शय्रर्+उ च ।* तपःसदखाभ्यां न केवलमस््यथ विनीनौ अण॒ च, वृद्धिः । संशित संशायते
सम संशितः। ५१ ४२्यतेव्र ते नित्यम् 1” व्यवस्थितविभाषया शो तनूकरणे इत्यस्य व्रतेऽय नित्यमिकारो
भवति, विकल्पो नास्ति । ती, “'हिंसाऽनृतस्तेयाजत्रह्मपरि्ेभ्यो विरतिवतम् १५ 12? व्रतं विध्तेऽस्य
ब्रती । तपस्वी “अनद्नावमोौदयेदृत्तिपरिसंख्यानरसपरस्त्यागवि विक्तशय्यासनकायक्टेशा बाह्य
तपः१६ । “्रायस्चित्तविनयवेयाघरत्तयस्वाध्यायन्यु्सरभध्यानान्युत्तरम् 1*७ तपस्व विदयते यस्येति
तपस्वी । संयमी, सयमनं संयमः इन्ियप्राणलक्तणः । संयमो विद्यते यस्येति संयमी । योगी, # युजिर् ५८
१. यत् इत्यघ्य पूवम् (तथा इति पदं योज्यम् । २. द° श०७।१।१५१ | ३. एतत्सूतरं ह°
श ० नोपलन्धम् 1 परतु द्धििम्यामयडूवा इत्यनुवतंमाने उमाभ्यां नित्यमिति टीकौक्तवचनात्तस्यमेवै-
तत्सूत्रमिति निश्चीयते । ४. कालवाचकयुगपरतयेवं व्छुसत्तिः, प्रकृतार्थ त॒ युगं लातीवयेव । ५. का० उ°
१।५७ इति च्पक् त्ययः कत्वं च । ६. गुनाम्नयुवधाकत्किः का० उ० ३।१५ दति विप्र । ७. यशतस्ि°
श्रा० ८, क० ४४ | ८. यती प्रयत्ने । इः सर्वधातुभ्यः का० उ० ३।१४ इपर | ६. यश० श्रा ८ कल्प
५४८ | १०. का० उ० ४३ इति विप्र | मनु श्रवयौधने | ११. यशण्श्रा० ८ कल्प ४४] १२. का
सू० ४। ४] ५१ | ६३.पा० स्.० ५।२।१०३ । १४. दयतेरित्वं व्रते निलयमिति पातन्जल्भाष्यम् ७।५}४१
१५. त० सृ० ७1१ | १६ त° स० 1 ९७ त° सू ¦ १८. एवस्चिहिताशस्थाने युजिर योगे रुधादौ
परस्मैपदी वुल् समाधौ वा दिवादौ ्रारननेपदी इत्येवम्पाठः सुगमः ।
९१८९१ ९॥।९०् । ४
योगे, युज समाधौ पर० युज् समाधौ वचा० दि° ] ्रास° युज् रुघादौ । पर० युज समाधौ वा दि° |
श्ात्म० % युनक्ति युज्यते वा इत्येवैशीलः योगी । युजभजेत्यादिना" विनिण् । वणी, वर्णो ब्रह्मचय॑मस्स्यस्य
वणौ । साघुः, शिष्याणां दीक्तादिदानाष्यापनपराङ्मुखः सकलकर्मोन्मूलनसमथौ मोक्तमागाऽनुषटानपरो यः
स साधुः । सिद्धि साघयति.साधययिष्यति वा साघुः | |
“स व्याख्याति न शास्त्रं न ददाति दीक्षादिकं च शिष्याणाम् ।
कर्मोन्मृलनरक्तो [धमे ] ध्यानः स चात्र साधूङ्ञेयः।।
“रकवापाजिमीस्वदिसाध्यशूहप्रणिजनिचरिचरिभ्य उण्" । वो युष्मान् पातु रक ।
दीक्षितं सोण्ड्यं शिष्यं च तमन्तेवासिनं चिदु; ।
चत्वारः शिष्ये । [दीक्षितम्] दीक्षा संजाताऽस्येति । उतारकितादिदशंनात्संजातेऽ्थं इतच् ।
मौरड्यम् मुण्डे मस्तके भवं वपनादिकं मौण्ड्यम्* । शिष्यम् , शिष्यते व्युला्ते गुरुणा शिष्यः
"'वज्दजुषीण शासुस्तुगुहयं क्यप् ।° गुरोरन्ते वसत्यन्तेवासी तम् । विदुः कथयन्ति ।
कृतान्ता-ममसद्भान्ताः
चयः सिद्धान्ते । लोकानां सन्देहस्य कृतः श्रन्तो विनाशो येन सः कृतात्तः । श्रागच्छुतीत्यागसमः,
श्मागमनमागमो वा ! सिद्धान्तो | सिद्धोऽन्तो ] निश्चयो यस्य स सिद्धान्तः, समयोऽपि । सवे पुंसि ।
ग्रन्थः चास्लमतः परम् ।॥ ४॥
ग्र्नातिः रचयतीति ग्रन्थः ¦ शास्ति शस्रम् ।
भूमिभूः परथिवी प्रथ्वी गहरी मेदिनी मही ।
धरा वसुमती धात्री क्षमा वि श्स्मेराऽ्वनिः ॥ ५॥
वसुधा धरणी क्षोणी क्ष्मा धरी क्षिति इः |
कुम्भिनीरो्वरा चोवीं जगती गौवसुन्धरा ॥ ६ ॥
सप्तविशतिर्भूमौ । भवति सर्वमत्र भूमिः । “ऊर्भिभूमिरस्मयः५ । भवय्यस्मात्सवे भूः ।
रेफान्तश्चाव्ययम् । प्रथते पृथिवी पृथ्वी च ! गुहयतीति < गहरौ । रुहरीति पाठः । न्याये मेद्यति स्निह्यति
मधुकेरभमेदोयोगाद् वा मेदिनी । मह्यते मही । मह पूजायाम् । धरत्यगान् धरा । वस्वस्तयस्या
वसुमती । दधाति संण्हाति मेषजाथं वेयो यामिति घाती । “कम॑शि ^ घेटः टन् ।” केचिदधातिरपीच्छन्ति।
रमणं क्षमा ` °। “पाऽनुबन्धभिदादिभ्यस्त्वङ? ° ।'” विश्वं बिभत्ति विर्वस्भसा । “नाम्नि तश्दृजिधारि
तपिदमिसहां संज्ञायाम्*९ 1" खप्रत्ययः । भूतानवति श्रवनिः । चियामीः । ° उ“"त्खरजधम्यश्यविच्रति
ग्रहिभ्योऽनिः 1“ अरनिः प्रत्ययः । वयु दधातीति वसु चा । धरति पर्वतानिति धरणिः । “ध्ूजो ऽनिः१४]'
स्तौति क्षुपम् क्ोखिः। ल्ियामीः । क्षोणी । ष्टुष्षु र कु शब्दे" । क्षमते भारं क्ष्मा क्माच। धरति
सवे घरि्नी । सयति कषयं प्राप्नोति प्रलयकाले क्सितिः । कायति कूयते वा कुः । कुम्भो रत्नोत्पत्तिद्रीपो-
ऽस्त्यस्याः कुस्मिनी । एति जन इमाम् इला । "दराषुराकपिलिकादिदसनाल्लत्वम् । ° “शद्रादयः--
१. युजभजसुजद्धिषटददुदाङ्क्तीडत्यजानुरुषाङ्यमाङ्माङ्यसरज्जाऽभ्याङ हनां च इति पणं का०
सू० ४।४।२२। २. का० उ० १।६। ३. तदस्य संजते तारकादेरितच् इति का० ₹ङ० प सू० ५०८ ।
. मोण्डयमस्यास्तीत्यपि विग्रहे निवेश्यम् । श्रं श्रादिभ्योऽच् । ५. कार सू० ४।२।२३ । ६. अभ्यते
र्यते इति कमणि विप्रदो योग्यः | ७. का० उ० ३।३२ इति भवतेभिभ्र° कितवं च ! ८. सृहतीति गहरी
सहरी इत्यपि पाठ इति युक्तम् 1 €. का० सू० ४।४।६० इति टन् । १०. वल्वुतत्ु मते इति दमा,
पचादित्वादच्, यप् 1 १९. का० सूर ४५।८२ । १२. का० सू० ४८।३।४४ । १३. का० उ २।४३ |
१४. का० उ° २४३ श्टुवृखधरज ° इत्यादिसूजम् । ९५. का० उ० २।१७ ]
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् अमरकीर्तिचिरचितभाप्योपरता
“टोग्रवन्रविप्रभद्रगंरभेरीराः' एते रथूप्रलययान्ता निपात्यन्ते । क्लेामुर्बति दिनसित फलेन चया । उवी ।
उवा धुर्थ दुव ध्व हिंसार्थाः । सवमूर्॑ति व्याप्नोति उर्विः । क्िधामीः उर्वा । राजान्तरं गच्छति जगतिः।
लियामौः,जगती । पूजां गच्छति गौः । लीनोः । गमेर्डोः | (“भगोरी धुरि इ्यौत्यम् । धन् धारणे ।
धुः । धरति धरते | दरू । शरस्य वृद्धिः । धारि जातम् । वशु वश्रूनि वा धारयति वसुन्धरा । नाम्नि
तृ्०* खप्रत्ययः । कारितस्या०° कारितलोषः। श्रमिधानत् खः । शहस्वा .्पोर्मोडन्तः ।” शन्निया"
मादा ।'” भूतधात्री, रलगर्भा, विपुला, सागराम्बरा, रलवती, रषा, ग्रचला, ग्रनन्ता, ल्वाम्--
कादयपी गोत्रा, स्थिरा, सर्वेषा । ।
तत्पय्यायधरः वैस्तत्पर्य्यायपतिनरपः 1
तत्प्य्यायस््ो बक्षः शत्दमन्यं च योजयेद् ॥ ७ ॥
योजयेत् योय्येत् न्यं शब्दं च । तव्पर्य्यायधरः दलः । मूमिधरः, मृघरः, पृथिवीधरः ृध्वीधरः,
गहरीधरः, मेदिनीधरः, महीधरः) धराधरः, वघुमतीधरः, घात्रीधरः, विच्वम्भराघरः) प्रवनीधरः, वयुधाघरः,
धरणीधरः, कोरीधरः, चमाधरः, धरित्रीधरः, सरितिघरः, ऊुधरः; कुम्भिनीधरः, उलाधरः, उर्वराधरः,
उर्वीधरः, जगतीधरः, गोधरः, वषुन्धराधरः। सतर्विशाति नामानि शैलस्य चैयानि ] तत्परय्याय पतिन्रंपः।
भूमिपतिः, मृपतिः, पृथिवीपतिः, पृथ्वौपतिः,' गह्रीपत्तिः, मेदिनीपत्तिः, महीपतिः, धरापतिः, वमुमतीपतिः,
( धात्रीपतिः, क्षमापतिः, विश्वम्भरापतिः, श्रवनीपत्तिः, वपुधापतिः, धर्णीपतिः, न्तोखीपतिः; चमापरतिः,
घस्तरीपत्तिः, ध्ितिपत्तिः, कुपतिः, ऊुम्भिनीपत्तिः, इलापतिः, उर्वरापतिः, उर्व पतिः, जगतीपतिः, गौपतिः»
वसुन्धरापतिः । स्तविंणति नामानि दृपस्येति ज्ातन्यानि । तत्प्य्यायरुद्यो वृश्चः । मूमिख्दः, मूरुदः
पृथिवीरुदः, पृथ्वीखदः, गहरीखदः, मेदिनीरुदः, मदीख्टः धरारदः, वपुपतीदहः) धावरीख्टः; क्षमारदः, विश्व-
म्मरारुदः, श्रवनीरदः, वदधारदः, धरणीरूदः, कोरीरुदः) दमाः, धरिवीरहः, कितिच्दः, कुर्द, ऊुम्मि-
नीरः, इलाख्दः) उर्वरारुः, उर्वरुदः, जगतीरुदः, गोर्दः, व्ुन्धरारुदः । सपर्विंश्षतिपर्यायनामानि
चद्तस्येति चातव्यानि । ¢
दरीम्रदचलः शृङ्गी पवतः सानुमाच् गिरिः । `
नगः चिोचयोऽद्विस्व शिखरी विकडन्मस्त् ॥ ८ ॥
द्वादथ पर्वते । दरीं वरिमर्तीति दरीश्रत् । स्वस्थानात् न चलति श्रचलः । श्मस्यास्तीति
दरी । पर्वाणि उनतयव्य पवतः । “धपरवमरयां तः ।” साठुरत्यत्य सुमान । जलं गिरतीति गिरिः ।
५७गृनाम्वुपघात्किः 1” नं गच्छतीति नगः । “ <डोऽशन्ञायामपि"] नाम्न्युपपदे गमेडां भवति । सिला
उन्चीयन्तेऽर, ्विलोचचयः। खम् श्राकाशम् श्र्तीति शद्विः । ^“ मूस्वदिम्यः क्रिः ।“ शिखरमस्त्यत्य
शिखरी । चिक पृष्ाधरं च्ुम्नाति विस्तारथतीति चिककुतच् । वणं विकारत्वाद् भकारस्य ^ "तकारः ।
त्म्य" "स्तु्य॒शकम्धस्ुम्यल्कुल्भ्यः श्वश्चेति कक्तव्यमन्ात्य घातोः प्रयोगः ।'' भ्रियन्ते ्षुदरजन्तवोऽस्व
सर्शेनेति मरत् । ५१ यमृग्रोरतिः” । गोलः सिितिधरः, गोः, श्रावः, कुप्रः, प्रावा |
स्थं पादवं तटं सादुर्मेखलोपत्यका तदी ।
नितम्वमन्तो दन्तद्च तद्यानपि गिरिः स्म्रतः।। & ॥
। १. का०स्° २ २३३1 २. नान्नि तृृजिषारितपिदमितदो संज्ञायाम् दति पूणं का° चू
४८।३।४८४ 1 ३. कारितत्यानामिडविक्रर्णे इति पूरम् का ०तू° ३।६।४४ | £. का०सू० ४।१।२२ | ५. का०
सू० २४४० } £. पर्वमरत्षवः श॒०्चं०्तु० ४१७३ ] ७. का०्ड० ३१३ । ८.-काण्सू° ४२३४७)
५. का ०ॐ०३।५२। १०. वरं विनाेन सकारत्य लोपोऽपि वोध्यः) ११. श्च ० २।१।९६ | चीरि क्कुदानिं
शङ्गाण्वलयेति विग्रहो उन्वत्र प्रिककुत्प्वते पार्स ° ५ । ४१८७ इत्यकारलोपः । १२. का० उ० १।३०।
नाससाला %
पर्वतमेखलायां दश । प्रस्थीयते जनेनान् प्रस्थम् । ^“ नागम्निस्थश्च'' कः । उभयम् । पाति
रहति जनन् पारवेस् 1 तरत्ति उच्छ्रायं गच्छंति तटन् 1 निषु लिङ्गं पु) सनोतीति साः 1 = कृवापा-
जिमीसवदिसाध्यशूदषखिजनिचरिचरिभ्य उण् ।*> "रण दाने" शस्य धातोः प्रयोगः । मेहनस्य खं तस्य मां
लातीति निरुक्तिः । मिनोति प्र्धिपति कामसिचित्तानिति वा मेखला । उपत्यक्षा उप समीपे भवा उप-
त्यका । ^ञउपापिभ्यां त्यकन्नासल्नारूटयोः | तटमस्यास्ति तदी । क्रीडाथे जनस्ताम्यतीतिर नितम्बः ।
्ममतीत्यन्तः । "“"मृगृवादस्यमिद मिलूपूग्यस्तः ““एभ्यस्तप्रत्ययो मवति । दम्यतेऽ (भ) चयतेऽनेन दन्तः ।
८८६मूगवाहत्यमिदमिलूपूभ्यस्तः ।” तप्रत्ययः । तद्वनपि गिरिः सखतः । प्रस्थवान् › पावंवान् , तटवान् ,
सानुमान्, मेखलाबान्; उपत्यकावान्, तरीमान् , नितम्बवान् ; ग्रन्तवान्, दन्तवान् ।
राजाधिपः पतिः स्वामी नाथः परवद; प्रषः]
ईर्वरो वियुरीशानो भेर्तेनद्र इन ईशिता ॥१०॥
चतुदश राज्ज | न्यायमागैण राजते.इति राजा । “°ब्ृषितक्षिराजिधन्तिप्रदि वियुभ्यः कनिः ।“
को यण्वद्भावार्थः } एम्यः कनिः एत्ययो भवतति । श्रधि रेश्वय्यं पाति रक्षतीति अधिपः) तथा च
उपसर्यवृतो-अधि वक्ीकरणाधिष्ठानाध््रवनेश्वयस्मरणाधिकेषु 1" पात्यवति पतिः} <पाते डतिः श्ररमाड्-
ङतिपत्ययो मवति “चसु गतो!" सुपूर्वः 1 शोभनममतीति स्वामी । ५हावमेरिच्* दीपश्च 1" साुपपदे
्ममेधातोरन् प्रत्ययो भवति | नाययति रिपु" नाथः । प्वृहि ब्रहि बद्धौ" । टो वृः। अत एव व्रः
परिपूर्वात् परि इति परिवहति स्प वा परिचटः । “१ <गत्यथां ०” इति क्तः । ^" “ परिवृटटटे प्रसुबलवतोः
एतो प्रसुबलवतोरथंयोयेथासंख्यं निपात्येते । परिपूर्य बरहेरिडभावो नलोपश्च । इवृहो; ्कृत्वन्तर-
योरपीत्यन्ये । ये तु प्ङघत्यन्तरयो रिच्छंन्ति, तेषाम्मते ““तृह तहि ब्रह बृहि हह बृद्धौति पाठान्तरं वर्तते |
तेन पाठान्तरेण दृहस्य इदस्य वा “ठृढः वटः” इति निपातः । तज वहंति स्म दहंति स्म इति वाक्यं क्रियते |
प्रमवतीति प्रसुः । *रसुवो इर्विशश्प्रपु "च “१ उडानु्न्ध ५) ऊकारलोपः । “ईश रश्व” ईष्टे इत्येवंशील
ईदवरः 1 “` षकशिपिसिभासीशस्य प्रमदां च । एषां वरो भवति तच्छीलादिषु । विमवतीति विथुः ।
डुप्रत्ययः } ईष्टे शक्नोति खष्टिस्थितिप्रलयान् कतुम् ईशानः । आशधितजनान् भिभरतिं पोषयति सर्ता ।
इन्दति परतैश्व्युक्तो भवतीति इन्द्रः ! “१ “^स्फायित्िवल्िशकि्तिपिक्षुदिरुदिमदिमन्दिचन्युन्दीन्दिभ्यो
रक् ।” एतीति इनः । ५१९इण् जिकृषिभ्यो नक् |? ईष्टे ईशिता ।
अनोकदस्तरुः शाखी विटपी फलिनो नगः।
दरमोऽङघरिपः फरेग्राही पादपोऽगो वनस्पतिः ॥ ११॥
दादश बृ्ते। श्रनसः शकटस्य अरकं गतिं हन्तीति अनोक; । * ऽश्रोकहप्रययेन वा सअमनोकदहः ।
तरन्त्यनेनातपं तरः । “^ °अमरतचरित्सरितनिमस्जिशीङभ्य उः "शाखाः सन्त्यस्य शाखी । विष्पो वित्तारो-
१. कारस्° ४।३।५] व्वुतस्तु नाग्नि स्यश्चेति कप्रत्ययस्य कतरि विधानादच घञं कविघान्-
मिति कः। २. काण्ड १।१। ३. पा० सू० ५।२। ३४ इति त्यकन् प्रत्यय्टाप् च । ४. क्रीडाथें जनैत्त-
भ्यते काङ्द्यते इति कम॑णि विग्रहो न्याय्यः । ५. का० उ० ४।२७ । ६. का० उ० २।३। ७. उ°चरृ° ११।
<. का० उ० ३।५२ इति पातेडतिप्र° ट्लोपल्च } ९. का०उ० ६।९८] पाणिनीयेस्ठ॒ स्वामितैर्वये पार्स
५।२।१२६ इति स्वशन्दादामिनप्रययेन साधितः । स्वमैर्बवंमस्यास्तीति विग्रहः } ६०. गत्यर्याकर्मकश्िलि-
पशीङ्त्थासवसजनरुदजीयं तिभ्यद्व इति पूणं का० सूर ४।६९।४२ । ११. कान्तू= ४।६।९५ ¡ २. का
सू ५।५।५९ { १३. डानुखन्धेऽन्त्यस्वरादेलोप इति पूण" का० सू० २।९।४२ । १५४. का० द् ४।४।४७ |
९५. का° उ २१४] १६. कार उ० २।५१ । ९७. चन प्रारने ¡ अनिति श्वानोच्छवान्त व्योरती
रन घाततोरोकहप्रत्यय शओ्रौणादिकं इत्यपेद्धितांसः } ९८. का० उ ६।५।
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छै, 5 ~ 2 ५
६ प्रमरकीर्विविरचितभाप्योपेता
उस्यघ्य चिटपी। कलानि सन्त्यस्य फलिनः} ^“वर्दाभ्यामिनच् 1" न गच्छतीति नगः । + डोऽ
संश्ायामपि? | द्रवति ब्रदि गच्छति श्रयवा द्रव "तेकदेणोऽस्यास्तीति द्रमः । श्रदट्तिभिश््वरणे; तरति
पाति वा श्रडपिपः। श्रटुग्निपश्च । फलनि ग्ृणातीति फलटे्राही । च्रमिधानादीरधः। ^ -फलमलरवश्र
ग्रदेः।"पादैः पितरति पानीयं पाद्पः। न गच्छुतीत्यगः | ४धनमस्याश्राणिनि वा चिक्रल्पन नकारलोपः |
वनस्य पतिः. वनस्पतिः! "पारकयादि्वास्ट् । मदीरदः, कुटः, शालः, पलाशी, हः, वृत्तः, कुचः,
विष्टरःः, श्रगश्चापि ।
तत्परय्यायचयो तेयो दिंरिशिखः कपिः ।
वानरः स्षवगश्चंव गोखादगृरोऽथ मकटः ।॥१२॥
एकोनविंशति नामानि दयौ । श्रनोकदवरः, तरुचरः, शाखिचरः, विटपिचरः, फल्िनचरः,
नगचरः, दरुमचरः, श्रद्त्रिपचरः, फलेग्रादिचरः.षादपचरः, श्रगचरःवनस्पतिचरः, । दत्यादिद्धाद्शनामानि
मर्कटस्य श्ेयानि } हरतीति दरिः । “द्रः सर्वघातम्यः 1” वलयो मुखेऽस्य बटिञुखः । कम्पते वायुना शरीरे
कपिः! "्रदिकम्प्यौर्न ग्लोपश्च 1“ शराभ्यां किः प्रत्ययौ मवति नलोपश्च | वनं वनति सम्भजते वानरः,
नरोऽपि । प्लवेन उत्फालेन गच्छुति प्लवगः । “डो <ऽज्ञायामपि"" च । गां भूर्म लद्घतीति गोलाङ्क
लम्, गोज्ञाङ्गलतस्याषौ मोलाङ्गलः उणादित्वात् ““लगे दीर्घश्च" । “भृट् प्राणत्यागे 1" प्रियते मकंटः ।
“जरा ° °मरकेटौ' एतावटथ्रत्ययान्तौ निपात्येते । बनौकाः । प्लवद्गमः । कीशः । शालातः ।
विपिनं गहनं कक्षमरण्यं कानन वनम् । ।
कान्तारमटवा दुगम्
नव वने । वेष्यते करम्प्यते भयेनात्र विपिनम् 1 १ °“वेपितुद्योह् स्वद्च'"' दतीनच् । उणादौ
उप्यते । “° ्वृजिनाऽजिनेस्णिविपिनद॒हिनमदिनानि ।” एतानि इनप्रत्ययान्तानि निपात्यन्ते | १ उगाह्यते
मूृगादिभि्गहनम् ! उमयम्। कपरति धति कक्षम् । श्रवते गम्यते श्वापदैः श्ररर्यम् । प्रतिभ्राग्यन्ति श्वर
वा श्ररण्यम् । १ ४्रतर्यः” श्रस्मादन्यः प्रत्ययो भवति } उभयम् । कन्यते गम्यततेऽस्मिन् काननम्^१
वन्यते सेव्यते वनम् । कान्तम् चलान्तम् गच्छति इच्छंति वा कान्तारम् । व्ररन्त्यस्याभटविः । छ्ियामीः।
श्रखची । दुःखेन महता कष्टेन गम्यते दुरगन् । नानाऽयें । स्रम् , हव्यम् , दावम् , श्ररण्यानी , फलम्
(१ £ग्रफलम्) ।
१. पात० भाष्य ५।२।१२२ ! २.काण्सू० ४।२।४७ इति गमेडः । ३, काण्पू० ४।२।४७
श्रनेन ग्रहेरिन् । एवं षति बरृद्धयभावात् फलेश्रदिरिति रपं सम्भवति । तत्राभिघानादीर्घं इति टीकाकारः
तथाभिघायकवचनाभावाक्तोपन्तरेदु षलेग्रदीति दीर्षरदितस्येव दर्शनाच्च पलेग्रादीति सूपं चिन्त्यम् |
‰. नेदं किमपि सुरं कातन्त्र । नगोऽप्ासिनि वा इति हे श० सू० ३।२}१२७) ५. पारस्करग्रभृतीमि
न्च संत्ायाम् पार सू० ६ १1१५७] ६. श्रव श्र° चि० ४१८० प्रमाणम् । तटक्तम्-ज्र्तोऽगः शिखरी
च शाखिफलदाव्रिद॑िद्रमो जीर्णेटर्विंखी कुटः दितिरुदः कारस्करो विष्टरः नन््ावर्वकयालिफौ तसवघर
पर्णी पुलक्यंदिपः सालानोकदगच्छुपादपनगा रूकागमो पुप्पदः ॥ इति ] ७, का० उ० ५४] ८. का०
प° ४।३।४७] ९. लच्छिपिमसिपिज्ञादिम्य ऊरीलौ का° उ० ३।६०दत्यूल५० उखा दित्वाल्लगे दीरपश्वैति
टगंडृत्तिः । ०. का ॐ० ३।५८ । ११. पा० उ० २।५५ | १२. का० उ २।२२ । इतीनग्रत्ययः वपेर-
कारेकारटच । १३. ग्र विलोडने व्रहुलमन्यत्रापीति युच् । छच्छुंगहनयोरिति निर्दैशादुध्रलः ।
१४. का ०उ० ३।२} १५. कानयतिं दीपयति स्मरादि । कनी दीप्तौ । युच् } कम् जलम् श्रननं जीवनमस्य
वेति विग्रदेष्वह्यः । १६. फलयुप्परदिते बन्ध्य-य्रवकेशि-ग्रपल-शब्दाः कल्पटुकोशे दषा: ] तदुक्तम्ू-- -.
'नजयात्कलपयायोध्वकेशी वन्ध्य इत्यपि । फलपुष्वर्विरदित एते बन्ध्यादयस्विध ॥
नाससला
त्रः स्याद् वनेचरः 1१३
चरशब्देन युक्ते शबरस्य नव नामानि । विपिनचरः, गहनचरः, कल्चचरः, श्रण्यचरः, कान-
नचरः, वनचरः, कान्तारचरः, श्रर्वीचरः, दुराचरः ।
पुलिन्दः श्वरो दस्यर्निषादो व्याधटुग्धको ।
धानुष्कोऽथ किरातश्च सोऽरण्यानीचरः स्मरतः ॥१४॥ र
पोलति भ्रमति महत्वं याति गच्छति पुलिन्दः । पुलीन्दश्च । शवति१ निर्दयत्वं गच्छतीति
शवरः; । तालव्यः । शवति अरण्यं शवरः । दस्यति अन्यसुपक्िणोति दस्युः 1 ““जनिमनिदसिभ्यो युः ।
एभ्यो युः प्रत्ययो भवति । निषीदति पापकमा निषादः । निषद्श्च । वाऽ ज्वलादिटुनीवो णः । “व्यध
ताडने व्यध विध्यतीति व्याधः ! “दिहिभलिदिश्लिषिच्वसिविष्यतीणुश्यातां च ।> एषां रौ मवति ।
लुभ्यते ख्ध्यते माते लुञ्यः 1 स्वायं कः लुब्धकः । धनुषा“ सह वत्तते इति धाुष्कः । किरति शरान्९ ९०
किरातः । अरण्यस्य शयरण्यानी (तत्न) चरतीति अरण्यानीचरः७। इन्द्र< वरुणभवशा्वरुद्रमृडदिमयमारण्ययव-
यवनमातुलाचा्यांखामानुक् ईर्च । अरण्यानीति 1
वार्वारि कं पयोऽम्भोऽम्बु पाथोऽणैः सखि जलम् ।
सरं बनं इं नीरं तोयं जीवनसबव्विषम् । ११५॥
अष्टादश पानीये । वास्यति तृषामिदम् वारि, इणोति वा वारि । ` ` शुवसिवपिराजिवृहनिन- १५
भेरिज. \:› एभ्य इन प्रत्ययो मवति । जकार इज्वद् भावाः । रान्तम् वार् । स्रीक्लीवे । काम्यते इष्यते
कम् › कायतीति (वा) । “° ° कायतेडंतिडमो” प्रत्ययौ मवतः । पीयते पयते वा पयः । ^पीड् पाने 1
५सवं\ १घातुम्योऽुन् ।” अमति गच्छति स्वादुत्वं सान्तम् अम्भस् ।^ध्रम गतौ ।*८“दमे ^ ~म्भोऽन्तस्च | श्रकार
उच्चारणार्थः । “रत्र शब्दे “चग्बु»इति सोनो वा "स्तेवायाम् ।° अम्न्यते दृष्णातिरित्यम्बु । ५९१ उश्रज्वि
कम्निभ्यामुः। "्ाभ्वामुः प्रत्ययो भवति 1 पीयते पाति वा पाथः। ° ्रमिकासिकुषिपात्वचिरिचिसि- २०
चिगुभ्यत्पक् 1" एभ्यत्थक् प्रत्ययो भेवति । को यणवद् भावार्थः 1 ऋखोत्यणेः । गम्यते" “लानपानार्थः
सान्तम् णेस । सरति गच्छंति सलिलम्। उणादौ षच सेचने !* (८१६ धात्वादेः षः खः ।” “उचते
इति सलिलम् । ““सवेलिलश्च च्य तुक्+ <।" सचेलिल : प्रत्ययो भवति चस्य लुक् च ¡ जडति नीचं
गच्छति जलम् 1 जडं च \ णाति दिनत्ति ठृष्णाम् इति सारम् । वन्यते तेव्यते एनत् वनम् । कोशते
कुलम् । प्रारिष्टं वृधि नयतीति नीरम् । मीयते हिनस्ति वृषं मीरम च। ठदति तृषाम् तोयम् ।"दु २५
सौन्न अावरणा्थो वा । जीन्यतेऽनेन जी वनस् । जीवनौयम् च | श्राप्लुवन्ति समुद्रमित्यापः । श्राप्नोतेः क्विप्
प्रत्ययो भवति ¡ हस्वरच । चप् लियं वहथः ! क्दचिदेकत्वम् ! क्लीठत्वम् । ्रपशब्दो वहुवचनान्तः ।
९. शव गतो भ्वादिः । बाहुलकादरः । २. का उ० ४१। ३. कार च्० * ४२।५५।
४. काऽ चू ५।२।५८ । ५. धुः प्रहरणमस्वेति व्युत्पत्तियुक्ता । प्रहरणमिरण् । ६. किरतौति
किरः 1 क वि्तेपे ! कप्रत्ययः । अततीत्यतः । अत सातत्यगमने 1 पचाद्यच् । किर्वखावतर्चेति किरात
इति पूणव्युत्पत्तिः । ७. महदरण्यमरण्यानी तने चरतीति विग्रहो युक्तः । ८. इदं पारिनीय ४।१।४९ चत्र
यमेत्यधिकः पाठः } ९.का०उ० ४।५ । १०.का.उ० १।५० । १६.का०उ० ४।५६ । ६८.का<उ० ४६६ ।
'छमत्ति स्वादुत्वं गच्छतीति शेषः 1 रामाभनमस्तु अमिशन्दे इत्यतोऽ्य॒न् प्रत्ययमाह ! १३. कार उ< ५।३५ ।
१४. का० ॐ २।१५ ! १५. अ्यंते इत्यस्य पयायो गम्बते । यतोऽरंत् शब्दो नत्रत्ययान्तः 1 छ गतौ ।
१९. का< सू ३।८।२४ । १७. सरति गच्छंति निम्नमिति विग्रहे खल् गतौ इत्यस्मात् उलिङ्ल्यनि°
इत्यादि १।१५४३० सूत्रेण साधितोऽन्य 1 ९८. का< उ< ६।३९ |
५
९५
४५
०८५।
५
८ अमरकीर्तिविरचिततभाष्योपेता
"रपव" "इति धुटि दीः | श्राषः । श्र्रुट्वरत्वात् एातादेनं दीर्घः | रषः, राः मेद्ः |” इति
विभक्ति पस्यद्ः । श्रद्धः । ग्रदग्यः । श्रदुभ्यः | श्रपाम् । श्रप्मु | “3 वगदिः शपरसेवु द्वितीयो बा ।'
रफ । ग्रष्ु । श्रामन्व्रशे-द श्रापः । वेवेष्टि देदं र्येन व्याप्नोतीती चिपम् । उभयम् । घनरसः, पुष्करम्,
मेघपुष्पमर्, पानीयम, उदकम्) क्षीरम्, सेवनम्, दकम, कमलम्, कीलालम, श्रधृत्म्, कवन्धम् , सर्वतोमुखम्,
श्रानतं इति नानार्थ |
भ
तत्परय्यायचरो मत्स्यस्तत्पर्य्यायग्रदो घनः |
तत्पर््यायोद्धवं पद्मं तत्पर्यायधिगम्धुधिः ॥ १६ ॥
तस्य प््ययिस्ततपर्य्यायः, तत्परं चरशब्दे प्रयुज्यमाने मत्स्यनामानि भवन्ति । वार्च॑रः, वारिचरः,
कञ्चरः, पयद्चरः, श्रम्भश्वरः, श्म्बुचरः, पाथदचरः, श्रणस्चरः, सलिल चरः,जलचरः, शारचरः+वनचरः)
कुशचरः, नीरचरः) तोयचरः) जीवनचरः, श्रपूचरः; विपचरः । प्रदप्रयोगे वारियर्यांयशब्दाप्रे धन्य
नामानि मवन्ति ] वार््रदः, बायिप्रदः, कग््रद्ः, पयःग्रद्ः, शरम्भः्रदुः, श्रम्ुप्रदः, प्रायःश्रदः, श्रणंःपरदुःःसलिलः
प्रदः जलब्रद्ः, शरप्रद्ः, कुशप्रदः, नीरपरद्ः, तोयग्रदः, जीवनप्रदः, श्रप्प्रद) विपप्रद्ः | इत्यादीनि घ्रनना-
मानि । तदर््ायोद्ुमवं पद्मम् । वारिपर्व्यायशब्दात्रे उदुमवंगरयुज्ये उदूभवगब्दय्रयोगे कमलनामानि मवन्ति ।
वार्टूभवम्, वावुष्ट्मवम्, कपुद्धवम्. , पयउद्धवम्, श्रम्मउद्धवम्, श्रनबरूद्धवम्, पाथञद्धवम्. ्ररंञद्धवम्,
सलिलोदवम्. जलोद्धवम्? शरोद्धवम्, वनोद्धवम्, कुशोद्धवम, नीरोद्धवम्. तौयोदद्धवन, जीवनौद्धवम्,.
ग्रवुद्धवम्. विपोद्धवम् । तत्पर्य्याय धिरम्बुधिः । वा; शब्दा ( शव्दपर्याया ) प्रे चिग्रुन्ये धिशब्दप्रयोगे
ग्रम्युधिनामानि जेयानि ¡ वार्धिः, वारिधिः, कन्धिः, पयोधिः, ग्रम्मोधिः, श्रमबुधिः) पाथोधिः, श्र्णोधिः
सलिलधिः, जलधिः, शरधिः, वनधिः, कुशधिःःनीरधिः, तोयधिः, जीवनधिः, श्रन्थिः, विप्रधिः।
पृथुरोमा पडक्षीणो यादो वंसारिणो स्प: ।
विद्रारी शफ़री मीनः पाटीनो (ऽ) निमिपस्तिमिः ॥१५७॥
एकादश मतसये । पृथूनि विस्तीर्णानि रोमाण्यस्य प्रशुरोमा । षर् श्रदतीरि खशंन-रषन-घ्ाण-
चष्षुः-ध्रो्-मनांसि य्व सः पडक्षीणः } याति गच्छुति जले, यादः ] विसरति ्रहदेरशिन्”* विसारी
मत्स्य इति । स्वार्थञय् | वैखारिणः । फपति जन्तून् दिनस्ति भपः । "छ गतो । सश्र गतौ वा|
स विर्वा विरति विसर वा इववंशीलःःविस।री । “““विपरतिभ्यामाङः सततेर्िन् प्रत्ययः । श्रस्यो
(स्य ) ब्रदधिः । विसारिन् इति चते सिः । ^दन्दन् [ पूर्ववत् ] (पूपायुंम्णां शौ च )” । शिति
शफरः | शकष: ८ न् ) बरायन्ते ( राति ) शी्रगत्वाच्छफसी । मीयते दिंस्यतेऽन्योऽन्यतः, मीनः | वहु्रधू-
त्वात पाटयति भदंयत्वेन पार्यते वां पाठीनः} निमिपत्ति परस्परं हिनस्ति हन्तीति वा ऽनिमिपः।
“ननाग्नु <पध (धात् ) पृरकृगृनचां कः" । तिम्यति जलेनाद्रौ भवति तिभिः । मत्स्यः, त्रण्डजः, शकली,
विसारः, जलचरः, गल्की ।
घनाघनो घनो मेषो जीमृतोऽभरं वलाहकः ।
पर्जन्यो मिहिरो नभ्रा
१.का०स्० २।२१९।२्.का० सू० २।३।४२। ३. काण्सू० प° सू २५७]
£. काण्य्० ४।२।५० इति रिन्. प्र । ५. पाणस ३।२।७६ उ््तिभ्यामाटि सतरपरंख्यानम्
इत्ति काशिकावृ्तिः। ६. कारस्° २।२।२१। ७.निमेप्ररहितत्वान्मीनानाम् ] कोपान्तरेपु तेपामनिमिप्रसंशना-
दशनाच्च द्त्ाप्यनिमिप इत्येव छदौ युक्तः} न ठु निमिप इति । तदुकतम्-“बिसारः शकली शल्की
.श्वरोऽनिमिपरस्तिमिःः श्र चि० ४८११० । ८. का० सू० ४।२।५१।
2
ध
नाससाला
नव मेचे । हन हिखागत्योः । हन्तीति घनाघनः ! “च् "घनाघनः" इति सूत्रेण घनाघन इति
निपातः। छ्थवा “रचिस््लिदचक्मसचराचरचलाचलपतापतवदावदघनाघनपाटरूपय बाः इति नमिभूता
संज्ञा रूढाः | तन्न दिलिदेः “ उनाम्युपधात्'' कः । क्नसिचरिचलिपत्तिवदिहनिपाय्यतिभ्यो उच॒प्रत्ययो
दिव॑चननिपातने चेति । वाशब्दात् क्लिदः, क्नसः, चरः, चलः, पतः, वदः, घनः, पटः, इत्यपि भवति |
हन्यते वायुना घनः ! ““भमूतौ घनिस्च ।" श्रल् । मिह सेचने । मेहति सिञ्चति भूमिमिति मेघः
“श्रच्य भव्वाम् { दिभ्यश्च ) ' रच् । नामिनो गुणः । “न्यङ् कुः ९" इत्येवमादीनां चजोः कगौ भवतः ।
हश्च (हस्य च) घो भवति । जीवनस्य जलस्य सूतः पुरबन्ध इति निसक्त्या जीमूतः । जीवन्त्यनेन भूतानि वा
जीमूतः । जीव प्राणते श्रभरन्त्यपो राति वा श्रम् । च्रभ्र गत्यथैः । न भ्रश्यति तपो यस्मादत्यके |
` प्नोति सवां दिशे वा श्रभ्नः क्लीवे |) ऽवलाकादिभिर्हीयते वलाहकः । वारिवाहको वा ।
भवष॑ति जलं पर्जन्यः । उणादौ “पूजी सम्प" पृङ्त्त पृणक्ति बा पजन्य: । “८पर्जन्यपुण्ये”
इति छन्यप्रत्ययान्तो निपात्यते । मेदति सिञ्चति विश्वं मिहिरः । मद्रः मुदिरश्च । न भ्राजतेन
शोभते नश्चार् । ^क्विभ्भ्राजिपुधुविभासाम्^'' एषां क्विन् भवति । त्रन्द्; स्तनयित्नुः, पयोधर धाराधरः,
धूमयोनिः, तडित्वान्, वारिदः, अग्बु्त्, सुदिरः जलमुच् ।
शस्पा सोदामि (म) नी तडित् ॥१८॥
आकालिकी क्षणरुचिरविदयुत्
षट् शम्पायाम् } शाम्यति शीघ्र श्यस्पा । शम्बा च । शणिवति वा शम्पा । सुदाम्ना श्रद्रिणा
एकदिक् सौदामि (म) नी । ^ <तनेकदिगित्यण् । शोभनस्य दाम्नो बन्धनरनोरियं सदृशी सौदामि (म)
नी । सौदाम्नी । सौदामिनी च । ताडयति तडित् । ताडयतेरिलुक् । ताडयति मेघं ताडधतेऽसो वेति
तडित् । तान्तम्। आकलयति स्तोककालं रोचते वा श्राकालिकी ` ^ । “श्राङ् मर्य्यादा ऽभिविष्योः }” चशे
रणे रोचते शालते क्षणरुचिः ! वियोतते विद्युत् । चपला, क्षरिका, शतहदा, हादिनीः अचिराः,
एेरावती, चञ्चला, चटुला, दिश्या ।
। तत्पतिरम्बुदः ।
विचुच्छन्दाम्रे पतिशब्दे प्रयुज्यमाने अम्बुद्नामानि भवन्ति । शम्पापतिः, सोदामनीपतिः,
तडित्पतिः, श्राकालिकीपतिः, कणरुचिपतिः, विचुत्पत्तिः, निधांतपतिः, अशनिपतिः, वजच्रपतिः, उल्कापतिः,
इत्यादिमेघनामानि स्युः 1
निर्थातमशनि्ध॑जयुल्काराब्दं च योजयेत् ॥१६॥
चत्वारो वज्रे | निहंन्यतेऽनेनेति निधौतम् । पवंतादीनदनाति, अशनिः । "° =ऋतुधरजूषम्य-
१. हन्तेषैत्वं च का० वार्तिकम् । अच् घनाघन इत्याकारकं वचनं न स्वचिदु-
पलब्धम् । शा० सू० ४।१।५५ घनाघन पाद्रूपटम् इति ; २. इदं ठ॒नोपलन्धम् । चरिच-
लिपतिबदीनां बा द्वित्वमच्याक् चाभ्यासस्य वक्तव्यम् इति कात्या वा० | ३. का०
सू ४२।५१ 1 ४. का० सू ४।५।५० इति हन्तेरलप्र घनिरादेशश्च । ५. का० स्
४।२।४८ । ६. न्यङ्क्वादीनाम् इति का० सू० ४।६।५७ इति हस्य घः ! ७. वलाकाभिदययते । श्रोदाङ्
गतो । केम॑रि क्वुन् । अथवा बलेन दीयते श्रादायते वा क्ठुन् इति रामाश्रमः । पपोद्रादित्वाद् वारिवाह-
कशब्दस्य बलाहक इति निपातर्च । ८. कार्ड ३।४। €. का सूऽ ४।४।५७ । १०. तेन प्रोक्तमित्यतत्ते-
लेत्यधिकारे “एकदिक्” इति जे सू ३।३।८१। ११. समनकालावायन्तौ यस्या इति विद्रे ्ाक्रालिकडा-
यन्तवचने इति पा० सूर समानकालशब्दस्वाकाल च्नादेश इक् प्रत्यये रित्वान्डीपि श्राकालिकीरि
मूलोक्तमपि साधु । १२. का< उ° २।४३।
२
१५
०
२५
५
१५
२५
च महोत्पलम् । तयथा च हुलायुधः-- “पुण्डरीकं १८ सिताम्बुजम् ।»
न
१० अमरकीर्तिविरचितभाप्योपेता
श्यविषरतिग्रहिभ्यौऽनिः | पएभ्यौऽनिः प्रत्ययो मवति। "ट उ स्पूं वज्रनि्घपि” सूर्वतीति वज्रम् १ |
शष्रादयः २ -शष्ोवत्रविध्रमदरग रभेरीराः” एते रक् प्रत्ययान्ता निपात्यन्ते । परवतेष्वपरि वजति वच्रम् ।
उपति उ्वलति उरट्का । उल् दति सौबोऽयं घाठर्वा |
परिपत्कदमः
त्रयः कर्दमे । परि समन्ताद् भाराक्रान्तः सीदति गन्तुं न शक्नोतीति परिपत् । “उसत्पृ द्विप
हदुदयुनविदभिदच्छिदजिनीराजामुपसगे"” एपारपसर् उनुपतर्गेऽपि नाम्बुपधात्क्विप्। करणोति चेषां दिनस्तीति
कदेमः । '^पृप्रथिचरिकर्दिम्योऽमः?? । पञ्च्यते विष्तारयेते वर्पाकालेन पद्रः । उभयम् । उणादौ पन च
पनायते पन्यते वा पद्भुः । 'पतिपनिम्यां कः” शराभ्यां कः प्रत्ययो भवति । तथा चामरर्षिहः-
०५६निपदूवरस्तु जम्बालः पङ्करोऽखी शाद्कर्दुमो ।'”
निप्रदूवरः) जम्बालः, शाद्ः, इचिकिलः, चिकित्सश्चानेकार्थे ।
तलम्
तसमात् जम् उदृमवम् पङ्कजम् , कद॑मजम् , परिपलम् , इत्यादीनि कमलनामानि भवन्ति ।
तामरसं विदुः |
कमं नलिनं पद्मं सरोजं सरसीरुदम् ॥ २० ॥
खरदण्डं कोकनदं पुण्डरीकं मदीत्परम् ।
दश कमलनामानि भवन्ति । ताम्यति चलं काङ्दति तामरसम् । श्रमरसिंदमाप्ये-“° तामः
भरकर्पा रसो ऽस्य तामरसम् । तमः प्रकपौ उथस्तारतम्यवत् | केन मस्तकेन मल्यते धायते कमलम् ।
धिया वाघ्ायं काम्यते वा । <पटिकमिमुरिकरुशिभ्यः कलः ।'” एम्यः कलः प्रत्ययौ भवति । कम्मलं च ।
नलाः सन्तत्य नलिनम् । नलति श्राकप॑ति ध्रिवं वा नलिनम्। ““" पुलिनलितलिमलिदरुिभ्यः
क्रिनः” । नलं च । पद्यते पाति लद्मीरत्र पद्मम् । “^ श्र्तिधृहुयुधृक्लिणीपद भायास्त॒भ्यो मः 1 उमयम् |
सरसि तडागे जातम् सरोजम् । सरस्यां रोदति ्रादु्मवति सरसीरुहम् । ? १खरञ्च तदृण्डञ्च
खरद्रडम् । कोकाश्चक्रवाका नदन्त्यत्र कोकनदम् । क्लीवे । [ रक्त ] कुमुदम् °> । रक्तकमलजञ्च ।
विशेषणम् [ कुमुदकमलविगेपे ] । पुखुति माङ्गल्यातात्पुरडरीकम् । मट ( सुट ) भ्रमर्दने
स्थाने । पुण्डिरित्येक्रे । पुण्डति पुरडर कम् । भाप्यकरतर॑मते पुण शोभे । पुखति जल्पति
शोभां पुण्डरीकः । “्रनुनाघिकान्ताड डः" श्रत॒नासिकिन्ताद्धातो डः प्रत्ययो भवति । मद्वच तदुत्पलं
स्फर्वतीति विग्रहे स्पर्वघातो वजादेशो रकप्रत्ययश्च निपात्यः । वल गतौ । वलतीति विग्र
केवलं रक् । २. का० उ० २।१७ । ३. का० स्० ८।३।७४ । ¢. का० उणादौ एतत्सत्रं नास्ति ¡ पार
उ० सु० ४८८४८ कलिकर््ारम इप्यमप्र° । ५. का० उ० ५।३० । समाश्रमस्वु पचि विस्तारे कर्मरि
दलश्चेति धञ् इत्याह । ६. ्रमर० १।१०।९। ७. नी° मा० १।९।४०] ८, का-उ० ६।१ | €. का०
उ० ६।६ । १०. का०० १।५३। ११. खरो दण्डो यस्येति विग्रहयो न्याय्यः । १२. श्रथ कोकनदं रक्तक्रुमुदे
रक्तपंकने इति मेदिनी तद्विशेषे प्रमाणम् । १द-पर्फरीकादयद्व पा० उ० ४।२० इति मुढघातो रीकन्;
प्रत्ययान्तः पुण्डरीकशब्दौ निपात्यते । रामाश्रमस्तु गुडिघातौररीकनप्त्ययमाद । भाप्यकतं मते पृण
धातोररीकपरत्ययो उान्तागमन््वेत्युभयं विषेयम् 1 केवलं उग्रत्ययस्तु न युक्तः । १४. दलायुधः ३।५८।
लासमाला ५64
इन्दीवरं चारविन्दं शतपत्रं च पुष्करम् ॥२९१॥
स्यादुपरु चर्यम्
सप्त नीलोत्पले । इन्दति शोभैश्वये प्राप्नोति इन्दीवरम् । शरान् राजीः विन्दति इति
्रचिन्दस् । विदल लाभे, विद् श्ररपूवः । शरान् विन्दतीति अरविन्द; । “कमंसि च विदः” श-
प्रत्ययो भवति । इति परसूत्रम् । स्वमते-शन्यत्रापि चेति [ कर्मण्यण् + ] श्ण बाधकः । “ साहिसाति-
वेगुदेजिचेतिधारिपारिलिपि(म्पि)विन्द्ं त्वनुपस्गँ एषामनुपसगे शो भवति । चक्रष्याऽ्वयवः श्रर-
विन्दम्। पिण्डी (पुण्डरीक) कमलेभ्थं त॒ (त्रपि) श्मरविन्दम् । साजविशरेषस्त॒श्ररविन्दः। केचित्तम-
लेऽपि पुःसत्वं सन्यन्ते । शतं पण्यस्य शतपत्रम् । वलीवे । शोभां पोषयति पुष्यति वा पुष्करम् ।
शोभासृत्कपण पलति गनच्छुतीत्युत्पलम् । कौ वलते प्राणिति कुवलयम् । ऊुद्धितो बदिव॑लयः पत्वे्टन-
मस्येति श्रीभोजः ।
ि विशेषपाद--
। अथ नीरमस्बुजन्मं च |
इन्दीवरं च नीेऽस्मिन् सिते ऊुयदकरये ॥२२॥
नील्लास्वुजन्म । इन्दतीन्दी वरम्३ । कुवलय [दलनीलेति] सामान्यस्य [ नीले ] विशेष-
वृत्तिः । अस्मिन् सिते । रान विकासं करोति चन्द्रेण काम्यते वा को मोदते वा कुयुदम् । दान्तञ्च |
के उदके जले रोति केरवो हंसः, तस्येदं प्रियं कैरवम् । क्लीवे ।
तद्वती
तस्य कमलस्य पय्ययि ध्वतीः इति प्रयुज्यमाने कमलिनीनामानि भवन्ति | तामरसवतो,
कमलवती, नलिनवती, पद्मवती, सरोजवती, सरसीरुहवती, कोकेनदवती, पुण्डरीकवती, मदोत्पलवती, श्र
विन्दवती, शतपत्रवती ।
विचिनी ज्ञेया
दिनविकासिन्यामेकः४ । विसमस्त्यस्या विखिनी । नलिनी । पुटकिनी । मृणालिनी ।
वरततीवल्छरी रता ]
वल्लीनामानि योज्यानि-
चतुर्व * ८ चत्वारो व ) छर्याम् । वृणोतीति न तती । प्रकृष्टा ततिरस्या ततीः ९, व्रततिश्च । २
जपादित्वादूवच्वम् । वल्लते वटलरी । लाति ललति चित्तं बा लता० । वते वेष्टते वर्ली । बल्लादीः ।
वल्लिरिदिन्तो ऽपि । लियामीः । बल्ली । तातश्च । वीसक् ( घ् ), गुल्मिनी, प्रतानिनी, शारिवा<, किरम
च } वृत्तशाखायामपि ।
१. का० सू ४।३।१ | २. का० सू० ५।३-५४। ३. इन्दतीतीन्दीः लच्मीः ।
सवघातुभ्य इन् उ० सरू० ४।११७ इतीन् । ऊदिकारादक्तिन इति ङीष् च । तस्यावरमिष्टम्
इति द्युतपत्यन्तरमप्यू्यम् । ४. एकः विसोनीशब्द् इव्यथः । ५. ध्र चत्वारो वह्छ्यामिति
यक्तम् । ६. प्रतनोतीति तरततिः । तन् धातोः क्तिच् । क्तौ च संज्ञायामिति क्तिच् । पपोदरा-.
दित्वास्पस्य ब इत्यन्यत्र ! ७, लतिः सौन्नो धाठुवै्टनार्थो लततीति लता । पचायच् इत्यन्यत्र ।
६. सारिवाशब्दोऽनन्तमूलनामकौषधि विशेषवाचकः । किमिः स्री स्वरंपुव्यां स्यादपि पमालपलाशयो-
रिति-विश्वलोचनप्रमाणतः किर्मिशन्दः। किमींशब्दौो स्वणंपूत्री-माला-पलाशवाचकः । बरसालार्या
लतायां वा उमावप्यप्रसिद्धौ । अतो.ऽतरेदमेव प्रमाणाम्
१०
१५
२०
१२ श्ममरकीर्तिविरचित्तभाप्योपेता
वारिधिर्धण्यतेऽधरना ॥२३॥
श्मघुना ददानीं चारिधि्वरयंते कथ्यते । केन भाप्यकरवां मुनिश्रीमदमरकीर्विना ।
साम्प्रतं समुद्रनामानि प्रार्यन्ते--
सोतस्विनी धुनी सिन्धुः सून्ती निम्नगाऽपगा ।
५ नदी नदो द्विरेफथ सरिनामा तरद्धिणी ॥२४॥
एकादश नय्ाम् । खोतः प्रवादो इत्यस्याः स्रोतस्विनी । धुनोति कम्पते घुनिः१। चछियामीः |
धुनी । स्यन्दति जले चलति सिन्धुः । त्रिपु । “स्यन्दे: सम्प्रतारणं धश्च |” तटेभ्यो जलं खवति सखवस्ती ।
निम्नं गच्छति निम्नगा । श्रा समन्तादाप्नोति श्रदुमिरगति वा श्रापगाः । श्रापिन वा गच्छति श्रापणा ।
नदत्यव्यक्तं शब्दं करोति मदी ¡ नदति नद्: ! ्रच्" पचादिभ्यश्च" श्रच् | दवौ रेफो तरौ यस्य द्विरेफः
१० सरति समुद्रं गच्छुति सरित् । तान्तम् । तरङ्गाः सन्त्यस्यां तरङ्गिणी ! तटिनी, नररिणी, कृूलङ्कपा,
शेवलिनी, सरस्वती, समुद्रकान्ता, हादिनी, सरोतः, कपु :“, कुल्या, द्वीपवती, रोधोवक्रा ।
तत्पाद भवत्याः,
तस्या धुन्याः पतिभ्रुनीपतिरित्यादिसमुद्रनामानि भवन्ति । खोतस्विनीपतिः, धुनीपतिः, षिन्ु-
पतिः, खवन्तीपतिः, निम्नगापतिः, श्रापगापतिः, नदीपत्तिः, नदपतिः, द्विरेफपतिः.सरित्पतितरङ्धिरीपतिः।
१५. पारावारोऽमतोद्भवः ।
अपारवारकूपारौ रतरमीनाऽमिषाऽकरः ॥२५॥
समुद्रो वारिरारिश्च सरस्वान् सागरोऽण॑वः ।
नव समुद्रे । पारमाद्रणोति पारावारः । श्रतृतस्योद्भवः श्रखतोद्भवः । श्रपारं वार् जलं
यत्राऽौ श्रपारवाः । न कुं पृणोति मर्यादापालनादेक्रुपारः । हलायुवे-"“न क प्रथिवी पिपर्ति भ्या-
२० प्नोतीति अकूपारः ।"' श्कूबारो ऽपि । रत्नमीनशब्दयौपरे आकरे प्रयुन्यमाने समुदरनामानि मवन्ति ।
। रत्नाकरः, पृथुयोमाकरः, षडक्तौणाकरः, याद्करः ९, वेसारिणाकरः, भपराकरः, विसा्याकरः, शकराक्रः»
मीनाकरः, पार्टनाकरः, निमिषाकरः, तिम्याकरः । "उन्दी क्लेदनेः सम्पूर्वः । समन्तादुनत्यस्मादिति
खमुद्धः° । “ <स्फायितञ्चिवच्चिशकिस्षिपिष्वुदिरुदिमदिमन्दिचन्युन्दीन्दिभ्यो रक्” “^ श्रनिद्नुबन्धानाम-
गुणेऽुषङ्कः" । तथा च इलायुपे * ° ~"“ुदन्ति मिश्रीभवन्ति भोमा.ऽन्तरीक्षनादेयजलान्यच्र सुदरः 1"
२५ श्मरसिंहे-१"समुनत्ति समुद्रः" । वारीणं जलानां राशिचौरिसाशिः । सरांसि जलप्रसारणानि
सन्त्य्य सरस्वान् । सागरस्यापत्यं सागरः, सगरतनयैः खातत्वात् ! श्रणांसि न्त्यस्य श्रणेवः ।
१. धुनोति कम्पयत्ति वेतसादीन् । धुच् कम्पने । किप् । पृप्रोदरादित्वाजुक् । नान्तत्वान्डयैप् घुनी
इति सावाश्रमः। २. का० उ० १।७} ३. अद्भिरगतीति विग्रहेऽपः पकारस्य जरत्वाभावोऽकारत्य
दीर्घसवे च पृषपरोदरादित्ेन निपातात्साध्यम् । ४. का० सू० ४।२।४८ । ५. चत्र कपरंरिति दीर्घोकारान्तपाठो
युक्तः । तदुक्तम्-- कपू. नदी करीपषाग्योरिति शाश्वतः ६७२ । ६, यादस् शब्दस्य सकारान्तत्वार् याद आकर
इत्येव न तच यादाकर.ः | ७. समन्तादूनत्ति आद्रीकरोति भूभागानेतावानेव विग्रहः । श््रास्मादिल्यपा
दानार्थ्टीकोक्तो नापेक्षणीयः । समीचीना मुद्रा जलचरविशेपा यस्मिन् सद मुद्रया मर्यादया वर्तते वेति
व्युतत्त्यन्तरम्यूह्यम् । €, का० उ० २।१४ | €. का० सू० ३।६।१ । १०. मुद् संसग चुरादिः सम्पूर्वः ।
कथादावदन्ते तत्पाठाच्चुरादिखिचो वैकल्पिकत्वानमुदन्तीत्यपि पक्त । समो मकारलोपः परषोद्रादिववात्तत्
वोध्यः । ११. क्ी° भा० २।६।१।
नाममाटा १३
तथा च चीरस्वाभिभाष्ये-"* अर्णो रस्यास्त्यणंवः । (्रणैसो लोपश्च इति वः सशोपश्च ।"
उद्धिः, उदन्वान् , तोयनिधिः, जलयाशिः, वीचिमाली, शशध्वजः* । तद्भेदाः सप्त-लवणोद्ः, क्तीरोद्
सुरोद्ः, इत्तुदः, स्वादृदः, दध्युः, घृतोदः |
सीमोपकण्टं तीर पारं रोधोऽवधिस्तटम् ॥२६॥
सप्त समीपे । पिज बन्धने । सिनोति बध्नातीति सीमाः | “उघ्मसोमाम्रीप्माऽधमाःः
एते मकूप्रत्ययान्ता निपात्यन्ते । कण्ठस्य समीपे उपकण्ठम् । तरन्त्यस्मात्तीरम्४ । तरति प्लवते
इव के तीरं का। "पिपत दृणोति जलेनेति पारम् । पायते समाप्यतेऽस्िन्निति वा । रुणद्धि
जलं वेगेन रोघस् । सान्तम् । उभयम् । श्रवधानम् श्रवाधः । “<उपसर्गे दः किः" । तय्यते श्राहन्य-
तेऽम्भसा तरम् । त्रिषु ] तटः} तटी। इदन्तो वा । तरिः । स्नियामीः, तदी । कूलम्, कच्छः,
प्रपातः, तीरम् 1
भङ्स्तरङ्धः फल्लोो बी चिरुतकलिकाऽवलिः |
पारी वेरा तटोच्छ्वासौ वि भ्रमोऽयञुदन्धतः ।२७॥
एकादश तर्कं । भज्यते जले स्वयमेव भङ्गः । तरति प्लवते तर्कः । ""°त्पत्तिभ्यामङ्गः
अाभ्यामद्धभ्रययो भवति । “कल्ल्यन्तेऽ्नेन नयः कल्छोरः । कुत्सितं लोडति कर्लोल इत्येकः ।
याति ( वयति ) गच्छति वीचिः, | स्तियामीः, वीची । ब्रद्धिमुत्कपैख कलयति उत्कलिका । सि-
याम् । श्रा समन्ताद् वलते श्रावल्लिः । पाल्यते पालिः । स्तरियामीः । पाली ] वेलयति पूिमादि-
कालमुपदिशति वेला । स्वियाम् । तरश्व उच्छवासश्च तरोच्छबासौ । तटति तटः । उनच्छुवसनम्
उच्छ्वासः । विग्रपत्ति विश्रमः विकारः । कस्य १ उदन्वतः समुद्रस्य | ऊर्वः, लदरी |
सम्प्रति मलुष्यवणं श्रारभ्यते श्रीमदमरकीर्तिना-
मतष्यो मानुपो मर्यो मनुजो सानवो नरः ।
ना पुमान् पुरूषो गोधा
एकादश मनुष्ये । मनोरपत्यं मनुष्यः 1 # ^ °कुरुनिषादेभ्यः प्रथमाऽपत्येऽपि" । कुरुनिषादाभ्या-
मणीपि मनोः सान्तश्च । ववचिदुद्धिस्वरस्य न वृद्धिः । श्रण्वा | # मनुष्यः । मानुषः । उणादौ च ।
मन्यते सुखदुःखादिकमिति मनष्यः } ५१ १मनेरस्यः” उस्यप्रत्ययः । मानयति मान्यते इति वा मानुषः |
"१ रमरानेरुसः'' उस्पत्ययः । उभयम् ।
१ क्ती° मा० १६ । २. कोषान्तरेषु समुद्रस्य शशध्वज इति नाम नोपलन्धम् । कथं
चित्समाधानपेक्तायां शशिध्वज इति पाठो बोध्यः। रशी चन्द्रो ष्वजरिचहं वंशश्रख्यापके यस्येति
तद्िभरदः । चन्द्रस्य समुद्रभभवत्वं पुराणप्रसिद्धम् । ३. का उ० १।५६। ४. तु सवनतरणयोः । क-
प्रत्यये ऋत इर दीर्घत्वं च \ श्रोरादिः शरणम् । सरलः पन्थास्तु पार तीर कर्म॑समाप्ता । ततस्तीरय- .
तीति विग्रहे पचाद्यच् । ५. पालनपूरणयोः प धातुस्तेन पिपर्तीत्यस्य पूरयतीति पयायो दयुत्ततीन व
इणोतीति । ज्वलादित्वाण्णः | क्षीरस्वामी तु परे पाश्वं मष कूलम् पारम् इत्याह । ६ का० त° ५७०
इति किः । ७. का० उ ५२२ । ८. कल्ल शव्यक्ते शब्दै कल्लमते इत्यस्य शब्दायन्ते इत्यथः । उणा-
दित्वादोलचूप्र° । कं जलम् तस्य लोलस्चञ्चलोऽवयवः । अनुस्वारस्य परसवर्णो लकार इति रामाश्रमः ।
९. वेज ._ संवरणे । वेजो डिच उ° सू० ४।७२ इतीविप्र० । १०. %एवं चिह्धितांशस्थाने “मनोः परु्येः"
काणरूण्पू० ४९३ इति ष्य षर प्रत्ययौ इति पाठो युक्तः ! ११. का० उ° ६।१० । १५. का० उ° ६।११।
१५
२५
१४ अमरकीनिविरचितमाप्योपेता
(वीय वाञ्छितं यान्तो वरमेते ुजद्धमाः।
न पुनः पत्तहीनत्वात् पडङ्गुप्रायन्तु मानुपम् ।»
भ्रियते मत्यः । ५ उ्त्यः" । स्वार्थे त्यो वा । मनोर्जातः मनुज; । मनोरपत्यं भानवः? ।
नणाति विनयति नरः, ‹ णीन् प्रापो ? नयतीति वा । “नियो डाऽनुघन्धर्च' । अस्मात् रन् श्रत्ययो
५ भवति, स च डाऽनुत्न्य इप्यतेऽ्धमस्वरादिलौपायंः । पूर्य्यते कुलमनेन सान्तः-ण्पुमान् । उणादौ
पूडः पवते पुनातीति वा पुमान् । “"सि्म॑नन्तदच ।* श्रसमात्तिः प्रत्ययो भवति, शरस्य च मन् रन्त;
चकाराद् हस्वत्वं च । इकार उच्चारणायंः । पुरि पुरि शयनात् पृरणाद्वा पुरपः । पृणाति पूरयति वा
स््रीणामुदरं गभैरेति पुरुपः£ । ध्रणतिः० कुपः । श्रप्माक्कुपः प्रत्ययो भवति । कोऽनुबन्धः । श्रन्येपा-
मपीति वा दाघंः । पूरुषः । लत्वे पुरुपः, पुलुपस्च । शुध परिवेष्टने । शुष्यति गोधा< ।
१० धवः स्यात्तःपतिनूपंः ॥२८॥
तस्यं मनुष्यशब्दस्याप्रे धव~पतिशब्दग्रयोगे चपनामानि भवन्ति । मनुष्यधवः, मानुपधवः,
मत्य॑धवः, मनुजघवः, मानवधवः, नरधवः, दघवः, पुम्धवः, पुरुपधवः गोधाधवः । मनुप्यपत्तिः, मातुप्पतिः
मर्व्यपतिः मनुजपतिः, मानवपतिः, नरपतिः, पत्तिः, पु स्पत्ति> पुरुपपतिः, गौधापतिः )
भ्त्योऽश् भृतकः पत्तिः पदातिः पदगोऽलुगः |
१५ भटोऽुजीच्यनुचरः शच्जीवी च किङ्करः ॥२६॥
एकादश सेवके ! धियते इति श्रत्यः ! “““गनोऽसंक्ञायाम्?? । भ्रियते राज्ञा भतः । स्वाथे कः |
श्रतकः । पतति श्रधो गच्छति पत्तिः१ ° पतनं वा । [पादाभ्याम्] ग्रतति [पद्ातिः१ १] । पादातिकः ।
श्रं,णादिक इकः । १? विनयादित्वात्त्वा्थे ठण् । पदुभ्यां "3 गच्छतीति पद्गः । श्नु पश्चाद् गच्छति
छचुगः । भति युद्धं बिभति भटः । श्रनुजीवतीव्येवंशीलः अचुजीवी । श्रनु पश्चाचरतीत्यञ्चचरः ।
२० शस्त्रेण श्रायुेन जीवतीत्येवं शीलः शखजीवी । फं कुत्ितं कायं विदधाति किङ्करः । सदायः, सेवकः,
पद्जेयः, पद्गः. पदिकश्च । तथा च यशस्तिलके-(रलो० १३० ) ।
“सत्यं दूरे विहरति समं साघुभविन पुंलां धमं श्ित्तात्सह करुणया याति देशान्तराणि ।
पापं शापादिव च तुते नीषचृत्तेन सार्ध सेवाटृन्तेः परमिह परं पातकं नास्ति किञ्चित्
सखी नारी वनिता य॒ग्धा भामिनी भीरूङ्गना ।
२५ ललनां कामिनी योपिद् योषा सीम न्तिनीति च ।२०॥
)
१. का० उ० ६।१२ । <. वाणपत्ये का० रू» पू° ४७३ इत्यण् । ३. का० उ० २।४१ । ४.
पाति पुनाति वा पुमान् । पातेडम्युन् पूजी इम्ब॒न्, पा० उ० ४।१७० इति इम्बुन् इति प्रक्रियाऽन्यत् ।
५. का०उ० ४।४२ । ६.पुरि शयन।दिति ठ निरुक्तप्रकारो विग्रहस्तु पृणातीत्यादिरेव । ७, का०उ० ३।५४।
८. गोधाशब्दस्य पुरुपाथं कोषान्तरप्रमाणं नोपलब्धम् } तदुक्तम्-गोधा तलनिदहाकयोः'" विण्लो° । गोधा
प्रखिविरशेषे स्य.ज्ञ्याघातत्य च वारणे । श्राकारान्तघ्लीलिगत्वं च सर्व्रास्योक्तम् ! अरसं ° २४३। श्रतोऽस्य
मूलं सुग्यम् । गोद् दति पाठे व॒ गोदो मस्तिष्कमस्याप्तीति गोदः सुख्यमस्तिष्कवच्वात् पुरप इति समाधेयम् ।
तदुक्तम गोदं ठ मस्तकस्नेदो मस्तिम्को म्वलुद्धुकः श्र चि० २।२८९। €, का० सू० ४।२।२५ इति
क्यप् । १.. ग्रौखादिकस्तिः, क्तिच् क्तौ च संलायामिति वा क्तिच् । पतनं वा इति व्युतपत्तिन््वमासङ्घि-
कत्वाद्पेचया । ११. अज्यतिर््यां च पा ०० ४।१३० इत्यतेरिन् । पादस्य पदाव्यातिहतेपु इति पदादेशश्च ।
१२. विनयादेष्ठण् वै० सू० ४।२।४० । १३. पदाभ्यां पादाभ्यां वेत्ति वक्तव्यम्, न तु पद्भ्यामिति । पाद
इत्यापत्तेः । पादस्य पदाज्यातीति पादस्य पद् ।
नाममलिा १५
नितम्बिन्यबला वाला कामुदी वाभरोचना ।
भासा तनूदरी रामा सुन्दरी युवती चरा ॥३१॥
द्ाविशत्िः चछियाम् । “रत् श्राच्छादनेः स्तरणात्याच्छादयति स्वदोप्रान् परगुणानि-
ति स्री। उणादौ । स्वृणात्याच्छादयति लजयाऽ्त्मानमिति खी । स्वरणतिष्टत् `” प्रययो मवति ।
द्कारमात्रः । ध्रमृवरणंः-" । श्रथवा इट्पाठः । डाऽ्नुबन्धोऽन्त्यस्वरादिलोपाथैः । उकारो
नदाच्थैः | रकारमात्र एव । ग्रमरसिहमाप्येः-“स्त्यायव्य(तेऽ) स्यां गभः स्त्री 1 तथा च हलायुधे
^“स्तृरणति विवेकमाच्छि नत्ति स्त्री” । नरस्य खरी जातिश्चैतनारी । नरं वनति भजते वनिता । सुह वैचिव्ये
कायेषु सह्यति मुग्धा । ' सुदेर्धक्४ दस्य गः 1 भामते कुप्यते (तति) भामिनी । [मामः] क्रोधो ऽस्त्यस्याः
वा भामिनी । श्िभेलयस्माद्(त्यसो)सी रः । ५८“भियो रुग्नुकौ च ।, भीरुः । प्रशस्तान्यङ्खान्यस्या श्रङ्खना |
लाडयति, (लडति) विलसति, ललयति (ललति) नरमीप्सते वा ललना । ''लल ईप्सायाम्" । भोगान्
कामयते कामिनी । युषः सो्ोऽयं धाठुः सेवाभ्थं । योषति पुरुषं गच्छंति रतेच्छया ग्राल्मनौ योषा ।
""कप शिप जघ भष दष मप सष रिष यूष जुष दिंसार्थाःः” । येोप्रति हिनस्ति हन्तीति योषित् ५‹हृख्तडि-
स्दियुषिम्य इतिः" एम्य इतिप्र्यो भवति । इकार उच्ारणार्थः । श्रमरसिदे-“ग्योति पुंसा योषित्
श्रजादित्वादाप््रत्यये योषिता च । सीमन्तोऽरूस्याः सीमन्तिनी 4 बध्नाति चित्तं वधूः । नितम्बोऽस्यस्या
नितम्बिनी । न विदयते बलमस्या शवला । "्वा' सौभाग्यं लाति ृहातीति बाला । “कस कान्तो” कम् |
^“<कमेरिनिङ् कारितम्" इन् । “श्रस्योप०” दीर्घः । कामयते इत्येवं शीला कामुकी } "^^ शृकमगमदनङ्ष-
भस्थालपरपतपदामुकञ् ।'' १°कारितलोपः । “१ ^निमि ०” दीघाँभावः । जकाराऽनुबन्धतवापपूवंस्योपण्दौवः ।
वामे स॒न्द्रे लोचने नेतरे यस्याः सा वामलोचना । “माम क्रोये” चुरादौ । भामवति । "भाम क्रोषेण
भ्वादावकारा <नुचन्ध आ्रात्मनेपदी । भामते भासा) चक्षुदौषादिद्थनात् । तनु सूच्मणुद्रं यस्याः सखा
तनूदसी । नरेषु रमते, मनांसि रमयति वा रामा? । पुषटु द्वियते श्राद्रियते जनोऽच, शोभनौ दरो
वराङ्गच्छद्रमस्या वा ^ उसुन्दरी । श्रथवा शुन्दर' इति सौत्रोऽयं धाठुः । युवत्शब्दात्नदादिविदहितस्तिः* ४
युवतिः मिश्रणे यौति नरान् भिश्रयति श्रौणादिको वा श्रतिः युवतिः। ल्ियमीः। युवती
यूनीयन्यः । तथाहि प्रयोगः--
“मत्त संगर एव मृत्युवसतिं प्राप्तः समं{बन्धुभिः,
यूनी काममयं दुनोति च मनो वेधव्यदुःखाद् वधूः ।
वालो दुस्त्यज एक एव च चलिशुःकष्टं कृतं वेधसा,
जीवामीति महीपते प्रर्पति यदूषेरिसीमन्तिनी ॥"
चलचित्तान्पुरषान् च[लयतीति चला^ “५ । वामनेत्रा, पुरन्ध्री, वासिता, वर्रिनीःप्रमदा, रमणीः
१. का० उ० ४।३६। २. का० सू० १।२।१०। २. क्ती° भा २।६।२। £ का०्ड०
६।२८४ इति धिक् प्र° हस्य गश्च । ५. काभसू० ४४।५६ | ६. का०्ड० १।३५ 1 ७, क्तीर भार
२।६।२॥ ८. का० रू° उ० ४६२ । ९. कार सू० ४।४।३४ | १०. कारितस्यानामिड्विकस्णे का० सू
३।६।४४ इतीनो लोपः । इनः कारितसंज्ञा कातन्चव्याकरणे ! ११. निमित्तापाये नैनित्तिकत्याप्यपायः इत्ति
परिभाषन्दुशेखलरे श्रकृतव्यूहपरिभाषा्थरूपः । १२. रमते राम। । ज्वलादित्वाण्णः । रमयतीति ठ न युक्तम्,
ण्यन्तस्य उ्वलादित्वाभावात् । १३ सु-्रतीव उनि खन्द्री । उन्दी स्लेदने । वाहुलकाद्रप्र ¡ शकन्ष्वादि-
त्वादुकारस्य पररूपम् । गोरादित्वान्डीप् इति रामा्मः । १४. का० स्० २।४।५० | १५. चलचिरः
पुरुपेश्चलती'त॒ चलत्येव विग्रहः } प्रचादयच् ! शिजन्ताततु चाला इति स्यात् ।
©
९
१०
१५
२०
१६ अमरकीर्तिविरचितमाप्योपता
दयिता, मरतीपदर्भिनी, कान्ता, वशा, मिला, मदेला च । |
भार्यां जाया जनिः कृन्या कलत्रं गे्टिनी गृहम् ।
महिला मानिनी पत्नी तथा दाराः परन्धरयः ॥२२॥
दश कलत्रे । इगन् धारणपोपणयोः'” | भ्रियते पुष्यते ग्म॑ख भार्या । ^ "चृव्व्यज्लना-
न्तत्ष्यण्"' । यकारमात्रः । श्त्योपधाब्ृद्धिः । भायां एति जातम् । “र छियामाद्ा” | श्राग्रत्ययः | प्र”
तिः | ^“रश्रदूघायाः सिर्लोपम् ।'' सिलोपः 1 शल्या वयो" जा (जि) नाति जाया । "जनी प्रादुमवि
च' | सुखी जायते ग्रासा उर जाया । ^च्ठन्ध्यादयः-सन्ध्या वन्ध्या जावा इत्याद्यः एव्दाः यक््त्ययान्ता
निपायन्ते । जनयति पुत्राञ्चनिः। दः“ सर्वधातुभ्यः । कुले खाधुः कुटय{ ' ¢ यदुगवादितः” | “कड
मदे कड तदादि + । कडति माद्रति यौवनेनेत्ि «कलत्रम् । ““्रमिनक्षिकडिभ्योऽचः” शरत्रप्रययः |
कडच्रम् । उलयोरेक्यम् । प्रथ“ ति०नपु० शध्रका० मुरा०। °मोऽनु० । गेमल्यस्या नेदिनी |
£ ग्रह उपादाने" । गृहाति प्रत्युपार्भितं गदम् । “+ °गेदेखक्” श्रकूप्रययः । 'श्रदिव्या + १?--सम्परतारणम् ।
मद्यते पूज्यते । महिला । मानः प्रखयक्रोपोऽत्या मार्िनी । पतिं पतति याति पत्नी । ° विदारण ¡ ट
क्र० । दोयंते शतलण्डीमवति पुस एभिरिति दासः । “^ "भवि घल्। श्रक्रारमात्रः । “श्तरदधिः | दार
इति जातम् ] रथमा ज् । प्रया ब्रहुत्वं च । पुरं धमयन्त, नेत्रान्ते पुरं शरीरं धरन्तीति **पुरन्धयः ।
त्तेत्रम्, सधर्मचारिणी, गदाः; सदचरी, सदटचरा ।*५ `
वल्लमा प्रेयसी प्रेष्ठा रमणी दयिता प्रिया।
दृटा च प्रमद् कान्ता चण्डी प्रणयिनी तथा ॥ ३३ ॥
एकादश वहछभायाम् | वल्लते पत्युधित्तं शंदरणौतीति वर्लभा । "^१५छ्ृश्शलिगर्दिरासि-
वलिवल्लिभ्योऽमः'" श्रमः प्रत्ययः श्याप्र्ययः 1 श्रत्निशयेन प्रिया भेयसी । “तर १ ०तमेयस्ि्टः” प्रका ये
ध्तर तम श्यघु इट" द्यते प्रत्यया भवन्ति श्रतिशयेन प्रिया परे्ठा । रमते जनो इ, मर्नासि रमयति
०
८, का० सू० ४८।२।३५ इति व्यण॒प्रत्यथः । २. का० सू० २।४।४९ । ३. का० सू° २।१।३७।
%, क[० उ० ४।३० | ५. का० उ०२३।१४ | ६. का० सृ० २।६।१९१ द्रति यत्प्र०। ७. का०उ० ३।५]
गडः सेचने । गढति ग्यते वा “गडेरादेद्च कः” पा० उ० इत्यत्रन् । उलयोरेकत्वम् । कड शासने मदे ।
कृडति कब्वते वा बादल कादुचन् । कलं मधुर ध्वनिं चायते र्तति वा! तरैड् पालने कः इत्यन्य ।
८. श्रक्रारदसम्बुद्धौ युश्च इति पृणं क सू० २।२।७ इति सेर्लपी युरागमश्च । ९. मोऽनुस्वारं
व्यवने दति पृं काण०्स्० १।४।१५ इत्यनुस्वारः । ५०. का००य्० ४।२।६० । ११. का० सू्० २।४।२
व्यावयिव्यधिवषिव्यचिप्रच्छित्ररिचिभ्रस्जीनामगुणे इति पृणंसूतच्रम् । ६२ का० सू० ४।५।१३। १३ का
सू० ३।६।५। श््योपध्रषया दीर्घा बद्धिनामिनामिनिचयक्षु इति सू्रप्वरूपम् । १४. स्यतु कुटम्विनी पुखरी
२।६।६ । इन्यमरादिकौशेषु दर्घकारान्तपुरन्प्रीशब्दक्येव सत्वादच्र पुरन्धरथय इति पाटो युक्त इति न
भ्रमितन्यमर । धुरं धरन्तीति विग्रहे "रच इः” पा० उ० ४।१३९ इति दः । पृपोदयादित्वात्पुरो एकारान्तलं
मुमागनच्चेति सीया तस्याप्युपपत्तैः । श्रत एव “ तौ सनातकेवंन्युमता च राज्ञा पुरन्धिभिश्क्रपश्च
म्रवुक्तमः" इति रघुः । पुरन्धमयन्तीति न विच।रसदम्, तत्वाधकाठुशाषनविरहदात् । १५. मार्या दिपुरन््यन्त-
शब्देषु सामान्यविरेपरभावादथमेदौ न विसर्तेव्यः । त्थामा, चाया, कुल्या, कलन, गेदिनी,यद,पतलनी
दारा परिणोतल्लीवाचक्राः । मदिलामानिन्थी विशि्नायिकरे । पुरन्धी पतिपुत्रवती । १६. का०उ० ३।१२।
१७, एतच कातन्तमू्ं नोषलतचम् । गुणाह्घदधष्टेवसू शा० सू० २।४।७१५ इतीयहुप्रलयो बोध्यः ।
नाममाला १७
वा रमणी ! नरेषु दयते गच्छति ईष्टे वा दयिता | प्रीणाति पत्तिचित्तं रज्ञयति परियाः | इज्यते
इष्यते वा दा । ्ङकृषटो मदोऽस्याः प्रमद्¶ । काम्यते नरेण कान्ता । चण्डते कुप्यत्ति चरडी । चण्डिका
नच 1 प्रणयोऽस्या श्रप्तीति प्रणयिनी ।
सती पतिव्रता साध्वी पतिवत्येकपत्यपि ।
सनस्विनी भवत्यार्या-
सप्त पतित्रतायाम् । एकः पतिरस्तीति सती १ । पतित्रतं करौति.पत्तिरेव त्तं सेव्यो नान्यो यस्या
इति वा पतिता । पतिसेवेव रतं यस्याः पतिता । यत्सृति-“नास्तिः ख्रीणां प्रथग्यक्ञो न
जतमिति 1” साधयति साध्वी । पत्िरस्या श्रस्तीति पतिवती 3 । एकः पतियंस्याः सा एकपती । मनोऽस्या
श्रस्तीति मनस्विनी । अर्थते सेव्यते श्राया । सुचरिता ।
विपरीता निरूप्यते ॥ ३४ ॥ `
मया धनञ्जयेन, भाष्यकर्वा रमरकीसिना वा कथ्यते विपरीता श्रसदशा ।
बन्धकी ुरुटा युक्ता पुनभ : 4स्वली खला ।
षड् चन्धक्याम् । बध्नाति तरुणचित्तानि बन्धकीं । कुलमठ्ति लटा । तथा चोणादौ
““टल्ञ वल वैकल्ये" देताविन् । श््योपधाया दीः । कुलपूवैः । कुलं लयति कुलटा । 'छुल्ञे टले-
रिलुक् उश्च" ले उपपदे रलेरिज्न्तस्य उः प्रत्ययो भवित इलुक् च । स्वाचारं मुच्यते ( स्प ) पत्या जनैरवा
मुक्ता । पुनर्भवतीति पुनभ ! पुमांसं चालयति पुश्चली । खं पञ्चेन्दियोखनन सुखं लाति गहातीति
खला, श्नन्यपुरुषलम्परत्वात् । पांशुला, स्वैरिणी, श्रसती, इत्वरी, धषंणी, ग्रविनीता, अभिखारिका, चपला |
सपर्शाऽभिसारिका दृती स्वैरिणी स्फी तथा ।
पञ्च दुत्याम् । स्पृश ससय" । स्पृशति, स्परत्यति, शस्प्ाद्तीत्, पस्पशं वा घज. । स्पशः । ^“पद्"-
सुञजविशष्पशोचां घज. । नामिन\श्च गुखः । “चछियामादा'” च्राप्रययः। स्पशं । पुरषान्तरममिसरति
अभिसारिका । दूयन्तेऽस्या० मौलर्यात् दृती । ्ैर् गतौ कम्पने च' । ईर् । ईरणम् ईरः । “भावि
घज _ प्रत्य: | स्वस्य दरः स्वैरः । स्वैरो विचयतेऽस्या स्वैरिणी । “तदस्याऽस्तीति " मन्त्वन्त्वीन्"' इन् ।
^“ ° नदाद्यज्ज्विवाह्” ई प्रत्ययः | “"रपुवर्णँभ्यः१ १ नस्य रत्वम् । शं सुखम प्रलति निप्पादयतीति
शम्फली । तथा तेनैव प्रकारेण ।
गणिका रद्धिका वेदया रूपाजीवा विरासिनी ।
पण्यस्री दारिका दासी काकी सर्व॑बन्नमा ॥ २६ ॥
नव वैश्यायाम् । गणः पेटकौऽष््यस्याः, गणयतीश्वरनीश्वरौ वा गणिका । 'लजि लाजि लाजा
लज तज भव्ने' । लज्ञयति निः स्वान्पुरषान् तजयतीति लञ्जिका । वेरो वेश्यावटे भवा वेदया^२।
रूपेण श्र समन्ताजीवतीति रूपाजीवा । विलासोऽप्याऽस्तीति चिरासिनी । तथा चोक्तम्--
“हावो मुखविशारः स्याद् भाव्रधिन्तसमुद् भवः ।
विलासो नेत्रजो क्षेयो विश्रमोऽत्र दगन्तयोः॥ ९
१९ च्सृधातोः शतृप्रययान्तो डीवन्तः सतीशब्दः ! २ “नास्ति घ्लीणां पृथग् यज्ञो न व्रतं
नाप्युपोषणम् । पतिं शुश्रूषते येन तेन स्वरे न दीयते, इति मनुस्मृतिः ५।१५५। ३. पतिवत्नी, एकपत्नी इति
पाठो युक्तः । ४. का० उ० ५।४७ | ५. का० सू° ४।५।१ 1 ६. कारसू० ६।५।२ नामिनश्रोपघाया लघोः
इति पूण॑सूत्रम् 1 ७. दूयन्ते परितप्यन्ते । शरस्य कारः खीपुमांषः । ८. का० तू० ४।५।३। ९. का० स्
२।६।१५. ! १०.का० सू २।६।५०। ११. का० स २।४।४८] ^रपुवसैभ्यो नोममन्त्यः स्वरहयकवगांऽन्तरो
ऽपि'" इति पूणं सूम् 1 १२. वेशेन नेपथ्येन शोभते, 'कमवेशाघत्” इति यत् । वेशे भवा दिगादित्वायत् ।
३
१०
१५
०
२०
१८ अमरकीतिविरवितभाण्योपेता
पण्यत्य खी परयस्री । परिमा कृतवा रमयतीत्यथं; । टणाति विदारयति कामिनम् दारिका ।
दस्यति परिकर्मणा कयति, ददाव्यासानं बा दासी । दाशी । तालव्यदन्त्यः | कामयते दव्येवशीला
कामुकी । सर्वेषा पुरुपाणां वल्लभा सवंवह्ठमा । तैरिन्री ।
५१प्तुःपष्िकलाभिन्ञा शीलहूपादिसेविनी ।
[ रि ५
५ प्रसाधनोषचारज्ञा सेरिन्प्री कथ्यते बुधे ॥»
गन्धकारिका } पण्यस्त्री च]
कान्तेष्टौ दयितः प्रीतः प्रियः कामी च कायुकः।
ल्लभोऽपुपतिः प्रेयान् विटर्च रमणे वरः ॥३५॥
तयोदश कान्ते । काम्यतेऽभिलप्यते कान्तः । इष्यते इः । दया कृपा संजाता अस्येति दयितः।
१० “तारकितादिदर्शनात्संजातेऽथे इतच् ।' “उइव्णवर्णयोर्लोपः स्वरे प्रत्यये पे च ।' श्राकारलोपः । सौरेफः।
प्र प्रकर्षेण दर कामसुखम् इतः प्राप्तः भीतः । पप्रोदरादित्वात् श्चाकारलोपः ! प्रीणातिस्प भ्रीतः।
प्रीणाति प्रीणीते वा परियः। '“प्नाम्युपधप्रीकृगजां कः" । ““स्वरादाविवर्णोवर्णान्तत्य धातोरिज्वो ।
कामोऽस्यात्तीति कामी । कामयते दइव्येवंशीलः कामुकः । वल्लते वल्लभः । ““धइश्रशलिगदिं
रासिवलिवलिलभ्योऽभः ।'" श्रमः मत्ययः । श्रसूजां प्राणानां पतिः श्रसुपतिः ! अतिशयेन प्रियः प्रेयान् |
१५ “°ग्रियस्थिरस्फिरोसतहुलयुखतरद्वरपरदीवृन्दारकाणां प्रस्यप्तववेदिगवंरपित्रवद्रायिन्रन्दाः 1 विट शब्दे
विटति कामोद्रेकशब्दं करोतीति विटः । “इयुपपेति कः ¦ रमु क्रीडायाम् !` रम । रतै करिचत्।
तं प्रयुङ्ते इन् । श्रस्योपधादीघः । “ "मानुबन्धानां हस्वः ।" रमयतीति स्मणः । ^ °नन्वादे युः 1”
° १८युबुभ्तानामनाकान्ताः” यनः । “१ कारितस्य ० कारितलोषः } “१ उरप ०* नस्य एत्वम् । बृणोति वर-
यतिवा वरः| कमिता! पतिः} वरयिता । भतां । भोक्ता | धवः | सच्यः । शछ्रभीकः । ५१ म्य
२० ठभ्यां कामपितिरिको वा दीर्घश्च जनयति क! | श्रभिकः । अमूकः | प्राणाधिनाथः । सेत्ता |
सचित्री जननी माता
रयः मातरि । सूते जनयति सविजी । जनयति जायतेऽस्यां वा जननी । माति गर्भो
१५पानयति वा माता | श्रम्वा।
। जनकः सविता पिता |
२५ च्यः पितरि ! जनयति उत्पादयतीति जनकः । पुत्रान् स॒जते ( सते ›) सविता ! श्रहितात्
पाति रक्तीति पिता । “उणादौ” पा॒रकषरो, पातीति पिता । स्वस्ाद्यः" १६ । ' स्वखनप्टनेष्ृतवष्ट
चतदीतरध्शास्तृपितृमावरदुदिवजामावृ भ्रातरः” एते शब्दास्तृनप्ल्ययान्ता निपावयन्ते ।
१.८चवप्बष्टिकलाऽमिनज्ञा शीलरूपादिसेविनी । प्रसाधनोपचारज्ञा सैरन्धी स्ववशेति चेति कात्यः"
इत्यमरकोरे कती° स्वा० । २. का० रू० पू० ५०८ । ३. काण्वू० २।६।४४ । ४. का° सू० ५।२।५१ । ५.
का०सू० ३।४।५५] इतीप् । ६. का० उ० सू° ३।१२ ¡ ७. पा०स्ू० ६।४।१५७। इति प्रियशब्दस्य प्रादेशः।
८. “इगुपधज्ञाप्रीकिरः कः" पा० सू० २।१।१३५] €. का० सू० ३।४।६५। इति ह्वः । १०. का० सू
४।२।४९। इति युप्रत्ययः । १९१. का० सु० ४।६।५४ इत्ति योरनादेशः ! १२. का० त° -२।६।२५।
इतीनो लोपः । १३. का० स्० २।४।४८। १४. कातन्ते नैतत्सूजमुपलब्धम् । सैनेन्द्रव्याकरशे-“शुङ्लि
कोदरिके" त्यादि सूम् ४१।९७] तेन कपत्ययान्तः पके दीर्ान्तश्चाभिकौऽभीक इति निपातितः । १५
मानयतीत्थंः, विग्रह मातीत्येव । मा माने । तच प्रत्ययान्तः । १६. का० उ० २।४२।
नाममाला १९
देदापघनकायाङ्गं वपुः संहननं तनुः ॥ ३८ ॥
कठेवरं शरोर च मृतिः
दश देदे । देदद्च श्रपघनश्च कायश्च श्रङ्ग च । समाह।रसमास्वादेकवचनम् । दिद । देग्धीति
देहः । “ "दिदिलिदिशिलिपिश्वसित्यध्यतीषूर्यातां च'” । एषां खो भवति । श्रपहन्यते अपघनः ।
“मृत्तौ ` घनिश्च'" शल् । चिन् चयने । चि। चीयतेऽसौ कायः। “उ शरीरनिवासयोः कश्चादेः"'
चिनोतेः शरीरे निवासे चाथ घज भवति ्ादेश्च को मवति । उख, ए, ब, मख, रख,
लखि, इखि, वल्य, रणि, लगि, गि, वगि, मगि, स्वगि, इगि, रिगि, लिगि गत्यर्थाः |
श्रङति मस्णं गच्छतीति श्ज्गम् । उप्यन्ते पुरुपराथां भ्रनेनेति वपुः । ' ऋः"पुवपिचक्षिजनितनि
घनिभ्य उष्" एभ्य उस् प्रत्ययो भवति । संहन्यन्ते पंपयन्ते धातवोऽत्र संहननम् । धाठमिः रसास॒गुांस
मेदोऽस्थिमजुकरस्तम्यन्ते तजः । तन्; । उदो तुवित्तारे। तनोतीति तनूः । “कृषि ""चमित्तनिधनि-
चधिर्जिलर्जिभ्य ऊः" एभ्य ऊप्रत्ययो भवति । कलते स्थिरत्वं गच्छति कलेवरम्< । कडति मायति
वा कलेवरम् । कडेवरं च । श्रमरसिंहमप्ये ° “कट्यते कलेवरम् ।' शीयते क्षयं गच्छति रोगज्वरादिभिः
शरीरम् । ""कृ<शुशौष्ड्भ्य दरः 1 एभ्य दरप्रल्ययो भवति । उणादित्वात् । मूष मोदसषुच्छूाययोः
मू । मूष्खनं मूर्तिः । सियां^ क्तिः । “घोषवत्योश्च कृति ^ °इति नेर् । “राल्लोपः (प्यौ)' ° १ इति छुकार-
लोपः । “नामिनाबौदङुदधु रोष्य॑ज्ञने'" + > दीघेः । व्यज्ञनम्?`३ | प्रथ० सिः] “रेफ०१४ | विग्रहः |
वर्मं । पुरम् । पिण्डम् । सेत्रम् । गोचरम् । घनः । पुद्गलः । प्रतीकः । अवयवः ।
अस्मिन् भवः
ध्मस्मिन् कये भवः कायमवः। देहमवः । शआपघनभवः । श्रङ्गुभवः। वपुभंवः | संहनन-
भवः । तनुभवः । कलेवरभवः | शरीरभवः । मूतिंभवः । कायजः । देहजः । श्रपघनजः । अङ्गजः ।
बपुजैः । प्ंहननञः । तनुजः । कलेवरजः । शरीरजः । मूततिजः । एतानि पुचनामानि भवन्ति । मव
प्रयोगे ।
सुतः।
पुत्रः सूनुरपत्यं च तु तोकं चात्मजः प्रजा ॥३६॥
टौ पुत्रे । सूयते खतः । पुनातीति पुरः । ^^ “पूजो हष्वश्च 1” श्रस्मात् चकूप्रत्ययो भवति
` धातोहष्वस्च कोश्युणार्थः 1 तथा च सोमनीव्याम्१६--“य उत्पन्नः पुनाति वंशं स पुचः। अथ
पुन्नाम्नो नरकात््ायते वा पुः । सूयते सू युः । < १ऽसूविपिभ्यां यण्वत् ।” श्राया तु मरत्ययो भवति,
स चे यण्वत् |” पूङ् भा{एिगमं विमोचने ।” पल शल पत्लू पथे च गतौ 1” पत् नज पूर्वः । न पतन्ति येन
जातेन पूवेजा नरकादौ तदपस्यम् । भनजि१< पतेः" यप्रत्ययः { नस्य तत्पु० बिः | नपुर
। १,का०सू० भारा] २, कार सू० ४।५।५८। इत्यल् घन्यादेशश्च 1 ३. का० स्
४।५।३५ । ४, का० उ० २।४६। ५. का० उ० १।३१। ६. कले शुक्रे मधुराव्यक्तष्वनौ वा वरं श्रेष्ठम् ।
“लदन्तादि"” ति सप्तम्या श्रलुक् । इत्यन्यत्र । ७. क्तीर० भा० २।९।७०] ८. का० उ० ३।४८। €. कार
सू.० ४।५।७२] इति क्तिप्रत्ययः । १०. का० सू ४।६।८०] ११. का० सूर ४।९।५८ १२. कार षू
३।८।१४। १३. “"व्यञ्जनमस्वरं परं वणं नयेत्” इति पूणं कातन्न सूतम् ।१।१।२१। इति व्य्धनस्य पर-
वणंयोगः । १४. “रेफसोर्विर्जनीयः' इति पूणम् । का० स्० २।३।६३। इति खकारस्य वितगः |
१५. का० उ० ४।४१। ९६. नी° वा० समु° ५ सू० ११ १७. का० उ० २।८ १८. कार उ० ६।६०।
१९. “नस्य त्स्पुरुषे लोप्यः' इति पएूणंम् । का सू २।५।२२। इति नलोपः |
१०
१५
२०
२
॥
<
१०
१५
२० मरकीर्तिविरचितभाप्योपेता
द्का०१ । मोऽ्नु०* । तोजति भ्वुक् 1 स्तूयते तोकम् । चात्मनो जातः श्रात्मजः। प्रकरं
जाता भजा) ^ “सत्तमीपञ्चम्यन्ते जनेः} व्रालः, पाकः, श्र्म॑कः, गर्म॑पोतस्च । पृथुकः, पि्युः
शावः, डिम्भः, वटः, मारवकः, भ्रखः।
उद्वदस्तनयः पोतो दारको नन्दनोऽ्मकः ।
स्तनन्धयोत्तानशयो-
प्रौ व्रालकरे। उद्वहतीति उद्धष्टः। खश । तनोति वि्तास्यति वंशम्, तनयः । “तनेःः
कयः | पवते वातेन पोतः । दरयति दृणाति वा तर्णीनां मनांसि (दारकः 1 टनदि समधौ ।
नद् । श्रत एव नन्द् । नन्दति कररिचत्तमन्यः रयु ङक्ते । “° धातोश्च दतो { देतौ )» दञ्! नन्दयतीति
नन्दनः । "नन्दि ^ "वाविपदिदूपि्ाधिशोमिवर्धिभ्य दइनन्तेम्योऽषं्ञायाम्” युपरत्ययः । स्वमते “नन्द्ादे
युः" यु प्रत्ययः *१५युबुानाम०- इति युस्थाने श्नः । ^° रकारितस्यानामि० कारितलोप
दं मह पूजायाम्" ब्रहत्य्भंकः । “° अमृकादयः ।' मृकयुकाऽ्मकपधुकत्रकछकभूकाः एते कमत्थ-
यान्ता निपात्यन्ते । स्तनौ धयतीति स्तनन्धयः । १४'शगुनीप्तनमुज्चकूल।स्यपुप्पेु षेः ।” खर्
उत्तानः शेते उत्तानशयः । १ ५“उत्तानादिपु कटु“ श्च. ।
सत्री चेद् दुहितरं बिदुः ॥४०॥
पुष्या दुदितरं१६ दोग्धि मावरकुलं दुनोति वा विदुः कथयन्ति । तनया, पुत्री ।
वयस्याऽली सहचरी सध्रीची स्षवयाः सखी ।
प्ररं सख्याम् । ववखा व॒ल्या वयस्या । वयसी च । श्रा समन्ताचिचत्तं लाति श्रालिः।
यामीः । आाज्ञी । सदह साधं चरतीति सहचरी । स्ा्तीति सध्यड्1 १*“सदसन्तिरषां सत्रि्मिति-
स्यः \" ईप्रत्यये सधीची । सद वयसा वर्तते सवय!:१८ । समानं खयातीति ठखिः (खा } । चियामी
सखी । ११“वख्यादयः” सचि श्रभि प्रहि इत्यादयो डिगभ्रत्ययान्ता निषालन्ते ।
। आीविवनितं मित्र सम्बन्धो मित्रयुक् सुहत् ।४१॥
चत्वारो मित्रै | श्राल्ली रहितानि बयस्यादीनि नामानि मिच्रवाच्यानि स्युरित्य्थः | “जिमिदा
सनेन" । मेद्यति स्म मेदते स्म वा स्नेदयुक्तो भवति स्म वा भिन्नम् । २० ८चिमिदिम्यां चक्" शराभ्यां २१
१. “्रकारादषम्बदधौ गुश्च" इति पूम् । का० घू० २।२।७। इति सेर्लोपो मुरागमश्च |
२ 'मोऽनुस्वारं व्यज्जन" इति पू णंम् । का० सू १।५।१५। ३. “तुज दिंसावलादाननिकेतनेपु” । चुरादौ
वा णिच् । तौजति पितृघनमादरौ “तुक्” इति टीकाशयः । ४. तौति पूरयति पितुकायं पितुरभावेऽपीति
तोकम् । ठः सौरो धार्हिसादर्तिपूततिषु । हुलकात्कः इति ब्युतपत्यन्तरमप्यूहयम् । ५. का० चू° ४।५।५१।
दरति जनेडः 1 ६. का० उ° २२५] इति तन् धातोः कथप्रत्ययः । ७. पवते वातेनेति विग्रहस्तु नौका
वाचकपोते बोध्यः । पुत्राय तु पुनाति पवते वा वंशं पौतः | 'म॒गवाहस्यमि"" - इति का० उ० ४।२७।
सूत्रेण तप्रत्ययः } ८. युवतिमनोदार्णं बालद्वारा न धरते ! श्रतो दृणाति दारयति वा प्रातुयौवनम्,
पित्नोरनिस्सन्तानता जन्या्तिवेति तदाशयोऽभ्युत्ने यः । €. का० सू ३।२।१०। १०. का० सू ४।२।४९।
“नन्यादे यु” इति सूते दुर्गवरत्तिः । ११. का० स्.° ४।६।५४ । १२. का० सू० ३।६।१४1 इतीनो लोपः ।
इनः कारितसंला कातन्त्रे । १३. का० उ० २।५८! १४. का० सू० ४।३।३१। १५. का० सू० ५।३।१८
अत्र दुंृत्तिः । १६. दोग्धि पितलं दहतति दुनोत्ति वा मातूङकलं दुता । स्वखादित्वातुनप्रत्यय
इत्याशयः 1 १७. का० पू० ४८६।७१) इति सदस्य सथ्यादेशः। १८. समानं वयौ यस्या इति विरह
न्याय्यः । ज्योतिजंनपदेति समानस्य सादेशः) १९. का० उ० ४९। २०. का० उ० ४1४० | २१. मेदति
मेदते इति वतंमानकालिको विग्रहो युक्तः, न तु भूतकालिकः।
नाममाला
क
क् प्रत्ययो भवति } ककारो यण्वदुभावाऽथस्तेनागुरत्वम् । सम्यक् स्नेहेन बध्नातीति सम्बन्धः । मिचं ::
युनवतीति भिच्युक् । सुष्टु दरति चित्तं खुद † । शोभनं हद्यं यस्य वा । सखा, ल्निग्घः ]
~ सहकृत्वा सहकारी सहायः सामवायिकः ।
चतारः सहाये । सदङृतवान् सदेरत्वा । “कुजश्च” कछनिप् प्रत्ययः । प्र० सि० "धुरि
चा० दीर्धः ! सह समन्ताकरोतीति सहकारी । "'नागम्यजातौ * रिनिस्ताच्छील्ये । सह सार्धम् श्रयते
-गन्छुति सहायः । समवाये नियुक्तः सामवायिकः 1 इकणए् ।
सनाभिः सगोत्रो बन्धुश्च सोदयः
चत्वारो भ्रातरि । समाना नाभिर्य॑स्य सनाभिः । समानं गोरं यस्य सगो; । बध्नाति
सनेदेन वन्धुः । ““पर्यसि” वसिहनिमनित्नपौन्दिकन्दििन्धिबह्यरिभ्यश्च” एभ्य एकादशम्य उः प्रत्ययो
भवति । सोदयेः । समानोदर्यः, सगः, सोदरः, समानोदरः, श्रात्मीयः, स्वजनः, माप्त, जात्तिः,
सनासेयः, सपिण्डः ।
अवरजोऽलुजः । ४२ ॥
कनीयान्-
दौ (जयो) लघुभ्रातरि ! श्रवरं पश्चाजातः वरजः । (अनु) पश्चानातः श्रुजः । “सती -
पञ्चम्योजं ८ म्यन्ते ज ) नेः" | श्रयमनयोरतिशयेन युवा कनीयान् । ध्युवाऽल्पयौः« कन्वा । कनिष्ठः |
अग्रजो व्येष्ठः
श्रमे जातः ग्रः । प्रकृष्टो बद्धो उयेष्ठः । “बद्धस्य < ज्यः" वृद्धशब्दस्य ञ्य श्रादेशो
मवति । पूर्वजः, वरिडः, वषींयान्, अभ्रियः
भ्रातरजानी स्वसाऽनुजा ।
जयो भगिन्याम् । म्राठुर्जाता श्रातरज्ञानी ^ । स्वस (स्य) ति तप्यति क्षिपति चित्तं स्वख" ° ।
कऋदन्तः । श्चु पश्चाजाता श्रनुजा । भगिनी । भग्नी च । जामिः । यामिश्च ।
भतत : स्वसा ननान्दा स्यात्-
स्यात् भवेत् । भतुःरवसा भगिनी । ननान्दा । "नदि समृद्धौ” । नद् । ध्य्रत१९ एव ०१
नञ् पूवः । न नन्दति म्रावृजाया यस्यां सत्यां षा ननान्दा । “ननि ९२ च नन्देन दीषश्च'” ननि उपपदे
१.यघ. दस्तीति्युत्प्तिसतु तान्तयुदत्शब्दे सम्भवति । भित्रवाचक्दान्तषुहद्शब्दे ठ शोभनं हदयं
यस्येत्येव । हदयस्य दादेशः सम।से । २. का०स्० ४।३।९०। ३. “घुटि चाषम्बुदधौ"४.का०ू° २।२।१७।
का०स्० ४।३।७६! ५.का०उ० १।६। ६. का०स्० ४।३।९१। ७. वर्तमानकातन्तरे नोपलन्धम् । ८. वर्तमान-
कातन््रे नोपलन्धम् । ९. नान्यस्मन्कोषे भ्रातुजानीशब्द उपलब्धः, नाप्येतत्साधकं किमपि व्याकरण-
सूम् । भ्राठजातेति बि्रहोऽपि भगिन्ययऽसंगतः । तथापि भ्राता सह॒ माठजततिति विच्य बाहुलकादौ-
णादिकपणत्ययं जनघातोः प्रकम्य श्रणन्तत्वान्डीपि भ्रातृजानीति शब्दे परन्यकारमत्ययात् कथञ्चित्
समाधेयः । १० स्वस्यति क्िपति चित्तं भरातः ष्विति विग्रहो वोध्यः । “चु रेपे ` दिवादौ । सप॑कात्ततः
“सुज्यसेषट् न'' इति श्रनत्ययः । कातन्नोखादौ त॒ "स्वस्रादयः" इति “वस् प्राणने' इत्यत ्ृनप्रत्यये
शकारस्य सकारे च “सवसितीति स्वसा” इत्याह । अन क्रिपतीति दर्धनात् “चदु ्तेपणे' इत्येवं भाप्य-
कतु'रमिप्रेत इति क्लायते 1 ११. "रत एव वर्जनादिदमनुवन्धानां नोऽस्तीति'" दगंदृततिः । कार द् ३।६।१०।
१२. का उ° स् २।३९।
१०
१५
२०
१०
१५
२०
२८५
२२ | अमरफीर्तिचिरचितभःप्य्रोपेता
सति नन्देधातिोक्"न् प्रव्ययो मवति श्रकायो दीर्घश्च भवति । ननान्दा इति जातम् |
मातुलानी प्रियाम्विका ॥ ४३॥
द्रौ माठलमार्यांयाम् । मादलस्येषं भायां मावल्लानी । दद्र" वठ्राभवशर्वददरदिमेयमार्य-
यवयवनमादल।चार्याखामानुक् ईप च” । श्रम्पेव श्रग्िश्रा । श्रम्बादिम्यौ उलकाः” ड) ल, इक, भरत्या
भवन्ति | श्रिया चापौ श्रम्विका प्रियास्विका ।
वैर्ारातिरमि्रोऽरिरिटू सपत्नो विपद्रिषुः ।
भरार्यो दुर्जनः श्रु श दष खलोऽदितः ।॥ ४४॥
पञ्चदश शत्री। विरिाम् ई लद्मीम् दस्यति निगमयति वीरः, वीरस्य कर्मं वरम्: |
[ वैरमस्यास्तीति वैरी । ]. वैरिपुरमियसिं गच्छुति श्रारातिः> श्रयति । न मित्रम् अभित्रम्।
श्रधर्मारतादिवत् । “विपक्षे नय” इति सरघतध्सूघम् । श्त्ुत्वमियर्सि श्ररिः । देशीति दिट्।
“सत्^सृ द्विप ददुहयुजविदमिददिदजिनीराज।युपत्गैऽपि" किप् । एकार्थाऽभिनिवेश्चेन समानं
पतति सपल्नः। द्विष्टे द्विषन् । निष्ठुरं रयति रिपुः । “उरज्जुतक्ुवल्गुफल्युरिष्रिपुपृथु्तधवः
एते उभ्रत्ययान्ता निपात्यन्ते । निपातनमप्राततप्रापणा्थे श्राततस्य बाधनायेम् । लक्षणेन य्दपिद्धं तत्छव
निपातनास्िद्धम् । तथा क्तीरस्वामिनः-ऽ“रेपयति रिपुः! रेप गतो । भ्रातरं व्ययति मारयति
°श्रातव्यः। दुजनः दुजेनः । परममहारकश्रीयशकीर्चिषम्मापितप्रन्ये--
'्रशस्या न नमस्याऽपि दुजनैयी विधीयते|
कण्टकः पादलग्नोऽपि न शुभाय प्रजायते ॥"
तथा च सू चिष्क्तावल्याम्--
वरं धिघ्ठः पाणिः कुपितफणिनो वक्क्रे
वर कम्पापातो उवलदनलक्रुण्डे विरचितः ।
वरं प्रासप्रान्तः खपदि जठयन्तर्विनिदहितो
र दौ , क प
न जन्यं दौज न्यं तदपि विपदां सदूम विदुषा 1"
श्रत्र ये केचिद् दुर्जनाः सन्ति, तेषां मस्तकेऽशनिपातो भवतु । तथा च१०--
““दुज्जण सुहियड होऽ जगि सुयगु पयासिख जेण ।
ममि विसं वासर तिमिण जिमि मरगड कच्चेण ।1
शरणा शीयते वा ^ चुः । दृष्यते निन्यते लोके दुः! दै ^ शद्षोऽसत्यस्य वा द्विषन् ।
१. परा० सू०४।१।४९। श्रत सूत्रे यमेत्यधिकः पाठः । २. “दायनान्तयुवादिभ्योऽणु"युवादित्वादण् ।
ततो मत्वं “ग्रत इन्ठनो” इतीन् । ३. “र गतौ” । व्राङ्पूर्वकाद् ऋषातोवाहुलकादातिग्रययः।
श्नन्यच्र तु न राति सुखं ददातीति नन प्व॑कात् 'रा' (दाने) धातोः क्तिच् क्तौच संक्चायामिति क्तिच् ।
४. “"तद्न्यतद्धिरुद्धतद्मावेषु नज.. वतेते” इति वक्तन्यम् । “यन् स्वरे" सारण समा० १४ सू० । ५ का
स्० ४।३।७४] ६. का० उ० सू १।६] ७. कीर ० भा० २।८।१०। ८. “व्येन. संवरणे" घातूनामनेकाथं
त्वादिखाऽथं इत्तिः । गआ्रातोऽदपगे कः । ६. निर्खयक्गरयन्त्रालयप्रकाशितकाव्यमालाप्तम गच्चेदुकति
मुक्छवलौ ६१ श्लौ° । १० सावयध० दो० २। १९. "“जव्वादयः । उत्रश्मक्त शिग्र श्रवः । एते रधर
यान्ता निपात्यन्ते" । इति का० उ० दुग० व° ३।६६। १२. देपोऽस््यस्येति केवलमर्था <भिप्रविर ।
` विग्र्स्तु दे्टीत्येव । शवरभ०
नासमाख २२
खलति षननगुणानाच्छादयतीति खलः 1 न मैं हिनोति गच्छंति, न हितो वा, अहितः । श्रभियाति
प्रतिपत्त , सहनः, जि्घांघुः, परिपन्थी, परः, च्रुत्, श्रपयी, पयंवस्थात्ता, शाच्रवः) प्रत्यनीकः, दवेषण
दह'द्, दस्युः, श्मभिमन्थी ।
दीधिति्भावुरुस्रोऽशगंभस्तिः किरणः
पादो रुचिम॑रीचिर्मास्तेजोऽचिगौयतिः प्रभा ॥४५॥
षोडश किरणे ! दिधीते दीप्यते दीधितिः \ ` 'दीधीडो छिमतिः" दीधीडो धातोडित्तिः प्रत्ययो
मवति 1 “मा दीतौ" माति भावः । उ"दामारिङ्रञ्भ्यो नुः ।” एभ्यो नुः प्रत्ययः स्यात् । वति सौ
* उखः । पुंसि । श्रश्नुते जगद् व्याभोति अंशुः 1 छी । उणादौ 1 त्रनच् 1 अजनितीति छंशयुः 1 अनेः"
शुः" श्नेधांतोः शुपत्ययो भवति । [ “ध्मा दीप्तौ" माति भातुः} "्दामारी ] गां यवं बमस्ि
°गसस्तिः।
"" <वणीगमो गवेन्द्रादौ सिंहे वणं विपय्येयः।
षोडशादौ बिकारस्तु व्ण नाशः प्रषोदरे ॥"
कीर्यते किरणः । हलायुघे-“किरति विक्षिपति तमांसि किरणः 1“ “° कृभूभ्यां कनः
कौं ते फरः । पद्यते पाद्; “° °पद्स्जविरश्स्पुशोचां घञ. "' रोचते रुचिः । भ्रियते तमोऽनेन मरीचिः।
स्तरीनोः । उणादौ । भ्रियते मरीचिः । “° ^मुकणिभ्यामीचिः” आभ्यामीचिः प्रत्ययो मवति । भाषते
क्िपि सान्तो भास्। स्वीनोः।" पुस्येवेति शब्दभेदः । भाः। भासौ । भासः । तेजयतीति तेजस् ।
श्रचयतीति अचिष् । अव्य॑ते पूज्यते शरधिः । "अरि" ^शुचिरचिहुखपिदिछर्दिभ्य इसिः ।" गच्छुति
तमोऽत्रोदिते गौः ।. स््ीनोः । चोतनं द्य॒तिः। चोतते (वा) य् तिः! प्रभाति प्रभा) रोचिः, अभीशुः,
५ रश्मिः, धृशिः, सुचिः, विभा, धाम, वषुः, केतुः, प्रग्रह, उपधृतिः, धृष्णिः, पृश्निः, मयूखः, विरोकः,
कद
दीप्िर्जयोति्महो धाम रदिमरूजों विमावसुः ।
सप्त तेजसि । दीप्यते दीति: । द्योतते ज्योतिः । शज्योतिसादयः१उ । ज्योतिर्वदिरादयः ।
महति महः १४ । सान्तम् । धीयते सूर्येण नन्तम् घामन् । रशि: सौचः । रशति श्रश्नुते रद्विमः। “ऊर्वं `
चल्राणनयोः ।" उर्जयतीति ऊजैः। कः। [ °“विभा वलुर्यस्य स विमावस्ुः 1 ] ( विभा । वदुः 1 )
रीतोष्ण प्रायपूर्वाञ्चौ तदन्ताविन्दुभास्करौ ॥४६॥
तयोरन्तौ ° ‹ तद्न्तौ । इन्दुभास्कसौ । इन्दुश्च भाक्करश्च इन्दुभास्करौ । कथंभूतौ १ शीतोप्ण-
१. न मीं दिनोतिस्मेति भूते विग्रहो वोध्यः। गत्य्॑त्वाकततैरि क्तः । न हितमस्मादिति
रामाश्रमः । २. का० उ०सू० ६।२९। ३.का०उ० सू २७] “वस् निवाते” वस् धातोः “स्फायि
तश्ची"' त्यादि उ° भन्ने रक्मत्ययः सम््रसार्णं च | ५. का° उ० सू० ५।४८ । श्रंशयति विभाजयति “रं
विभाजने" उप्रत्ययः व्युत्पच्यन्तरं च } ६. पुनसक्तत्वात्परिदार्यः । ७. बभस्ति दीपयत्ति । “भस भर्व॑नदी-
पयोः" । त्िप्रवययः । पषोदरादित्वाल्ोडशादौ वशंविकारवदोकारस्याकारः। ८. शा० प° २।२।१७२।
“पुषोदरादयः'' इत्यत्र कारिकारूपेख पठितः । ९. का० उ० सू ६।१४। १०. का० सू० ५।५।१।
१९१ का० उ° सुऽ ३४३1 १२. का० उ० सू० २।४४। १३. का० उ० सू० २।४५। १४. महन मदः।
मते पूज्यते वेति रमाश्रमः। १५. वस्तुतस्तु “विभा” इति “वु” इति च तेजसः तला । ससदितौ
“विभावसु शब्दस्वु सूर्यांग्निवाची । तदक्तं “वसयंवही विमावस्” इति श्रम० कोऽ ३।६।२२६।
१६. ते दीचित्यादयः शब्दा श्रन्ते ययोत्तौ तदन्तौ इत्येवं समासो बोध्यः । तयोरन्ताविति समार
लेखकम्रमादात्परयुक्तः
१०
२५
१०
९
9
२४ अमरकीर्पिविरचितभाप्योपेता
८ प्राय ) पूर्वाञ्चौ । शीतीष्णी ( प्रायेख ) पृवान्यी वयोसिनुभार्योः (ती) शीतोष्कु (प्रा)
पूर्वाञ्चौ । शीतदीधितिः। फीतदीधितिनान् । फीतमानुः। शीततमानुमान् । गतांश: सीतथिमान्।
शीतगमस्तिः । रीतगभस्तिमान्। सशतीतक्रिरणः । शीतकरिर्णवान् । शीताः । गीतपादुवान् । योत-
रुबिः। फीतरचिमान् 1 शीतमरीचिः । फीतमरीचिमान्। एीतार्चिः । श्ीततार्चिप्मान् । सीतभाः।
शीत्तमावान् । शीतयुः। सीतगौवा+ (मा) नृ । गरीतच्रुतिः । श्रीतदरुतिमान् । एीतप्रभः। शीतप्रमावान्।
शीतद्रीिः । शीतदीतिमान् । शीतव्योतिः। गीतव्यौतिष्मान् । णीतम्ाः। णीतमदस्वान् । श्वीतवामा ।
तीतघामवान् । यीतरशिमिः 1 शीतरदिमवान् । शीतोजैः। गतोर्ववान् । ग्ीतविभावुः।
शीतविभावपुमान् । किर्यगब्दानां ( व्देम्यः) पृवं शोतशब्द्रयोगै चन्दनामानि भवन्ति ।
उष्यशव्दप्योगे सथैनामानि भवन्ति । उष्णदीधितिः । उष्दीधित्िमान् । उप्भावुः ।
उष्णभानुमान् । उष्णोच्लः । उप्णौक्वान् । उर्णा्युः । उप्णद्युमान् 1 उष्णगमस्तिः ।
उष्टगभस्िमान । उष्छकिरण. । उप्यकिरस वान् । उष्एपादः। उप्रप्रादवान्। उष्एरचिः । उन्ठ-
रुचिमान् । उप्णमरीचिः । उण्णमरीविमान्.। उप्यभाः । उष्यमास्वान.। उष्यतवाः । उप्णतनत्वान।
उप्ार्धिः ! उप्यविंप्मान.। उप्रगुः। उय्णगोमान्। उप्ख्युतिः । उष्णदयुतिमान् । उष्ठप्रभः। उचष्छ-
प्रभावान् । उष्णदीत्तिः। उप्णदीतिमान । उप्छव्वोतिः । उप्छज्योतिप्मान् । उप्छमहाः 1 उष्एमद-
स्वान् ! उप्णघ।मा । उप्एघामवान् ) उष्णरद्रिमः। उप्णरदिमवान् । उष्णौर्वः । उ्णोर्ववान् 1 उष्ठ-
विभावसुः । उपएविभाववुमान् 1
शशी विधुः पुघाग्रतिः कौदीडघदग्रियः 1
कलमृचन्द्रमाशवन्द्रः कान्तिमानोपीश्वरः ॥ ४७ ॥
दश्च चन्द्रे । शशो <ष्वास्तीति श्यी । ' विदघात्यृतं विधुः ¡ “वौ धाजश्च > । चुघा श्रमूतं
वूयते खधाखतिः । कुश्दानामियं विकाश (स) देठलात्कौमुदी ( च्वोत्लना तस्वाः ग्रिवः कौमुदीग्रिवः ) 1
ऊुरदानां प्रियः चमीष्टः कसुदयियः । कलां बिभर्ताति कठाशरत् । “मा मानि" चनं मातीति
चन्द्रमाः३ 1 ` ध्वने: मतिः" चन्द्रे उपपदे ग्रतमादखन् प्रत्ययो भवति । श्गुखुवदूमावादक्रारलोपः।
भित्नयोगः ल्यं एव । चन्दुतीति चन्द्रः । “तावि "तच्िवचिशकिन्तिपिश्ठदिव्दिमदिमन्दिचन्दुन्दी-
न्दिभ्यो र" । कान्तिरस्यीत्त कान्तिमान् । श्रोषधीनामीश्वरः श्रोपघीश्वरः । इन्दुः, सोमः, रावा
रोहिणीवल्लमः, श्रन्नः, ऋतेः, अत्रिनेच्रचतः ¡ तया चोक्तं वशस्तिलके-* -
“आहु तँत्रोस्थमत्रेः सुतममृतनिवे यं दरेनंर्मवन्धु'
मित्रं पुष्यायुधत्य च्रिपुरविजयिनो मोटिमूपाविधानम् ]
वृत्ि्ेत्रं सुराणां यदुज्कलतिलकः वान्धवं कैरवा,
सम्प्ी्षि वस्तनोचु द्विजरजनियतिश्चन्द्रमाः सवक्ालम् ॥१
१. “मादुपघावाश्च °” इत्यादि वत्वविधायकं सूत्रम् । मवर्खाऽवर्न्तान्मवाविर्छोपधाच
मतो्म॑कार्स्य ककारं शाल्ि । अनर तथात्वामावात् “शीतमोमान् इति वक्तव्यम् । वस्त॒तत्तु शीतः
गोशव्देत्व क्रमेषारये ततो “गोरतद्धितलुक्गि" इति स्चो दुर्वारल्ात् “्वीतगववान्” इति दुप्रच् ।
शिद्धान्ततत नेट शस्यले मतुरिष्टः । तदुक्तं “न कर्मधारयान्मत्वर्यीयौ वह्ीहिधत्तदर्थप्रतिपत्तिक्ररः” 1
२. का उ० च ५।२। छप्रत्यवः। ३. चनं कपूर माति ठलयति खाद्व्वेनेति अन्योक्तविप्रहा्थः।
चन्रमाद लाद मिमीते ठलवति सादर्यनेति वि्रहान्तरमप्ृहयम् । ४. का० ॐ सू० ४५७।
५. का० उ० ० २।१४] ६. अस्वा० ३।४७ स्लो० |
¢ नाममाला २५
प्रालेयांशुः; स्ेतरोचिः, शशाङ्कः, द्विजराज: रजनिकरः, पीयूषरुचिः, निशीथिनीनायः,
जेवाठृकः, मुगाद्कः, दाक्तायणीरपणः, मा? श्प्युज्यते, सत्यभामेतिवत् । सुधासूतिः ्रमृतनिग॑मः,
समुद्रनवनीतम् । देश्याम्ः ।
€
उडनि भानि तारक्ष नकषत्रम्-
चत्वारो नक्ततरे । श्रवति प्रभाम् उडःउ । छीक्गीवे । तथा चामरसिदे--
'नक्षत्रसक्चं भन्तासा तारकाप्युद वा खियाम् 1
भाति दीप्यते म् 1 सीरस्वाभिनि-५“*मा विद्यते.ऽस्य भम् ।'' तरन्त्यनया तासा^ । तारयति
वा | ऋष्टणोति हिनस्ति तम् कक्षम् । नचति खे याति न तमः क्ति (क) णोति वा नक्ष् ।
“ममि .न्तिकडिभ्योऽ्रः" ] तारकं क्लीवेऽपि । यच^ शाश्वतः--
“नक्षत्रे वाऽक्तिमध्ये च तारकं तारकाऽपि च ।
ल्यं च--
्ित््व्योर्नि पुराणमोक्तिकघनच्छायेः स्थितं तारकैः”
तस्यतिः
( नक्त पय्यायभ्यः परं ) पतिशब्दप्रयोगे चन्द्रनामानि भवन्ति । उडपतिः । तारापतिः ।
ऋष्पतिः । नन्षत्रपतिः | उडराजः । उडस्वामी । उड्नाथः । नक्तत्रे श्वरः । तारेन््रः ।
निसा
क्षणदा रजनी नक्र दोषा श्यामा क्षिपा
त रानौ । निशाति तनूकरोति चेष्टामिति निशा, निशो वा । "रात श्चोपसरमै"" 1
छणमवसरं ददातीति क्षणदा । तमसा र्ति रजनिः । ियामीः । रजनी । रजनशन्दाद् वा नदा-
दित्वादीः ! नेनेि नक्तम् \ दुष्ट दूषयति याऽत्र दोषा । ्रादन्तोऽभ्ययाऽनव्ययः । श्यायन्ते गच्छन्ति
रात्रिर अतर इयामा । तथाऽनेकाथं ^ १ (ध्वनि) मज्ञ्याम्--
“श्यामा रारिस्तु विट्ङ्यासा यामा सखी सुग्धयोवना ।
श्यामा श्रियज्गुराख्याता र्यामा स्याद् बृद्धदारिका ॥
क्तिप प्रेरणे ! किप् । केपणं क्षिपा । “१ र्षा इनुबन्धमिदादिभ्यर्त्वङ् !" किप्यते स्वपेन जनैः,
निर्गम्यते वा । तमी 1 तमा त्रादन्तो इव्ययानव्ययः । तमिला । तमस्विनी । विभावरी । नक्तमुखा । शर्वरी ।
त्रियामा । निशीथिनी । यामिनी 1 वसतिः । ब्रासतेयी । रत्निः ।
१. "लोपः पूवपदस्य च श्रच प्रत्यये तथैवेष्टः इति काल्यायनवार्तिकम् ॥५।३।८३। पा°
सुतनस्थं पूवंपदलोपविधायकपमत्र प्रमाणं वोध्यम् । २. “देशी शब्दः प्रान्तभाषावाचकः । कतीरस्वामि-
कृताऽमरभाष्येऽपि बहुत्र उपलभ्यते । साधुत्वमस्य पचादेराकृतिगणत्वात् "देवी" इतिवद् वोध्यम् 1 वस्तुत
त्वयं शब्दौ दैशिक एव । ३. प्रवति प्रभां रतीति ऊः । “व रतरः" धिष् । “ज्वरत्वर” त्ूढ् । डयते
इति इः । इयतेडुभत्ययः । उश्वासौ इशवेति कर्मधारयः } नक्षत्राणां रक्तणारहत्वादाकाशोततन श्षीलत्वाच
उडस्वषुपपन्नम् । “इको ह्वः" इत्युकारस्य हस्व इति टीकाशयः । ४. श्म को० १।३।२१] ५. सीर०
भा० १।३।२२) ६. भिदादित्वादङ् । शङ परे गुणः । निपातनाद्दीर्घः । ७ पति गच्छति “रपी गतौ"
तुदादिः । श्रौणादिकः सप्रत्यय; किन्। पत्वकत्वच्त्वानि । ्रदमिति। ८. का० उ° स्० ३।५। ९.
%य॒च शश्वतः” इत्यारभ्य “स्थितं तारके." इत्यन्तः पाठः १।२।२२। क्ीरस्वामिनाप्वस्योऽत्र गीतः ।
९०, का० सुऽ ४५८४] ११. ९६ रलो° रलोका० । १२. का० सूञ ४।५।८२।
९०
१५
२०
२
२५८
१०
१५
२०
॥)
२६ जमस्कीर्तिधिरवितभाप्योपेता
कर्ः ॥४८॥
(निशापर्यायाद्परं ) करयाव्दे प्रयुज्यमाने चद्धनामानि मवन्ति। निशाकरः । नखदाकररः।
रजनीकरः । नक्तङ्करः । दोपाक्रः । श्यामाकरः । क्षेपाकरः ।
तरणिस्तपनो भायुव्भ्नः पृषाऽयमा रविः ।
तिम्मः पतद्ञो दयुमाणमावण्डाऽक्रा ग्रहावपः ॥४६।॥
हनः परर्यस्तमोध्यान्ततिमिरारिर्विरोचनः
सतदगर सरथं 1 तरन्स्यनेनेति तरणिः । “छत "युधृन.धम्यश्यविन्रतिग्रहिम्योऽनि तपति
त्रिलोकीं तपनः 1 माति दीप्यते करैः भायुः। “व्दाभाखिृन्म्यौ तुः नुः शत्ययः। न्ध वन्धने
वध्नाति जन्वुदण्रीत्र ध्नः । ^ यन्ये्र धिश्च" । श्रह्मान्नक् प्रत्ययौ भवति व्रध्यादशश्च । दकार उचार्णाथः
पुष पुष्टौ 1 पुष्णाति वर्ध॑ते तेजष्ा पपा । पादयः “पृपननवमनरुचव्यवनप्लौदनमातरिववन्कलेदनस्नेदन्-
मूर्धनघनदोपन्' एते कन्यन्ता निपा्यन्ते । द्र्तीति श्र्यमा । ‹ ऋ सतौ” । ख्यते स्ठृयते रविः
“रः "घर्वधातुभ्यः' ¦ तीति्लतीति तिग्मः । “युचिरुचितिजां न्म्“ 1 परतति नक्षत्रपथे पङ्कः । ^तु-
°पतिम्यामद्भः"” । श्राम्यामद्घः प्रत्ययो भवति । दिवौ मणिरिव दयुमाणः । मृतण्डत्यापत्वं मातरड
म॒तण्डश्च ¡ श्राकाश्तमियरसिं श्रकैः | उणादौ “श्रचं पूजायाम् 1" श्रच्य॑ते शकः । ^<दणुमीकापागल्य
चिकदाधाराभ्यः कः” एम्यः कः प्रययो भवति । अरहाखामधिपः स्वामी ्रहाधिपः। एतीति इनः
९ दण्लिकृपरिभ्यो नक्” । सुवति (रस्यति कमणि ) लोकान्. सूथः 1 रूयर्त्यान्यभ्वा ५० कर्तरि
सूं इति यप्रत्ययान्तो निपातः । तमस्च ष्वान्तं च तिमिर तमोष्वान्ततिमिराःतेषामरिःः- तमोऽरिः,
ध्वान्तारिः, तिमिरारिः । पिरोचते इत्येवं शीलो वियेचनः । "+“रचादेश्च व्यज्ञनादेः" । स्चा-
दर्गणाद् व्यज्ञनादेर्ः भवति । श्रादित्यः, सविता, सद्लकिरखः, प्रचोतनः, भाक्करः, तिग्माः, दिनमरिः,
भावान् , विवस्वान् , हरिः, विकर्तनः, भगः, गोपतिः, दिनकरः, चरः शरश्च, बं शुमाली, मिष्दिरः, तिमिर-
रिपुः, श्रंशुमान.; ग्रंशुः, हरिदश्वः, उताश्वः, प्रभाकरः) भानुमान्) दसः, खगः मित्रः, चित्रभानुः,
ग्रद्प॑तिः, कर्मघाक्ती, जगचक्षुः, दादशाला, त्रयीतनुः ।
दिनं दिवाऽहदिवसो वासरः
पञ्च दिवसे । “दो उवखण्डने" द्रति खण्डयति श्रन्धकारमिति दिनम् । “दौनात१२ इ (देरि)
च" यते नैप्रत्ययो भवत्याकारस्येच । रविर्दी | घान् दी] प्यतेऽत्र; च्रादन्तमग्ययम् दिवा । दन्तं क्लीवम् ।
दिवं चिद्न् । न जदाति काल (रवि) महः । “नचि उ जहातेः इति किप् (कनिः) । दीग्यतीति दिवसः १४।
दिवसम् । “१ “वेतववादषदिवसषफनसाः” एतेऽसश्र्ययान्ता निपात्यन्ते । बासयत्यत्र वासरः १६ | वाहोऽपि ।
उभयम् । “देवि ^०वटिजचिग्रमिवासिम्यौ उरः ” ए्योऽर प्रत्ययो भवति । घुः । घखः।
१. का० उ० तु० २।४३ । २. का० उ०सु० २।७।३. का० उ° स् २।५्] दु्गवृत्तिश्च ॥
¢" का० उ० सू० २।५ | ५. का० उ० सू० ३।१४ ६. का० उ० सू० १।५७] ७. का० उ० सू० ५।२२]।
८. का० उ° सू० २।५७] ९. का० उ० सू० २।५१। १०. का० तू० ५२।३०। १६९. का० सू० ४।४।३१।
१२. का० उ० सृ० ६३७ १३. का० उन्त्० २।८] १४. दीम्यन्ति क्रीडन्ति प्ररिनो ऽत दिद दत्यपि ।
१५. का०उ०सू० ३।११ । १६. “वा उपसवायाम्* वाश्यति सूर्यलोकं प्रारिनं वा वासरः । विग्रहे “रवर
इति पदमधिकम्र ¡ १७. नेतत्सू्रम् का०्डणादौ लब्धम् । तत्र “कुवाभ्य; सरक्" ३।६२। इति स्रम् ¡ वातीति
वाषरःवाघ्रातौः सरक् प्रत्यय इत्युक्तम् । तवैव चतुर्थपादे ३३ तमपरमपि सूत्रम् धप्रचषिवशिवासिभ्यः वर
इति वाषिघातोः सरध्रयय उक्तः । वाखयतीति वारः । कौमदीस्यमुखादिसन्म् ्यर्िकमिचमिभ्र
मिदिविवासिम्यध्ित्ः' ३।१२७। इति वािधातोररप्रत्ययः | `
+
#
नाममाख २७
तक्छरं सः ॥ ५० ॥
दिनकरः) दिवाकरः, श्रस्करः, दिव्तकरः, बासरकरः, इत्यादि सूयंनामानि भवन्ति ।
चक्रवाकान्जपर्यायवन्धुः-
चक्रवाकश्च उन्जं च चक्रवाकान्जे, तयोश्चक्रवाकान्ञयोः (परत्र) बन्धु शब्दप्रयोगे सूर्-
नामानि भवन्ति । चक्रवाकबन्धुः । न्जवन्धुः | पद्मबन्युः । कमलबन्धुः । इव्यादीनि ज्ञातन्यानि ५
इुयुदविग्रियः |
इसुदानां (परत्र) विगप्रियशब्दे मयुन्यमनि पूयंनामानि भवन्ति । कुमदनिप्रिः । कैरवविग्रियः !
कुमुदविवह्लभः । इत्यादि ।
यमुनायसकानीनजनकः सविता सतः ॥ ५१ ॥
यसुनाजनकः । यमजनकः । *कानोनजनकः । सचिता 1 मतः कथितः] १०
वाहोऽशस्तुरगो वाजी हयो धुर्यस्तुरङ्मः।
सपरा हरी रथ्यः-- |
एकादशाश्वे | वाह्यते गम्यतेऽश्ववादै्वाहः । तथा ऽनेकार्थं : ( ष्वनि ) मञर्यामू--
“वाहो युम्यं घनो वाहो बाहके बाह इप्यपि ।
वाहो मानविशेषश्च वादो बाहुरिति स्मृतः १५
“शु व्यातो ॥ अश् । श्ररनुते व्याप्नोति वेगेनाभीष्टस्यानमित्यश्वः । अथवा «त्रश. भोजने"
श्रश्नाति मक्तयति मुद्गादीनित्यद्वः। “श्रशिलरिखटिविशिभ्यः क्रः । वमान्नः । ध्वोषवत्योश्चष
कृतिः नेद। "उरो ( रसा ) गच्छतीति उरगः । ““डोऽ^संज्ञायामपि" । पूव॑मर्वानां वाजा अभूवन्निति
श्रुतिः । वाजाः सन्त्यस्य वजतीत्येवंशीलो वा वाजी । इदन्तोऽपि, वाजिः । तथा हैमनाममालायाम्°--
“वाजं बाजस्तु पक्तेऽपि मुनो निःस्वनवेगयोः ।"' २०
हिनोति गच्छति वधते (बा) अनेन इयः । धुरि सद्भ्रामे साधुधयः< । ५१ यदुगवादित्तः”' । तुरं
रेण) गच्छति तु (तो) तोत्ति त्वरते वा तुरङ्नमः^°। “गमश्च +” नाम्नयुपपदे गमेश्च संज्ञायां खो भवति
''्वात्अदेः\२ पः सः" | सपत्यध्वानं गच्छतीति सप्तिः । ^ ^ ऽस्पेस्तिततितनः'' स्पेधांतोस्ति तत्ति तन् एते
प्रत्यया भवन्ति । श्वेति गच्छंति शरनेन नान्तः, ^*ध्मवेन् । हरत्यनेन हरिः । रथे साधू रथ्यः१५] गन्धर्वः,
ताच्यंः, ययुः, घोरकः, चर्दनिः* ९, वीतिः, पीतिः । =
४६
१. कानीनः कणः । कन्या वस्थायां कुन्त्याः कणौदुखन्ने इति पौरयारिकी कथा उनसन्धेया ।
२. ११ रलो °्लोका ° 1 ३.का०्डर्सू० २।१९। ४. का ०सू° ४६।८०।५. ्रान्तोऽयं पाठः । उचित्स्त॒ तुरेण
वेगेन गच्छतीति तुरगः! ६. का ०सू° ४।३।४५७] 9. ्रने०स ° २।७८। ८. धुरं वदतीति धयं: । ! धुरो यड्टकौ"
इप्यन्यन । ९. का ०सृ०२।६।११। १० -तुरपूवंकाद्गमेः "गमश्च" इति खे तुरङ्गमः । तोतोति त्वरते वेति विद्रे
तत्सद्धिभकारो ऽन्यथा कल्पनीयः । ११. का० सू ४।३।४५। १२. कार खु ° ३।८।२४५ १३. का उण सू°
५३८] * ४, “रवं गतो '' वाहुलकात्कनिन् । १५. ““र्थं वहतीति सुवचः । “तद् वदति रथवुगप्रासङ्कम् °
इति यत्! १६. श्रदंनिशब्दस्याखायें प्रमाणं मुग्यम् ¡ कोशान्तरेऽद॑निशब्दाथेत्थम्-“्र्द॑नी चाद॑नि-
रपि लियः स्युः प्रा्थनाऽ्थना” कल्प० को० १।९।२१। द्र्वतीशब्दोऽक्िविनीपर्यायस्तु उर्वखन्मतः । "वीति"
“पीति"' शब्दयोरर्वायें प्रमाणमघस्तात् `'वीत्तिः सिदधिक्रावा वातस्कन्धायं टत्यपि कल्प० दो १६।५। .
१९३। "पीतिः पाने सपूवां ठ सहपाने ये पुगान्” विस्व० ।
१०
१५
२४५
३०
सप्ना्यर्यो मगखवान् ॥ ५२ ॥
श्रदवशब्दस्य ( ब्दात् ) पूर्वं यदि सप्तादि .( तशब्दः ) सदा सूर्यनामानि भवन्ति|
सतवाहः । सततावः} तततुरगः । सक्तवाजी । सततहयः । सतुं: । वततुरङ्गमः 1 सप्तरतिः । सतवा ।
सप्तहरिः । सप्तरथ्यः |
खं विहायो वियद् व्योम गगनाकाशमम्परम् ।
गर्न 9 र
दोनभोऽप्रोऽन्तरीक्षं च-
एकादश गगने । खनति शृट्यत्वेन खन्यते वा ^खम्। विजहाति सवे विद्यः? । वाय विहाया
परिणा मार्गे विहं यच्छतीति वियत् । ( श्रवा वीनां पक्षिणां माग यच्छति वियत् ) । ग्परेन्रभाप्ये -
“वियच्छति3 विरमति वियत् 1 चायुना वीयते (व्यथति व्यव्यते वा) उयोमन् । “कषिव्यविभ्मविज्वरि-
त्वरामुपधायाः'* एपामुपधाया वकारस्य चोष्ू भवति । “'स्व॑धातुम्यो मन्” (इति विपूर्वकादर्मन्) । गम्यते
स्वमनेन गगनम् । क्लीवे वा । गच्छत्यनेन गगनं वा । श्राकाशन्ते सूर्याद्योऽत्राकाशम् । न काशते वा
छान्दसो दी्षैः । रम्बते शब्दायते श्रम्वसम् । दीग्यन्ति परिणोऽ्र द्यौः । लियाम् । नह्यति वध्नाति
सवमासना सान्तम् नभः । नभम् इयदन्तम् नमसं च । न भ्राजतेऽश्चम् । श्रन्तः छक्ताण्यचर श्रन्तरीक्षम् ।
पृपोद्रादित्वम् । द्यावाभूम्योरन्तरीचयते वा श्रन्तरिक्षम, श्रन्तरी्ं च । मरुद्वत्म॑न् । तारापयः । पुष्करम् ।
विष्युपदम् । चिदिवम् | नाकम् । श्रनन्तम् । घुरवत्मं । मदा्र° (वि) लम् । देश्याम् ।
मेषवायुपथोऽप्यथ ॥ ५३ ॥
मेवशब्दाग्रे वायुशब्दाभ्रे च पथशब्दे प्रयुज्यमाने द्याकाशनामानि भवन्ति । मेघपथः । मेधमागंः।
घनपथः । वनमा्गः । परन्यपयः । पर्जन्यां; । मिदिरपथः । मिदिस्मार्गः । नश्राद्पथः । नश्राप्मा्; । &
तडिप्पतिपथः । तडित्पतिमार्गः | सौदामिनीपतिपयः। सौोदामिनीपतिमागगः । वायुपथः | वायुमार्मः।
वातप्रथः । वाताः । श्रनिलपथः । श्रनिलमार्मः । मरुखथः | मरन्मार्गः | समीर्णपथः । समीरण-
मार्गः | गन्धवाहपथः । गन्धवादमार्गः । शवघनपथः । श्वसनमार्गः } सदागतिपथः । सदागतिमा॑ः |
तचरः खेचरः-
तच श्राकाशचे चरतीति त्रः । श्राकाशाग्रे चरशब्दे प्रयुज्यमाने विद्धरनामानि भवन्ति ।
खचरः 1 विहायश्चरः । वियचरः । व्योमचरः | नभश्वरः | गगन चरः । श्रम्वर्चरः । श्राकाशचरः । श्रन्तरिक्-
चरः । मेधपथचरः । मेधमागंचरः । वायुपथचरः । वायुमा्गचरः ! धनपथचरः । घनमारग॑चरः | धनाधन-
, पथचरः । घनाघनमाग॑चरः । जीमूतपथचरः । जीमूतमागग चरः । श्रभ्रपथचरः । त्रभ्रतागंचरः । बलाहकः
पयचरः | बलाहकमार्गचरः । पर्जन्यपथचरः । पजन्यमागं चरः । इत्यादिनामानि चिन्राधरस्य ज्ेयानि ।
तद्गः,
तत्र गगने गच्छतीति तद् गः । गगनाञ््रे “श शब्दे प्रयुज्यमाने श्रुन्तनामानि भवन्ति ।
खगः । विहायोगः । वियद्गः। व्योमगः। नभोगः | गगनगः। श्योगः। श्माकाशगः | श्रन्तरिक्षगः।
१. ““खनु श्रवदारे'” उप्रत्ययः । “खं गतौ" खर्वत्यसिम्निति वा विग्रहः श्रत्रापि डः । २. उक्त-
विग्रहे “ग्रोहाक् त्यागे” दाघातोः “वदिदाधाञम्यश्छन्दसिः ४।२२। इत्यसुन् खित्त्वं च । शि्ाययुक् ।
विशेषेण हाययति गमयति विमानादीन् इत्यपि वोध्यम् । "हय गतौण्यन्तादघुन् । ३. क्ीर०भा० १।२।२।
ध. का० सु०° ४।१।५७। ५. का० उ० सू° ४।२८। ६, “गमेगं श्च", इति युच् गध्यान्तादेशः 1 ७. मदाविल-
शब्दस्याकाशवाचकत्वेऽमरकोपमघस्ताद्ममाखम्--“तारापयोऽन्तरीच्त' च मेघाध्वा च मदाविलम्”
१।२।२] चतेपक ।
नासर्बाडा २९
मेघपथगः 1 गेघमा्गगः ! इत्यादिनि ज्ञातव्यानि । ।
पक्षी पत्री पतत्यपि |
साङुन्तिः रफनिर्विर्च पतङ्धो विष्किरोऽन्यथा ॥५४॥
सप्त पतङ्ख । पक्ताः सन्त्यस्य पक्षी । पत्राणि सन्त्यस्य पञ्ी । नान्तः । पततीति पत्रिः त्रिरव्यये
इदन्तः । पतत्रि सन्त्यप्य पतन्नी । नान्तः । पततीति पतेः परतोऽन्रिप्रत्ये इदन्तो वा पत्नि: 1 दलयुघ-
भाष्यकारेण डाहछरणिकेन --पननिशन्दः पिन् नकारान्तः पत्रिरिकारान्तश्च व्याख्यातः 1 श्नमरसिंह-
नाममालायाम्-
। ““पतत्निपत्निपतगपतत्पन्ररथाण्डजाः ।
नगोकोवाजिविकिरबिविष्करपतत्र॑यः ॥१
इकारान्तः पतिशब्दः परितौऽस्ति \ माष्यकर्चा दीरस्वामिना पतत्निरिकारान्तो निषिद्धः ।
""्पतेरत्निरिति" भ्रान्यया पत्नि मन्थकृदिदन्तं र्मन्यते। एवं कथितमस्ति श्रीमदमरकीर्भिना द योर्वचनं
प्रपाणम् । शब्दानां वेचिव्यं वत्तते 1 नभसा गन्तु शक्नोति शकुन्तः। शक्कन्तिः 1 एव शङ्कनिः ! एवं
शकुनी 1 शकुन्तः । शङ्कनः । दौ दन्तौ । बयतीति विः । ५वेजो डिः२> | पतेन वेगेन गच्छतीति पतङ्ः४।
विकिरति पननणि विष्किरः ।
५" वणौ पसो गवेन्द्रादौ सिंहे वणं विपर्ययः ।
षोडश्ञादो विकारस्तु वणं नारः प्रषोद्रे ॥*
सुडागमः 1 विकिर ।
जाङ्गलं पिषितं मांसं पल पेशी च-
पञ्च मसि । गल्यते श्रयते जाङ्गलं जङ्गलं च । पिश्यते रुधिरादिभिः पूर्यते पिशितम् । मन्यते
सम्भाव्यते शरीरोपचयोऽननेति मासम् 1 'त्ऽवदिदनिमनिकस्यशिकषिभ्यः सः" 1 एभ्यः सः प्रत्ययो
भवतति । पलयते ( पालयते ) देहं पलम्। रुधिरादिभिः पिश्यते (पिंशति) शरीरम् पेश्वी । च्रामिषम् 1
रुच्यम् । तरसम् 1
तस्परियः।
तस्य मांसस्य प्रियः । जमिषशब्दात्रे प्रियशब्दे प्रयुज्यमाने राचसनामानि भवन्ति । जाङ्ल-
प्रियः \ पिरित्रियः 1 मोप्रियः । पलगप्रियः ! पेशीभ्रियः ।
यातुधानस्तथा रक्षो--
द्रौ याठुधाने । यातूनि यातना धीयन्ते ऽस्मिन् यातुधानः । रतीति रक्चः« । राक्षसः ।
णपः ! क्रव्यादः । नैकर तः ! नेकसेयः । नेकषेयश्च । विपुसेऽपि ( करः । श्रलपः ) । कीनासो नानाथ ।
रान्यादिचर इष्यते ॥ ५५॥
१. अम० कोऽ २।५।३४। २. त्तीर० भा० २।५।३५} ३. का० उ० सू ४५ रामान्नमस्तु-
वातीति विः । “वातेडिच'' इत्याह ! ४. पतेन वेगेन गच्छतीति विग्रहे तत्साधु वं कल्पनीयम् । तादशसूत्राऽ-
गुपलम्भात् । पतत्य् डयते इति पतङ्खः । “तृपतिभ्यामङ्क? का० उ० सू० ५।२२। इत्यक्गप्रययल्त
युक्तः । ^"तृपतिभ्यामङ्ग- "इत्यङ्प्रत्ययः । ५. 'पोदेरादयः २।२।१७२। शा० कारिका } ६. पिश श्रवयवे
पिंशति पिर्यते स्म वा पिशितम् । "पिश: किच” उ०चू० ३।६५। इतीतन् ¦ श्रथवा क्तः। इति रामा-
क्रमः। ७, का० उ० सू०४।५३ । ८. रलेन्त्यस्मादिति रक्तः । “सव॑घातभ्योऽखुन्) । “"मीमादयोऽपादानिः
रत्यन्यन ]
१०
१९
>?०
१०
१५
२७
३०
३० अमरकीतिविरचितभाप्योपेता
स्धिशब्दाग्रे चरशण्द प्रयुज्यमान राक्षसनामानि मवन्ति। रात्रिचरः | निशाचरः। क्षण्दा-
चरः } रजनीचरः । नक्तश्चरः } दोप्राचरः । ्रत्यादीनि स्ातव्यानि ।
। प्रारभ्यते स्वरगवर्मः
रतोऽदितेस्-
श्रदितिशब्दापरे खतशब्दे प्रयुज्यमाने दत्य (देव ) नामानि भवन्ति| श्रदितिषुतः | ग्रदिति
तनयः । श्रदितिपोतः । श्रदितिदास्कः । ग्रदितिनन्दनः | श्रदित्यर्भकः । श्रदितिस्तनन्धयः।'
श्रदित्युत्तानशयः |
तडिद्धन्वा सेन्द्रौ देवः सुरोऽमरः ।
प देवे । सद इन्द्रेण वर्तते इति सेन्द्रः । “दिवु क्री०“--। दिव् । दीव्यन्ति क्रीडन्ति स्वगैऽ
प्तरोभिः सद विलसन्ति देवाः । श्रचा सिद्धम् । श्रयवा दीव्यति क्रीडति परमानन्दे
देवः । पुष्ट राजते घुरः । तथा सरन्ति खुराः । “सुर रेवं “सुय एपामस्तीति वा । श्रशंघादिभ्योऽ१च्'1
यतोऽन्धिजा सुरा तैः पीता । न प्रियते श्रमरः। आदित्याः । चिदश्ताः । वुमनतः । स्वर्गंकिषः । देवताः |
गीर्वाणाः । भवः । मरतः । वृन्दारका: । निजंराः । श्रस्वप्नाः । विव्रधाः । तिविषएटपत्तदः। लेखाः।
सुपर्याणः | श्रमृताशनाः । श्रनिमिपराः । देवतम् ।
स्वरयोः स्र्गोऽथ नाक,
चत्वारः स्वँ । मुदितो जनः स्वरति शब्दं करोत्यत्र रान्तमन्ययम् । स्वर् । “दिषु क्रीडादिषु" ।
दीभ्यन्ति क्रीडन्ति श्रत पुण्यवन्तः इति दयौः । "“दिवि्डिविः ५ प्रत्ययो भवति । ग्रस सुष् शर्व्य॑ते स्वैः ।
«स्वृ भ्ृभ्यां गः” गप्रत्ययः } नायकं दुःखमत्र नाकः } उमयम् ।
तद्धासच्चिदशो मतः ।॥ ५६ ॥
तत्य सवर्गस्य वासः तद् ण्वासः-स्व्गवा्षः । चोवासःस्वगंवाषः,इत्यादीनि देवनामानि भवन्ति ।
तत्पतिः
तस्य देवस्य ( स्वर्गस्य च) पतिः, तत्पतिः । देषपतिः, सेनदरपतिः, स्वरगवाठपतिः, स्वर्गपतिः,
नाकपतिः) नाकेन्रः, इत्या दिपयायनमानि इन्द्रस्य ्नेयानि |
राक्र इन्द्रश्च शुनासीरः रातक्रतः
प्राचीनवरिः सुत्रामा बजी चाखण्डलो हरिः ॥ ५७॥
दतररवङस्य गो्रस्य पाकस्य नथुचेरपि ।
वृत्रह च सहस्राक्षो गीवणिशः पुरन्दरः ॥ ५८ ॥
विडोजारचाप्सरोनाथो चासवौ हरिवाहनः ।
मरुतर्च मस्त्वोरच वृषा चेंरावणाधिपः ॥ ४६ ॥
शतमन्युस्तुरापाट् च पुरुहूतद्च फौरिकः
संक्रन्दनोऽथ मघवान् पुलोमारिमंरुतपखः ॥ ६० ॥
त्रयछिशदि्े । पाठं शक्नोतीति शक्रः 1 ““स्फायितन्चिवञ्िशकिन्धिपिक्चुदिरदिमदिचन्दु-
१. ग्रशं ्रादिरः चै” स० ४।११।५०। २, का० उ० सू० ६।५३। ३, का० उ० सू० ५।६१।
४. तस्मिन् स्वग वतीति तद्वासः । रप्रत्ययः } स्वगेपर्यायार्यात् परव वासशब्दे प्रयुज्यमाने चिद्शनामानि
भवन्तीत्यर्थः । ५. का० उ० स्० २) शण
पि
नाससाला २१
स्दीन्दिभ्यो सक्" । इन्दति परसेशवरथयुक्तो भवति इन्द्रः । रक्। शुन श्रादित्यः शीरो वायुस्तयोरपत्यमणो
लुक्यभेदाद्वा, दीपै श्युनाशीरः 1 तालव्यद्वयम् । शोभनं नासीरं कटकं वा यस्य स सुनासीरः । दौ दन्त्यौ ।
शु श्रव्यं तालव्यमपि } अत्र पत्ते प्रथमस्तालव्यो द्वितीयो दन्त्यो मवति । तथा च शोभना नासीरा
ग्रमरैसरा श्रस्य, शुनासीरः । शुः पूजायाम्, श्वशरुरवत् ^+ । शुनाषीरयोरपत्यभिस्येके ] शतं क्रतवो यज्ञा
यस्य शतक्रतुः । प्राचीना प्राचीनमुखा बर्हिषी दभा यस्थ सः । पुष्टु ्रायते नान्तः खुत्रामा । वधं विद्यते
यस्य स वज्ी। श्राखण्डयति भिनच्यरीनाखरडल्ः । हियते शचीकराक्तेहंरिः ]
““शत्नुबेरस्य गोचरस्य पाकस्य नसुचेप्पि-
वलशुर्गाचशत्रः पाकशतरुनैमुचिशवुः, इत्यादीनि इन्द्रनामानि मवन्ति । बच दानवं यक्षवा
हतवान् जहा । किप् । “(र करिनु्रहम्रूएवृतरेषु” चिप् सदखम्तीणि यस्य स सदखाक्षः । गोवाणानां देवाना
मीशः (गीबशिशः) । विदसु प्रजासु श्रोजो यस्य । प्रषोदरादित्वाद् इद्धिः । विड भेदने वा । विडं मेदकमोजो
यक्य वा (विडौजाः3 )। श्रप्रसां नाथोऽप्सरोनाथः ! वस्वपत्यं वासवः । दरि्बादनं* यस्य हरिवादटनः |
पुण्यक्षये प्रियते च्यवते मरुत् । तान्तम् । मरुतो देवाः सन्त्यस्य भरुत्वान | वपति, नान्तम्,चषा | एेराव-
णानामघिपः (ेरावणाधिपः) । शतं मन्यवः क्रतवोऽस्य शतमन्युः । “पद मपरे" । । षद् । ''्वात्वादेः९
षः सः” 1 सहते कथित्तमपरः प्रयुक्ते धातोश्च» हेतौ” इञ् । श्रस्योप० दीर्धः । साहि जाते । व॒रपूर्वकः ।
तुरं त्वरितं साहयत्यभिभवत्यरीनिति तुराषाट् । ('सदरृ्छन्दसि<'' विण् । धकारितल्या ०९० कारितलोपः |
वेर्लोपः १ °। “नहि ° °बृतिद्रषिभ्यधिरुविसदितनिषु कोः” चिबन्तेषु प्रायकाराणां दीघेः । तुय जातम् । त यासाह
निष्पन्नः | सिः । “व्रज्ञनान्ताच ^ र"सिलोपः । दशप १ उच्छन्तेजादीनां डः" दक्य डः । “सहेः साडः षः१४''
सस्य पत्वम् । रपरत्वाप्परपदेऽपि सस्य षत्वम् ! स्वमते श्रपिशब्द्बलात् । श्रथवा तुरं वेगं सहते तुराषाट् ।
“सह ^ “छन्दसि विण पूर्ववत् । पुर प्रभूतं हूतं यज्ञे यजेष्वा ( स्े श्रा) हानं यघ्व पुरुहूतः । जातमा्ोऽ-
दित्या कुशेराच्छादितत्वात् (कौशिकः) । तथा पुराणम्१६
“जातमाररो उथ भगवानदित्या स कुञर्धृतः ।
तदा प्रभृति देवेशः फोरिकलत्वमुपागतः ॥'”
ङुरैर्दरमश्वरति वा श्ररिखीः सच्छन्दयति सङ्क्रन्दनः । मड्व्यते प्यते नान्तो मघवा ।
“मदे १ न॑लुगवन्तश्च"' सख्ये; कनिः प्रत्ययो भवति, नहुगवन्तश्च । पुलोमस्या (ग्नोऽ) रिः पुलोमारिः ।
मरूतां पवनानां सखा भिन्नः (चं) मसुत्सखः । दृरच्यवनः । इत्रारिः । बलसूदनः । वृद्धश्रवाः 1 जिष्णुः ]
वज्रः । च।स्तोष्पतिः । गोपतिः 1 पजन्य ¡ हरिहयः । पूवेदिक्पतिः । स्वराट् । गोत्रभिद् । श्रग्रघन्वा |
हरिमान् । पाकशासनः । दिवस्पतिः ।
१. श पूजायाम् श्रश्तुते स्याप्नोति “श्वशुरः” इति व्युत्पस्या “श्वशुरः” शब्दो निष्पन्नः । तदुव-
च्छुनासीरशब्देऽपि शु शब्द्ः पूजार्थं इत्याशयः । २. का० स्० ४।३।८३। ३. वेवेष्टि व्याप्नोति विर् ।
“"विष्लु व्यातौ" किप् ! विड् व्यापकमोजो यस्य स विडौजाः । पृपोद्रादित्वादोकारस्योकारः । इत्यप्य-
ह्यम् । ४. त्वक्केशबालरोमाणि सुवणमानि यत्य त॒ । दरिः स वतो ऽद्वस्ठ॒॒पीतकेरोयसप्रभः । दति
शालिंदोत्रोक्तप्रकारो ऽस्वो हरिः । ५. परतो देवाः शास्यत्वेन सन्त्यस्येति यावत् । ६. का० सू ३।८।२४।
७. छा० सू० ३।२।१०। ८. कार सऽ ४६1३1६० ९. का० सू ३।६।४४। १०. "वेरपृ्ूस्य'" पार र्
६1१।६७ ] १९१. पार्स्ूऽ ६।३।११६ १२. का० सृ< २।१।४९) ९३. जार चू २।३।४९1 १४. पार्स
८।३।५९। १५. का० सू ४।३।६०1 ९६. श्लोकोऽयम् श्चमिर चि ० २।८७। टीकायामप्येवमेवोपलम्यते ।
९.७. काञ उऽ स्. ५४ 1
१०
१५
२०
१०
१५
श्रमरकीर्तिविरचितभाप्योपेता
काटि कद्व दगा च दक्षकन्या तथा त् ।
पड् दिशायाम् । कान्ते राजन्ते (नकत्रद्यौऽच) काणा" । क स्छम्नाति विस्तारयति
फठुप् । भान्तम् । दिशव्यवकागं दिक्। “ज्क्रविब्दधृक् कग्दिगुष्णिदध" दति साधुः । रादु
श्राश्चा । दत्तः प्रजापतिः, तस्य कन्या, दक्षकन्या । ट्रत्यनया दरित्* ।
तत्प्यायपरं योज्यं प्राः पालगजास्बरम् ॥ ६१ ॥
कष्ठादिनामतः परं योस्यं प्रात्नैः विद्रदिभः पालगजाम्बसम्। क्ठापालः । क्कुपालः। .
दिकूपालः । श्रापालः । द्करम्यापालः । दरित्पालः । पालप्रथोगे दिगगजनापानि भवन्ति
काष्ठागजः । ककुत्राजः । दिग्गजः । श्राशागजः । दक्तकन्यागजः 1 हरिद्गजः । श्रम्बरशन्दभवोगे दिगम्बर-
नामानि मन्ति । काष्ठाऽम्बरः । ककुव्म्बरः । दिगम्बरः । आशाञम्वरः । दृच्तकन्याम्बरः । हरिदग्बरः।
तथा च--
1
९)
(मिस्किन्दरदुरगेषु ये वसन्ति दिगम्बयः |
पाणिपात्नपुराहारस्ते यान्तु परमा गतिम् ॥
एवंविधा मुनयो भव्यानां शरणं भवन्तु जन्मनि उन्पनि ।
पथनः प्वमानदच वघुर्वातोऽनिलो मस्त् ।
समीरणो गन्धवाहः श्वसनस्च सदागतिः ।॥ ६२ ॥
नमस्वाच् मातास्दवा च चरण्युजवनस्तथा |
म्र मञ्जन.--
पञ्चदश वायौ । पयते जगत् पवित्रीकरोति पवनः युच् 1 “धूट् पवने । पू । पवते पवमानः ।
“पूङ्यजोः श नड्” श्रानमानः । शन्वि०^ श्रनिच०० नाम्यन्तयुणः । “श्रो “व् ।* श्य्रान्मो ऽन्त
द्रात" मोऽन्तः । वातीति वायुः । ¢ "छृवापाजी“- ति उण् } वाति सर्वत्राऽस्वलिते वा वायुः । बाति
ग्रस्खलितं याति, चातः । “१ १मृगबादस्यमिदमिचपूभ्यस्तः"' ! श्रनेन जगत् श्रनित्ति प्राणिति, न
निलति वा श्रनिलः । “निल गहने” । श्ुद्रजन्तवेो श्रियन्ते सपर्शेनास्य मरत् । तान्तम् 1 "१ रमूप्रोरतिः"
उतिप्रत्ययः । समन्तादीरयति समीरणः । गन्धं वदति गन्धवहः । यन्धवाहः । गन्धवादी । श्वघन्तयनेन
वसनः । सदा सर्वकालं गतिर्यस्य स सदएगति; । नम श्राकाशमस्यास्तीति नभस्वान् 1 मातरि
रेतः श्वयति वद्व॑ते नान्तो मातरिश्वन् । मातरिश्वेव भवति १उमरातरिदिवा । चराचरं याति चरे
१. “काश दीतौ” “इनिङ्कशि” इत्यादि २1२ पा०्ड° सूत्रेण क्थन् । २. कं वातं स्कुभ्नाति
विस्तारयति । क्रिप् । पृपोद्रादि्वात्सलोपः । केनारिव्येन जलेन वा कुल्छितानि भानि नकार यस्या-
मिति “ककुभा” इत्यावन्तोऽपीति केचित् । ३. का०सृ ०४।३।७३! ४. रन्ति नयन्ति ्ननया इदरित् दिग्-
ज्ञानेनैव कचित् कुतथित् छुत्रचिन्नयति । "“्दसरुदियुपरम्य इतिः” इतीति: । ५. का०त्० ४।४।८1
६. “ग्रन्विकरणः कत्त॑रि'" इति पूणं सूत्रम् । का० पु ° ३।२।२२} इत्यन्विकरणः 1 ७, “धरनि च विकरणे"
कार सुऽ ३५१३) <. का० सू० १।२।१४८। ९. का० सू० ४।४।७] १०. का० उ०स्० १।१। ११. काण्ड
स्० ४।२७। १२. का०उ°सू० १।३०। १३. मातरि जनन्यां रेतः प्रिक्तं यथा वर्धते, तथाऽन्तरीक्ते वधमानो
वायुः ° मातरिश्वा” इत्याशयः । कीरस्वामी त--' मातरि खे दवयति" इयाद् । रामाध्रपस्षु--' मातरि
जनन्यां श्वयति वर्तते सतवप्तकरूपत्वात् ” इत्याद । सापन्नतस्वाया दितेर्निद्रा उवस्थायां तक्कुश्षिप्विषटंनेन्रेण
कलिशढारा तदुगभ॑स्येवोनपश्चाशच्छकलौकरणस्य पुराणप्रसिद्धत्वात्सतसतकत्वमुपपन्नम् । ठु श्रोशिि
गतिवृदुयोः 1" दिवघातौः "“श्वन्तुकन्नि"' त्ति कनिन्नन्तो निपातः सम्या लुक् च
५ नाममाला २२
१रण्यः । "'केवयुसुरण्यवष्व्ाद्यः" केवय्वादयः शब्दा डभ्ययान्ता निपात्यन्ते । तथा च द्िसन्धानकाव्ये ---
“द्मसूयया ऽगम्य निज्ञाम्य यां पुरो
विजया सम्भःपरिणमिनीदशाम् |
, गता इवाभान्ति कुलाद्विपेशल-
खअरण्युलोखाः परिखा उम्बुवीचयः ॥
"जु" इति सौत्रो धातर्मतो । सौत्रा धातवोऽपि भ्वादौ पटयन्ते । जवतीति जवनः । “ उुचड्-
क्रम्यदद्रम्यसशधिज्वलशु चपतपदाम्” एभ्यो युभवति । स्वा दिशाः प्रभनक्ति प्रभञ्जनः । जगस्राणः ।
पषरद्श्वः । स्पर्शनः । समीरः । दरिः ) महाबलः । ग्ग: 1
अस्य पर्यायपुत्रो भीमाज्ञनात्मजो ॥६३॥
मस्य पर्य्यायात् प्रभञ्जनादि शब्दात्परत्र पुत्रशब्दो दीयते तदा भीमदनुमतोनांमानि भवन्ति । १०
पवनपुत्रः । पवनतनयः । प्रवमानत्तनयः । वायुपुत्रः 1 वायुतनयः । वातयुत्रः | बाततनयः ] अनिलपुतः।
अनिलतनयः ] समीरणपुत्नः । समीरणतनयः । गन्धवादपुत्ः । गन्धवाहतनयः } श्वसनपुच्रः । शवसनतनयः ।
सदागतिपुजः । सदागतितनयः । नभ्वत्पुत्रः । नमेस्वत्तनयः । मातर्दिवपुत्रः ! मातरिवतनयः ।
चरण्युपु्रः । चरण्युतनयः । जवनपुत्रः । जवनतनयः 1 चलपुत्रः ) चलतनयः । प्रभञ्ञनपुत्रः । प्रभञ्जन-
तनयः 1 भीमस्य दनुमतश्च नामानि ज्ञातव्यानि । १५
तत्सखाऽभिः, ।
तस्य वायोः सखा, तत्सखः । वायुशब्दाप्रे सशब्दे प्रयुज्यमाने श्रगिनिनामानि भवन्ति ।
पवनसखः । वायुतलः ! अनिलसखः । वातसखः । मरुत्खः ! गन्धवाहसखः। समीरणसखः । दवसनसखः।
सदागतिसखः । नमखत्सः । मातरिश्वः चरण्युसखः । जवनसखः । चलः । प्रभञ्ञनसखः । पवनेष्टः ।
पवमानेष्टः । इत्यादीनि अग्नेनांमानि ज्ञातव्यानि । २०
शिखी वहिः पावकस्चाशुङुक्षणिः
हिरण्यरेता सप्ताचिर्जातवेदास्तनूनपात् ॥ ६४ ॥
स्वाहापतिहुताशश्च उ्वरनो दहनो ऽनरः
वैश्वानरः कुंशाचुरुच रोदिताख्यो विभावसुः ॥ ६५ ॥
वरपाकपिः समीगरभो हव्यवाहो हुताशनः । २५
एकविंशतिरनौ । “चक अरग कुटिलायां गतौ 1" श्रगति वायुवशादुध्वं गनच्छुतीत्यग्निः।
.शिखाऽसत्यस्य शिखो । उह्यते वद्धिः । '““्रथिश्रुभियुबहिभ्यो निः" एम्यो घाठुभ्यो निः प्रत्ययो
भवतति । पुनाति पावकः । श्राशु शोषयति रसान् भ््राश्युदयुक्षणिः । “°या शौ शपे: सनिक्ः' । ध्टुप
५
१. चरण्युशब्दोऽयम्; न तु चरण्युः । द्विसन्धानेऽपि चरण्युश्दष्यैव दशेनात् । एतत्वाधक्युरा-
दिस्नम् श्रमिधानचिन्तामरिटीकायाम् ( ३।४८३ ) उपलभ्यते; नैवान्यच्र । वस्त॒तत्तु वैदिकोऽयं प्रयोगः ।
“चरण् बरण् गतो” कण्ड्बादौ चरण् धातुर् प्रत्ययान्तः । ततः "क्याच्छन्दसि" पा<स्० ३।२।७५ | इतयु
मत्ययः 1 सुम्नयु, वुरण्यु, ुरण्य, सपयुं, ्र'दिशब्दवदस्य सिद्धिः । विशषेपत्तु “स्याच्डुन्दसि” इत्यस्य
तव्वत्रोधिन्यां दर्यः । चरण्यतीति चरण्युः । २. स० ? श्लो० १९। ३. का° उ्< ४।५३२ 1 £. वहति
हव्यं वतिरिति व्युतत्तिरन्यत्र । ५. कार उ० सू ३।५० । ६. प्राशोष्टुमिच्छतीति श्वाद्ूर्वन्लच्टपे
सतनन्तात् “शाटिः सुपेः सनस्छन्दसि"' पाञडन०्सू २।१०६ | श्निः! व्रण शीघ्रम्; श्चं व्रीहिं गश
सुष्टु सणोतीति वा } “'सवंघाठुन्य इन्» इत्यन्यत्र । ७. कार उर सू ५।९५ ]
१०
२४ अमरकीर्तिविरचिततभाप्योपेता
शपे 1” श्रन्तमू(तकासितार्योऽयम् । श्राछ्पूर्वः । श्राशाटुपपदे शपेः सनिक् प्रत्ययो भवति | दरणं
रेतोऽस्य स हिरण्यरेताः । यत् सृतिः + “अग्नेरपत्यं प्रथमं युवर्ण॑म”” । सतार्थिपौ वध्य स सत्ता
चिः । भवन्ति हिरण्या, कतका, रक्ता, कृष्णा, प्रसुप्तभावाऽन्या । श्रतिरिक्ता वहुरूपेति सप्त
सप्ताचिपो जिया; जाते जते विद्यते खान्तौ जातवेदस् । जाता वदा श्माद् वा जातवेदाः"
तनू. न पातयति तनूनपात् । चछरपि तान्तो दान्तौ वा| सवाद" इत्यस्य, ( स्या ) पतिः भरा
स्वाहापतिः । हुतं वपट्कारकृतं वस्त श्रश्नाषीति हताशः । हुतम् श्राशो भोजनं यस्व वा । च्वलती-
्ेवंशीलो ज्वलनः। दहतील्यवंशीलो दनः । श्रनिति प्राशिप्यनेन श्रनल्लः । विव्वानरस्वापलः
वंदवानरः । कृश्यति तनूकरोति '्कृशानु; । रोदिताऽख्यो मृगोऽर्वो वादनमस्व सोहितादवः । विभा
वसुरधनं यस्य स विभावसुः । पृषो धर्मः कपिर्वराहः परष्टश्च तदृरूपत् वृपाकपिः । "पुराणम्-
'कपिवैराहः श्रष्टर्च धर्मद्च बृप उच्यते ।
तस्माद् वृपाकपिं प्राह काश्यपो मां प्रजापतिः ॥''
दमीनाममालायाम्.--
(वृपाकपिचौघुदेवे चिवेऽग्नौ च”
शम्यां गर्भो यस्य स श्मीगसैः । दव्यं वदतीति दञ्यवाट् । हतमदनातीतति हुताएरानः । वहुलः।
वयुः । सितेतरगतिः । श्र्चिष्मान् । धूमध्वजः । वदि्ज्योतिः । उग्ुधः । चित्रभानुः । शविः । छमीर-
योनिः । दमुना । कृष्णवर्त्मा । श्रपांपित्तम् । वीतदोत्रः । वृदद्मानः । श्राश्रयाशः ¡ धनञ्जयः । तमोव्नः ।
दमूना द्येक । दमेरूनसि ।
तदादिष्रः,
श्रग्निसूनः । वहिपुत्रः । वृपाकपिसूनुः । ब्रपाकपिपुचः । इत्यादीनि स्वन्दनामानि भवन्ति ।
सेनानी; स्कन्दश्च शिखिवाहनः ॥ ६६ ॥
कार्तिकेयो विशाखश्च कमारः पण्ुसो गुहः ।
रक्तिमान् कोश्वमेदी च सामी शरवणोद्धवः ॥ ६७॥
दादश स्कन्दे । सेनां नयतीति सेनानीः । “कत्सणद्विपदुददुदयुजविदमिदलिदजिनीराजामुष-
सर्गेऽपि” एषामुपसरगेऽप्यनुपसर्गे ऽपि नाम्न्यनाम्नयुपपदे क्िव् भवति । स्कन्द्व्यरीन् स्कन्दः । स्कन्नं
णुष्कं रेतोऽस्य वा । शिखी मयूरो बाहनमस्य शिखिवाहनः । कृत्तिकानामपत्यं कार्तिकेयः । दानव-
वलौजस्तेजांसि दयति विशेपेण तनूकरोति विशाखः" । विशाखायुतो वा । कुमारो ब्रह्मचारित्वात् |
१, यम. को० क्ीर० भा० १।१।५५ | २. सर्वत्रोत्पन्नपदाथं वत॑मानत्वाद् वेदोतक्तिका-
रणत्वेन चाग्नेरुत्तव्वाच्च । जातं वेदो धनं ( शवं ) यत्मात्, जातं वेत्ति वेद्यते वा इति व्युत्पत्तिरपि ।
३. तनूं स्वस्वरूपं न पातयति दहतीव्यथंः । किप् । “नम्राणुनपात्' इति नलोपाभावः । तनूं न परति
रचतति जाते जाते विनण्ल्वादिति वा। पातेः शतध्रत्ययः । तन्वा ऊनं पाति रक्ततीति तनूनपं धृतं
तद्तीति । ्रदोऽनन्ने” इति विद् । इव्यव्यृह्यम् । ४. कृशोऽप्यनिति वर्ध॑ते कृशानुरिति वा।
५. श्लोकोध्यम्, श्रभि० चि०.२।१२९। टरीकायामेवोपलम्यते। ६. यनेका० सं° ५२१८
७. का० सू० ४।३।७४ } ८. स्कन्नं रेतोऽस्येल्य्थांमिप्रायेण । विग्रदस्तु कन्दति शुष्करेता भवतीति छन्द
इत्येवंरूपः । ब्रस्मचारिणं शष्करेतसत्वमागमात्सिद्धम् । पचाय्च् । ९, विपूर्वात् “शो तनर्णे"
इव्यक्माद् बाहुलकात्लप्रययः, विशालानक्तत्रे नातो वा । विशाखयति विशेषेण व्याप्नोति दानवन्रलमिति
वा । शलालु व्यातौ ।'' पचाद्च् ।
नाममाला ४९
१५.
कुत्सित मासेऽधयेति कुमारः१ । पण्पुलानि यस्व स षरसुखः । गूहति रक्षति देवसैन्यं गुहः | “रनाम्युपध-
परीकगजां कः |” शक्तिरवियतेऽस्य शक्तिमान् । करोश्च पर्वतं भिनत्तीति क्रौश्चमेदी । सवमसत्यस्य स्वामी ।
शराणां वनम्, शरवणम्, तस्मिन्तुद्धवः शरवणोद्धवः । गोरीपुत्ः। शक्तिपाणिः । ताखारिः । श्रग्निभूः |
बाहुलेयः । गाङ्ग यः । व्रह्मचारी । महासेनः । महातेजाः । पाव॑तीनन्दनः ।
तप्पिता शङ्करः शम्भुः शिवः स्थाणुरमहेशरः।
उयम्प्रको धूर्जटिः शर्वः पिनाकी प्रमथाधिपः। ६८ ॥
व्रिपुरारिर्विश्ारक्षो गिरीशो नीरृरोहितः
रद्रन्दुमोलिरयञारिस्तिनेत्ो वृषभध्वजः ॥ ६६ ॥
उग्रः शूली कपारी च रिपिविष्टो भो दरः ।
उमापतिरविरूपाक्षो विश्वरूपः क्पर्यपि ॥ ७० ॥
एकोनर्चिशदीश्वरे । तस्य खन्दस्य पिता । शं सुखं करोतीति शङ्करः । शम्भवती (यस्मादि)
ति शस्मुः। “सवो"ुर्विशम््रपु च ।” शेते प्रलयकाले जगदत्र शिचः: । अगति प्रलीनेऽपि तिष्ठति
स्थाणः । मदहोँश्ाशौ हर्वरः महेर्वर । चीण्यम्बक्रानि श्र्तीण्यस्य उयम्बकः । चरयाणां लोकानाम् श्रम्क
पितेव्यागमः । धूर्मारभूता जय्यो जय यस्व, धूशंङ्गा जयिु यस्ववा धूजेटि । शखाति दैत्यान् शर्वः ।
“ऽ शार्वजिहाग्रीवा'” एते कप्र्ययान्ता निपात्यन्ते । पिनाकमस्त्यस्य पिनाकी । प्रमथाया शश्रधिपः, प्रम
धांधिपः । त्रिपुराखुरस्यारिखिपुरारिः । विशाले विस्तीणेँ श्रक्षिणी यत्य विश्चालाक्षः । ^° सक्ध्यक्तिणी
स्वाङ्खं ।» गिरीणामीशो गिरीशः । कालवूरभक्षणान्नीलं छृष्णं लोहितं यस्य उ नीललोहितः" ° । ““नीटः^
कण्ठे छोहितश्च केदो इति नीललोहितः" इति पुराणम् ! रोद्यत्यरिखी रुद्रः । “स्कायितचिवञ्चि-" >
शकरिकषिपिश्ठदिरुदिमदिमन्दिचन्युन्दीन्दिभ्यो रक् ।“ इन्दु्मौटिमुरं यस्य॒ ( सः ) इन्दुमोलिः१३ |
यक्नानां प्ुकास्णलक्णानाम् श्रः, यक्ञारिः | च्रीणि नेत्राण्यल्य चिनेचः । इृप्रभो बलीवर्दो ध्वजायां
यस्य स चरृषभध्व्रजः । कोपमूजैति उग्र ^ ४; । शूलमस्त्यस्य शूली । कपालं मनप्यकरोरिरस्त्यत्य कपाली ।
शिवः पिष्टो हतौ श्रस्थिरूमो (विष्टे) मूध्नि यस्य स शिपिचिष्टः*५ । भवतीति भव ५६: । हरत्यघं हरः ।
१. “कुमार क्रीडायाम् 1 कुमारयतीति पचाद्यच् । कौ पृथिव्यां मारयति दुष्टानिति वा
विग्रहो बोध्यः । २. का० उ० सू० ६।६८ । इतीनप्र्ययः । ३. स्वशब्दादामिन् प्रत्ययः । “स्वामिननैश्वर्ेः'
पा० स ५।२।६२६ । श्रवा शोभनममति रद तीति स्वामी । “सावमेरिन् दीघंश्च'' का° उ° स्° ६।६८
दतीन् प्रत्ययः । ४. शम्भवति भावयतीव्य्थो वा 1 श्रन्तभावितण्यर्थोऽत्र भवतिः । ५. का० सू° ८।८।५६।
६. उक्तविग्रहे ेतेर्बरुलकाडड् विप्रत्ययः । शिवं करोतीति शिवयति, ततः पचाद्यचि िवोवा। यिवन-
स्याल््यस्पिन्वेत्यपि विग्रहो बौध्यः । ७. का० उ० सू० २।२ ८. प्रमथाया दुर्गाय: ° परन्तु 'श्रमथाः न्यु
पारिप्रदाः'' इसययतरादिषु प्रमथशब्दस्य शिवपर्यायतेन सिद्धः, द्गत्विनाप्रसिद्धेः प्रमथानामधिपः
दूति सुवचम् । ९. “राजादीनामदन्तता'' का० सू° २।६।४१। वृत्तिः ५०। १०. नीलं कण्टे लोदितं अयया-
मक यस्येति विग्रहाः । तदुक्तम्--“नीलं येन ममाद्न्॒ रसाक्तं लोटितं सिषा । नीललोदित शनये
ततोऽहं परिकीर्सितः ॥ दति स्कान्दे” इति म॒कुटः । ११. गमन्कोत्ीरण्भा० १।१।३३। १२. दार उणश्दु°
२।९४। १३. इन्दु्मोलो यस्येति विग्रहः सरलः । १४. उच्यति क्रुधा उमवति उनः । "उच् समवाय"
उच् धातुः । ततो रक् । गश्वान्तादेशः। ऋजेन्रादि उ० सृ । १५. शिवपिष्टशन्द्योरायद््रोपादानन
शिपिशब्दोऽ । १६. मन्याय भवति कल्पते इत्यथः 1
१०
९५
२०
^<
२६ अमरकीरिविरचितभाप्योपेता
उमायाः पतिः उमापतिः । विस्याण्यक्तीण्यस्य विरूपाक्षः । विच्चे सपं यध्य स विद्वरूपः | कप
सत्यस्य कपर्दी । कपदां जयटाजृटः । कं शिरः पिपर्तीति कपर्दः । प्रौणादिकौ दः | शपिन्दात्-दणानः)
शशिरोखर : । पशुपतिः । शम्धः । गिरिशः । श्रीकण्ठः | सरव॑नः | त्रिपुरान्तकः । ृतेशः । परमेश्वरः ।
ग्न्धकरिपुः । दक्ताध्वरध्वंसकः | क्षा । वामदेवः | कामध्वंती । व्योमकेशः ¡ वह्धिरेताः } भीतः } मर्म
कृत्तिवाषाः । ब्रपा्भुः ।
भागीरथी त्रिपथगा जाहवी हिमवता |
मन्दाकिनी--
च गङ्गायाम् ] मगीरवेन राक्नाउवतास्तित्वात्तस्यापत्यं वा भागीरथी | त्रिभिः परयिभि-
गच्छति चिपथगा + | चरिमागेगा च । जहना पीता श्रौ ण व्यक्ता जाह्वी । जहोसघयं वा जाहूवी।
हिमवतो दिमाचलघ्य ठता हिमवत्ुता । मन्दाका मन्दा गतिरस्त्वध्या “मन्दाकिनी । युस्वसित् ।
विष्पयुपदी । सरिदूव । त्रिद्शदीर्धिका । चिद्लोताः । मीप्मसूः । सुरनिम्नगा ।
द॒पर्यायधनी
द्राकाशश्नव्दतो ( तः परत्र ) नदीपययिपु गह्भनामानि भवन्ति| खल्लोतस्विनी । विहायो
धुनी । वियत्िन्धुः । ग्यौमलवन्ती । नभोनदी | गगननिग्नगा । श्रम्बरापगा । यौनदी । श्राकाणिनदी।
ग्रन्तरीक्तद्धिरेफा । मेवपयसरित् । यायुपथतरङ्धिखी । इत्यादीनि चातव्यानि ।
गङ्धानदीद्यरः ॥ ७१ ॥
भगीरध्यादिशव्दतः (परतर ) इदवरपरयायिघु हरनामानि मवन्ति । भागीसथीराजः | तरिपय-
गाधिपः | जाह्ववीपतिः । हिमवेघ्ुतास्वामी । मन्दाकिनीनाथः । इत्यादीनि ज्ञातव्यानि । ,
विधिर्ेधा विधाता च द्रहिणोऽनथतयुखः।
पद्मपर्याययोनिश्च पितामदविरशिनो ।७२।
हिरण्यगभः खा च प्रनापतिस्सहस्च पात् ।
ब्रहमात्मभूरनन्तात्मा कः
सपतद्था ब्रह्मि । विधति खजति विधिः } विधत्ते वा विधिः । "उपे द्ः किः 1" विधति
खलति वेधा : । (“सर्वधातुभ्यो एसन् 1” “विध विधाने !” विदधाति धारयति भूतानीति विधति ।
टृह्यत्वषुरेभयो द्ुहिणः । न जायतेऽज्ञः ¡ चत्वारि खलानि वक्ताण्यस्य चुसुंखः । “पद्यपर्याययोनिः"
पञ्चपर्यायशव्दाप्रे योनिशब्दे प्रयुज्यमाने धातु्नातानि भवन्ति । तामरस्योनिः । कमलयोनिः।
नलिनयोनिः । पद्मयोनिः । उरोलयोनिः। सरसीख्दयोनिः । खरदण्डयोनिः । पुण्डरीकमवः । मदौत्ः-
लजः । श्ररविन्दयोनिः । शतपन्रयोनिः। पुष्करयोनिः । इत्यादीनि श्नातव्यानि । दक्तमन्त्रादीनां लोक-
पितृणां पिता पितामहः । ्ात्मनौ भूतानि विरिर्लत प्रथक् करेति विरि्चिनः | विरि्ः । विरि्चिरच ।
१. त्रयाणां पथां समादारल्निपथं तेन गच्छतीति वां 1 इत्थं च पूरवे समाहारद्धिगौ कते ततर
समाखान्तविधानेन चिपथशब्द्स्याकारयन्तत्वं सूपां भवति | गंगायालिपयग।मित्वे भारतोक्तं वचनम्-
"क्षिता तारयते मर्त्यान् नागोस्तारयतेऽप्यधः । द्विवि तारयते देवास्तेन त्रिपथगा स्मृता ॥> २. मन्द्
मकि गल्ठ शीलमस्य इति वा । शरक कटिलावां गतौ 1” शिन् । डीप् । प्रन्थोक्तविग्रहे मन्दाकणब्द्
स्य भन्द्गत्यर्थं प्रमाणं मग्यम् 1 ३. “विध विधाने” । वदादिः ¡ सवं धाठम्य इन् किच च | ¢. का० सू”
८।५।८०| ५. का० उ० सू. ८।५६।
नामभाका | २७
हिरण्यं गभे यस्य, हिरण्यं गभो वा यस्य हिस्ए्यगभैः । 'पुराणम्--
“"हिरण्यगभमभवत्तत्राण्डमुद्के तथा |
तत्र यज्ञं स्वय" ब्रह्मा स्वयभ्भूर्लोक्िश्चुतः |"
खजतीत्येवं शीलः खटा । प्रजानां पतिः प्रजापततिः 1 “पद् गतौ ।” पद् । पद्यन्ते गम्यन्ते
( गच्छुन्ति ) प्राणिनः, तान् प्यमान.न् जन्तून् चरणा एव ्रयुज्ञते । “धातोश्च देती इन. । श्र्योप०
दीः । पादि जा०। पादयन्तीति पादः] किप. च | “उकारितस्या०'° कारितलोपः | वे्लोधः । पाद् ।
सदस पादो यस्य स सदखपाद् । बृंहन्ति वधंन्ते चराचराण्यत्र ब्रह्म । उभयम् । इदं ब्रह } श्यं ब्रह्मा |
प्रथा वृहन्ति नतानि यस्मिन्निति ब्रह्म । वृदः भमन् प्रत्ययो भवति. श्रचच दकापात् पूर्वम् । आत्मना
भवति श्रास्मभूः 1 न अन्तो विद्ते यश्य सोऽनन्तः, रन्तो विनाशरदित च्माला यस्य सः ्रनन्तातमा |
कायतीति "कः । परमेष्ठी } सुरज्येष्ठः } शतानन्दः । स्वयम्भूः } जगत्कर्ता । शतधृतिः । स्थविरः, |
ततपुत्रोऽथ नारदः ॥७३॥ `
तस्य पुत्रस्तत्पु्ः। ब्रह्मणः शब्दात् ( परत्र ) पुत्रशब्दे प्रयुज्यमाने नास्दनामानि मवन्ति !
विधिपु्ः । वेघःपुत्ः } विधात्रपु्नः | चिरिञ्चिपुत्रः । द्हिणपु्रः। श्मजपुत्र;ः । चतुमु्खपुत्रः ! पदूम-
योनिपु्रः । पितामहपुत्ः । दिरष्यगरभपुत्रः । मजापतिपुत् : । दसत गत्पुचः । ब्रह्मपुत्रः श्रास्मू युतः ।
शछनन्तात्मपुन्ः \ इत्यादीनि ज्ञातव्यानि ।
कृष्णो दामोदरो विष्णुश्पेन्द्रः पुरुपोत्तमः ।
केशवश्च हपीकेरः शाङ्गी नारायणो हरिः । ७४ ॥
केशी मधुवलिर्बाणो दिरण्यकशिपूरधरः ।
तदादिख्दनः शौरिः पद्मनाभोऽप्यधोऽश्षजः ॥७१॥
गोषिन्दो वासुदेवश्च--
एकविशतिनाराये । कर्॑यरीन् कृष्णवरणत्वाद्रा ष्णः । '१दण्जिङ्ृपिण्यो नक् ।“ दाप उदरे
यस्य स दामोदरः । - यह्लद्यम्°-बालो हि चपलाद्दाम्ना वदुधोऽभूत् । वेवेष्टि व्याप्नोति विष्णः ।
“स् विपिभ्यां यण्वत् 1)" उपगतमिनद्रसुपेन्रः । इन्द्र॒ उपगतोऽनुजघ्वाद् बा उपेन्द्रः । पुर्पेपु उत्तम
पुरुषोत्तमः । केशाः सन्त्यस्य केशवः । ह्रीकाखामिन्धियाणामीशो वशि्वाद् हपीकेशः ! शद्ग घनु-
रस्त्यस्य शछाङ्गाः } नार श्रापः च्रयन यत्य नासयणः^ । यस्पतिः" °--
“छापो नारा इति.परोक्ता ्मापो वे नरसूनवः
अयनं तस्य ताः पूर्वं तेन नारायणः स्छृतः
१. “पुराणम्? इत्यारभ्य "लोक विश्रुतः” इद्यन्तम् श्रमिधानचिन्तापरियीकायान् २।१२५।
उपलभ्यते! २.का० सू० ३।२।१० ३.का० सू० २।६।४८४] ४. 'प्स्वघातुभ्यो मन्” का० उ°
स्० ४।२८। ५. 'व्के शब्दे" वेदध्वनिकतृत्वेन व्रि कायतीति क इति विग्रः । "कच दीतौ" फचते
वा । “"छन्येभ्योऽपि दश्यते" पाऽसू० ३1२1१०१1 सूत्नवाततिकेन उः 1 ६. का-उमस्= २।५६।७.बालकृष्छो
दि यशोदया तस्चापल्यनिवारणाय करिप्रदेरो यड इति पौराणिकी कथा ““लक्तयम्'' इति पदेन समा्य॑ते
८. का° उ° सू० २४८ ९. नराणं समूहो नारम्; तदयनं यस्व, नराद् विराट् पुरुपाञ्जातं तयं नारम्;
तद्सते जानाति वा, द्याययति प्रवयति वा, "नारायणः" इत्यपि दपुर । ६०. मनुर् ति: १।१०॥
ठतीयचस्णे “ता पदस्यायनमूर्वम्" रति पाठ लभ्यते ।
१०
१५
५
१५
९)
|
रा
र
स ज ०
१५
1,
द्ममरकीर्तिविरचितभाप्योपता
नरस्याप्यं वा । नरनयते हति वाक्येन नरायणोऽपि । दरत्यत्रं टरिः । केशाः सन्यस्य कैश्वी |
"मन्यते जनैः मधुः । "“मनिजनिननां मधजतनाकाथ्'' एपामुद्रत्यया भवति मवरजतन(काश्च यथादंल्य.
मादेशा भवन्ति । “वलं वल्ल च 12 व्रलतीति वलिः ¡ “दः ऽसर्वधाठुभ्यः 1“ व्रण्यतं बाणः } तदादि
खेदः । तदादीनां कैश्यादीनां सदना नारकर्वादरिः । केशी, मधुः, व्रलिः, वाणः, दरिण्यकररिपुः, मुर,
एभ्यः गष्द्भ्यः परत्रारिणन् प्रयुज्यमाने नारयखनामानि भवन्ति { केणिधेरी । केदयरातिः | केश्वमित्रः।
केधिद्विर् । केग्रिसपलनः । मधुरौ । मध्वरात्तिः | मध्वमित्रः | मध्वरिः । मधुद्धिर् । मघ्रुसषलः । पष्ररिपुः
बलिवैरी ! बरल्यरातिः | बल्यमित्रः । वलिद् । अलिहपटनः ! त्रलिरियुः । वागवेरी । त्राणारात्तः । ब्ाणा-
मित्र । बाणारिः। वाशद्रिय्। व्रारुरपलः। वाणुरिपुः । दिरण्यक्रगिपुद्धिट् । दिरव्यकरिपुष्यलः।
दिरण्यकरिपुरिपुः । मुखरी । मुरारिः । मुरारिः । मुरद्रिद् । मुरघपत्नः । मुररिपुः । मधुशतरुः ! वाण
णात्रुः । मधुसूदनः । धल्िसूदनः । वलिव्न्धनः । वाणसूदनः । दिरण्यकरिपुरदनः । केगिचूदनः । इत्यादि
पयायनामानि । शररस्तस्यादिपुख्पन्तस्यापत्यम्, शरौसिः । तोरि } पदुमं नाभावस्य पद्मनाभः)
““ध्से्ायां नाभिः | श्रधो्घाां जितेद्धियाणां जायते प्रतयक्तीभवति, श्रधोक्षजः'^ । गां मुष विन्दति
गोधिन्द्ः । वषुदेवस्यापव्यं चासुदरेवः। °मन्चकेशः । श्रीवत्छादरः । श्रीपतिः । पीतवासाः । विष्वकूतेनः | विश्-
रूपः । सुजुन्दः । धरणिधरः । सुपरंकेढः+ वैकरण्डः । जलशयन: । रथाङ्गपारिः । दाशाः । कदुप्ः।
वरृप्राकपिः | ग्रच्युतः | इन्द्रावरजः । वभर: | विष्टरश्रवाः | वनमाली । उनातनः । जिनः । रम्भः 1
दव्यागर्यम् ।
टक्ष्मीः श्रीर्गोभिनीन्दिरा ।
चत्वारः प्रियाम् । "लक्त द्शैनाकाटूक्योः 1“ लक्तयति दशयति पुण्यकर्माणः जनमिति लक्ष्मीः ।
“<लक्तेरोऽन्तश्च'” श्रस्मादीप्रत्ययो मवति मौऽन्तश्च ] “भन् च्िन् ( सेवायाम् ) 1“ पुण्यकृतं श्रयतीति
श्रीः । “` वचिव्रच्छिशिद्ुयुख्वां क्रिवूदीघ॑श' एम्यः चिपृद्रत्ययो भवतति दीष स्वरस्य चैषम् । गां मिनो
तीति गोभिनी? ° । उन्द्ति परमैश्व््ययुक्ता भवति इन्द्रि । कमला । पदमा | पद्मवासा । हरिभिया ।
क्ीरोदतनया । माया । मा | ता^^1 ई) ध्रा । सा । सीता । वला (चला) । भर्मरी | श्न्धिजाऽपिं।
तत्पतिः शेलमस्यादिधरस्चक्रधरस्तथा ॥ ७६ ॥
तत्याः पतिस्तत्पतिः । लचमीपतिः } श्रीपतिः । गोमिनीपतिः । इन्दिरापतिः । इत्यादीनि हरि
नामानि स्नुः । गरौलभूम्यादिधरः । पर्वतधरः 1 रौलघरः । द्रीश्वदधरः । श्र चलधरः । शङ्करः साठम-
दुघरः । गिरिधरः । नगधरः । शिलोच्चयधरः । भूमिधरः ¡ भूधरः । पृध्वीधरः । गहरीधरः । मेदिनोधरः।
१. मन्यते जनैः '"ललत्वेन' इति शेषः २. का० उ° सू० ११८ । ३. का० उ० स्० ३।१४।
£. का० सू २।६।८६ । त्तिः । ८ । ५. श्रध: कृतमक्जमेन्धियकं ज्ञानं येनः श्रवो न क्षीयते जात॒ इति
वा वित्रहोऽधिक्रोऽन्यत्र । ६, “मन्लुकरेश्” शब्दस्य “विष्णु” परयांयत्वे कल्पटुरपि म्माणम्-"म्युक्ेशः
कौस्त॒भोराः सोमगर्भा धराधरः 1” ३२७1 ७, वभ्र.शन्दस्य नारावणार्थैऽमसे ऽपि प्रताम् । “विपुले
नले विप्णौ वमर्. स्वाप्त चु 1 ३।३।१७० 1 ८. का० उ० चू० ३।३५ । €. का० उ० सू
२।२३ । १०.गोपिनी शब्दस्य लद्म्यर्थं प्रनाखं मृग्यम् । अव्रत्यविश्रहयोऽपि चिन्त्यः ! मतर्थं गोशव्दा-
न्मिनिग्रत्यये कीपि गोपालिकार्थं तस्य प्रसिद्धौ कोपान्तरंवादः ! ११. ता, ई+र, एयां लदमयरथ प्रमाणम्
“लध्मीपद्रूमा समायामा ता घी कमलेन्द्रा श्रभि० चि० २।१४८० | "या इत्यत्र श्रा इति
च्छदः । "लक्स्यान्व॒ मर्मर विष्णुशक्ति सौरान्धिमानुपी 1" इति तट्गीक्रायाम् ।
नाममा ३९
सहीघरः } धराधरः । वुन्धराघर; । घाक्ीघरः ! दमाधारः । वसुमतीषरः । विद्वस्भराधरः \ यवनीधरः ।
धरणीधरः । कसाघरः 1 धरितरीषरः । द्ितिधरः । कुधरः ( भ्रः ) । कुभ्मिनौधरः । इलाधरः। उर्वरीघरः ]
उवीधरः \ गोधरः । जगतीधर 1 इत्यादीनि दरेनांमानि क्षातव्यानि 1 तथा चक्रधरोऽपि ।
¢ [+
तसपुत्रो मन्मथः कामः सपकाराति (कारि) रलन्यजः ।
कायपर्थायरहितो मदनो सकरष्वज; ॥ ७७ ॥
षट् कये ! तत्पुत्रः । कृष्णपुत्रः । दामोद्रपुत्रः । विष्णुपुत्रः । उपेनद्रतनयः । पुरुपोत्तनत् नुः ।
वेःशवपुच्ः 1 हषीकेशपुत्रः । हपीकेशतनयः शा्जनन्दनः । नारायशोदरहः । हेरिसूनः । गोविन्दठुक् ।
दूमानि मदनस्य पर्यायनामानि ज्ञातव्यानि । मध्नाति चित्तं १मस्मथः । कामयते जनः (नेन) कासः।
रसूरपकारातिः । मनरोऽयसमान्न जायते अनन्यः । कायपर्यायरद्ितः । विदेदः। चरकाय: । ग्रनङगः ।
च्रतपवनः ! श्रवपुः ! श्रसेहदननः । अकलेवरः । श्रमूत्तिः । इत्यादि (दीन्यपि तस्य) पर्यायनामानि । अनं
मदयतीति मदनः} मकरो ध्वजे यस्य स सक्तर्वजः । भरदयुम्नः । मनसिजः । सङ्कल्पजन्मा ¦ श्ङ्गजः |
पञ्चेषुः 1 भीनन्द्नः । दच्छयः । मुषलः 1
शिरीमुखः शरो बाणो सगणो रोपणः कणः ।
इषुः काण्डं क्षरपरं च नाराचं तोमरं खगः ॥ ७८ ॥
दादश वाणे 1 शिलीव स्मारं मुखं यस्य उशिल्लीभ्ुखः । “शृ दिपायाम्' । शणन्त्यनेनेति
शरः । भ्"्पुःसि सज्ञायां घः" घप्रत्ययः । वति “वाणः । ६“्यञ्नाच्च'' घञ् ¦ माग॑यति अन्वेपयत्ति
मांगेणः । रोप्यते देहे निखन्यते रोपणः । कणति कणः ] “ईप गतो” । इष्यते गम्यते शनुसम्मुखमिति
“दपु: । जन्त॒किष्यति हिनस्तीति वा इपुः । ५१ इषिधृपिभिदिख्चिमृदिपृ्यः कुः” । काम्यते रिपुवधाय
१ °कारुडम् । उभयम् । खनति भिनत्ति ५ श्लुरप्रम् । नारं नरसमूहम श्रच्चतीति ^ नाराच म् । स्तोम्यते
श्लाष्यते तोमरम्१३ । खमाकाशं गच्छतीति खगः । कङ्कपत्रः । चित्रपुङ्खः । चिधिखः } कलम्बः |
कदम्बो ऽपि 1 सायकः | प्रदहः । पृषत्कः । रोपः । गादुधपच्ः 1 ^ *खरः ! भलिलिः । मल्लः ।
१. विग्रहे चित्तस्थाने मनःशब्दपाखो योज्यः | मनस्टलोपायं परपोद्रादिगखप ठायाषो
ऽपि तस्य काय॑: । चीरस्वामिरामाश्रमो त॒ मननं मत् चेतना | मध्नातीति मथः । पचाद्यच् । मतश्चेत-
नाया मथः (मन्पथः'' इत्याहतुः । २. छन्दोभङ्गभयाच्ुपकारिरितति पाठो वोध्यः । श॑को नाम क्विद्
दानवस्तस्य नाशकारित्वाक्तामः शूपरकारिः। तदुक्तम्- श्रभि० चि० २।१४९ ! “'पुप्पाण्यसयेवुचापास््रा-
ण्यरी शम्बरपूर्पैकौ ।" ३. रशिलली नाम गण्ड्पदेः । ""के्ुवा" इति लोके ख्यातः । ४. का० सू° ४।५।९६
८. वणति शब्दायते पुड्खो ऽस्मि्निति पूर्णो विग्रहः । £. का° सू० ४।५।९९ { ०. कणति शाब्दायते
कणः । पचायच् । ८. इपत्ति गच्छति शचुसम्पुखमित्ति वा । ९. कार उर सु० १।६१९। १८. कनति
दीप्यते काण्ड इति रामाधमः । “कनी दीप्तो” । "छादिभ्यः कित्" उ° ११२ ¡ इति डः । श्रहनानिकस्यद्यु-
पधघादीर्घश्च | श्रपरकी्यु क्तविग्रहे “कमु कान्तौ” कपघातोः स एष प्रत्ययः । कंणत्यनेनादतः काष्ट टत्ति
हेमचन्द्रः 1 “कण शब्दे" इत्यतो डः }! १९१. क्षुरं तेरण्येन प्राति गच्छतीति क्षुरप्रम् इत्यपि | प्रयनं लैर
श्राति गच्छति वा} १२ नारमाचामतीति रामाभ्मः { नरमश्वतीति नराची, मसाच्यास्तुल्य नागच दति
देमचन्द्रः । ९३. "तु गतो" सोनः 1 तोतीति तीः} विच् ! श्रियतेऽनेनेति मरः । पुति सायां घः । तदार
भरस्चेति तोमर इत्यन्य 1 ६४. खसर्बणः । तदुक्तं कल्पदुरोश्े १५।२६५ । “चिवः पदाः
चिन्न पुवः शरः खरुः 1" इति ।
१५
१५
२०
१०
१५
० अमरकीर्तितिरवितमाप्य्रीपेता,
कामुकं धन्व चापं च धरं कोदण्डं धनुः |
शिलीमुखादेरसनम्-
प्रद् धनुषि | कमे शत्रवधलकणाय प्रभवतीति "कामु कम् । दधन्ति मारयत्यनेन रधन्वन् |
श्रद्न्तम् धन्वम् । चपस्य वेरोर्विकारश्यापम् । उभयम् | धरति श्धमम्. । धमं च॑ । “कुद ्रनृतमापरणे" |
कोदयतयनेन "्कोद्रडम् । रानरुवधा्थे धन्यते प्रर््यते धार्यते वा धनुः | उभयम् । उणादौ दधन्तीति
धनुः (नः) 1 ^ कुत्रिचमितनिघनिवधिष्निलर्चिम्य ऊः िलीभुखद्देरशनम् । यिर्लशताहनः।
शरासनः । मर्गखासनः। रोपणातनः } कणापनः । दप्वादनः । काण्डातनः । श्षुरधाप्रनः | नारचाघनः !
तोमराखनः | ।
तत्कोिमटनीं विदुः ॥ ७& ॥ `
तस्य धनुषः कोटिभग्रभागम्। कामुककौटिः। धन्वकोरटिः । चापरकरोटि; | काण्डकौटिः।
धतप्कोरिः । शिलीमुलाषनकौटिः । श्राषनकौटिः । वाखासनकोटिः । रोपराषनकोटिः । मार्गसाहन-
कोटिः । इत्यादिकपमटनीति कथ्यते । श्र ठति गच्छुति भूमिमरनिः। द्याम् । श्ररनी । द्र स्तिवाम् ।
पुप्यं सुमनसः एुल्छं सतान्तं प्रसवोद्गमो ।
प्रघ्रनं इमं न्ेयम्-
प्रद् (शष्ट) पुष्पे । पुष्यति विक्ररति पुष्पम् । खष्ड मन्यन्ते श्रामिः मनसः; । ल्रीतववटूत्वे ।
“भिकला विशसे ।” फलू । फलति स्म ष्टः 1 फुदछं वा । “०गत्वयःऽकर्मक-" तः । ` “श््रादनुवरन्धाच"
इति नैट् । “°श्रनुपकर्गाुछकतीवकृ गोवा” निष्ठा तकारत्य लत्वम् 1 ^^ ° चरफ़लोरुदस्य” तक्रारादावयुे
उत्वम् । छि: ! रेः । लताया श्रन्तं पतितं रतान्तम् । प्रस (य ) ते परसवम् । उद्गच्छति प्रादुर्म
वत्ति उद्गमः । श्चिवं प्रसते प्रसूनम् । घनं सूलकं च । एतां उमयम् । कौ शोभां सूते + ^कुसुमम् ।
सुमं च । जञेयं क्ञाततव्यम् ।
तदाद्यस्चशरः स्मरः ॥ ८० ॥
पुष्पपर्यायतो ( तः परतरा }) स्पययिपु तथा वाणपययिप्वपि स्मरनामानि भवन्ति।
पुष्पेपुः । पुप्यव्राणखः 1 पुष्पशिलीमुखः । पुष्पशरः । पुष्यमागसः । पुम्परोपणः । पुथ्पकाण्डः । पुप्पकणः |
पुष्यष्ुरयः । पुप्पनायचः । पुष्पतोमरः । उखमनःरः । सखमखिलीगरखः । समनोनायचः । लतान्तेयुः 1
१. “कर्मण उक." पा० सू० ५११०३ । इति प्रभवत्यथ उकञज. । टिल्लोपः ¡ २. धन् धान्ये”
जुहोत्यादिः 1 वनृप्रत्ययः। धातूनामनेकाथत्वान्मारयतीत्य्थः | धात्वथानुरोध ठ दधति धान्यमर्चयद्यनेने
त्यर्थो बोध्यः । वीराणां घनघान्यार्जनसाधनत्वाद् धनुषः । धन्वति गच्छति धन्वेति क्तीरलामिरामाश्रम-
देमचन्द्राः । कनिनत्वयः । ३. धरती रत्तत्यापन्नरच्वानिलय्ः । मनिनप्रत्यय; । श्रकारन्तधर्मशव्द-
स्य धनुवांचित्वे मेदिनी प्रमाणम्--“धर्मोऽल्ली पुण्य च्राचारे स्वमावोपमयोः कतौ । श्रहि्ोपनिपरन्यावे ना
धनु्यंमसोमपे [° मान्तव ० १६ श्लो० ॥ %, वराहुलक्रादण्डप्रत्वयः । रामाध्रमस्तु "कुट श्टेतमापसे"
कोटती विग्रहमाह ।* स एव प्रययः । पुयोदरादिव्वष्टस्य दः । कदिः सौचः । कदयतेऽनेनेति देमचन््रः।
“कु शब्दे" कौतीति कौः। कौः शब्दायमानो दण्डो उष्येयप्यन्यत्र । ५. का उ० सू० १३१] ६. पुप्रीतं
मन द्राभिरितति मकुरः 1 ७, का^सूञ ४८६।४९] ८. का०सू° ८।५।९१। ९. का०सू° ४:६।१ १५। १०. कार
सृ० ४।१।७६। ११. कुष्यति कुम् । "कु संदलेषरो” दिवादिः । "कुसेरगमोसेदेत्ताः” परा ०० यु"
४।१०६। इत्छमप्रत्ययः ! इति रामाश्रमः 1
६ नाममाला
& `
लतान्तकाण्डः । लतान्त; । लतान्तनाराचः । लतान्ततोमरः। प्रठवमागंणः। प्रखवरोपणः ।प्रसवकणः ४ _
श्रसवेषुः । प्रसवकाण्डः । असवक्षुररः । प्रसवनाराचः । प्रसवतोनरः। उदूगमशिलीमुखः । उदूगमशरः ।
उद्गमवबाणः । उद्गममार्भणः । उद्गमरोपणः। उदूगमकणः ! उदु गमेषुः । उदुगमक्षुरप्ः । उद्गमनासचः ।
उद्गमतोपरः । प्रसूनशिलीरलः । प्रसूनशरः । प्रसूनव्ाणः । प्रसूलरोपणः । प्रसूतकणः । प्रसूनकाण्डः 1
प्रसूनेपुः 1 पसूलक्षुरपः । प्रसूननासाचः । प्रसूनतोमरः । कुखमशिलीमुखः । कुखुमशरः । कुसुमवाणः ! कुपुत-
मार्गणः 1 कुसुमरोपणः) ऊुसुमकणः। कुखमेपुः। उुसुमकाण्डः 1 कुपुमक्षुरपः । कुसुमनायचः 1 कुषुमतोपरः 1
पुष्पशब्दामे धनुषि शब्दे प्रयुज्यमाने कन्दपनामानि भवन्ति । पुष्पकामुकः । पुष्पधन्वा । पुष्पचापः
पुप्पधमां । पुप्पकोदण्डः ; पुष्पघनुः (न्वा) । लतान्तकाम कः । लतान्तधनुः (न्वा) । लतान्तचापः |
लतान्तधममः (मा) । लतान्तकौदण्डः । लतान्तधन्वा । अ्सवचापः । प्रसवकोदण्डः । प्रसवघनुः (न्वा) ।
परसूलकासुषकः 1 कुयुमघन्वा । कुषुमचापः। कुमुम (मा) । कुखमकोदण्डः । कुसुमघनुः (न्वा) ।
द्त्यादीनि ज्ञातव्यानि ।
स्यान्तमास्यनितं चित्तं चेतोऽन्तःकरणं मनः ।
हृदयं विरिखाऽकतम्-
नव चित्ते । “स्यम स्वन ध्वन शब्दे ।' आद्पू्वः | स्वनति स्म, श्रास्वनति स्म इति
स्वान्तम्, श्रास्वान्तम् । “व्यर्था ०१ निष्ठा क्तः । धवा ररष्यमसखरसंुषाऽस्वनाम्" एभ्यः कते विभाषयेड्
भवति । वेट् 1 “पञ्चमो ०3 । "मनोरतुघ्वारो * घुटि” ! मनौऽथे "क्षुभिवादी"~ स्यादिना क्तं -नेय् । कथि-
तत्वकथनेऽपि परत्वापूरवोक्तपरोक्तयोः परोक्तविधिर्बलवान् इत्ति वचनात् । श्रनेन सत्रैसायमेव विकल्पो
भवति । मनोऽभिधानेऽपि परत्वादयमेव £विधिर्मवति । चेतति चित्तम् । चेतति जानाति अनेनात्मा
चेतस् सान्तम् । शन्तः निश्चयः क्रियतेऽनेन, स्रन्तःकरणम्< । मन्यते बुध्यते ऽनेन सान्तम् मनस् ।
दुध्याऽथे दरति हदयम् । नोः दो ऽन्तश्च" । दान्तं च हृद् । निगतं (ता, नष्ट" (णश) शिख (खा)
यस्य तत्. विशिखम्^ ° } श्या समन्तात् कूयते आकूयते ( श्राक्रूतम् ) } तया च्सादख्याम् ›
“जाताक्रूतेनाकारेणेति मानसम्? ।
मारस्तत्रोद्भवो मतः । ८१ ॥
तत्र चित्ते उद्भवो मासे सत्तः कथितः । स्वान्तसम्भवः । स्वान्तजः । श्रास्वनितजः ! चित्त
सम्भवः । चित्तजः । चेतस्सम्भवः । चेतोजः । श्रन्तःकरखसम्भवः । दृदयसम्भेवः | हृदयजः । विशशिखशम्भवः
निशिखजः ! श्र्ूतसम्भवः \ इत्यादीनि कन्द्पेनामानि ज्ञातव्यानि \
मौवी जीवा गुणो गव्या ज्या-
पड् गुणे । मूर्वति दहिनस्त्यनया मूर्वा । तदाख्यस्य तृणस्य विकारो मौवी । धनुरनया जीवतीति
९. का° सू° ४।६।४९} २. का० .सू० ४।६।९५७। ३. का? सू० ४८।१।५५॥ ^ पल्लमोपधाया
धरि चागुणे" इति पूणे सत्रम् । ४. का० «० २।४४४। ५. का० सू° ४।६।९३ । ६. प्रास्वनितमित्यत्
मनोऽ्ेऽपि परात् “वा रुप्यमत्वरे"' ति चेद् । श्यास्पूवैकत्वाभव्े ह स्वान्तमिल्यत्र '्ुभिवादीः? व्यादिनेद्-
प्रतिपेघः । तेन स्वान्तमिव्येकमेव स्मम् ! श्राङ्पू्वकत्वे तु ग्रास्वनितमास्वान्तमिच्छुमयमित्याशयः ।
७. “'ज्यनुबन्धमत्तिबुद्धिपूजार्थभ्यः क्तः" इति का ४।४।६६] सूष्धेण श्वानाथत्वाद्वर्तमानि त्त: 1 <. प्रन्त
व्दस्या उत्राधिकर्फशक्तिप्रधानरेफान्ताव्ययवेनान्तो निश्चय इति य्युत्पत्तिनं यक्ता । न्तर्गत करसम्
करणानामन्तगतं वेति व्युत्त्तिवोरध्यां । ९. का० उ० सू २।२६ । १०. दििखशव्दस्य ह्दया्ँ न किम-
प्यन्यत्र प्रमाणमुपलब्धम् ! सघोमुखपुण्डरीकाकारत्वाद्धृदयस्य शिखारदितेस्यं कथस्िन्देयम् ।
५५
१५
१५
०
५
१०
१९८
२ अमरकीर्तिविरचितभाप्योपेत्त
जीवा 1 गुण्यते शभ्यस्यतेऽनेन गुणः। पुंसि । गोभ्यौ दिवा गव्या १1 जीयतेऽनया यार । व्राणाठनम् ।द्रणा |
यिभर्गः रिलीगखः 1 |
भ्रमरः पटूषदो जेयो द्विरथ मधुव्रतः ॥ ८२ ॥
सप्त श्रु । श्रलति मण्डयति पुम्पजातीः च्लिः । मधुना व्रिमरस्यामानं भद्ध: । भ्व
ङ्गाङ्गानि'' एतेऽङ्गप्रत्ययान्ता निपात्यन्ते । शिलीसटशं िलापटशं वा एवमस्य शिलीमुखः 1 श्रमन्
रौतीति निखक्त्या श्चमरः । “कन्ध्वाद्यः”" रकन्युप्रछतीनाम् श्रकारस्य लोपो भवत्ति। श्रादिष्ब्दात्
नकारस्य लोपः उणादौ “श्रगु चलने" । भ्रमतीति भ्रमरः। “देविध्वटिजटिश्रमिवाधिम्यऽरः"।
प्र् पदानि व्ररणा शरस्य पट्षदः | द्रौ रेफौ थस्य द्विरेफः । मध व्रतयति स॒द्कै मघुत्रतः । मधुकरः |
पुप्पलिड् । दृन्दिन्दिरः 1 प्रट्चर्णः । पटचििः । चश्चरीकः । मलः । रोलम्बरः । देयाम् ।
मौ ह [^ करृन्दपं ¢ म, (५ ८
व्यादिग्रान्तमल्यादिकन्दपस्यक्षवं धरु; ।
द्तोविकरार रेश्षवम् । त्रलिमेर्वी (कम्) 1 मूद्ुमौ्वां (कम) । रिलीखवमो्वौ (कम्) ।
श्रनरमोर्वी (कम्) । पट्पदमार्वी (कम्) द्विरेफमोर्वौ (कम्) । मधुव्रतमेर्वा (कम्) । श्रलिजीवा (वम्) ।
भृद्जीवा (वम्) । शिलीमुखजीवा (वम्) । श्रमरजीवा (वम्) । पट्पदजीवा (वम्) । द्विरेफजीवा (वम्) ।
मधुत्रतजीवा (वम्) । श्रलिगुखः (णम् )। भद्रगुणः (एम्) । शिलीमुखगुखः (णम् )।म्रमरगुखः (णम्) ।
परपद्गुणः (णम्) । दिरेफयुणः (णम्) 1 मधुव्रतयुणः (खम्) । श्रलिच्या (च्यम्) । शद्धज्वा (ज्वम्)।
दविरेफव्या (घ्यम्) । मधुव्रतव्या (यम्) । दत्यादीनि कन्दपंशिलीख (धनुः) नामानि वेवानि ।
देतिरखाऽयुधं शस्वम्- |
चत्वारः शसम. हिनोति श्रनया देतिः* । छियाम् । '%“ “सातिदतिृतिूतवश्च“ । एते
तिप्रत्ययान्ता निपाध्यन्ते । श्रस्थते चिप्यतेऽनेनेति श्रम् । श्रायुध्यतेऽनेन श्रायुधम् 1 उभवम् |
शस्यतेऽनेन शाखम् ।" " “नीदाप्शुयुयुजस्त॒ठद्चिसिचमिदहपतदं शनदां करणे" । मात्रः ।''व्यञ्नम् › ५
इति सपरगमनम् । नु श्यस्येदप्रतिपेधामावात् नि प्रत्यये इडागमः कथं मवति । श्रागमशाघ्लमनित्यमिति
वचनात् शशुधातोः नि प्रत्ये इद् न भवति । “युग्यं 3 पत्रे” इति ज्ञापकादेव (द्वा)
पष्पाद्यस््ः स्मरो मतः ॥ ८३ ॥
पुष्पपर्यायतः श्रखपयविपु शरपययषु तया चापपययिष्वपि स्मरनामानि भवन्ति । पृथ
१. गोभ्यो वारेभ्यो हितेव्यर्थः । २. जिनाति जीयतेऽनया । “ज्या वयोहानौ" । “शरन्येष्वपि
दश्यते" इति डः । ३. श्र मूपणादौ । स्वेधादुम्य इन् । ४. का० उ० १।४८। ५. का० सू° वृर
६. कातन्ब्रोणादै नोपलब्धम् । ७, भ्रमरपदे रेफद्वयसत्वाद् द्विरेफः । ८. कन्दर्पस्य धतुरैच्वम् । इधुदण्ड-
निर्मितम्) शतत एव काम दक्षुधन्वेदयुच्यते । मौव्यदियः शब्दा न्ते यस्य, अलिः श्रलिपर्याय ग्रादौ यस्येदं
तद्घनुरिति यथाश्रुतपाठार्थः । श्रस्मिन्न्ये धनुर्विशेषणतया श्रलिमौर्वीकम् मुद्मोवीकम् इत्यादि
टीकायां वक्तव्यम् । वस्त्व मौव्यौ दिप्रोक्तमल्यादिरिति पाटो वुक्तः । तत्र पदाथंयोजनाऽपि साधु संगच्छते ।
श्रल्यादिः कन्दर्पस्य मौ्यांदि धटुश्च रेच्चवम् इत्यर्थः । तदुक्तम्- “मेवं रोलम्बमाल्ा धनुस्थ विशिला
कौमा: पुष्यकेतः" इति सादित्यदप॑शे । टीकया तु यथाश्रुतपाठावगामिनी । €. “हि यतौ वरदौ चः)
दयं ब्धुत्पत्तिरग्निशिलार्थं बोध्या । शस्त्रार्थे “दन् र्हिठायाम्?' हन्यतेऽनयेत्ति सुवचम् । १०. का ०.
४।५।७३। ११. का० सू० ४।४।६१। व्यज्लनमस्वरं परवशं नयेत्" । १२. का० सृ०१।१।२६} इति सकास्स
पर्गमनम् । १३. का० सृ ५।२।३२२
नामसमाखा ४३
देतिः । पुष्पाः ! पुष्पायुधः 1 पुष्पशघ्लः। स॒मनोदहेतिः । सुमनोऽखः । सुमनच्राय॒धः ] सुमनर्शल्लः )
लतान्तदेतिः । लतान्ताल्लः । लतान्तायुधः । लतान्तशस्रः । प्रवारः । प्रसवायुघः । म्रसवशख्रः । उद्ग-
महेतिः । उद्गमायुघः । उद्गमश्रः । प्रसूनहेतिः । प्रसूनास्ः । प्रसूनायुधः । प्रसूवशलः । कुखुमहेतिःः ।
कुपमालरः । कुसुमायुधः ! कुसुमशसख्रः ! इत्यादिकानि नामानि ज्ञातव्यानि ।
ध्वजं पताका केतुश्च चिह्र तद्वैजयन्त्यपि ।
पञ्च पताकायाम् । ` ध्वजते (ति ) धूयते ध्वजः १ । तथाऽमरसिंदे-“रध्वजमखि याम् 1"
ध्वनिश्च । पताकादण्डे ध्वज इत्यन्यः । पत्यते क्षिप्यते वातेन पताका । बलाकादयः --वलाकापिनाक-
पताकाश्यामाकशलाकाः” एते यकप्रतययान्ता निपात्यन्ते । पराक्रा च । लियाम् । कीयते सैन्यमनेन केतुः ।
भकेत्वादयः--“केलृतुक्रत्वाप्तुपीलवेघतुबदतुजीवातवः एते वुनप्रत्ययान्ता निपात्यन्ते । चह परिकल्कने ।
चहयति ८ श्रनेन) चिम् 1 विजयतेऽनया वैजयन्ती ^ । जयन्ती च । छन्नौ: । वैजयन्तः । जयन्तः !
^त॒त्तदन्तो श्पा्यादिः शम्भोवि्धकरः स्मरः ॥ ८४ ॥
मप्रघ्वजः 1 सपपताकः ! ऋष्रकेतुः । कषचिहः । भपवैजयन्तिः 1 पडप्तीणधष्वजः 1 पडक्तीण-
पताकः। षडत्तीणकेतः । षडक्तीणचिहः । षडक्तीणवैजयन्तिः ] सफरष्वजः । सफरपताकः । सफरकेतः ।
सफरचिहः । सफरवेजयन्तिः । श्रनिपिष्रध्वजः । शअनिसिपपताकः। शअनिमिषकेतुः। अनिमिपविहः।
्रनिभिपवैजयन्तिः ।तिमिष्वजः । तिमिपताकः । तिमिकेतुः । तिमिचिहः। तिमिवैजयन्तिः। मीनघ्वजः । मीन-
पताकः ।मीनकेतुः। पीनचिहः । मीनवेजयन्तिः । पाठीनध्वजः । पाठीनपताकः । पाठीनकेतुः । पाठीन चिहः।
पाटीनवैजयन्तिः । शस्भो्विष्नक्षरः । हरविन्नकरः | इत्यादीनि स्मरनामानि ज्ञातव्यानि ।
कोसेयकासिनिस्विशपणाः करवालकः ।
तरवारि्मण्डलाग्रं सद्नामावकलिं विदुः ॥ ८१५ ॥
शरौ खड्गे । कुषौ भवः कौक्षेयकः० । कौक्तेयः । स्यते रिप्यतेऽसिः । निष्कान्तलिशतोऽ
ुलिम्यो निखिश्चः । तालव्यान्तः । शरन् हन्तुं कल्पते याचते छृपाणः ° । “'कृषेः काण ९: ] करे वलते
करवालः ^° करपालः । तरति (तर) वमानं वारि यत्रेति निरुक्त्या तरवारिः । मण्डलं वतलमप्र
यस्य तन्मरुडलाथ्रम् 1 खण्डति परमर्माण्यनेन खङ्गः ° खण्डरगक्" , । स्त्ीत्नोः । ऋष्टिः । चन्द्रहासः ।
अक्षौहिणी वरानीकं वाहिनी साधनं चमूः ।
ध्वजिनी परतना सेना सैन्यं दण्डो वरूथिनी ॥ ८६ ॥
| दादश सेनायाम् । ग्र्ाणां रथानामूहिनी श्क्षौहिणी 1 धयस्यौत्वमूहिन्याम् " ->' श्रौत्वम् ।
प्रधवा घात्व्थन साध्यते भाप्यक्रां भ्रीमदमरकीर्तिना । च्श व्यापषो । श्रश्ठुते व्याप्नोतीति श्रत: ! “ › गवृनू-
१. "ध्वज गतो | पचाद्यच् । २. श्रम० को° २।८।९९। दे.का० उ० ३।४०} £. का उ०
६।२८। ५. विलयते विजयन्तः, विजयशाली पुरुषः ! श्रोखादिको ऋच्प्रत्यवः । ऋस्यान्तादेणः ।
विजयन्तस्येयं पताका वेजयन्तीति । ६. ते ते ष्वजपर्य्याया घन्ते यत्य सपादिमोनपयीयश्रादौ यस्प
दुटशस्तथा श्ठम्सविष्नक्रश्च सरः कामः 1 तेऽपि सरपर्ययायाः । तव्यथा भपष्यजेत्यादि । ७. डुलदु्ति
मीवान्यः श्वाऽस्यल्रेु" पारस ५।२.६। इति खद्मायं ठक् । <. छ्पां ठदति द्रम्य दत्य ।
५. फा०उ०सू० ५१५] ६०. "वल वेष्टने। ञ्वलादित्वाण्णः । वलनं बलो वेषटनम । ररे बालो यश्व, ररेर
वल्यते वोभयमप्यन्यन्न । ९१. का० उ च्० ५।५२। १२. कास्चू. द° १।२।<। ६३. कानउन्त^ ५,५२।
१९०
९)
(३,
१०
, लमरकी्तिचिरवितभाप्योपेता
वदिदनिमनिकम्यरिकपिम्यः सः" स प्रत्ययः । चलुशौश्च ^ | चणो; कःते" शक् प | ^ कयक्षवेगे च
श्र इत्ति जातः । ऊष्टनं उः । उदो विचते यस्याः सा ऊष्िनी । श्रक्नाणामूृदिनी श्रद्ीदिी | “त्मा
सान्तसमीपयोरसुवादेः> श्रस्यायः समासस्य शन्ते समाप्य समीपे च नक्रारस्य पूरवपदध्यात् निमित्तात्
(परस्य ) णो मवति वा । इदानीम् श्र्तौदिणीप्रमाणं क्रियते । यद्धारतम्--
५५५दको रथो गजग्धेफो नराः पन्च पदातयः ।
च्रयट्च तुरगास्तञ्नः पत्तिरित्यभिधीयते ॥
पत््य॑गैखिगुणेः सर्वेः क्रमादाख्या यथोत्तरम् ।
सेनामुखं गुल्मगणो वादिनी प्रतना चमूः ॥
अनीकिनी
पत्तेस्तरिगुणं सेनामुखम् । गजाः ३, रथाः ३, श्रए्वाः ९, पदातयः १५ इति सेनाणरुलम् । गना
९, रयाः ६, अश्वाः २७, पदावयः »५ इत्ति गुल्मम् । गजाः २७) रथाः २७, श्रवाः ८१, पदातथः १३५,
द्रति गणः । गजाः ८१, रथाः ८१, श्रवाः २४३; पदातयः ४०५ द्रति वाहिनी } गजाः २४८२, रथाः २४६;
श्रश्वाः ७२६, पदातयः १२१५, इति पृतना । गना; ५७२६) स्याः ७२९. श्रश्वाः २१८७, पदातयः ३९५५
दति चमूः । गजाः २१८५, स्थाः २१८५, अश्वाः ६५६१ पदातयः १०९३५ उत्यनीकिनी । द्शरानी
१५ किन्योस्नौहिणी । गजाः २१८७०, रथाः २१८७०, श्रश्वाः ६५६१०, पदातयः १०९३५० | वलते
संरणोत्ति परभूमिं वलम् । उभयम् ¡ श्निति श्रशितितूर्य॑स्वनैः न नीयते पराभवं वा अनीकम् । वाहा
श्रश्वाः सन्त्यस्यां वादिनी । साध्यते ८ श्रनेन ) साधनम् । परान् शवम् चमति ग्रहते चमूः । “शपि
चमितनिधनिवधिस्जिलर्जिभ्य ऊः 1” चश्च । ध्वजाः सन्त्यस्यां ध्वजिनी । नायकं पिपर्ति पृतना ।
शरदधैः विनोति वध्नाति सेना । “सिनोतेर्नः° सेनायाः स्वायं यशि सैन्यम् । दाम्यति दण्डः । वकूथो स्थ
२० गुधिरस्त्यस्या वरूथिनी । पताकिनी । चक्रम् । अनीकिनी । “गूढः । तन्तम् ।
कदनं समरं युद्धं संयुगं कहं रणम् ।
स्रामं सम्परायाजी संयदाहुमंहाहवम् ॥ ८७ ॥
एकादश नुदे । क्ते कदनम् । समियुति प्रतिविक्रला मवन्त्यत्र नयाः समरम् । युध्यतेः
(वा) रिमियु्धम् । भगाः संवुज्यन्ते मिलन्वत्र संयुगम् । कलं मधुरं वाक्यं हन्त्य कलहः } रणन्ति
२५ दन्दमयोऽत रणम् । संग्रस्यन्ते सत्वान्यनेनेति सं ्रामः१ °। पुंसि । संपरेति मृ्छुरतर सम्परायः। भटा रज्यन्ते
च्तिप्यन्तेऽ्र श्राजिः । स्वीत्रोः । संयतन्तेऽतर तान्तं संयत् ) महाँश्वारो आदवः१ "मटाहवः ! तम् आदुः
१. का० स्० ३।६।६०। २. का० सू ३।८।५। ३. “'कप्रयोगे सः” । का० ° धू
२५६ सू० । ४. प्रथमः शलोको मद्याभारत उपलभ्यते । तस्योपलन्धिस्तु द्धि तीयःध्याये पञ्चदशश्लोकयेन |
इतरस्तत्र नोपलम्यते ! तत्र “एको स्थः» इति श्लोकानन्तसम् -“पत्तिन्तु व्रिगुणामेतामाहूुः सेनाग्रं
बुधाः । चीरि सेनमुखान्येको गुल्म इत्यभिधीयते ॥ त्रयो गुल्मा गरो नाम वादिनी तु गखाख्यः । स्मृताः
स्तिखस्त॒ वादिन्यः पृतनेति विचक्षरैः ॥ चमूस्त॒पतनास्तिसलस्तिखश्वग्बसत्वनीकिनी । अनीकिनीं दशगुणां
प्राहुः सेनायुखं बुधाः ॥ इति ! श्लो० १६, १७.१८ } ५. श्रमि° चि० २।४१३। ६. का० उ० सू° १।३१।
७. का० उ० सू ६।३६। €. गृहशब्दस्य सेनार्थञ्यत्र प्रमाणं मुग्यम् । ९. “कद् वैक्लव्ये” । कयत
विक्लूयतेऽनेनासमिन्वा । करणेऽधिकरणे वां ल्युट् । १०. घर् ग्राम युद्धे“ । ट् ग्रामयन्तेऽरेति । देमचरः।
सङ्गमणं सद्घाम इति रामाश्रमः । ११. श्रदूयन्ते यौद्धारोऽत्रेयादवः ।
` नाममाला । ४५
नन वन्ति । श्रायोघनम् । जन्यम् । प्रघनम् । प्रविदारणएम् । मृदम् । श्राछतन्दनम् ¡ संख्यम् । समीकम् ।
नीकम् । विग्रहः । समुदायः । अभ्यागमः। संखफोरि; (टः) समितिः। समित् | इन्द्र
सम्मद; 1 संगरः!
गजो सतद्गजो हस्ती वारणोऽनेकपः करी ।
दन्ती स्तम्बेरमः कुम्भी द्विरदेभमितद्गमाः ॥ ८८ ॥
सुण्डालः सामजो नागो मातङ्गः पुष्करी द्विपः ।
करेणुः सिन्धुरः-
विंशति्गजे } गजति मादयति गजः? । च् 1 मतङ्खादषेजातो मतङ्गजः । -खतमीपचचम्यन्ते
लनेडः3 । दस्तो वियतेऽस्य हस्ती । “जातौ तु दन्तहस्ताभ्यां कराच्चेव इनेव हि?” । वारयति परान्
शचून् वारणः । न एकेन पिषत्यनेक्पः । करोऽसत्यस्य कारेन् । इदन्तोऽपि करिः । दन्तो विदयतेऽत्व
दन्ती । स्तम्बे तृणे रमते स्तस्वेरमः। “> स्तम्बकणंयो रमिजपोः“ खच् । ऊुम्भो विद्यतेऽस्य
कस्मी । दौ रदौ यस्य द्विरदः 1 एति गच्छति शतुसम्पुलमितीभः । “इणो वण्वत्"' भप्रव्ययो मवति
स च यण्वत् 1 मितं गच्छतीति सितङ्गमः। “गमेरच्£' खप्रत्ययः । "स्वा रुपोमोन्तः 1“ शुण्डं लाति
ह्ातीति, श्ख्डाल्लः< । साम्नः सामवेदाञ्जातः सामजः । नगे पव॑ते भवो नागः ! मन्यते जनेन
मातङ्धः । पुष्करं वियतेऽस्य पुष्कर । द्वाभ्यां पितरति द्विपः 1 करोति कायं करेणुः । ""ज्न्यामेुः'*
प्ाभ्यामेशुः प्रत्ययो भवति । स्यन्दते सवति मद् सिन्धुरः+ ° । दन्तावलः । पद्मी *२। पीलुः । कालिङ्धः।
तेषु यन्ता याता निपाच्यपि ॥ |
चयो हस्तिपके । यच्छतीति यन्ता। यातीति याता । निषीदति इत्येवंशीलो निपादी |
गजयन्ता । गजयाता । हस्तियन्ता । हस्तियाता । इद्यादीनि ज्ञातव्यानि । शरपिशब्दात्-श्राधोरणः |
₹प्तिपः । दस्त्यारोहः । गजाजीवः । महामात्रः ।
[> ^,१२ „(~ ८८०८ ् ० [9
नागाद्यरिः कण्ठो (ण्ड) रवो मगेन्द्रः केसरी हरिः ।
चत्वारः सिंहे । नागारिः । गजरिपुः । मतङ्गुषेरी । हस्तिद्धिट् । वाररवैरी । व्नेकपर्तपत्नः ।
करिरिपुः 1 दन्तिवैरी । स्तम्वेरमरिपुः । कचिद्दस्यते इदः पाठः । कुम्भिवेरी । इभवेरी । मतङ्गः ।
शुण्डालरिपुः 1 सामजद्देषी । नागारिः । पष्करिरिपुः । द्िपवेरी । करेरुरिपुः । सिन्धुरैरी । इत्यष्टीनि
पर्यायनामानि सिंहस्य ज्ञातव्यानि ! कण्ठे रवो ध्वनियंस्य कररीरवः ।
१. गञति मायति गयंति वा गजः । २. कार सतू० ५।३।९१। ३. का° च् २।६।१५। ठृत्तिः
काऽ सू ४३९१६) ५. कार उर्चू० २] ९. काऽ सूर ४1३1 ४५1 <. कार सूर ४५।६६
. शुण्डाऽस्तयस्येत्यपि 1 “प्राणिस्थादातो लजन्यतरत्याम् ' पादू ५।२।९६। इति मत्वर्थीयो लच्प्त्यय
सामवेदो हि गीतपरः । तत्स्वरेण समाकृष्टा दन्तिनो वद्धा एचवन् । चद्धाश्रा्प्व जनपदे उमानीताः ।
†तमूटा यतो बदतमानीताः । छत एव सामजा रद्युच्यन्ते । इति सङ्गतिः । प्रमाखान्तरमपि मुग्यम् ।
सामवेदसमुव्यारयन् विधिगंजान् ससज । साम्ना सह जातत्वास्तामजा दति १०. कार उ द् ।६।
९१. स्यन्दधातोरकस्त्वात्सवति मद्मिययेचिन्तनीयः । १२. च्रधे कल्पटुकलोपः६।५।१४। नारम्
“कर मततञ्ुखः पद्मी सूकरो लतारखः' । इति 1 ९३. छन्दो नङ्खनिया-त दष्टिरव दति उट: प्रतिमान)
वर्णागमो रवेन्दादावित्येकारस्य इकार शकारश्च विधेयः 1
1) ^ ५ ५€
१०
श्रमस्कीर्दिविरयितयाय्यायिना
=
४.१
,५११
“"वण्णागमो गवेन्द्रादौ सिद वर्भवरिषयरथ्रः।
पटशादं। विक्रारम्तु वगानाशः परपोद्र ।॥
दयनेन एकारस्य दकारः । मृगाणां चतुदा्ना म्ये द्रनट्रः मृगेन: ! कयः स्वन्ववेणाः
मन्यस्य क्रसरो । कमप्रातरे दरति ग्रः । पल्ाननः । दूर्व: । नशवरावुघ्ः । मृगरिपुः | दः 1
4 व्याघ्रद्वमृरः चार्ढः- |
त्रो व्यात्रे । व्याथिव्रति प्राणान् उगादतते वात्र । चमति श्रत्ति षतु चमृरः । परन्
शरमाति दिनन्ति उग्राः 1 दीपौ । पुष्टगीकः । तस्थुः | चित्रक्ावः | मृगारिः ।
दरभाऽष्रापटोऽषटपात् ।॥। ६० ॥
त्वो््रापदे | श्रगाति दिनस्ति श्ग्थः । “ण्करश्रालिगर्दिसातवलिवद्िम्योतमः' | श्रा
पदान्यद्य श््रापद्ः । चषा पदा य्याण्रा च्रष्टपात्न ।
करटा वराद देप्री च चर्टिः पात्री च वृक्र्ः |
श
७
श्रा ( प्र् ) शक्रे । पल्वलं संतरपति क्रोडः" । वयनादन्ति चसाहःः । द्राः दन्त्यस्य दृष्टी |
यप्रतीति चिः । गृष्िश्च | पृ पवने | परू | भान | पृत् पवने वा | ‰#० ] उमवपद्री | पथते <नेनेति पोत्रम्
पोच ।
[क
चते प्रचुरा-
“्दलरृङ्तसयोः पुवः नु । चरमाः । नाम्बन्तगुणः । लि नपृ । पत्रमस्वल्व पोच
2५ पत्यानि; य्वयति वर्धते वा पीनत्वेन सक्र । शूद्रश्च । दन्यतालव्यः ] कोलः। किरः | किरिय्च |
ष्ट मयः श्रृखल्किः कलभः वीघ्रयायुकः ॥ ६१ ॥
नोष्रं | उप्यत दरद्यते मरी उण्रः^ | “^ °सर्युघातुभ्यः ष्र्" । मन्यते गच्छति मयः ^ मर्वे
दन्यः | श्रद्ुलं वन्धनपय्य श्रदरःखल्तिक्रः५ 1 कं सिरो रभते उन्रमयतीति कलभः | क्रमश्च । शीतर
गच्छतीति शीघ्रमामुकः । दारकः) दी्र॑लद्वः | ग्रीवी 1 रवणः} धृ पराको { धृपकः )1
कौटेयकः सारमेयो मण्डलः दवा परोगतिः
1{जहपा ग्रामकः ककरा गत्रचागरः |} ९२]
नव स्ागमय । कले शदे भवः कंद्धयः१२ ( वकः ) { सरमाया ष्यं सारमेयः । मण्डं लाति
मर्डल्लः । चसदीन, श्वयति गच्छति चचा । एवानोऽदन्तोऽपि । पुरो गच्छति पुरोगतिः (१ ४जिद््ां शरीरं
९)
भि
१, “धृपोदसदयः'' दति शा० सृ० २२१५८७२) कारिका 1 २. प्राणान् दरतीस्वता-
वानवान्यत्र 1 ३. यद्रा शारयतीति शार्। चिव । दृते दति दृलः । श्रन्त्मावितरिवर्थौ दुर्! शार
वचाद् दृलध्रेति विग्रहः । ¢, काण्डण्स्० ३।१२1 ५. शन्रुढ घनत्वे” । क्रौडनं घनत्वं सोऽस्यात्तीति क्रीडः
व्रण श्राद्रच्" इतिं रामाश्रमः । ६. वरमदन्तीति, वर् श्रादारो यस्येति वा पुपोदरादित्वात् 1 ७, का०सू°
५८६।६२। €. सुवं प्रसवे करोतीति 1 शाक्रोऽयस्य क्रः खर्यौमघ्वात् । शकं रातिवा | श इतिवि
करोति वा] ५. वष्टि दच्छुति कण्टक्वृत्तादने मरुभूमिवा इति | सवंधातुभ्यः एन् इति का० उ°
८।२६। च्रे टुगसिदः-- वगा कान्ता । वरति उष्ट्रः करभः | श्रव्य दटरन्नन्तस्य सम्प्रसारणं निपाता
दध्वं च" 1 टृलाद । १५. क्राण्ड तस्. ४।३९ । ११. मीनात्यदीन् मयः । "मीच हिंसायाम्" । पचाय्च् 1
टतिवा। ५२. रदलमस्य बन्धनं कस्मे” पा० त° ५।२।७९ । इति कन् । तेन श्रडललक इति साधः ।
नन् तरु शृद्धलकः काषः स्यात्याद्रवन्धनैः” 1 दति श्रभि० चि० 1 ९३.बुलकुशनिग्रीयाम्यः श्वाष्यलङ्करयु"
प्रा सृ० ८२९६] उति शवार्थं कतर् । १४, चिद्या सतरनया पिबतीति विग्रद्ः सुवचः । निहया यरीरं
पातीदयपि सम्भवति । |
नामसाला, ८9
पाति रहति ज्िहयापः | आरामाणां शादूलो व्पा्रः ्रासश्षादूंलः । कुक् शब्दं करोतीति कुकुरः" । ऊुर्
शब्दे । कुकुर । रात्रो जाग्रति सज्चिजागरः । लेडवहः । बुक्कणः । भषरणः । मृगदंशः । शालावृकः 1:
हेम चा्टापदं स्वं कनकाजनकाश्चनम् ।
सुवणं हिरण्यं स्म॑ जातरूपं च हाटकम् ॥ ६३ ॥
तपनीयं कलाधौतं कातंस्रशिलोद्धवम् ।
पञ्चदश स्वश । हिनोति वर्ध॑तेऽनेन हेमन् । नान्तम् । श्नदन्तं हेमं च । उष्टं लोदेसु पद् प्रति-
टाव छष्टापदम् । “्र्टनः संज्ञायाम्" इति दीर्घः । शोभनो वणोऽस्य स्वर्णम् ।
उकारलोपः । श्रथवा समासे वणंस्य वा वलोपमाहुः । यथा पञ्चाणो मन्तः । कनति दीप्यते कनकम् ।
“<कनिचनिभ्यामकःउ'” । कनी दीक्िकान्तिगतिपु । श्रजं सज च्रज॑ने । शजतीत्वजयुनम्* । “छक्ृतवृन्ूयमि "~
दायजिभ्य उनः" । काञ्चति शोभां बध्नाति काञ्चनम् । शोभनो वणो यस्य सुचरम् । उमयम् । पुण्यं जिदीते
हिरण्यम् 1 अथवा श्रोदाक् व्यागे } हीयते" हिरण्यम् । “हो दिरश्च" चस्माद्न्यः प्रत्ययो भवति
दिरादेशश्च । भ्रियते धार्यते नान्तम् भर्मन् । श्दन्तं च भर्मम् | जातं सूपं यस्य जातरूपम् । छीवे ।
तथ। च “यशसििलकरे--““सङ्धस्प्रहो ऽपि जातरूपस्परहः ।" हरति दारकम् । हट दीप्तौ । श्ग्निना
तप्यते तपनीयम् । कला धावति गच्छति कलधौतम्? ° । कतस्वराकरे भवं का्तस्वरम् । शिलायाः
पाषाणद्द्धवौ यस्व शिल्लोद्धवम् । शातकुम्मम् । गाद यम् । कतरम् । चामीकरम् । महारजतम् ।
+ सकमम् । सम्मम् । जम्डूनदम् 1 कल्याणम् । गिरिक } चन्द्रवसु च ।
रूप्यं रजतं गुख्कि-
नयो रूप्ये । रूप्यते जना सुह्यतेऽनेन रूप्यम् +“ । जनं रजति रजतम् । रञ्यते हेम्ना रजतं वा |
गुड सक्तायाम् । गुडति रक्षति च्रापदः सकाशाद् गुलिका । गुडिका च । कलाधौतम् । तारम् । सितम् ।
दकम् । खजूरम् । श्वेतम् ।
शुक्किज मोक्तिकं तथा ॥ §४ ॥
रौ मौक्तिक । शुक्त्या जलादियानोपकरणद्रव्यविशेषाज्जात्म् श्रुच्किजम् । मुक्तानां समूहो
मौक्तिकम् । समृदेऽ्ये इकण् ।
वित्तं चस्त॒ बसु द्रव्यं स्वाथ रा द्रविणं घनम्-
करस्य
दश धने । विन्दति पुण्यकृतं चित्तम् । घात्व्थ॑न व्युत्पत्तिः क्रियतेऽपरकीतिना । विदल लाम ।
विद् । विद्यते स्म॒ भुज्यते (स्म) वित्तम् । निष्ठातः । ““नित्तणंवित्ताः"२ शकलाधमणंभोगेु" वित्तमित्ति
१. कुक् इति शब्दं कुरति उच्ास्यतीति विग्रहः । दगुपधल्वात्कप्र्यवः | यद्रा दोक
ऽस्ध्यादिकमादत्ते कुक् । “कुक् श्यादाने 1 क्विप् । कुरति गाः दायते कुरः । छुक् चारा कुरति
यिग्रहः! २.पा० सू ६।३।१२५ 1३. कार उर सूञ ३।४६ 1 ध्रववते एुष्यैरञनम् । ¢. काः
उ° सू° २६० ६. का उ० सूर ३।३। ७. श्द्तकसूपमिलयथः । श्रयवा प्रस्तं उने दपर
प्रशंसायां स्पप्यतययः । ८. सुदत्तमुनिवणंने श्रा० । ९. दाटकाकरपरमवत्वाद् या दावन् । 1. दना
` इुवणकलिका धोता गता धावति गच्छति वा यस्मादिति कलधौतम् । ११. स्प स्पदिपायाय् । प्यन्तः
प्यचा यत् । १५२. कार सू< ४।६।११४।
१०
„९
1 च।
-
# 0
५
१०
१५
२५
८ अमरकीर्पिविरचितमाप्योपेता
निपातः । निपातस्येड् न भवति । “'दादस्य" च” तो नौ न भवति । वसति सुलमनेन वस्तु । “कमि
मनिजनिवसिषिम्यश्च” एमभ्यस्तुन् प्रत्ययो भवति । वत्ति यु्ठमनेन वस । “पय्यऽसिवपिदनिमनि-
चपीन्दिकन्दिधिग्र्रिभ्यश्च एय एकाद्गम्धः उः प्रत्ययो भवति । दूयते गम्यते न्यम् 1 परं स्यति
शरन्तं नयति श्रथवा पुण्यं स्वनति सखः" स्वम् । उभयम् । पुण्यक्रृतमियरतिं श्रम् । गुखान् यति #
“"राते्डः ।' छीत्रोः । द्रूयते गम्यते द्रविणम् । दधाति धारयति सारत्वं धनम् । कशत गतौ । कतीत्येध
शीलं कस्वरम् । "“4कतिपितियाषीशय्याप्रमदां च" वरपरत्ययः । दुगं । सारम् । स्वापतेयम् । श्र.
क्थम् } रिक्थम् । हिरण्यम् । विभवः ।
तत्पतिं प्राहुः छवेरं चंकपिद्म् ॥ ६५॥
वेभ्रवणं राजराजयृत्तराशापतिं तथा ।
अल्करानिरयं श्रीदं घनपर्यायदायकम् | ६६ ॥
सत छ्रुवेरे । तस्य पतिः तस्ततः तं कुरर परार वन्ति । वित्तपतिः । वसुपतिः । व्तुपतिः।
्रम्यपतिः । स्वपतिः | श्रथपत्तिः | रा(र)पतिः । द्रविरपतिः । घनपत्तिः । कस्वरपतिः । इत्यादिपर्यायनामानि
कुमेरस्य ज्ञातव्यानि । कुत्पितौ वेरो देहः ऊुम्जत्वायत्य स कुचरः । पिङ्गलेकनेवत्वादिकपिद्लः । विध्र-
वसोऽपल्यमरि शिवादित्वात् । देशौ वैश्रवणः । राज्ञां यत्लाणां राना राजराजः । उत्तराशायाः पतिः
उत्तराशापतिः । अलका निलयो ग्रहं यश्य श्रलकानिलयः । धियं दयते श्रीदः । धनपर्यायद्ायकः।
धनदायकः । धनदः । वित्तदायकः । वित्तदः । वषुदायकः । वदयुदः । द्रव्यदायकः | द्रग्यद्ः । स्वदायक्रः 1 '
स्वद्: ! रेदायकः । रेदः । द्रविरदायकः । द्रविणद्ः । कस्वृरदायकः । कस्वरदः ।
रां जनपदो निगो जनान्तो विषयः स्मरतः ॥
पञ्च जनपदे । राजते राम् ¡ तथा च सोमनीतोऽ--^“पशुधान्यहिरण्यसंपदा राजते
शोभते इति राष्ट्रम्” । जनी प्रादुभावि । जन् । जायते कशचि्तमन्ये प्रयुञ्जते ।“्धातोश्च<देतौ "हन् प्रलयः ।
श्रस्योप० दीघं; 1 जानिरिति जातम् । जनि्यौश्च'” हस्वः । जनि जातिम् । जनयन्ति प्रजां धनमिति
जनाः ] '्ययच् * ° पचादिभ्यः“्च् प्रययः ।“कारितस्याना °" +"कारितलोपः | पद गतौ । पद्1जनैवंराशिम-
लत्तणेः पद्यते गम्यते प्राप्यते ्ाभ्रीयत इति अनयपद्ः ।“'्रच् पचादेः१२यच् प्रत्ययः । जनपदं इति जातः
तथा च सोमनीतौ--“+ जनस्य वणांश्रमर्क्षणस्य द्रऽयोत्पत्तेवा स्थानमिति जनपदः 2 निर्गम्यते
यस्िन्निति निग: । “निर्गा १* देशेऽधिकरणे इति उभ्रव्ययः । देशादन्यच- निर्गम्यते यस्मिञ्निति निर्गमनो
गिरिः । जनानामन्तो निकटे जतान्तः । परन् बन्धने । “धात्वादेः पः सः'” सिर्विपू० | विषिण्वन्ति
श्रस्मिन्निति विपयः । <युंचि संज्ञायां १६ धः -ननाम्यं ०१७.* गुणः । ९९१८ चय्" तथा । च सोमनीतौ--
५८५ २विविधचस्तुप्रदानेन स्वामिनः सद्मनि गजान् चूवाजिनश्च सिनोति बध्नातीति विषयः |"
` पू पुरी नमरं चेव पडनं पुटभेदनम् ।॥ 8७ ॥
१. का० सृ० ४६।१०२] २. का० उण तू० १।२७] ३. का० उ" प्रू० १।६। ४. “पोऽन्त-
कर्मणि" । वप्रत्ययः । “स्वन शब्दैः" उप्रत्ययो वा| ५. का० उ० सू २।२७) ६. का० सू० ४।४।५७।
७. जन ० सथ्रु° १। <- का भु० २।२।१०। ९. का० स्० ३।४।६७] १०. का० सू० ४।२।५८] ११. का?
स्० ३।६।४४। १२. घनं कविधानम्, पुंसि संजायां घः इति कर्मशि कप्रव्ययो धथ्रत्ययो वा वक्तव्यः)
न तु पचाद्यच्; तत्य कतंरि विधानात् 1 १३.जन० समु० ५) १४.द०श० ५।१।१३३। १५.का०सू० ३।८५२५ `
१६. का० सू० ८।५।६६। १७. का० सू० ५।५।१। १८. का० तू० १।२।१२। १९६. जन० समु०३।
५9 नाममाटा <
पर् (पश्च) नगरे । धृ पालनपूरणयोः । पृ । के । पृणातीव्येवंशीला पूः । “ *किन्परालिपुर्वि-
` मासाम्” किप् । ““~उरोष्टवौपधस्य च” उर् । पुर् जातम् } “उनामिनोर्वोर०”' पूर् । वेर्लापः४ । सिः ।
"ध्यञ्ञनाच”"? सिलोपः । “प्रेपसोर्विषजंनीयः'' रस्य विसगेः } पृः 1 यदन्तः । पुरं पुरी च । इटन्तोऽपि
पुरिः । नगाः सन्त्यत्र, ग्राम्यत्वं न्यत्यन्र वा नगरम् । ्ीवे । नगरी च} नानादि्देशागतानां
वशिजां भाण्डानि पतन्तयत्र पत्तनम् । पट्रनं च । चत्र स्मूतिभमेदः--
““पटूनं शकरटेगेम्यं घोटकेनोभिरेव बा ।
नोभिरेव तु यद्गम्यं पत्तनं तस्रचक्तते ॥*
पुटा वासा भिचन्तेऽ् पुटभेदनम् । क्लीवे । श्रधिष्ठानम् । निगमः । दरङ्धः । स्थानीयम् ।
वक्त्रं रुपनमास्यं च वदनं युखंमाननम् ।
षण्मुखे | वचं परिभाप्रणे | उच्यतेऽनेन वक्रम् ॥;: (सर्वधातुभ्यः ८ टन्" | रप लप् जल्प व्यक्तायां
वाचि] लप्यतेऽनेन लपनम् । युट् । अरव्यतेऽस्मिन्नास्यम् `! ^“ १ “कृत्यल्युटो बहुल"मिति ण्यच् । वद् व्यक्तायां
वाचि । उग्यतेऽनेन वदनम् । महति मुद्यति स्तोत्रेण व। मुखम् °^ । खन्यते वा मुखम् । उणादौ । सुख
टःख तच्ियाम् ! चौसादिकत्वादिन् । सुखयति श्न्नादिखादनेनेति मखम् । “सुखेः* २ को मुखिश्च”
सुखेः कः प्रययो मवति घातोमुखिश्च । इकार उचारणायंः । श्रा ्रनिति श्वसित्यनेन शआ्राननन् । तण्ड् ।
वणं शरोत्रं श्रवर्चापि कणं चेव भ्रति विदः ॥ ६८ ॥
पश्च कणं । श्रूयतेऽनेन श्रचणम् । भ्रूयतेऽनेन श्रोत्रम् । क्लीवे । शरणोल्यनेन सान्तम् श्रवः ।
क्लीवे । करोति शब्दावधानं कणंः१३ । कणंयति वा कणः | द्रः कणंमेदे । श्रयतेऽनया श्रतिः ।
चिम् 1 विदधुः कथयन्ति ।
(क 0 ४ (4 भ 9 विलो
दग्षि चक्षुनंयनं दषटिनत्रं विलोचनम् ।
सत्त नेतरे } दश्यतेऽनया दक. । तालव्यान्तः । शरश. व्यापौ । श्रश्तुते व्याप्नोत्यनेनासा घरादीन-
थानिति क्षि । "“१८रशिक्रपिभ्यां सिक् ] चष्टे दृदयाकूतं सान्तम् चश्चुः 1 “ " "्रपृवपिचर्तिजीव-
तनिघनिभ्य उस्" । नीयते चित्तं विपयेषु श्रनेन नयनम् । दश्यते प्रकयर्थोऽनया दृष्टिः । नीयतेऽनेन
दृश्यं नेचम् । उभयम् । विशेषेण लोच्यते वलोक्यतेऽनेन विलोचनम् । र्तम् 1 तारका ! च्योतिः।
कटाक्षं केकरापाङ्गं विभ्रमस्तस्य येकृतम् ॥ && ॥
तस्य नस्य वेकृते प्र् ८ पश्च ) । करयतीति *६करटाक्षम् । उभयम् । क (शिरसि)
१. का० स्० ४।४।५७1 २. का०सू० 1 ३१५।४३ । क्रूकारस्योत्वम् 1 ३. का०स्० ३।८।६८। टति
दीर्घः । ४. काण सू ८।१।३८्/ ५. का० सू० २।१।४६॥। ६. का० सू० २।३।६९३। ७. “'नगवासु-
पाण्डुम्यश्नेति" पा० सू० ५।२।१०७। वार्तिकेन मत्वर्थीयो रः । श्चथवा नश् धातोरोणादिकोऽरपरत्ययः
णस्य गत्वे च 1 ८, का० उ० सू ४।३१। ९. श्रास्यन्दतेऽम्लादिना प्रखवत्यत्ेति । १५. "छरलयल्युयो~-
न्यत्नापि'" इति क ° सूत्रम् 1 ४।५।९२1 रीकोक्तययाश्रुतसरन्ठ॒ पाणिनीयम् ३।३।१९३। ५१. छन्यतेऽ-
वदार्यते फलादिकमनेने्यपि । “'दित्छनेमुट् चोदात्तः” उ० ्रच्_ स च डित् ुडागमश्चेत्यन्यत्र । "“सुदि-
तानि खानौन््रियाण्यत्रेवयेके" इति क्तीर० स्वा० 1 १२. का<उ०चू० ६।६५। १३. यीगोक्तधिग्रहे करोतररा-
दिको णप्रययः । कीयते शब्दरहणाय ज्तिप्यते, कीयते शब्दोऽस्मिन्निति वा, रिरति शरीरे दममिति वा:
१४. का० उ० सू ६।५७] ६५. का० उ° सू्० २।४९1 १६. कटे एतिशायितेःद्धिणी यन्न, कटं गण्टमटठति
व्याप्नोति वेति रामाश्रमः 1 कटे श्राद्तिपितीति रोरस्वा° ।
१९०
१५
५
~+
१०
२५
५० अमरकीतिंविरचितभाप्योपेता
किरति विक्तेपं चिपतीति (करपर॑तोति) केकरः | न पाति कामिनम्रपाद्धः"। ठमयम् । विभ्रमं विश्रमः)
विकृतस्य भावो वैकृतम् ।
दन्तवासरोऽधरीऽप्या्टे वणितो दशनच्छदः |
चत्वारश्तु्थं श्रौष्टे । दन्तानां वाश दन्तवासः । श्रवति शोभामधरः । “शधो? भवो(धरौ
चा | श्रोष्ठम्यां सहितावधरी वा | श्रधरोऽप्योएमातरे वर्तते“ । उपति ददति सपनीद्दयमोषः । उप्यते
तीदंणादरिणौष्टौ वा । व्रणितः कथितः } दशनस्य घुदौ दशनच्छदः ।
रियैधरो गलो प्रीवा कण्ट्छ्व धमनी घमः ॥ १०० ॥
प्रद् गले । शिरो धरति श्रिसोधरः । शिरोधरा च । गलति भो जनं गलः । खाति गिरतिवा
ग्रीवा । उणाद गण्डे एणातीति प्रीवा । "“ार्वचिठाग्रीवाः८ एते क्रप्रययरान्ता निषाल्न्ते । कति
करटः । “कराध्रः ५ श्रष्माद्रधरल्ययो भवति । धमः सौत्रो धाठः। धम्बतेऽनया धमनिः । ददन्तः)
लियामीः । धमनी । धमति धमः । मन्या । कन्धरा |
दोदपिा च युजो व्राहुः-
चत्वारो वाद । दम्यते विनीयते पेऽनेन दोः! चान्तम् । “दमस” । दृप्यति दष्ट या इषि
दोपा । यदन्तः 1 च्रब्धयः । न व्ययते । अुन्यते-नेन भुः । निपातनात् चनोः कगत्वं न भवतति । नामिन
त रुणश्च न भवति | "युजन्वुव्नी° पाणिरोगयोः" इ्य्िन्नर्यं निपातनात् । भवा च 1 वदयननेति
वाहुः । “धदिस्वदि< (रहि) तलि पंश्चिभ्य उण्“ । प्रकौष्टः 1
। पाणिर्हस्तः करस्तथा ।
त्रयो इस्ते । पणायते व्यवदरल्यनेन पाणिः । “°्मचिजन्यततिरख्िपणिम्यः" एम्ब दय्
` मवति 1 दमत हस्तः 1 ° "दत्तः । कीर्यते सषिम्यतेऽनेन करः । णायः । शाम ^ ५ इत्यन्वः । पद्रशाखः
प्राहू्वाहुिरो ऽसख्च-
ब्ाहुिस्सोः च्रं दति खा धाह: कययन्ति । ग्र्ते भरेणांसः** । सन्वश्च ।
दस्तश्राखा करद्लिः ॥ १०१॥
दौ श्रद्रुल्याम् । दष्तस्य शाला इव इस्तशाखा । आङुखनादिकर्मांसि धरद्गति गच्छति
श्र्गलम् । खीक्लीवे । श्रहनल । करस्याङ्गुलिः* > कराद्कुलिः । एवमङ््गुरम् । श्रङयुरी ।
नासा प्राणम्-
९४१)
१. श्रपाङ्गतीलयपाङ्गः । “यगि गती"! शरच् | २.५ भवः इलारम्य “वर्तते” इत्यन्तं चीर
स्वामिभाष्वमवोदतम् । तद्ध्ये `श्रौ्टाषरौ ठु” इलयमरोक्तमूलपदतस्य व्याख्वारूपम् “श्रो
सदितावघरोः? इति वास्यनन्धानुखरणेनातरौद्धरतमप्रस्॒त्तमिति विवेकः । ३. दन्ताश्ाचन्तेऽनेनेति तदाशायः।
पुदि संज्ञायां धः! £ का उ° सू० २।२। ९. का० उ० सु° १।४२। ६. का० उ० सू० २।३१। ७. का”
सु ४।६।६८ €. का० उ सृ< १।३ । €. का उण सू० ८ा६| १५. का० उ० सु०.४२५। शदुगवाः
इस्यमिदमिलपूम्यस्तः" इति पूण सूत्रम् । ११. यत्र प्रमाणखम्--* पाणिः शायः स॒मो दृस्तः इत्यमरमाला ।
“प्चताखः शयः मः" इति श्रभि० चि | १२. रस्यते समादन्यते इत्यर्थः | ख समाघाते" | ग्रह
चादध्रुरादिः । यद्रा रम गतौ” श्रमति अम्यते वा श्रंखः | श्रौ खादिकः सनपत्ययः । १३. श्रट्य॒ल इत्यत्र
ध्द्भं खलः” का० उ° सू० ६।४८। इत्यद्भधातोरलप्रत्ययः । श्रङ्कलिशब्दे तु “्रह्यतिभ्यामुलीयि" का
== 313०1 दत्वलिप्रत्ययः } च्ियाप्रीः 1 च्यव्छ्त्ती दत्यति 1
[१५११
[31
नाममाला ५५९
द्रौ नासिकायाम् । नासते शब्दायते नास्यतेऽनया वा नासा? । नेस्ना२ च | जिघ्त्यनेन
घ्राणम् । कवे ! सिद्धनी । नासिका । घोर ।
ठरो वक्षः
ह्रौ यजमध्ये । यंते गम्यते उरःउ | ४““अतैरुश्च' शरस्मादसुन्प्रत्ययो भवति श्रस्य उरादेशो
भवति } छ गतौ 1 शरस्य धातोः म्रयोगः । वक्ति पाणी घश्च; । वचेः" सोऽन्तश्च' श्रप्मादसन् प्रत्ययो
भवतति सो <न्तः । श्चकार उच्चारणार्थः । €चवग॑स्य किः । ““ऽनिमित्तादि"' त्यादिना पलं च ।
कुक्षिः स्याज्ञटरोदरम् ।
त्रयो जठरे } कुषति (कुष्णाति ) निष्कर्षत्या्ारं कुक्षिः< । पुसि । ककम् । क्रीवे 1 जमति
जटरम् | श्रथवा जठ सौन्नोऽयं घातः । उणादौ निपातोऽस्ति । उनत्ति क्लेदयत्याहारमुदस्म् । एते
उभयम् । पिचण्डम् । तुन्दम् ।
स्तनः पयोधरछुचो वक्षोज इति वणितः ॥ १०२।
चत्वारः ऊु्तौ । स्तन्यते बालैः ^ स्तनः । पयो धरतीति पयोधरः" । कौोचते छी मृय-
माने, कुष्यते मर्दनेन श्राकुलीक्रियते वा कुचः । कूचश्च । वद्तसि जातो वक्चोजः । उरसिजः 1
वक्तोरदः ।
कटि्नितम्बं श्रोणी च जघनं-
चत्वारः कय्याम् । कय्यते वच्त्रैराच्छायते करिः | कटी । कटः । कटम् | नितरामतिशयेन
तम्यते काङ्क्ष्यते ११ नितम्बः श्राश्रीयते कामिभिः श्रोखः। नदादित्वादीम श्रोणी । इदन्तोऽपि भोणिः^२।
लियामीः । भोखी । इन्ति चित्तमिति जघनम् । “+ उदनेजवश्च'" । चकारात् काञ्चीपदम् । कलम् ।
कंडतम् । जघनम् । ककुद्मती । श्रारोहः । कटीरम् । त्रिकस्थानक्म् । स्थानपदाभावेऽपि चिकम् । फलकं च 1
जानु जह च|
द्रौ जानौ । गन्तुजायते जानुः+४ । “^ "कृवापाजिमिस्वदिषषाष्यशूट्सनिजनिचरिचरिभ्य
उण्"' । जदाति १९जहुः । ्रष्ठीवान् ! जद्धा +° |
चलनं चरणं पादं करमोऽदिथ पदं विदुः ।॥ १०३॥
१. '.णाख शब्दे" । नास् धातुः 1 शरच् घञ् वा । २. नेदमतो ऽन्यत्र समुपलन्धम् ! ३, श्रर्यने
गम्यते बलेनेति शेषः । प्रथवा उरस् बलाः कण्डवादिः । उरस्यति वलमाघत्ते उरः । चिम् 1 ¢. कार
उ० सृऽ ४।६७1 ५. का०्डसू० ४।६२। ६. का०सू० ३।६।५५। “चवग॑स्य किरसवणं" । इति पूं सत्रम् ।
७, का० सू० ३।८।२९। ""निपित्तास्व्ययविकारागमस्थः सः षत्वम्" इति पूणं सूत्रम् । ८. "कुप निष्के"
'्रशिक्रुषिभ्यां सिक्" का०उ०सू० ६।५७1 €. “स्तन यदी शब्दे ' स्तनति कथयति यौवनोदयम् । स्तन्य
ते वण्य॑ते कामुकैवां स्तन इत्यन्यत्र । १०. धरतीति धरः । पचायच् । पयसो धरः पयोधरः । एति वोध्यम् ।
टीकोक्तविग्रदे ठ कर्मण्यणि पयोधार इति स्यात् । ५११. तम्ब गतो" नितम्बति गच्छतीति, निग्तं तम्यते
कामुकैः निभतं ताम्यति सुरतसम्मदाद्वा नितम्ब इति रामाश्रमः । १२. धृयते किद्भिरिष्वनिरय शरु भ्रषरा
णादिको शिः । इति देमचन्द्रः | “ओरख सङ्प्राते भ्रोरति विविधशरीरावयवेः सट्धातोमवतीति
भोखिः ! 'सवेषातुभ्य इन्" इति सामाभमः। ९३. कार उर सूर २।३८1 १४. दायते ८नेनादूखनादि
जानुरिति देमचन्द्रः1 १५. का०उ°स्ऽ १।१ १६. नात्र कोपान्तरप्रमारमुपलन्धम् । ६७. पयपि नोः
पमागुल्फान्ते जदा, अद्ताजघनयोः सन्धिजदुरिति भेदः । तथापि उद्धारामीप्याद् मेदाविवदमा दान्
पयायो जक्धयुक्तम । त्न भेदस्त॒ न ॒विष्मत्तन्यः 1
१०
१५.
०
५ अमरकीर्विविर्चितभाप्योपेता
प्रद् चस्णे । चाल्यते च्लनम्५ । चरत्यनेन चरणम् । पद्रतेऽनेन पादुः । घन् | दन्तोऽपि
पराद् । रमु प्रदविक्ञेपे' । क्राग्यल्नेनेति क्रमः । शरदि गतौ? | ददनुत्रन्धत्वान्नागमः : श्रदत्यनेनैवंदहिः |
“२ हरिः” श्रंदैधातोरिपरस्ययो भवति । श्रटिदधश्च | प्रते पदम् । क्तीवे ।
रिरो मूर्धेत्तमाद्ग कमू्-
चत्वारो मस्तक्रे। शरदिखायाम् । शीर्यते स्यते शिरः | ५3 उपरिरजिश्ृभ्यौ यप्वत्
एभ्योऽसन् प्रत्ययो भवति स च यण्वत् । तेनागुणखः । श्रनुपद्धलोपः । - मूर्छ मोदसमच्छाययौः । मू्न्त्य-
ब्राहताः प्रारिनो मूधा ध्पप्रादयः-~“पृपरनश्र्यमन्मनन्तुचनय्वनज्लीदनमातरिश्वनकलेदनस्ने
ूर्धनूयुषन्'' एते कन्यन्ता निपात्यन्ते । उत्तमं च तद् श्रम्. उन्तमाह्नम् । क गै शब्दे । कायतीति कम् ।
शीपम् । मस्तकः । "कन्याङ्गु' च नानार्थ |
प्रारभ्यं प्रेरितेरितम् ।
त्रयः प्रेरणे । प्रारभ्यते प्रारभ्यम् । “९ाक्रिसदिपवर्गान्ताच्च यः प्रत्ययः ईर गती
कम्पने च । प्रयते प्रेरितम् । रितम् । “नपुसके मवि क्तः" ।
साम्प्रतं सरस्वतीनामानि प्रारभ्यन्ते श्राचार्यश्रीमदमसकीर्विना-
वाग्वचो वचनं वाणी भारती गीः सरस्वती ॥ १०४ ॥
सत्त वाण्याम् । उच्यते वाक् । ""वचिप्रच्छिधिदटशरुरव्वां कव् दीर्घश्च एम्यः क्विप् प्रत्यवौ
मवति दीवश्चस्वरस्येपराम् । वक्ति वचः< । “^सवघातुम्योऽसन् उच्यते वचनम् । वाण्वते
वाणिः*° लियामीः । वाणी । चिमर्तिं जगद् घारयत्ति, भरतौ व्रह्मा तस्येवं भारती । तथा च--
(“परात्मनि मोक्ते ज्ञाने चरत्तौ ताते च भरतराजस्य ।
ब्रह्मेति गी; भ्रगीता न चापरो विद्यते व्रह्मा ॥
गीर्यते उच्चार्यते सान्तं मीः | षरः भसरणमस्तस्याः सरस्वतीः । वब्रादयी । तथादि--
“गाः कामदुवा सम्यक् प्रवक्ता स्मयते बुधः
दुष्प्रयुक्ता पुनर्गोवं प्रग्रोक्तः सेव शंसति ॥
सिहदहिपघने गजः-
क्तिहि कण्टे, द्विपे गजे, घने मेवे च गर्जं +° शब्दः कथ्यते । गर्जनं गजः ।
हेपाऽउवे
शवानां शब्दे हैषा | देषणम् । दैपादहेपा च।
बरंहितं गजे ।
गजणब्दे च्र'हितम् । व॑खम् |
र्फीर्कृतं धेल॒कलभे-
१. चलत्यनेनेति चलनमिति सुवचः । २. ्रच्ाभिधानचिन्तामणिः प्रमाणम् -न्वरणः त्रमणः
पादः पदोंऽहिश्चलनः क्रमः” । इति । ३।२८०। ३. का० उ० सू० ४।५९] @. काच्ड०्सू० २।५] ५.
प्रमाणान्तसभावः । वराद्कुः कमनीयाङ्गमिति वा स्यात् । £. कार्स्° ४।२।११। ७. का०्ठ०्सू० २।९३।
८. उच्यते वच "इति कर्मर विद्रदौ युक्तः । ५. का० उ० घु ४।५६॥ .१०. ध्व शब्दे" चुरादिः।
११. सिंहगजमेषध्वनौ गर्जशब्दः प्रयुञ्यते । एवं वद्यमाणतत्तदष्वनौ सर्वत्र योचयम् ।
नाममाखा “` ५३
धेञ्रकलमे शिवत्से स्फीत्छृतं ^ स्फीत् शब्दः कथ्यते ।
स्तमितं जलदे तथा ॥ १०५॥
जलदे मेषे मेघानां शब्दे स्तनितं कथ्यते । स्तन्यते स्तनितम् ।
स्यन्दने चीर्छृतं मन्त्रे सटे च हुड्भतं तथा ।
स्यन्दने रथशब्दे चीत्छृतं कथ्यते । मन्बे भटे च हशब्दः कथ्यते । हुं मन्त्रे, हुं परिपरदने ५
हु सवं पुष्ट ते मयादौ क्षोभ्यम् । कुत्सने हुं निलंज! । यनिच्छायाम् हुं हुं मुच्च ।
सीत्कतं मणितं कामे-
कामे कन्दप॑भोगव्रत्तावशब्दे सीत्छतं मणितम् । सीच्कियते सीक्छृतम् । मण्यते मणितम् ।
खन्कृतं शृहुरागुधे ॥ १०६ ॥
ग्णद्ला-ऽयुधे खेचकूतम् } सुगमम् । ५
मञ्ञीरक तुखाशटोरिन् परं-
च्यः स्रीणां चर्णाभस्णे 1 मज्जः सेचः 1 मज्जत्याकपंत्ति चित्तं मस्षीरम् 1 यथवा मञ्जु मदुर
मीरयति मज्ञीरम् । ठुंचाङ्तेजद्वाया कोटिरिि त॒लाक्नोटिः२ । लगति नौतीति नूपुरम् । शिङ्ञिनी ।
पाद्करकः 1 हुंसकम् । पदाङ्कदम् । कलापो नानां । ।
तत्र संसृतम् । , १५
तत्र तस्मिन् मज्जीरके तच्छब्दे सृतं कथ्यते ।
ब्रातं चाथ मरूति-
सरतत वाया तच्छ्दे साङ्कत कथ्यत ।
रेड तं क्ौश्वदंसयोः ।। १०७ ॥
क्ोचश्च हंस क्रोयहंसौ तयोः करोश्चदंखयोः कररूतशब्दो मतः कथितः । तथा» चापरतिहः- २०
“निषाद्पेभगान्धारषड़जमध्यपधैवताः ।
पञ्चमरवेतस्यमी सप्र तन्जीकण्ठोत्थिताः स्वराः |
तथा च भरतनारके"
+ < ^पडजं मय्रा न्वते गवस्त्वुषभभाषिणः।
ध्राजाविकं तु गान्धार ' क्रच्छः कणति मध्यमम् ॥ २४
पुष्पसाधारणे काले पिकः क्रजति पञ्चमम् ।
धेवतं हेषते वाजी निषादं घ 'हते गजः ॥
नासाकण्ठमुरस्तालजिहादन्ताश्च स्पशम् 1
षड्भ्यः संजायते यस्मात्तसमातषडज इति स्मृतः ॥'”
१. नवप्रसूता गो धेनुः ्रिशदन्दौ हस्तिशावकः कलभस्तयोः शाब्दः सीत्छरतयुच्यते टति
शब्दार्थः । दीकार्शरस्यन्तु गोवत्सश॒ब्दः स्फीच्कतमित्येव प्रतिभाति 1 श्रत कोलान्तरयमासानावाल्यवि-
प्रयोगादशनाच मृलशब्दार्था उतुखर्णमेव शरणम् । २. तुलां वलया वा कोटयति । कुट प्रतापने चरादिः 1
श्रच इः 1 यद्रा वुलाकारः कोटिरममस्येति रामाश्रमः 1 ३. नुवन नूयते वानः । एन्तवने। द्रि,
युवि पुरति नूपुरम् ! पुर श्रग्रगमने। इगुपयेति कः 1 ४. शब्दभेदग्रसङ्गाद् अन्धान्तरोक्त मन्य
स्वरभेदं चःह् ! ५९. प° कोऽ १७१! £. `प्र” र त्पारम्य “इति र्तः इन्यन्ठः "द
भरतनारके” इत्येवं टीकायामुपन्यस्तः पाठः ""निपादपंनगान्वारःः -रति दीरस्वानिमाप्दे-मरेड
उपलभ्यते ।
र
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[1
५4
मर
~
1 =
+
(+
{=
५
१०
१५
०
२ ४ ्
५५ श्ममरकीतिविररचितभाष्यापेत।
प्रतीतं संस्तुतं रुच्धं दं परिचितं स्मृतम् ।
पय् स्मृते । प्रतीयते प्रतीतम् । ष्टन् स्ठणे । ष्ट । “वाव्वादेः पः सः । स्तुः समूपूर्वैः | सम्यकर्-
प्रकारेण स्यते स संस्तुतम् । लम्यते स्म च्यम् । परिचीयते स परिचितम् । स्मर्यते स स्तम्
संस्थितं दशमीस्थं च परसुं च मृतं विदुः ॥ १०८ ॥
चत्वारो मृते । संतिष्ठते स्म संस्थितः । सम्पूर्वकस्तिषतिः। दरा तिष्ठतीति द
मोस्थः | तथा च-- |
“प्रथमे जायते चिन्ता द्वितीये द्रष्टमिच्छति।
तृतीये दीघेनिःश्वासश्चतुथं भजते उवरम् ॥
पच्चमे दद्यते गात्रं पष्टे भुक्तं न सेचते ।
सप्तमे स्यान्महामूदधौ उन्मत्तत्वमथा्टमे ॥
नवमे प्राणखन्देदो दमे मुच्यते ऽसुभिः।
एतेर्वनँ; समाक्रान्तो जीवस्त्वं न पट्यत्ति 1"
दशानां पूरणी दशमी तत्र तिष्टतीति वा दशमीस्थः । परागत्ता श्रसवोऽस्य्पराछुः । प्रियते स
ग्बतं विदुः कथयन्ति |
\
खेदो द्वेपोऽप्यमरष्य रुटुकोयक्रोधमन्यवः।
सत्त क्रो । खिद परिघाते । ठदादौ खिन्दति । दैन्ये स्धादिपाटात् खिन्ते ( ततः खेदनं )
'खेद्ः । भावे घन् प्रत्ययः । द्विष् श्रप्रीतौ च्रदादो । द्वेषणं दवेषः । मृप तितिक्षायाम् । चुरादौ । शक
मृप क्षमायाम् । दिवाद् विभापितः। मपु सहने भ्वादौ परस्मेपदी ] रमपंरम् च्रमपः } कुप क्रुध सष रोपे ।
रोपणं रुट् । सभ्पदादित्वाद्भुवे क्विप् । कोपनं कोपः । क्रोधनं क्रोधः । मन जाने । मन्यतेः मन्युः |
<अजनिमनिदसिभ्यो वुः" । एभ्यो युप्रत्ययो भवति । उखादित्वाय्रोरनदेशो न मवति ।
दपः प्रमोदः प्रमदो सक्तोपानन्द त्सवः ॥१०६॥
सक्त ह । दर्भणं दषः । प्रदर्मश्च । प्रमोदनं भमोदः । मदी दँ । प्रमदनं भ्रमद्: । (ग्मः
प्रमोह्य” प्रसमोरपपदयोर्मदेरल् भवति दर्पार्थे । सोदनं सुद् दान्तः छियाम् । तप्र तुष्टौ । तोषणं
तोषः । श्रनन्दनम् आनन्द; । पुःसि । टुनदि समृद्धौ । उत्सवनम् उर्खचः । प्रीतिः ! उत्प: । उद्धवः"
कुपाऽुकम्पाुक्रोशोऽदन्तोक्तिः करूणा दया ]
पड़ दयायाम् } क्रप कृपायाम् } क्रपणं छपा । '“््परानुतन्धमिदादिम्योऽङ्'” इत्यङ् } “क्रपेः
सम्प्रसारणम्" इति परसूत्नेणाङ सम्प्रसारणं च । स्वपते< क्रप कृपायाम् इति ज्ञापकात् सम्प्रसारणम् ।
“स्वियामादा 1" चनुकम्पनमयुकम्पा । श्नुक्रोशन्त्यनेन अनुक्रोशः । पुंसि । न हन्तोक्तिः रहन्तोक्तिः।
करोति बिप्रादं चित्तं किरति वा करुणा ! उणादौ इकर. करणे । क्रियते करुण! । ““करकृतृद्नन्दमिदायं-
१. दवेपपयोये चेद्पाठश्िन्तनीयः ।! चखेदप््रीयस्तु “शोकः शुक् शोचनं खेदः” इति
अभि० चि०1 क्रोघपर्यायष्वु -“कौपक्रोघाऽमपंसेपप्रतिधा सरक्रसो स्वियौ" इत्यमरः 1 २, मन्यते व्या-
ल्यत्वेनेति शेषः 1 ३. का० उ० सू० ४।१। £. का० सूऽ ४।५।४८४] ५. उद्धवशब्दस्योत्सवार्थे प्रनाणम्-
“उद्धवो याद्वभिदि महे च क्रतुपावकरे" । इति मेदिग कौ वा० व० ३२ दलो० । ६. का० चु.
४।५८२। ७. “क्रपेः सम्प्रारणं च” पा०्गण सू० ३।३।१०४। ८. कातन्त्रमतमन स्वमतम् । पाणिन्यादि-
सूत्रं परमतम् 1 ५. का० उ० सू० २१६०
नामसाला ६५९५
जिभ्य उनः'' एभ्य उनः प्रत्ययो भवति । दयनं दया । दय दानगतिदिसादानेषु । भिदायर् | .
शेमुषी धिपणा प्रज्ञा मनीषा धीस्तथाऽशयः ॥ ११० ॥
षड बुद्धौ । शे इत्यव्ययम् । मोहः । तं मुष्णात्ति शमयत्ति इति शेमुषी? । धृष्णोत्यनया
धिषणा । प्राने प्रज्ञा । मनुते जानात्यन्या मनीषा | मनस ईषा मनीपा वा । ''इलण्लाङ्गलयो
रीपे मनसश्च" इत्यनेन ग्रन्त्यस्वयदेर्लौपः। शच सलोपश्च । चकाराधिकाराह्टोकोपचायाद्रा घलोपः
सप्र ्ये चिन्तायाम् । ध्यानं घीः" | सम्परदादित्वाद्धावे किप्£ । ^ ध्याप्योः सम्प्रसारणम्" श्रनेनेव सम्प्रसारण
दीषत्वं च । प्र सिः “रेफसोविंसजंनीयः” । व्रते तिष्ठति सर्वमत्राशयः । तथा-परत्ता । प्रतिमा ।
बुद्धिः । मतिः । मेधा । संख्या । संवित्तिः । उपलब्धिः ।
्रा्ञमेधाविनो विद्वानभिरूपो विचक्षणः।
पण्डितः ्रिराचार्यो वाग्मी नैयायिकः स्मृतः ॥ १११ ॥
दश र्दुपि । प्रजानातीति प्रज्ञः । प्रजञादित्वादण् प्राज्ञः | मेधाष््स्व मेघावी 1 ~मावा-
मेधाक्लजो विन्” वाधिकारात्सवे एवेते विभाषया विभाषिताः) रेषेभ्यो मतुरिष्यते । मतिमान् । वुद्धिमान् ।
-विद् ज्ञाने । बिद । वेत्ति जानातीति विद्धान् ।" ˆ वर्तमाने श०। शत्र । ¢ ° *न्वि०"' श्रदादि ^ २। भवतत;
"3शतु्व॑सुः । शत्रड् स्थाने वसुः । तदादेशास्तद्वद्धवन्ति इति वचनात् वसोः शवद्वद्धावेन सावघाठु-
कतात् “र्ती णु" ण्घयेसैकस्वरातामिड्वसो ” शनेनैकस्वरत्वाद्याप्त इड् न॒ भवत्ति । विदन् संजातम् ।
“सि; । ""सान्तमदतोनोंपघायाः'” दीर्घैः । विदुरोऽपि । ्रभिगते सूपं येनाभिरूपः । रूपं विद्या ।
''कोकिखानां स्वरो कूपं नारीरूपं पतिब्रता ।
विद्या रूपं कुरूपाणां तमा रूपं तपखिनाम्
चक्ष धातुर्विपूर्वः । विविधं चष्टे विचक्षणः । नन्दादेयु: । योरनः । १ शरपु° स्वम् ।
चिचरणो विद्वान् इनेन विचक्षण इति निपातः । निपातस्य फलं ख्यादेशो न भवति । पण्डा बुद्धिः ।
पण्डा संजाताऽघ्येति परिडतः । “१०तारकितादिद शेनास्संजातेऽयै इतच् ।” ^` <दवर्णावणं < षकार-
लोपः। सिः] रेफः । पू् प्राशिगभंविमोचने । सूते बुद्धि' सूरिः । “१ ° मूस्वदिभ्यः क्रिः'' एन्यः भिप्रत्व-
यो भवति । को यण्वदर्थः 1 २च्राचर्यते च्राचायः। “व्वरेराङि चागुरौ । तथा चौक्तम्-२१टनद्र
नन्दिनीतिशास्त्रे -
पर्चाचाररतो नित्यं मूलाचारविदश्रणीः।
षवतुवेणस्य सङ्घस्य यः स श्राचाय इप्यतं ।}
१. रेते इति रेमौहः । विच् । तम्युप्णातीति, मूलविशजादित्वात्ः । गोयादिदीप्।
शमेः कसो रत्वाऽभ्यासलोपे उगितश्चेति डीपि शशमेति शेमुपीति कीर स्वार । २. "धिप शब्दः |
देेष्टीति 1 ्ती° स्वा० । ३. ग्र्ञायतेऽनयेत्यन्यच । £. का० रू० पूर्वा< २८ सृ० । ५. स्यावतेलनया
घीरित्यन्यन्न 1 ६. "“सरपदादिभ्यः चप्", का० रू० उ० ८०५ पू | -का० रूऽ मा प्ल < ।
८. का० षू २।३।९३। ६. का० सू २।६।९५। श्रत्र दुगंडत्तिः। १०. “वतमान शन्दरानथाव-
प्रथमैकाधिकरणामन्तितयोः । का० सू धधा १९१. श््रन्विक्रणः कर्तरि” स० द 5।२।-
` ३२। १२. “श्रददेलुम्विकरणस्य'' का० सू ३।४।९२। ५३. श्शन्तु्वतुः' । कार सू ४।४।४।
९४. का० सुऽ ४८1६1७६ १५. कार सू० २।२।१८। ५६. कार सूर २८४८८ ५५ दः
५०८ । ९८. का० सूर २।६।४४। १६. कार उ० स् ३।५३ । २८. कार द ४1१८ २६.
५ स्लो०।
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५६ श्ममरकीर्षिविरचितभाप्योपेता
प्रशष्ता वाग्यस्य वाग्मी | न्याये विचारे नियुक्तौ मेयायिकः] धीरः । लन्धवर्खः ।
विपश्चित् | ब्रद्धः | श्रापङ्पः । सन् । मनीप्री । ज्ञः । दोषन: | कोविदः । परवद: । पुधीः । चती | कृषि
कविः । व्यक्तः | विशारदः । पंस्यावान्. । मतिमान् ।
पारिप्यो बुधः सभ्यः सदः संसत्सभोचितः |
पट् सभापृस्पे। पयिदि सभायां भवः पारसिप्रद्यः। यण् । व्रुध श्रवगमने । बोधतीति
बुधः ! समायां साधुः सभ्यः । कुशलो योग्यो हितश्च साध्रुखव्यते । सदसि उचितो योग्यः सदृडचितः।
संसदुचितः, सभोचितः । समाद् । समास्तारः । सामाजिकः ।
परिपपतभाऽस्थानपती-
चयः समायामू । परिपीदन्त्यस्यां परिप्रद् । सह भान्यस्यां समा | ग्रामन्ताल्स्यीयतेए
स्मिन् आस्थानम् ।
(-श्रधिपति राजा) पतिः--श्रास्थानं समा इत्यादिपर्यायनामतोऽधिपतिः पतिरित्यादिपर्याय
गब्देपु सच्सु राज्ञो नामानि भवन्ति ] परिषद्धिपत्तिः | परिपत्पतिः 1 समाधिपतिः | समापत्तिः । श्रास्या-
नाधिपतिः । श्रास्थानपति
राजघ्यो नृपक्रतुः । ११२॥
मण्डलेश्वरप्रजायां ( प्रयाजे) दौ । पुन् श्रमिप्वे | पु । “उधात्वा० सः । राजनपूः
राजा सोतन्यो राज्ञा सूयते वा यक्िन्निति राजसूयः । ""४राजसूयदच" । व्यर्रव्ययान्तौ निपातः।
पाणां राजं क्वः नरपक्रतुः। तथा च “स्मुता--
(श्रोसवे स॒रमभि हन्याद्राजसूये तु भूञुजम् ।
्रवमेधे हयं हन्यात् पौण्डरीके च दन्तिनम् 11"
चिष्रं मल्लिकापीटमासन्दीमास्नं विन्दुः |
प्रडाखने । स्तन. श्राच्छादने | विपृवं; ) विस्तरणं विष्टरः | “स्वर ध्वृ्टगमिव्रदापल् 1 श्रल् ।
नाम्यन्तगुणः । “व्वौस्वृणावेः” । संज्ञायां सस्य पत्वम् । “°तवग॑श्य पटवगाट्वगः 1" मल्ल्यते धार्यंते
मदिलिका । पेठतीति पटम् । “पृपोदयादिव्वादीष्रः । श्रा समन्तात्छीदति तिष्त्यस्यामासन्दी ^| ्रास्यते
१. श्च प्रमाणम् श्रभि० चि० ३।५। ''विद्वान् खंघीः कविविचकतणलव्धवर्णां जः प्रा्रूप-
करतिक्कश्वमिरूपधीयः । मेधाविकोविद्विशारदेस्रिदोपक्ञाः प्राज्पण्डितमनीष्रिवुषप्ुद्धाः ॥ व्यक्तौ
विपधित्सङ्ख्यावान् सन् „> इति । >. शशरधिपतौ राजा इति प्रतीकमाध्ित्य व्याख्यादर्शनादयं मूल-
पर्या इत्ति, न भ्रमितव्यम् । पूर्वापयादयोर्म्ये तत्समावेशाम्भवात् पड्क्रत्वेन स्वतन्त्रपादत्वा
भावात्, श्न राजवणंन्याप्रसरतवाच्च । एवं च समाप्रतं न तदधिपते राजव्यपदेशाथं-टीकाकठंवि-
रोषवचनमित्येव युक्तं भाति । ३. का० चू© ३।८।२८। ¢. का० सू० ४।२।४१। ५. ‹ सूतौ" इ्युक्तम् ।
परमविकलः श्लोको यश्षत्तिलके था ७क० ३० श्लो० २ उपलभ्यते । ६. का० पू ५४।५।४१।
७. का० सृ ३।८।५। ८. शा० स्.० ६।२।१५८२। €. "ध्रा उपवेशने" | शब्दादयः” पा० उण षू
८।६८। इति द्रव्यय भवति, अमागमष्टिवं च । रित््वान्डेप् । तया चोक्तम्--““स्याद् वेत्राघनमासन्दी
दरति ३।२४८ ] द्ममि० चि ० ।
माससाला ५.9
उपविश्यते एस्मिन्नासनम् । "“१कृत्ययुगोऽन्य्नापि च" युट् ¡ विदुः कथयन्ति |
विष्टपं सुवनं लोको जगत्-
चत्वारो जगति । `विष्टपन्त्यत्र विष्टपम्उ । मूतानि भवन्त्यस्माद्भवनम् । लोक्यते लोकः |
गच्छतीवयेवेशीलं जगत् । ““*दयुतिगमोदे च" क्विप् । गमो द्विर्वचनम् । अभ्यासमकारलोपः । ‹ ५ कवर्मघ्य
चवगः' गस्य जः 1 ज गम् जातम् । ^“ःपञ्चमो०' | दीधः । ^ऽयममनतनगमां कौ? पञ्चमलोपः।
दरात् अत् । “‹<घातोस्तोऽन्तः पानु्रन्धे" तो ऽन्तः । "वेलोपः । सिः । नपु'तकम् |
तस्य पतिनिनः ॥ ११२ ॥
तस्य सेवनस्य पति्जिनः कथ्यते | श्रनेकभवगहनन्यसनम्रापणदेतून् - कर्मारातीन् जयतीति
जिनः! ^ १०इणुनशजिक्ृषिभ्यो नक्” । विष्टपपतिः । लोकपतिः ! जगद्यति । इत्यादीनि जिनस्य पर्याय-
नामानिज्ञात्तव्यानि |
वर्षीयान् वृषभो ज्यायात् पुरुरायः प्रजापतिः |
एेश्वाङ्कः (कः) कारयपो ब्रह्मा गौतमो नाभिजोऽग्रजः ॥११४॥।
दवादश वृषभे । अतिशयेन ब्रद्धो चपीयान् } ^" ग्रियस्थिरक्किरोरवहुलगुसवृदधनेपदीध-
बरन्दारकाणां परस्यस्कवर्नदिगवर्भित्रवूदाविवरन्दाः" । व्रपेण श्महिं्ालद्णोपेतधमेण मातीति "°वुपभः।
"५ उश््रषिघ्रषरिभ्यां यण्वत्" ] आाभ्याममःः प्रत्ययो मवति स च यण्वत् । च्वमेषां मध्ये प्रकृष्टो
बद्धः प्रशव्यो वा ज्यायान्. 1 बद्धस्य ^" च ज्यः वृद्धशब्दस्य व्यादेशो भवति । प पालनपूरणयो
पृणाति पालयतीति पुरूः । ८५१'दपिधृष्रिभिदिखधिनृदिपृभ्य कुः” एभ्यः कुप्रत्ययो भवति ! अ्मस्मिन्नहनि
रद्य १६ । इदमोऽद्धवो दश्च परविधिः “सद्योऽदा १७ निपात्यन्ते'' इति वचनात् । ( यादौ भव आद्यः)
प्रजानाम् इन्द्रधर्शेन्द्रचक्रवत्यादीनां पत्तिः स्वामी प्रजापतिः । इपु इच्छायाम् । वाञ्ुयते लोकैः
णेषषवाकः, ८ । तथा चारै मदापुरशे-
“अङ्कनाञ्च तेदेकषुर्णां रससग्रहणे दणाम् ।
इदबारित्यभूदेवो जगतामभिसम्पतः ॥*
काश्यं क्षत्नियतेजः पातीति कादयपः । तथा च महापुराणे-
“काश्यमिद्युच्यते तेजः काठ्यपस्तस्य पालनात् 1”
वृ "दतीति ब्रह्मा 1
.१. का० सू० ४।५।९२] २. प स्तप प्रतिघाते" थम० को° च्ी< स्वा ° माप्य एवौपल^यते, न
ठ पारिनिषाठुपाे । ३. विशन्त्यत्रेति रामाश्रमः । विश्चन्स्यसमिन् जीवाजीवा रति टेमचन्टः । £ का? न्
४।४।४६८ । ८. का० सू० ३।३।१३ | £. कार सू ४।१।५५॥। ७५. काऽ भ< ४।१।६द =. कार द्
४।१।३०। ९, का० सऽ ४६१।३४।. वेलोपोऽपुक्तस्य" इति पूणं चन् | ६०. ॐ" उ: म्< २।५६
११. पा०सूज ९।४।१५७] १२. वृषेण मातीति विग्रहे घातोऽतुपरे कः ¡ नः दूतौ । व्दति घममुतमिति
विग्रहे ऋषिद्ठपिभ्यां यण्वत्'› रत्यभः | °वृपु सेचने" । १३. का०्उरसूर ३।१६ । ८४. ६०2० ५,
५५.फा० उ० सु० १।१९1 ९६. अत्र श्रयशन्दा न त्वयशोच्द्ः | तनादा नैव न्राय एति टन: प्रनिन्ाहि।
१७. कार स्९ २।६।३७ १८. दत्ताम् घ्रा ( रदापक्पणम् ) द्ररुतीति इद्यादु
प्रपाणमाई--'शनाच्चेति " सङ्गतिः ।
<
१०
१५
३०
५ > ्मरकीर्तिविरचित्तभाप्योपेता
"आरमनि मोचते क्ञाने व्रततं ताते च भरतराजस्य |
ब्रहेति गीः प्रगीता न चापरो विद्यते त्रदा
श्रतः परौ व्रह्मा नास्ति । गातमो गोत्रोज्यताराद् गोतमः । श्राप मदापुरयण--
धो; स्वगः स प्रकृष्टास्मा गोतमो ऽभिमतः सताम् ।
स ॒तस्पादागतो देवो गीतमश्रुतिमन्वभूत् ॥"'
नाभेर्जात नाभिजः । ्रग्रे जातो-ऽग्रजः । श्रदृशत्यात् }
४ ~ 0 (^~ ^~ रो १
सन्मतिमहति्घीरो महावीरोऽन्त्यक्राश्यपः |
५ 0. ९८
नाथान्वयौ वधमानो यत्तीथेमिह साम्प्रतम् ॥ ११५॥
सती समीचीना मतिर्यस्य स सन्मतिः । मदापुरणे-
'“तत्सन्देहे गते ताभ्यां चरणाभ्यां च भक्तितः
छस्ताचि सन्मत्तदेवो भाक्रीति समुद््टतः +"
८ महये पूज्यते इति मतिः ) ! मती पूना यस्व ख महतिः । विषिष्टम् दन््ाच्सम्भाविनीम्
दम् न्तरङ्ग समवसरणानन्तच्यलक्तणां लम सयादत्ते ठति वीरः । वीर दति नाम कस्माञ्जातम् !
जन्माभिपेक्रे चालधुशरीसदर्शनादाशङ्धितवतैरि्रस्य सामथ्यंख्यापनार्ये पादाद्करेन मेरुकचालनादि
वीरनाम कृतम् । मर्होश्वासौ वीरः महावीरः । तथा च वदतपरतिक्रमणमाप्ये--
“कुमारकलि श्ामलकीकीडायां क्रीडतः सङ्गमदेवेन वि मानप्वलनाद्धगवत्पो (्ो)दना्थं
महाफटाटोपोपेतं भयानकं सर्षरूपं विक्त्य क्षो वेष्टितः । भगर्वोप्तस्मान्मस्तकादिपादन्यासं
कृत्वा ब्रक्तादत्तीणेः । ततस्तेन मदावीरः इति नाम करत्तम् 1" अन्त्यं काश्यं तेजः पातीति आअन्त्यका
इयपः । ततः परस्तीथैकरो नास्ति । नायोऽन्वयो यत्य ख नाथान्वयः ।.तथा च--
(“चत्वारः पुरुषंशजा जिनव्रपा धमौदयस्ते पुन-
नँमिश्रीशुनिुत्रतौ दरिङ्ले वीरोऽथ नाथान्वये ॥
रोषा: सप्रदशाधिका जिनवरा इ्षबाङ्कवंशोद्धवाः
। प्रोयन्मोहविनाशनेकनिपुणाः सङ्कप्य सन्तु धिये ।|*
व समन्ताद् द्ध परमातिशयप्रातं मानं केवलक्नानं यघ्यासौ वर्धमानः
“्वष्टिमागुरिरल्लोपमवाप्योरुपसगेगोः ।
आपं चव हलन्तानां यथा वाचा निश्चा दिशा ॥”
इत्यवशब्दस्याकारलोपः । तथा ऋषिश्च प्रत्य्तवेदी--भगवतो हि गर्भावतारादौ पिरि
स्ादिविनिर्भितां विशिष्टां पूजां रल स्वघ्य च ऋदिग्रढवादिकं ट्छ वर्धमान इति नाम कृतम् । इद
ति £
ग्रस्मिन् पश्चमकालि यस्य तीथं यत्तीथंम् सास्परतम् ग्रघुना वतते ।
सर्वशनो वीतरागोऽहन् केवली यर्मचक्रमत् ।
तीथंङ्रस्तीथंकरस्तीथंकृदिव्यवाक्पतिः ॥ ११६ ॥
नव जिनेन्द्र । न्ना श्ववरोधने । नञा । स्वनः । कवं जानाति वे्तोति सर्वज्ञः । (श्रातो *नुषधः
गात्किः?° प्रत्ययः । "केर यण्वच योक्वजंम्' इति यण्वद् भावात् श्रलोपः । विशिष्टा ई तां धरति इतः श्रा
रागो यत्य च वीतसगः । यरिदननाप्रजोहनन (स्या) भावाच परिराततानन्तचवु्यस्वशूपः सन् इन्धनिर्भिता
१. का० सु० ४।३।४। का० सू ४।१।५।
ताससाला ५९
पतिशयवतीं पूजमहंतीति न् } घातिक्तयजमनन्तज्ञानादिचत॒षटयं विभूता यस्वेति वाऽहन् । त्रिकालं
केवलस्षानमस्त्यस्य केवली । जिनधमचक्रं सदलारयुक्त' तीथकदप्रे निराघारतया विहारकाले गगने गच्छेत्
सवेजीवदयासूचकं रतनमयमायुघविशेपं त्रिभि तद्वाऽनुभवतीति धमचक्रत् । तीथं द्वादशा शालं करोतीति
तीथङ्करः । तीथं करोतीति तीयं्ृत् 1 दिव्यवाचाम्पत्तिः दिव्यवाक्पतिः । तथा चोक्तम्:
““यत्सवोत्मदितं न वणंसदहित न स्पन्दितोठदरयं
नो बाञ्छाकछितं न दोषमदिनं न रेवासरुद्धक्रमम् ।
शान्तामषविष समं पशुगणंः संकरणितं कर्णिभि-
स्तद्रः सव विदः प्रनष्टविपदः पायादपूवं वचः ।
, चेर निवसनं पासश्चीरमम्बरसंशुकप् ।
धड़ वद्तरे 1 चिल्यते वस्यतेऽनेन चें चैलं च । निवसत्यनेन निवसनं, विवसनं, वस्नं च |
वस्यते एनेनाद्भं चासः। सान्तम् । चिनोति उपार्जयति सास्तां चीरम् , चीवरं च ¦ प्म्वते गच्छति शोभा-
मनेन श्रस्वरम् 1 उभयम् । श्रंशल् कारयति अंशुकम् । क्वे । कपटम् । आच्छादनम् । वलम् । पिचयः
पटः, पटम्, पटी । पोतः । प्रावरः | प्रावारः । संव्यानं च |
वस््राचन्तः दिगाययादिसंज्ञितो व्रूपमेशवरः ।
वल्रादयः व्परयाया शन्ते दिगादयो दिक्पर्थाया दौ यत्य तर्संक्नितो दृपसेद्वरः । बद्भादिकं
नाम अन्ते दिगादिकं नाम शआ्रादौ वथा--दिक्चेलः। दिग्वासाः 1 दिग्वसन । दिगम्बरः । दिगंशुकः ।
दिग्बल: । काष्टाचेल्लः । काष्ठानिवसनः । काष्ठावासाः । काष्टाचीरः । काष्टाम्दरः । काकः । काषए्ठावल्लः ।
क्कुप्चेलः । कछु व्निवसनः ! ककुन्वाखाः 1 ककुप्चीरः 1 ककुवम्बरः । कङुवंश्ुकः । कक्ुव्बल्रः । श्राशाचेलः
द्राशानिवसनः ! शआ्ाशावासाः। अशाचीरः। आशाम्बरः । त्राशांशुकः । श्राशावल्लः । दक्तेकन्याचेलः 1
. दक्कन्यावासाः । दद्तकन्याचीरः 1 द्तकन्याम्बरः । द्कन्य।शुकः ! दक्तकन्यावछ्लः । दरिच्चेलः । दरिनि-
वसनः । हरिदासः । हदरि्वोरः । दरिदम्बरः । हरिदंश्ुकः । दरिद्रः । इत्यादीनि बृपमेश्वरनामानि
ज्ातव्यानि ।
इुङ्मं रुधिरं र्तस्-
चयः कुद्कमे । काम्यते जनैः ऊुङ्कमम्? ! रुधिर् ्यावरणे । स्णद्धि रुधिरम् । “7 तिमिरपि-
, मन्दिधिरचिशुषिभ्यः किरः 1 रज्यतेऽनेन रक्तम्> 1
कस्तूरी गृगनामिजम् ॥ ११७ ॥
दो मृगमदे 1 के स्तूयते कर्त्री» । मृगनाभेर्जातम् स्गनाभिजम् । मृगनाभीजं
कूरं घनसारं च हिमं सेवेत पुण्यवान् |
कृपू सामथ्ये 1 कल्पते कपरः 1 "छृपेरूरप्रययः 1 “°नाम्बन्तयुखः > छपे” रोलः" रषनन.
परस्ययो नुमागपश्च 1 इति रामाश्रमः । ऊ कौतीति क्ीरस्वामी । २. का उ० १।२३। ३. तथा चन्
मेदिन्णम् ताऽ बर स्लोर ४६। “रक्तो दनुरक्त नील्यादि रचिते लो दिते जिद 1 व्लीयन्त दुःटद्मे तापर
प्राचोनामलके<खलि » । इति ! ४. के शिरसि स्तूयते मशस्तधायंस्वेन मन्यते इत्यपः । विक्ठति सगन्प्यम
स्या इति छ्ी° स्वार ! कस गतौ" कसति गच्छति गन्धो ऽन्या इति रामा दवञनिस्द्विन्य उर.
लचौ'" 1 पा< उ< ४1९०1 इत्यमरः 1! पएषोदरादित्वारट्, गारादित्वान्डीर् च ¡ ८. ^रिटरिम निपरिता
दिभ्य उरोत्लः इति का ॐउ० ३।६ £ नाम्यन्तयौधतुदिरर्सयोगु सुः" व्य &< ३१८; 1
\५. प९ सुऽ २।६।९७।
१. कुक्यते आदीयते कुङ्कुमम् । ङुङ् च्रादाने। “कुदङुकोनु न् च” नो° उ० दति उमनू
३,
1 ।
१०७
९५
१}
9
६० | श्रमरकीर्तिविरचितभाप्योपेता
सव्यम् । उणादयो दि वहुलम्, तेन~
'“"१युचिलरघृ्तिः कचिदप्रवृत्तिः कविदिभाषा कचिदन्यदेव |
विधेर्विधानं वहुधा समीक्ष्य चतुर्विधं वाहुटकं वदन्ति ।+
घनस्येव सारोऽस्य वनसारः । हि गती । दिनोतीति दिमत् । ^उद्न्धियुधिद्याधूटिम्यौ
मक्" । चन्द्रस॑क्ञः । सिताभ्रः । हिमवालुकः ।
समालम्भोऽद्धरागश्च प्रसाधन व्रिटेपनम् ॥ ११८ ॥
व्त्वारो रगे । सम्यक् प्रकारेणालभ्यते समालम्भः । श्रद्नस्य सगोऽङ्कसगः । प्रकथश
साध्यते मण्ड्वते प्रसाधनम् ! विलिप्यते विलेपनम् ।
भृपणाभरणं स्च्यम्-
चरथ श्राभरशे 1 तसि मुप श्रलद्रःरे ) भूप्यते मण्ड्यततेऽनेन भूपणम् । ग्रा समन्ताद् भ्रियते शभा
धार्यते ऽनेन श्राभरणम् । रोचते ख्च्यप् । श्रलद्भारः । परिष्कारः । मण्डनम् ।
माल्यं मालागुणघ्जः ।
चत्वारः पूुप्पमालाथाम् 1 मालैव माद्यम् । चातर्वर्ादित्वास्यर् । माल्ये धार्यते माला ।
ग्रथवा मां लान्ति पुष्याण्यत्र माला । ्ियाम् । गुरुतीति गुणः । शनाम्युपधध्रीकृगुां " कः” | सज्यते
खक् । ` त्वग्: दधरक्लगिति'" साधुः |
मेखला रसना काश्ची |
त्रयः काञ्च्याम् । मेदनस्य खं तत्य मां लातीति निरुक्तिः । मिनोति प्रक्षिपति कामिचित्तमिति
वा मेखला० । रखति शब्दं करोतीति रसना< । रस कान्तौ ( शब्दे ) सौत्रोऽयं धाः । श्रोरी शोमा
रचति( कायते )* वध्नातोति काचिः । छियामीः } काञ्च । तक्तकी } कलापः } करिूत्रम् 1 सरसनम् ।
शिन्ञिनी* ° च ।
[9
| हेमपयां यघ्रफम् ॥ ११६ ॥
हेमशन्दास्सूजशब्दे प्रयुज्यमाने मेखलापर्यायनामानि भवन्ति } देमसूत्म् । श्रणपदसून्् )
स्वर्ण॑सूचम् ] कनकच्म् । श्रेनसूचम् । काथनसूतरम् । दिरण्यदू्रम् । जातरूपतूत्रम् । शातकुम्भू्म् ।
दारकसू्रम् । कलधौतसूत्रम् । तपनीयसूत्रम् । कातस्वरसूत्रम् । इत्यादीनि ज्ञातव्यानि ।
श्रोणीविम्बं करीं मानस््भिव।हितम् ।
जयः पट्सूत्रे। श्रोण्याः कय्थाः विमं परच्छदकं श्रोणोविम्वम् । करय सूत्रयति वेटयतीति
१. साणसू. १।६३।१४९। श्रत कारिकाखूयेण पठितः । २. हिनोति गच्छतीं; । कपू रस्याशूत्प-
तनस्वमावात् । हन्ति श्रोष्ट्यमिति रामाश्रमः । ३. का० उ० १५५1 . श्रालम्यते विलिप्यते इव्यर्थः ।
४. का ०सू०४।२।५१। ६. काण्य्° ८।३।७३। ७. मखं गतिं लातीति पपोदरादित्वानमेललेति सयमाध्मः ]
म॒हः स्वलतीति दैमचन्द्रः । मीयते प्र्तिप्यते इति प्ती°स्वा ० । “मिजः खलस्चैच्च” २।२।१७] सर० क० । ,.
- ८. श्रश्नुते कटिम,्रश्नाति कामिचित्तं वेति रामाध्मदेमचन्द्रौ । ° तरो रश्च” इति यूर्शदेशश्च । ९ “काचि
दीतिवन्धनयो.' । “सवंधाठभ्य इन्" । १८. शिञ्जिनी नूपुरम् । मेखलापययि तत्पालोष्युक्तः । तदुक्तम्--
“भू पुरन्त॒ वलाकोरिः पादतः कटका्दे । मञ्जीरं दंसकं गिञ्ञिनी,--श्रसि० चि० ३।३३०।
नाममाला ६९
करटी सूत्रम् । माने भरमाणीभूतं सूचयतीति मानसूत्रम् । केचिद् रागं पठन्ति प्ट्सूच' च ।
सदिरां मयमेरेयं शीधु फादम्बरीमिराम् ॥ १२० ॥
प्रसन्नां वारुणीं हालां मधुवारां सुरां विदुः ।
एकादश मवे । मायत्यनया मदिरा । मपिष्टा च | सदतेऽनेन मदम् । यमिकदिगदां *
त्वतुपसगे । इरायां यरामसीमायाम् साधु एेरेयम् । शेरतेऽनेन शीधु; । “र शीडो धुक् । शीपो(घो)स्यिके ५
पठितत्वात् शीधुप्रकृतेःउ क इति व्याख्यत् । श्रथवा पीतेऽत्र जनः शेते शीधु; । उभयम् । तालव्यः ।
कुस्सितं नीलमम्बरं यस्य स कद्म्बरो बलदेवः । तध्येयं प्रिया कादम्बरी । कुत्सितमम्बते वायनया वा
कादम्बरी । एत्ति परिभ्राम्यत्यनया इरा 1 यात्मा प्रसीदप्यनया प्रसन्ना । यदन्तः । वरुणत्यापत्यं वारुणी 1
जदति लजञ्जामनया हाला । स्त्रियाम् 1 मधु वासयतीति मधघुचास । सुवति सूते भवं खुरा। तथा
दविसन्धानमाप्ये--"“चअतिग्ररापमावेन समुद्रमथनान्निष्कासिता सुरैः सुरा 1” १५
“लदमीकोस्तुभपारिजातकसुय घन्वन्तरिश्वन्द्रमा
गावः कामदुवाः सुरेश्वरगजो रम्भादिरेवाङ्गना ॥
अश्वः सप्तमुखः सुधा हरिधनुः शष्ो विपं चाम्बुधे
रत्तानीति चतुदश प्रतिदिनं कुन्तु ते सङ्कटम् ॥
। विदुः कथयन्ति 1 मधुः । श्रावः 1 परिप्लुता । स्वादुरसा । शुण्डा" । गन्धोत्तमा । माधवकः । १५.
माघवः । कल्यं, कल्या । कर्यं, कदया । परिश्रुत् । तान्तं ल्ियाम् । तालव्यदन्त्यः । ्हारहूरं । कापि-
शायनम् । मृद्दीकम् । माध्वीकम् ।
शुण्डासवः-
मय विशेषौ दौ । सुन्व(न)न्ति वृति गच्छुन््यनया शुण्य (न्य) ते पातुमभिगम्यते वा शुण्डा" ।
लीचोः । .श्युर्डः । ्ासूते जनयति मदम् आसवः । पुंसि । २०
तद्विधायी शण्डो गेत मध्पः ॥ १२१ ॥
द्रौ कल्यपालके 1 शुण्डायां मये भवः शौरडः । सयं पिवति पाययतीति बा मद्यपः ।
सक्तोऽक्षद्यूतपानेपु विचित्रा रब्दपद्धतिः |
जयो मयासक्ते 1 शरक्तेपु यतेषु सक्तः ध्यकतसत्तः । यूतसक्तः । पानेषु सक्तः पानसक्तः। चिचिव्रा नाना
पकाय शब्दानां पद्धतिः भ्रेणि; शब्दपद्धतिवतते । श्रचशौण्डः । प्रधूतः । श्यत्तकितवः | “ °वपत २५
शेण्डेः" । व्याल, भ्रधि, पट्, पण्डित, कुशल, चपल, निपुण, स्वेव्यादि शौण्डादिराकृतिगणः ।
(क
सर्पिहे यद्धवीनान्यं-
जियः सर्पिषि । सप्त धातवः सप॑न्त्यनेन सान्तं सपः । क्लीवे । ““<धर्चिशुचिरचिदुरपि-
छादिहर्दिभ्य इसिः" । सम्ल् गतौ । ह्यो गोदोदस्य विकारो हैयङ्गवीनम् । इदं दयद्गवीनं घक्तनदिन-
गोदोरे सञञत्तम् । उक्तं च-- ३०
"< तत्त हैयङ्कवीनं यद् द्योगोदोदोद्धवं घृतम् 1"
१.का० सू ४।२।१३। २. का उ० सू २।३३। ३. सीधुः
र्
"शुण्डा हाला हारहूर प्रसन्ना वारुणी सुरा ।*' छभिर चिर ३।५६५८} &. दुपष्यारष्टो सदनाय
पानमदस्यानमपि । तदुक्तम्-“शुण्डा दाला हास्दूरम” श्रनि < चि ०३१५९७1 'ष्ुप्या दानरटग्यनम
प्मभिऽ चि° ३।५७९} ६. शुण्डायां पदिरापानागारे नव रति रामाधमः । ^टुप्या मद्धि (स्त्यम्दनि उ
त्नादिसखादण्ः इति टेमचन्द्रः । ७. पाणस २।९।४०1 ८. कान्डन्स्र साथ | दस्र ०१२२
१1
^
अमरकीरतिविरचितभाप्योपेता
तथा चाशाधरमष्भिपे-
“आयुः पीयृपङ्ण्डैः स्पृतिमणिखनिभिः गयुपीवदिल्कन्दे-
मभासध्यान्ुवराैर्वरटतरथि्नं त्ररल्नाधिदवं
निष्त्तत्रोणपेयप्रचुरमधुरिमसेदधूमो -पि येर्पा
५ कुर्म दरैयद्कवीनंः स्नपनमपनय ध्वान्तभानोर्जिनस्य ॥"
वीयते क्तिप्यते पित्तमनेनाञ्यम् । तथा नीरस्वामिनि--श्थ्रा श्यञ्चनीयमाल्यम्"।
टूवाद्न्जेः घ्ायाम्'' क्यप् । धृतम् । श्राधारः । खु्यम् ! याञ्वम् । दविः ।
दुगं क्षीराऽग्रतं पयः ॥१२२॥
चत्वारो दुग्धे । दुद प्रपूरणे । दृयते दुग्धम् । धस्त श्रदने । तौत्रोऽ्यम् । घस्यते क्षीरम् ।
१० “घते: किच" दरमात्रः । उगमदनजनेत्युपधालोपः । “ध्रघोदैष्व्चिगं प्रथमः'' कः | “"शाविवहि-
घनां च'' पत्वम् । क्पूर्योगे क्षः । “न्यज्ननमश्व ००” । उणादौ कतिगु चण हिखावाम्। करोतीति
क्षीरम् । ““दीरोोरगमीरगम्भीय” एतै ईरपलयान्ता निपाते} न म्रियतेऽनेन श्र्तम्।
द्रजगमरकारितवात् । पीयते वा सरसत्वतत् पद्रः । श्रमुन् । ऊधस्यम् । त्तन्यम् । पीयुं, पवू च ।
धि न्म धितं ५ (4 ~. « (~न 1
उद्ाशधन्माधत तक कारय पवद गुरूः |
१५ चल्वारस्तक्रो । उदकेन शृवयति वर्धते उद्भ्ित् | तान्तस्तालम्यमध्वः ¡ मथ्यते (घ्म)
मथितं घोलं च । तथति द्रवं गच्छति तक्रम् । उभयम् 1 तक्रं विभागभिन्रं तु केवलं मथितं
स्मृतम्?" इति धन्वन्तरिः । कलश्यां यर्गवां भवं क्राल्रेयं पिवेत् गुखः । तत्कालीनं गरिष्ठम् |
श्ररिषम् । दण्डाहतम् ।
प्रायो वयो दशनेहा पूर्ण" यौवनकं विदुः ॥ १२३ ॥
२० तारण्यं यौवनं च
शष्टौ तारुण्ये । प्रक्थैस परलोकमेयनेन प्रायः? ° पुंि 1 सन्तोऽपि प्रायस् ] ववतं
वयः^ +] दशति चु्ति स्त्रीखखं दृशा ¡ न ईहते ^२ चेते श्रनैटा। “नेहशो-प्रमोऽङ्धिरसः° 3" एतेऽसन्
म्र्ययान्ता निपात्यन्ते । ईह चेष्टायाम् 1 पूरी श्रप्वायने दिवादौ च्रात्मनेषदी ! श्रदन्तानां प्राक् तृ) तीयः
परद्पेषदी । पूरयते कथित् पूरयति कश्चित् । इन् चुराव्रपेक्या वा । “ च्कारित०” कारितलौपः । उमवया
पूरि वातम् | पूयते स प्रृणंः। निष्ठातः । “*“दान्तश्नान्तपृरणद प्तसष्टलुत्रकताश्चेनन्ताः'? इत्यनेन
पर्णति निपातः } चुनो मावो यौवनम् । स्वार्थं कः । यौवनकम् । १६युवादित्वाद्धावेऽणु । बद्धौ । तर्णस्य
१. प्रा० तू ३।१।१०९ । वातिकम् । २. पा० उ०्सू० ५३२ 1 ३. काण तू
२।६।४२ । ४. का० नूर ३।८।९ । ५. का० सृ० ३।८।२७ 1 ६- का० रू० पूर सू? २५६ ।
७. "व्यज्ञनमस्वर परं वणु नयेत्" ऋ° सु० १।६।२१॥ ८. का० उः सु० ३।४६। ९. चत्र
प्रायादयोऽनेदोऽन्ताश्वत्वारो वयोवाचकाः } पृरणपूर्वका एते चत्वारो यौवनकतारुण्ययौवनानीति चरवः ।
एवं च सत्त ताद्प्ये इति वक्तुं युक्तम् । १०. प्रकर्पख शरीस्स्य क्रमेणायते गच्छति इति द° च० । १४.
शरीरल्य क्रमेण वियन्ति वयः, बाल्यादीनि दश्यन्ते दशा इति हेमः । १२. नादन्ति नागच्छति नादन्यते
नागम्यते वेति रामाश्रमः । “नज्यादन एदं च” इति साधुः । १३. का० उ० सू ८।१८। १५. कार सू”
२।६]४२॥ ६५. का° त° ८।६।१००। १६. टै° शु ७¡ १1६७1 युबादेरण इति सुत्रम् ।
नेाममारा ६३
भावस्तारुण्यम् | भावाथ यश् । यूनो भावो यौवनम् 1
अन्त्यो चा्दरौनः स्थविरो मतः
त्रयो बद्धे । अन्तं भवोऽत्त्यः ! वद्धे नियुक्तो बाद्धौनः? \ तिष्टतीति स्थविरः? ! रति-
भद्धास्मतः कथितः । प्रवयाः 1 यातयाम: । दशमीस्थः । जरन् । जरठः । जीरः | वृद्धः
वंशोऽन्वयोऽन्ववायः स्यादघ्रायः संततिः इप् ॥ १२४ ॥
षड् वंशे उश्यते काम्यते जनेन वंशःउ ! पुःसि। श्न्वयते सन्ततिरत्ान्वयः४ । अन्ववैत्य-
पत्यमत्रास्ववायः । आम्नायते श्राञ्चायः"^ । सम् सम्यक् प्रकारेण तनोति विस्तारयतीति सन्तत्तिः६ ।
सन्तननं वा सन्ततिः 1 क्रु ( को ) लति सर्वे भवत्यत्र कुलम् । उभयम् । गोरम् । श्रभिजनः
ओधो वगंरच सन्तानः
चयः समूह ( वंशस्यावान्तसखगमेदे ) । ओ्रोद्यते श्रोघः° । वृज्यते विजातीयेन पथक् क्रियते
वभः } सन्तन्यते सन्तानः! विकरः | निकायः | निवहः | विरः । व्रजः । पुद्धः 1 समूहः सञ्चयः ।
सदयः । समुदायः । साथः । यूथः । निङ्करम्बः । केदम्बम् । पूगः । राशिः । चयः] समवायः । मण्डलम् |
चनेवालम् । जालम् । स्तोमः । ब्यृहः |
काव्यमेव कविरसिथितिः।
हो काम्ये । क्वेभावः कार्यम् । तथा च यशस्तिलक्र--
'दुजनानां< बिनोदाय बुधानां मतिजन्मने ।
मध्यस्थानां न सोनाय मन्ये काम्यमिदम्मवेत् ॥"'
कवीनां स्थितिः कविस्थितिः।
पर्चिवर्मः प्रारभ्यते श्रीमदमसकीरिना--
ठंसो मरालशथक्राज्गः
चयो हंसे । विसं हन्ति खण्डयति, चारुगत्या हन्ति गच्छति वा हंसः । हन्तेः" सः | मर
मल कमलमण्डिततडागमियति गन्डतीति मसलः । चक्रमद्वति चक्राण्य्ानि बा यस्य चक्राद्धः।
मानसौकाः । सवेतन्छुदः ।
ह॑सबाहः सनातनः ।। १२४॥
हेसशब्दाद् वादशब्दे प्रयुज्यमाने ब्रह्मणो नामानि भवन्ति 1 हंसंवाहः । मसलबादः । च ङ्ध
वाहः ! इत्यादीनि ज्ञातव्यानि ।
मुस वर्हिणः केकी शिखी प्रा्पिकस्तथा ॥
नीरुकण्डः करूापी च रिखण्डी--
टो मचूरे । मद्यं रोति मयूरः । मीनाति बा ऽहन् मचूरः । उणाद) । मील. दिसायाम् | मयते
९. श्रनान्यसरमारं नोपलन्धम् । २. योचनमतिन्म्य तिष्टतोति टै च० | "असिरदिसिरेन्यदि
पा०उ० १।५३ इति किरपत्ययो उगागमो दस्वस्वं च 1 ३..वस कान्तौ" प्रम् । तुम् । उन्पते दन्य “नेनेति
स्वामी । ४. छ्मन्वपेति न्वीयते 1 श्मन्वयः } "रु गता" 1 पच् 1 रत्यन्यन्र ^ भच नरन् शना
कुल श्यागमे उपदेशे ' इति हैमः 1३।१।११। ६. सन्तन्यते सम्यग्वित्तारयतीति रामाधमः | सप्ला ङण््)
उह वित । न्यङ्स्वादित्वाद् दस्यवः! <.ष्यार १ रलोऽ ५९. कार डर भुन ५" ददर दष्-
निमत्तिकत्यिकपेभ्यः खः" । इति |
१५
१५५
१५
६४ अमरकोर्विविरवितभाप्ययेता
इति मवूरः 1 “मयते” ररौ" ला" । वदृमल्यास्ति वर्दी | (कलय्वर्हान्यापमिनयच" | कैका वाणो श्रल्यन्
केकी । रिान्तत्यस्न शिखो । व्रा्रपि वपक्रिलि प्रवुक्तः ग्राद्रपिक्रः। नीलं कष्टे यल म नोलक्रगृढः।
कलापोःल्यत्य कलापी । एिवण्डोऽह्यस्य शिरडी । मचलाकी | सर्पाणनः | रिवावल्लः | गवाम.
कण्टः । चन्द्रकी । शुक्रापद्गः | ४
तत्पतिगुहः ॥ १२६ ॥
त्य परतिप्तत्पतिगंहः कातिकयः । मवरणाब्दात् पतिशन्य गरवृज्यमनि कार्विकरयपर्वायनातानि
भवन्ति । मवृरपतिः । वर्िणपतिः । कश्रिपर्तिः । शिखिपतिः । प्रत्रपिक्रपतिः । नीलक्षण्टपतिः । कलपि-
पतिः । शिखण्डिपतिः । इत्यादीनि स्नतव्यानि |
वरटा वारछ दस्ा-
चये दंठभायायाम् } व् विद्रिष्टमटति गच्छति चरखा 1 वरलध्य भर्या घार्ली । घवार्थऽ्यि ।
वरला च । हन्तीति हंसा }
कोक ईहामृगो वृकः |
ग्रजादिकं कोकते श्रादत्ते कोकः । इदा मूगेष्व्य ईदाख्गः । इदयं मुगवते वा गददातृगः । कुक
तरक दानि । वक्ते चुक्रः । श्ररण्यस्वा |
हरिणो मृग प्रयतः-
तरयो मुने | गीतेन द्वियते हरिणः । व्यप्रैमृश्यते खगः । पर्ति विंचति मूतेण प्रपतः"।
तान्तोऽपि पृषत् । एणः । कुरय्तः । कुरद्ुभः । सारङ्गः छण्यः। रिर्य: ऋष्यश्च । चसः। न्यदधुः । वात-
प्रमी । शम्बरः । शव्रलः । कृष्करः । कौलषछारोऽपि ।
तदङ्क दवरक्रः ॥ १२७ ॥
हरिणपर्यायदद्कपययि प्रवुल्वमाने चन्द्रस्य नामानि मवन्ति | दरिणाङ्कः । मृगाः । पृषताद्भः |
दव्यादीनि त्रातव्यानि ।
क हिविप न क क, क ६।
पल्गोऽहिविपधरो ठिदानो जङ्गमः ॥
त गौ [न (6
नागोरगौ फणी सपः-
नव स्ये । पद्ध न गच्छुतीति पन्नगः: । नभ्रासुनणदित्वस्योपलतत्यात् । ग्र॑दत्य ( तेऽ )
हिः । “अहि ्कन्प्योर्नलोष्ध" नलोपः । विधं धरति विपधरः । लिलेदेति ऊेलिदानः < 1 सुजाम्वां
गच्छति ˆ भुजद्धमः। न गच्छतोति › °नागः। उरसा गच्छतील्युरणः । “१ १उरो विहायो छगविौ च ।
उरो विदायसो्पपद्यो्गमरश्च सत्तायां खौ भवत्ति तयोश्च उरविहौ वथातंद्यं भवतः 1 कराऽ्यत्व फणी ।
१. का० उ० तु० ६।४० ¡ २. पा० ५।२।१२२ वारतिकम्--“फलवर्टाभ्यामिनच”” । ३; ईदा
महताल्यासेन मृग्यते श्राखदीक्रियते इत्यन्यत्र । %. वक॑तेजादिकमादतते, व्रणोति वा चरकः । ‰. रामाश्र-
मस्तु परता बिन्दवो चिन्टुखटशलचणान्यल्य पृष्तः । शरश श्राच्च् इत्याद । पृपतौ व्रिनटुचित्र दति
क्तो° ता० । £. पचे पतितं यया व्वत्तया गच्छतीति रमाश्रनः ] स्वेपन्नयोरिति वार्तिक्रन डः) ७. का
ड०तृ ०४1४] क्रि्रत्ययो नलोपश्च । द्रिं गती । च्रंदति वेगेन गच्छति । ८. भृभ्ं लेदीव्येव॑शीलो लेलिद्यानः
लिदरयद्ललगन्तात्-्तच्छील्यवयोवचनग्रक्तिि चानय” पाण सरू० ३।२।१२६। दति चानल। ९. शतेन
कौटिल्येन गच्छति, जुन इव गच्छति वेत्यन्यत्र | “गमश्च का० सू० ८।३।८५। इतिं! “भ्विह
लङ्गाश्च" कार चू ८1३४८) इति खचि) ड च, एवद्गमः, यवङ्गं इति । १२. नने पर्व॑ते भवो नागः।
स्रयवा न गच्छतीत्यगः, न गः, नाय दव्यन्यत्र } १९. का० स्० ४।२।४६]
नाससाला , ६५
सपति गच्छति सपः । पृदाकुः । मुजग: 1 ग्रासीविपुः । चक्री । व्यालः । -सरीसपः । कुण्डली । गृटपात् 2
दविरसनः । चक्षुःश्रवाः । काकोदरः । दर्वौकरः । दीषपृष्ठः । दन्दशुकः । विलेशय: । भोगी । जिह्मसः
पवनाशनः । गोकणः । कुम्भीनसः । कञ्चुकी । राजसप्ः । युजङ्गुखक् । दकृशतिः |
तद्ररी विनतात्मजः ॥ १२७ ॥
तस्य पन्नगस्य वेरी श्रुः विनतात्मजः गरुडः । पन्नगवैरी । श्रहिरिपः विपधररारात्तिः ।
लेलिहानरिषुः । सृजङ्गणघरुः । नागद्धिर् 1 सुजङ्गसपलनः । फणिद्विर् । सरपंहत् । सपृ्रेपी । इत्यादीनि
गरुडनामानि स्युः |
= 4 ~?
५
सुपर्णो गर्डस्तार्या गरुत्मान् शनीश्वर; ।
च { घेनते [क
इन्द्रनिन्मन्त्रपूतारसा वैनतेयो पिपाद्चयः ॥ १२८ ॥
नव गरड | एोभनं स्वश मयं परमस्य सुपः । तथा च--“ुपर्णा + देमपचतत्वात् }" डीय ९८
विद्यायसा गतो । गस्पपूवैः । गरद्धिः पर्तेडयते गरुडः
^ वरणगमो गवेन्द्रादौ सिह वण॑बिपर्ययः ।
पोडश्चादो विकारस्तु बणेनाशः प्रपोद्रे ।'
इत्यनेन श्लोकेन गस्त॒शन्दस्य तकारस्य लोपः \ लत्वे गरलः । गसट्श्च । तृश्नस्वापत्यं ताक््यंः ।
गरतः प्ताः सन्त्यस्य गरुत्मान् । शकुनीनां विहङ्कानामीदवरः स्वामी शङनीदवरः । इनदरं जितवान्
दृन्द्रजित् । मन्तरेण पूतः पवित्र आत्मा यस्य स मन्ब्रपूतात्मा । विनताया श्रपत्यं वैनतेयः । विमं ट
स्यतीति विषक्चयः । काद्यपनन्द्नः | विष्मुरथः । पचचगाशनः । नागान्तकः
खमिन्दरियं हषीकं च भो ( सो ) तोऽक्षं करणं विदुः ।
प्रडिन्धिये । स्वरग॑मो्ौ खनति विदारयतीति खम् । टन््रस्यात्मनो लिङ्गमिन्ियम्
हष्यति र्थे प्राप्नोति विपये शब्द्लशंरूपरस्गन्येषु दृपीकम् । शंणौत्यनेन सान्तम्. श्रोतः" । २,
तालव्यादिः । परदंणोति चिप्रयं व्याप्नोति श्रक्षम् । त्रियते मनोऽनेन विप्येु करणम् 1 शवं
[यिपयि] । कग्बलम्
पुण्य भाग्यच सकृत मागधय च सत्कृतम् ॥१२६॥
ञ्च पुण्ये । पुरु शौमे । पुणत्ति शोभते पवते वा “पुरयम् । ^ <पर्जन्यपुण्ये" । भगस्यैदवरया-
देरिदं [कारणम् | भागम् । मागमेव माग्यम् 1 "“मागाय्च" } सुष्टु च्यते खुद्छततम् । २५
4८" पेन्येस्य समग्रस्य धमेस्य यञ्चः प्रियः ।
यराग्यस्याश्र मोक्षस्य पण्णां मग इति स्छ्त्तिः॥
१. ्ी० स्वा० भा० {१।१।२९॥। २. शा० सृऽ २।२।१७२ । शत्र कारिक्ास्पक पटितः।
३. खन्यते; ठत्तदिद्धियाधिष्ठानस्य खाततदश्तत्वदर्शनात्, खम् । "खनु श्वदास्ण* । दप्रत्यय टन्यन्यष्र।
ष. रन्द्रियमिन््रलिङ्कुमित्यादिना घच् । घस्येयः । ५. तालव्यश्नोतरशशब्दः करें न्दियवाचवः । दयग्र
दन्दरियवाची, सोभ पद्धितव्यः। तद्क्तम्--टपीकमक्तं कस्णं सोतः व्यं व्रिषयीन्धियम्' ध्र नि
सोत इन्धिये निग्नगासये ;"' दत्यपरः ३।३।२३३ ६. नात्रान्यल्यरमाररप्रलन्यम् | वविन्ममायःन-
प्रकारस्तु--कमिति सुलार्थकमव्ययम् , तस्य बलं साधनमिन्ियमिति । &. एुखतीति एर | श्या एन
कमसिि | रगुपधेति कः | पुरमटति पुण्यम् | "तदत्ति" । पार सू ५।१६।९३ ! टति यट ! ननि
पयते वेयन्यन्न । ८. का^ उर सूर ३।४1 ९. लोकोऽ विष्युपराद्स्वलनोतिलिन्ितः पयर ज
सी° स्वा० भाष्ये ११।१३।
१०
१५
९)
^<
६६ अमरकीर्तिविरचितमाप्योपेता
भगस्येदं भासं भागमेव भागधेयम् । ° नामशूपमागेम्यो वेयः”१ । सत्समीनीनं निथते ( एम )
सच्छतम् ।
अधरमंह्च दुं पाप्मा पपं च किन्विपम् ।
वृजिनं कलिलं दनो दुष्कृतम्
दश पापे । न जाति प्रारिनम् श्रध? । चरंति गच्छति नस्कादिकमनेन श्रः । ठान्त ।
दुरितम्? । दुर् सोच्रोऽयं धाठः । पाति सुगतेर्वास्यति पाप्मा ॥पुःषि । 'सर्वधाम्यो मन् 1" पाति घुग,
घासयति पापम् । ““"ातेः पः" । निन्रत्वेन कल्यते शू, फिरति सङ्गतिं वा कफिंल्विषम्.। ^किलिवपा"
व्यथिपौ” एतौ यिपपरत्ययान्तो निपात्येते । त्रज्यतेऽपनीयतेऽनेन वरजिनम्९ । कलयति कलिलम्” ।
“कलेरिलः"' । एति गच्छति [खलम्] श्रनेन पनः ¡ सान्तम् । दुच्यते स्म दुष्छृतम् । तमः । क्लम् ।
कल्मपम् । शुभम् 1 प्रतिकिद्म् 1 क्कम् । किण्वम् 1 मलः । श्ननेका्थं ।
तजयी जिनः | १३० ॥
तस्य पापस्य जय) तज्ज यी | ग्रघरजयी । दुरितजयी , पापजयी । इल्यादीनि जिनस्य नामानि.मवन्ति।
सदनं सद्र भवनं धिष्ण्यं वेदमाथ मन्दिरम् |
गेहं निकेतनागारं निशान्तं निदरतं गदम् ॥ १३२॥
वसत्यावसथावासं स्थानं धामास्पदं पदम् ।
निकायं निरयं पस्त्यं शरणं विदुरालयम् ।॥ १३३ ॥
चतुर्विशति दे) जनाः सीदन्द्यत्र सदनम् । करीव । सीदन्ति खुं गच्छन्त्यत्र सद्म } व॑
धादभ्यो< मन्"! प्रायेण । भवति भ्रूतान्यत्र भवनम् । धिप शब्दे । देपे्टि शब्दं करोत्यत्र धिष्एयम्।
८८°पिे््य॑कू» प्रत्ययो भवति । विशन्तयत्र वेदम । नान्तम् । मान्ति जना श्रत मन्दिस्म्*° । छी- `
छ्ोवे । मन्दिर । गेदः सौत्रो निवारणग्रहयोः । गदति शीतवातातपादिकं निवारयतीति गदम् । गाति
वा गेदम् । ^गेदे १ त्वक्" } सुखं निकरितन्ति जानन्त्यत्र निकेतनम् । ग्रङ्गनित गच्छन्त्य श्रागारम् ` २ ।
रगारं च । निशाम्यन्त्यत्र निशान्तम्? 3 । नि त्रियते श्राच्छाचते निन्रृतम् । य्द्खाति नरेणोपार्जितं धनं
गदम् । वसनं वसतिः । श्रावसन्तयत्र जना श्रावसथम् । श्रा समन्तादुप्वतेभ्त्रावासः । स्थीयते जनेनानर
स्थलम् | दधाति घनादि धाम । नान्तम् 1 च्रदन्तं च धामम् । क्वे । श्रास्स (प) यतेऽजास्पद्म्१४। पयते
गम्यते पदम्! निचीयतेऽत) निकायः । “१५यारीरनिवाखयौः कश्चादेः” घन् । निलीयते श्राश्िप्यते (श्रत)
निलयम् 1 परिः सौत्रो निवासे ! जनाः पन्ति वसन्त्यत्र पस्त्यम् ६ । वत्तौ वाते खाधु वस्त्यम् ¡ वल्तौ
१. पा० सऽ ५।४।३५ [वार्तिकम् । २. श्ङ्पते गच्छति दान।दिनाऽधम् । “्रवि गता" }
पचाद्यच् । श्रागमशास््स्यानित्यत्वान्न चम् । दे. दुटमितं गमनमनेनेति रामाश्रमः । ४. काउ मू
२।५५॥ ५ “किच्िपराव्यथिपौ? का० उ० सू० १।२२। ६. धरनी वने 1” “वृजेः किच्चेतीनच् । श्रज्यते
वृजिनमिव्यपि । ७. कलयति जनयति दुःखमिति शेषः । € का० उ° सू० ४२८ । < कार उश्पूर
३६० । ६०. (तिमिदधिमदिमन्दि चन्दिविधिरुचिथुप्रिभ्यः किरः” का० उ० सु° १।२३। १६१. का० घु
४।२।६०। इति निदेशाद् गेद इति निपातः। १२. श्रा ङ्कति श्ङ्गयते वाञ्च बाहुलक ्यारप्रत्ययः । गि
गता” श्मा्ू्ः । नलोपश्च । १३. निशाया ग्रन्तोजतरेत्यन्यत्र । निशायाम् अम्यते गम्यते स्मेति राता- |,
श्रमः । श्रम गतौ" क्तः । १४. शच्रास्यद् प्रतिष्ठायाम्" पा० सू ६।१।१४६। इति युट् । १५ काण्व
-४।५।३५। १६. च्रपस्त्यायन्ति सद्यीमवन्त्यत्र पल्यम् । "त्ये शा्दखस्घयोः" ।
नासमाल ६७
वासे साधु "वस्त्यमिति श्रीभौजः । शीयते दस्यते शीताचयतर शरणम् । आलीयते जनेनात्राज्ञयः । पुंसि ।
विवुः फथयन्ति । पुरम् कुलम् ! संस्त्यायः ।
खेयं खातं च परिखा
त्रयः परिखायाम् । खनु मवदारणे ¡ खन् । खन्यते खेयम् । '्रात्यनोस्वि* यप्रत्ययौ
नकास्स्येकारः । “अवण्डइवं ए" परवश वणंयोरेकारः । खन्यते [स्म] खातम् । परिखायते परिखा ।
वप्र स्पाद्ध.रुङइमम् |
दरौ प्राकारे । शुल्कादिकं वपन्त्यत्र वपम । धूल्याः कुदटिमं धूलिकुद्िमम् । वदभूमिकम् ।
भूलिकुटिमम् ।
प्राकारः परिधिः सारः
त्रयो दुर्ग । प्रङर्बन्ति तिति प्राकारः४ । श्रकतैरि च कारके संज्ञायाम्” षन् । परि
समन्ताद् धीयते परिधिः९ । इयति तनूकरोति स्वनगरप्व॑तं शालं सां च ।
प्रतो गोपुराकृतिः | १३४ ॥
दौ .विशिखायाम् । प्रविशन् जनः प्रतोल्यते परिमीयतेऽत्र प्रतोली ! गोप्यते र्यते गोपुर
तस्याकृतिः गोपुखयट्ृतिःः ,
| परास्ादसोधहम्याणि
प्रयः सोर | प्रासादश्च सौधं च हम्यं च प्रासादसौ हर्म्याणि । प्रसीदन्त्यस्िनयनमनंपीति
साद्; | शरकर्तरि ^च कारके संज्ञायाम् । सुधायां लिप्तायां मवं ^°सौधम् । चन्द्रकरान् हरति
दम्यंम् " । ॥
निन्यृहो मत्तवारणः ।
द श्रपाश्रये | निन्यू'्यते निव्य॑दः । मत्ताः प्रमादिनः पतन्तो वार्॑न्तेऽनेन मत्तवारण: ।
वातायनं मताटस्वम्
दरौ गवात्ते ! वातस्यायनं मार्गो वातायनम् । उभयम् । मततमभीषएम् भाटम्बम् मतालम्पम् ।
जालकम् । जालम् ।
आदम्न्यसुखमासनम् ॥ १२५ ॥
-राशापवषम्मे दौ । श्रालग्ब्यस्य श्रवलम्बनस्य सुखम् श्रालस्व्यसुखम् । सुखेनाव्यते शासनम् ।
समः सवर्णः सन्ञातिः सरक्षः सदशः सदर ।
तल्यः सधर्मरूपशच तु्छा कक्षोपमा विधा ॥ १३६॥
|
१. यद्यपि मूल्ञे वस्त्यशब्दो नास्ति, तथापि पठमेदात् "“निशान्तवर्व्यरदनम'' २।२।५।
इत्यमरे बल््यशब्दपाटात् टीकाकृता तदपि विष्दीतम् । २. काऽ सु ४२।१२। ३. कार न्= {।२।२1
४. प्क्नियते इति कर्मणि घन् । इति रामाश्रमः । ५. कार सु० ८५९ ६ पर्ति पीयते वद्ट्य
नगरमनेनेति रामाश्रमः 1 ७. दन्त्यपारे तु सल्यते सालः । "'स्ल गती" ! घन.1 ८ पुरदारन्द् यापु
९।
भररचितम् ¦ तस्पाकृतिरिवाकृविर्यस्यास्तत्सट शीत्यथंः । €. कार तुर ८।।४। ६८. युध्य तिः स)
शेपे <ण । १९१. रति मनांसि हम्य॑मित्यन्यत्न । प्राखादस्ताघटम्पासामत्रादिरपेोापाद्ःनम् । पर चनम
क #ै रट दम्ष्+
न चिस्मत्तस्यः । तदुक्तम्-“म्यांदि धनिनां वासः प्रासादो देवदडखान् । नपाल
२।२।१५। इत्यमरः |
५
१५
६५
५
२५
१०
१५
६८ श्रमरकीर्तिविरचित्तभाप्योपेत्ता
+एकाद्ग समाने । समानं मार्तातिः समः | समानः सदो वर्णाभ्धय सवः | दमाना
श्ातिः शरस्य सक्ञातिः । समान दव दश्यते - ख्टक्षः । ^ ग्तमानान्ययोध्ः' सर व्रध्यवः | शस्व च
परत्वम् । "पद: कस्ते" परस्य कत्वम् । "कप्य ^ सः" । समान दव दृश्यते सदत; । “7 समानान्ययोश्र
रक्ध्रत्ययः । श्रमात्रः । कानुन्धत्वादृशुनिधेधः । टानुवन्यत्वानेदादौ पच्यते । टर् “ट दति समानल्
सभावः । समान इव दश्यते सक् । “ “समनान्ययोश्च' कष् । इलया तम्मित्तसुस्यः | समनो
धर्मा यस्य सधर्मः । समानं च्पं यव्य स सरूपः । “९ सपनामगोचस्यानवर्णवगौववदयु” दति
समानस्य पादशः । तोलनं तुल्ला । “" तोलेदच" श्रट््त्ययः। श्रक्रारव्याकारश्च । कपरति कक्ना।
उपमा | विधा । प्ररव्यः | प्रकाशः | प्रतिमः । स्निभः | प्रकारः ।
विन्मान्यो विद्मानद्व गुरुस्थानाम्बुजाननाः ।
सिंहादीनि च पयाययुपमानेष योजयेत् ॥ १३५७ ॥
योजयेत् चोय्येत् । पर्यायं विरेप्रयम उपमनेपु । वित्वमः । विल्छवर्णंः । वित्र
न्नातिः । वित्छटक्; । वित्तट शः । वित्छद रू । विन्तल्यः । वित्छधमः । विच्छटपः । वितुल्वः ¡ वित्छघ्ः !
यनेन श्रकरिण मान्यविद्रमानगुरस्थानाग्बुनाननर्विदादिगव्द्ा उपरमानेपु प्रवोजनीयाः ।
व्यपो निभं भ्ाजः पदं व्यतिकर्खलभ् ।
त कैतवे 1 व्यपदेशनं उय पदेशः + ^ । पुंि । निर् ्रतिश्चयेन माति निभम्+ २ 1 व्यज्यते, उभ्याजः।
पुंसि । पद्यते गम्वते कैतवेन पदम् । व्वत्तिकरणं व्यतिकरः । दलति ^ "छलम् । क्लीवे दछदयति
छ्य?“ 1 नान्तम् । क्रीम् 1 कैतवम् । क्रन् । कूटम् । उपाधिः + मिपरन् । लच्म् १६ ।
1 क
यृत्तान्तयत्यक्षा शव्दमन्य च णयत् | १३८ ॥
द्रौ वार्तायाम् । त्रत्तस्य चरितस्यान्तो छत्तान्त. ° “। उत्प्रच्णम् उत्प्रेक्षा । वार्ता । प्रव्रत्तिः। ठदन्तः।
१. श्रत समादयः चङ्परान्ता नव चमाने । ठलाकल्लोपमः विधा इति चत्वारत्वुलयामिति
पार्थक्येन वक्तवयेऽपि सदशाऽमिप्रयेण तदाद | कऋविदभिवति पारः । परन्तु वुलार्यकविवाशब्टोऽच वुक्तः ।
एवं च त्रयोदश दति वक्तव्यम् । श्रभिवापाटे ठु “उपमाऽभिधा" इत्वनवोस्पमावा चकते ति “एकादश
इति सद्च्छते । २. मकरि परे समानस्व सादेश॒विधायकवचनामावाच्छमानं सातीति वि्रहधिन्ः।
“सम् वैक्लव्ये” समति वैक्लव्यं करोतीति समः 1 वमः समल्य वैक्लव्यं करोव्येव । पचाच्रच् 1 ३. “क्षुं
पतने व्यदादौ हश्तष्क् रकौ च" का० सु० ८३।५५ त्त्र व्रत्तिः 1 ¢. काण सू० ३८४ ५. का०क्०
०२५६ । १० ६. “समानान्ययोच्येति वक्तव्यम्” दति वार्तिकर्पणोपलम्यते ६।२।६०। काशिकायाम् ।
कातन्त्रसृ्न्तु नेताहशमुपलन्धम् । वृत्तिरपीटशी काऽपि नास्ति) काशिकायां टीकीक्तवचनसाम्येऽपि प्रत्व-
यष्वक्धषाम्बं नास्ति । ७. गृहशददेषु खमानल्य सः" का मू° ४।६।६५1 ८. का० सूर ४।२।०५]
त्रत्तिः । €. 'ल्योति्नप्द्रातिनामिनामगोव्रह्पस्थानररंवयोव चनवन्युपु* इति ° पा० सृ० ६।३।८५1
2. वाचनिकं नैतत्. यतलोपमाभ्यामिति चचापरितमिति प्रतिभाति । १९. व्यपदिश्यते व्यप्रदेश्तोऽतदरपत्य
द्र्यम्। १२. नि नितरां तदिव भाति निमम् इत्यन्यत्र । १३. व्यजन्ति विच्चिपन्ति श्रनेन व्यालः | “न
गतित्तिपणयाः” | धन् 1 १४, दयति दधन्ति वस्व॒तच्वमनैनेति वा । द्यौ छदने । कल प्रयः | १५. छाद्रत
खूपमनेन छदम मनिन्. । हस्वः ] “द द्वारे” । चुरादिः 1 १६. लत शब्दोऽप्ययम् } ६७.वृततोधनु्
23 3 हि
-घानीयौ गवेषररीयोऽन्तः खमािर्यस्येति रामाश्रमः ]
मासमादल ६९
्र = जश्च मू ~ £
तः ` पूगः समाजश्चे समूहः सन्ततिधजः ।
उ्युहो निकायो निरो निङ्घरम्वं कदस्वकम् ॥। १३६ ॥
ओधः सयुदयः सङ्गः सक्घातः समितिस्ततिः।
निचयः प्रकरः पक्तिः
विंशतिश्समूे ! दृणोति छादयति नात्तः२ पूज्यते पूयते वा परगः>। संवीयते ससाजः। घन्)
समूहते सम्पर् ठोक्यते ससूहः 1 संतन्यते सन्तति; 1 ब्रजस्ल्यत्र तजः । उमयम् 1 विज्ञेपेण उद्यते व्युहः
निचीयते ऽसो निकायः । कायश्च 1 निकीय॑ते निकरः; 1 समन्तान्निकुरन्ति"वदन्ति (छिन्दन्ति) निङुरस्वः।
ऊुस्सितम् अम्बते कदम्बम् । स्वाथ के कदृम्वक्तम् । द्र. क्लीवे । उह्यते योघः९। (न्वङ्क्वादीनां ° इश्च घः।'
समुदीयतेऽनन समुदयः । समुदायश्च । संहन्यन्तेऽस्मिन्नवयवाः सङ्घः^ । संहन्यते संधात्तः।
हन्तेषेः । इणु गते। समूपूवैः । समयनं समितिः । स्वि क्तिः । तननं ततिः । निचीयतेऽसौ निचय
उचयः । प्रचयः | संञ्चयः । प्रक्रियते प्रकरः । पचि विस्तारवचने । प _। इद्नुबन्धानां घानूनां नलोपो
नास्तीति । पनं पङ्क्तिः । स्यां क्ति
पशूनां संमजे व्रजः । १४० ॥
पशलां रजः समूहः समजः कथ्यते । श्रज रेषणे ! रञ् समपूर्वः 1 समजनं समजः । "ठमुदरज
परपु ` °“ अल् ।
४ (~ _ ^~,
समीपास्यासमासनसस्यखं सन्निधि िदुः
अविदूरं च निकटमवलग्नमनन्तरम् ।॥। १४१ ॥
नव समीपे । समाप्नोति समीपम्? ° । व्रभ्युपेत्य चास्यते छ्रभ्यासः । घञ_। प्रास्यते स्म
शास्म , श्र गतौ याचने च । ग्र्दं श्रभिपूवः। यम्वरद॑ति स्म शछ्रम्यर्णंः। निष्ठातः ।नतामीप्य भ":
नेट् ! ' दाह \उस्य च" दकारतकारयोनत्वम् 1 ५४ ०४१८ -घाततोनंस्नारस्य रत्वम् 1 ^^ ' “त्वगस्य र निदा २
नस्य शत्वम् । सन्निधीयते सन्निधिः! शच(क)विद्रनोतीति विदूरम् । 'टुनोतेर्दविस्च ` ° ' दुनोतेरर् प्रययो
भवतति दीर्घश्च } इद उपतापे } निकटति निकरम । (नि) नास्ति कटो -स्वेत्तिव निकटः के वर्पा--वस्णये।ः।
~ ~¬ ~~~
: अवलगति (स्प) सवलग्नः । म गन्तरम् श्रनन्तरम् । सनीडम् । समयाद्न् । व्ारात् । सदेवम् । उर
१. चेतनाचेतनसर्वषमूहे व्रातादयो विरातिशव्दाः परदृल्यन्ते । रोघो वर्श सन्तान :नि
वंशस्यावान्तरवर्गभेदे इति कऋष्टव्यः ! परन्तु व्यवहरे शयोगसाङ््वंपपि दस्यते । २. “दन. दन्ताः । प्रात्
प्रत्ययः । न्यच तु ब्रत्यते एकस्मिन् यशौ नियन्यते इति रण्डभिन्न दति प्यन्तादूःतधर । -तच्यमोिदनि
निद शाद् दीर्धः! ३. पूज्यते रारित्वेन मन्यते, पूयते अनतडदायात् सिभेदन निर्वाच्यते एनः:
“छखापूखडिम्यः कित्" । उर्स्ऽ १२४] इति पूडः पूजो वा किद् ग प्रस्वः । एनवतेः एनय द ट:
स्थानिवस्वेन ण्यन्तात्कुप्वं दुस्साध्यम् । ४. "ध्न यतिज्तेदणयेःः" । घन् 1 ५. प्र् दवन ¦ ना
लफादम्च् । प्पस्योसे निकुरम्ब ₹त्यपि । €. श्रास्पूनादृूदतेन् | “उट् विते । ८. दा
।९।५७ । ८. षम्-उद्पूर्वकः “ण् रता ` र्खघठः । छलि समुदयः 1 बान सलाद ¦ ९. गन्द:
गंणरशशंसयोः'' काऽसू० ४।५।६४ इति हन्तेडग्रव्ययो वादेश | ६५. कान्न्० ०1५ । ५५. न 1
त्र } ---*-र-. र
द्पापोऽस्मिन्तिति विपदे समासः । शयचसमासान्ठः 1 'पयन्तसर्पसमैन्योनप इद् ` दर्खीदारः । उरन्यना-प्यः
< > ८ मः (6
मपि सपीपम् 1 १२.कछार स् (६७ 1 ६३. चार सर ४121१०२ १५८, स्र नू २, ४
९५. <"तवगस्य परदयांदवगेः ` सर युर ३।८।५। ५३. कार उर मए ६५;
१५
७ लमर्कीतिविरचितभाप्यपिता
ण्ट । श्य्यप्रम् । सन्निकटम् | श्राठन्नम् |
नित्या हलि्टं सीरं लाद्गलम्
पञ्चष्ट्ले। जिजये। जि। जीयते जिया । ^ "जयते क्यवेव' क्यव् | "धातो रस्तौऽन्त
पानुत्रन्धे 1” “ऽस्जियामाद्ा” । दलति हलिः । मददलं दलिशच्यते । भूमि दलति विलिलति दलम् |
सीयते वध्यते वर्या सीरम् । लद्कति मूर गच्छति लाङ्भटम् ।
तत्रो वरह
हलपर्यायतः करपययिपु वलभद्रनामानि भवन्ति ¡ भित्याकरः । दलिकरः । दलकरः । सीरकरः ।
लाङ्गलकरः । हलपाणिः । इत्यादीनि ज्ञातव्यानि ।
| भ क 4 कप्
रेवतीदयितो नीलवसनः केग्वाग्रनः ॥ १४२ ॥
त्रयो बलभद्रं । रेवत्या द्वितौ भर्ता रेवतीदयितः। नीलं कृय्णं वर्ण वशषनं यत्य ष
सीलचसनः । केशवत्याग्रजः कैदावाग्रजः । कालिन्दीकर्यणः । वलः [ प्रलम्वव्नः ।
= अर्ज 0 ल्ग [43 ण द्धे [नष्
अजनः फाल्गुनो जिष्णुः दवेत्तवाजी कपिध्वजः |
^ 0 म [क ्
गाण्डीवी काकौ सव्यसाची मध्यमपाण्डवः | १४३ ॥
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वरपसेनः पनि्मोफो देत्यारिः शक्रनन्दनः।
¢ [क [५ [न
कणंशुली किरीटी च रेष्दमेदी धनञ्जयः ॥ १४४ ॥
सतदशार्जने । श्रं सरजं श्र्जने । जति (कीर्तिम) श्रञ्ुनः । “धतृह्चतुत्रन.यमिदावंजिम्य उनः"
५ल निष्यत्तौ | फलतीति फादशुनः । ““पिश्युनफाल्युनं1 एतौ उनप्रत्ययान्तं निपायेते । जयतीव्येवं
शीलो जिष्णुः । ^“ °जिवोः स्क । स्वेता वाजिनो यस्य त दवेतव्राजी 1 कपिर्वरानरो ध्वजे यत्य ठ
कपिध्वजः । गां जीवतीवेवंशीलो *गारडीचो । काठकं धनुरस्तीत्वत्य काुंकी । सन्ये साचयतीति
सव्यसाची । मध्वमन््वाप्नौ पाण्डवः मध्यरमपारडयः। युधिष्िरमीमयोः सददेवनकुलयोर्मध्येश्नः, :
तेन मध्यमपाण्डवः कथ्यते । वृपं सिनोति व्रधनातीति च॒पसनः । निग च्यते शत्रुभिः सुनिर्मोकः । दुःषा-
ध्यन्वात् ! दरैत्थस्यारिः शतुदेस्यारिः । मक्रष्येन्रस्य नन्दनः शक्रनन्द्नः चर्ुनः कथ्यते । यमस्य पुत्रौ
वुधिष्ठिरः । वायौर्मामिः । इन्द्रस्याजुनः. श्रचिनीकुमाश्योनकुलसददेवौ पु । अत्यमेवं तत् । कँ शलं
विद्ते यस्याद करंद्यल्ली । किरीटं शेखरं विद्यते यस्यासौ किरीटी ! शब्दमेदोऽस्त्यस्य शच्दभेदी ।
१. का० सू० ४५।२।२६ । थत्र दुगं्त्तिः । २, का० सू° ८।१।३०। ३. का० सू २।४।४६ ]
9, का० उन तृ २।६०। ५. का उ सू २।६१। "फल निष्पत्तौ" उनघ्रत्ययो गोऽन्तश्च।
फलति कर्मसिद्धिमयते इत्यर्थः । ६. का रू ५।५।१८ । ७. गां जीवयतीति वोध्यम् । विराटूनगरे
पाण्डवानुन्थानाय मीप्मकरतृकगवत्मरोऽजन द्रारारलणस्य महामारतोक्तत्वात् ! व्वुतस्तु॒॒गाञ्ीव
राण्डीवमिति श्र्ुनधनुधो नाम, तदस्यास्तीति माज्ीवी दति मत्वर्थीय इन् | तदु कल्पद्रुकोपे -
"पाण्डवो गाण्डिवो-चियाम् । गा्जीवो गाल्िवोऽप्यघ्ली” दति १।५।४४। मूले गाण्डीवीशव्दप्व॒ गाण्डी
ग्रन्विरस्यास्तीति गाण्डीवम् । “गाण्डयजगात्सक्ञायाम्” पा० सृ० ५।२।२१० | इति मव्वर्थयिो वः।
तदस्यास्तीति मव्वर्थीय इन्. । ८. सव्येन वामपाणिनाप्पि सचते वाणान् वर्पतीति सव्यसाची |
नाममा ` छ:
केचित् रब्दवेदीति पठन्ति इत्यपि स्यात् । जि जये । घनपूर्वः । धनं जितवान् धनञ्चयः । न्नाम्नि*”
खः ] ““नास्यन्त°'' गुणः । ““एश्रय्" । ^हुस्वाभरुपरोर्मोन्तः "° धनञ्ञयेति कवेर्नामासिधानमपि ज्ञातव्यम् ।
स कथम्भूतः ¶ शब्दमेदी } श्रतः* परः कोऽपि नास्ति । पाण्डवनाम मिपेरा स्वनाम कृथितमत्ति ।
इरुक्षीचकयोर्धेरी वायुपुत्रो वकोदरः |
ङ्रुवेरी । कीचक्वैरी । कुरतः । कीचकाः । कुरुरिपुः । कीचकरिपुः । श्रनिलपुतः ।
पवनात्मजः । इस्यादीनि. भीमस्य पर्यायनामानि सतभ्यानि | इकोऽरण्यदवा तदत् उद्रं यत्य स चृकोदरः° ।
समवतीं यमः कारः कृतान्तो म्युरन्तफः ।। १४१५॥
षड् यमे । सवेषु समं तल्यं वर्तते ससवर्ती । नान्तः । रिपौ पिनै च समं वर्तेते इति वा । वम-
यति निग्रहाति प्रजां यमः । यमलजात्तत्वाद्रा । कलयति जन्तून् विनाशदेतत्वेन कारः» । इतो-न्तो
विनाशो येन स तान्तः । प्रियतेऽनेनेति सृस्युः । “““सजिप्रडोः युक्लयुकौ"" चन्तं करोतीति श्र्तक
शमनः । प्रेतपतिः । पित्रपतिः। कीनाशः । वैवस्वतः । कालिन्दीसोद्रः | धमंयजः । दण्डधरः | दरिः ।
दक्तिणापतिः | भाद्धदेवः
तदात्मजो जातरिपुः कोन्तेयो भरतान्वयः ।
कोरभ्यो राजयक्ष्मा ऽसो सोसवंो युधिष्ठिरः ॥ १४६ ॥
सप्त युधिष्ठिरे । तस्य घमंस्यात्मजस्तदारमजः । समवतिपुचः । यमेोद्रहः । कृतान्तपोतः।
मृव्युनन्दनः । ्रन्तकदारकः । इत्यादीनि युधिष्ठिरपर्यांयनापानि ज्ञातव्यानि । जातस्य स्वगोनरेव्य रिपुः
^ "ज्ातरिपुः । कुन्त्या श्पत्यं पमान् कौन्तेयः । भरतोऽन्वयोऽस्य भरतान्ययः । कुरोरपत्यं
पुमान् कौरव्यः । राजभिर्नरेयंद्यते पूज्यते राजयक्ष्मा । ° ""सर्वधातुभ्यो मन्" । राजलद्धमा चेपि
केचिलडन्ति । सोमो वंशोऽस्य सोमवंशः । युधि ए्रामे तिष्टतीति युधिष्ठिरः ।
उवेताऊनो शुचिः उवेतो वलक्ष सितपाण्ड्रम् ।
गुक्रवदातं धवलं पाण्डः चुभ्रं शरिप्रमम् ।। १४७ ॥
चयोदश श्वेते । य्वेतते इ्वेतः१२ । ्रञ्य॑तेऽज्ुनः" 3 । शोचतीति श्चि» । शुच सोदे 1
श्यायते येतः१५ । अवलत्तयति अवलक्ष: ! बलक्षश्च "६ 1 सिनोति वध्नाति(मनः)सितः । पण्डते याति
मनोऽ पाराद्धरः । अथवानगरपांञुपाण्डुभ्यो रः” पाण्डुत्वमस्यास्तीति पाण्डुरः पाण्डु: पाण्डरः । स्तोकति
मनोऽस्मिन् शुक्लः ! शुक गतो । श्रवदायते शोध्यते वदतः? ° 1 धघवत्ति धवः ^< । पण्टते या
"नाग्नि त्ृभब्रजधारितपिदमिसहां संखायाम्' कार सूर ४।६।४४] २. कारन
३।५।९। २. का० सू<१।२।१२ 1 ४. कार सर ४।१।२२ । ८4. घनन्ञयादयरं सश्िन्छव्दभत्येना
नास्तीसयथैः । ६. करको भीमजठराग्निः स उद्रे यष्येत्यपि 1 ७. कलयतीव्यस्य स्थाने कलयतीति
वक्तव्यम् । ८. का० उ० सू २।३४ ! ५. शन्तटूरोस्यन्तयत्ति, प्रन्तयल्यन्तक रति यावन् ।
१०. कोशन्तसप्रमाणान्महामासतादिकयारंबादात् महाकविव्यवहाराच् '्रजातरिपुः टनिव्टेदोल्य दुन ।
न जाता रिपवो यस्येति युधिष्ठिरस्य '्रनातशप्नः" इति संज्ञा । त्तम् प्गातस्तद्रः सत्यारिपमरृत।
युधिष्ठिरः" । अभिर चिर ३।३०८ । ११. काञउन्च्< ४।२८ । १२. “ह्विता वस ` 1 "जा ५
+,
क ^ +
पचायच् } १३. ध्यन्यते सद्गते जने: । ५४. एु्युञ्जलचस्त्. सपीपत्यं लदास ।
शोचति निम॑लीभवति शुचिः । शुच दीतौ । इय् 1 ९५. द्येद् स्तय | समार्य मरः
नीलादि विश्ुडत्वम् । 'ध्टस्याभ्यामितन्" । पा० उर द ३।९६ | दत् । ९९. (रल शनः
लप्यते चा घन्यवणपिक्तया उत्वेनेति । वि मायुरिरल्लोप र्ल्लरर्ते । ५७. ञस्य
मरन } पपु मन्द
देप् शोधने । कमणि क्तः । १. धुनोत्यसतोमार् एति टेमचन्द्रः 1 धाद
कलच्, एस्वर्नेतीति रामाधमः 1
“द
श}
[१
७२् प्रमरीतिविरचितभाप्यपेता
मनोऽसिन् पारष्धः ” । शोभते शयुः । फशिन दव प्रभा यत्य शशिप्रभम् । गौरः । दरिः ।
कृष्णं नीसतितं काम्
चत्वारः कृष्णो । वर्णान् कपि? क्रष्णः) नीलति नीलम् 2} उभयम् । न तितम् श्रितम् )
कं सुलमालाति कालः । काल्लयति वा मनः पकालः । मेचक्म् । श्यामलम् । इ्वामं च । पालाशम्
दरत् । शिलिकण्टाभः इति दु्गः।
धसं धृम्रसरिग्रभः।
विरिष्टष्कृप्े चयः । धूनोति धूमः ध्रूनोत्वभिभवति रागं धृष्रः] भ्रूमलस्व । ग्रलि-
वलरमा यस्य सोऽद्धिध्रभः |
क ५ ८" न्तं वा
तमारन्त्रकार् ताम्र ध्वान्तं सतम तमप्र्।। १४८ ॥
ताम्यत्ति मन्दीभवति चश्चुस््र तम्रः। सान्तम् । क्लीवे । अन्धं ष्ट्व पातं करोतीति श्न्ध-
कारम् । तिम्यते श्राच्छा्तेऽनेन तिमिम् । कान्तारे ध्वन्यते ध्वान्तम्” | षम्. सम्यक् प्रकारेण तमः
सन्तमसम् 1 ताग्यतीति तममित्यदन्तम् । क्लवि । छवतमत्म्. | श्रन्धतमघरम् । तमिचम् । मृह्धाया ।
मृष्धावम् । दिगम्बरम् । -
लोदितं रक्त माताम्रं पाटलं विकदारुणम् ।
प्रद् रक्त । रोदति जायते शोभना लोदितः" । रञ्यते रक्तम्+ । च्राताम्यते काड्यते
करु श्राताः । पाय्यतीति पारः । पाटेरलः । विशीयते चिग्राद्ः । ऋच्छति इयल-
(ति वाऽ) रुणः,
[] ५ +
पीतं गोरं दरिद्रभम्
दश्ष्रार्तवणे' त्रयः । पीयते मनोऽनेन पीतम्+ । गाते गच्छति वशं विशेर्यैः गौरः १६।
तथा च नाममाटायाम्" ~“) रः वेते एर्णे पीते विशुद्धं चन्द्रभस्यपि । विद्चदेःः । हरिद्रावत् रामा
छविववंस्य हरिद्राभः । =
पालाशं रितं हरित् ॥१४६॥
हरिदूवसं त्रयः । पलाशस्य वणंस्यायं पालाश्चः । पलाश इत्याद, ८--'"राक्तसे । विंशकं
वणे पछाद्यास्या । हरिस्यपि? । दरति चित्तं हरितम् । हरित् ।
पन्यते सूयते पाण्डुः । (पनेदी्वश्च" इतिं डुः । इति देमचन्द्रः। २. क्रति मन इति
रामाश्रमः । व्रपेवं इति नक् । ३. “णील वर्णं” । नाग्युपयेति का० सू० कः। ४. कालयति मन
दरत्यन्यत्र । ८. श्रयं पाठोऽच न युक्तः । “पालनं हरितं हरित" इति पद्स्व ठीकायामप्र दरषएव्यः । ६.कृष्-
मिश्नितलोदतेधरत्रधूमलशब्दाविति वैशिप्वाथः । तदुक्तम् श्ूत्रधूभल कृष्णलोहिते” इत्यमरः । १।५।१६।
०, कान्तारप्रदेशादिपु तमोऽविच्दिननिवेशात्तदाह "कान्तारे ध्वन्यते” इति । सव॑रोयदरतया ध्वन्यत
ध्वान्तमिति देमचन््रः 1 ८. रदौ र्तं, जरयो विशदारुणे, इति वक्तव्यम् | विशदं च तद्रूपम्+ श्वत
विशिष्रक्मित्यर्थः । तदेव पाटलम् 1 तदच्म--“श्वेतरक्तस्व पाटलः" दत्वमरः । €. “सद् वीजन्मनि
प्रादय । “नहे र्द्व लो वा” । पा०्ड०्स्० ३।२९४ ] इतीतन्., लत्वं च वा । १५. रञ्जति स्म रञ्य॑ते स
वा रनमित्यन्यच्र । ११.पीयते वर्णान् पीतः । “पीड् पाने" 1 दि०] इत्यपि 1 १र.गृरते उन्ुङक्तं मनोऽसिमन्
गौरः । “नूर उ्रमने” । छ्ेन्् इत्युखादिपूत्रस व्युलादितः । “गूयते गौरः इति देमचन्धः । “गृड
संर्लेषरणे 1 १३. यने° स० २।४२५. ¡ १४. शा० कोऽ ५२९ ।
9 नाममाला ७३
हरिणी रोहिनी शोणी गोर श्येनी पिश्ङ्घयपि ।
पड् रतवणः" । ^्येतेतदरितलोदितेभ्यस्तो नः२?° त्रनेन ईपत्यये तकारस्य नकारद्च । हरिणी ।
तथा च हलायुधे ऽ~“श्ुकाभा हरिणी स्ता 1 दरिता च । रोहति जायते शोभा लोहितः रलयोरक्वम् ।
'येतेतदरितलोहितेभ्यस्तो मः नेन इईस्तकारस्य च नकारः । लोहिनी जाता | हलायुषे"--
जपाङ्कसुमसंकाघ्ता रोहिनी परिकीर्तिता”
शोणते शोणी । गते गौरः । नदादित्वादीः । भौरी 1 श्यायते गच्छति भ्रियं द्येनी
दलादुपे"--्येनी कुपुदपन्रासा 1? स्वेना च । पेशति पिशद्धः । ईपरत्यये पिदा ।
सारङ्खी स्वरी काटी कल्पापी नीक्लप्जलिरी ॥१५गा
षृट्^ पश्च वशँ ! सारयति गमयत्ति [ बहुवर्णान् ] सखारङ्धः 1 ईप्रत्ये स्वारङ्गी 1 शरवत्ति
याति वर्गान् शवरः शवलस्व । इप्रत्यये शावरी । कालयत्ति कालः । ईपरत्यये काली । कलयति वर्णान्
कल्म।पः ! ईः कल्माषी । नील गन्धे । नीलति नीलम् । ईम्रत्यये नीली । पिज्ञत्ि पिञ्जरः)
ईश्रव्यये पिञ्जर ।
परागं मधु किञ्जल्कं मकरन्दं च कोसम् ।
पच कुषुमरेणौ । परं प्रकपंममग्यते सम्भा्यते पुष्पेषु परागः < । उभयम् 1 मन्यते सम्भाव्यते
एष्णूु सधु 1 उमयम् । किं जल्पति किञ्चरक्रम् ^ । मङ्कयते मण्डयते पुप्यमनेन सक्तरन्दम् ` ˆ । इसम-
घेदं कोुमम् ।
उपचारद्रनः पाबुरेणुधूलीर्च योजयेत् ।॥१५९१॥
चत्वारो धूल्याम् । रंज रागे । रजत्यनेन रजः । "'उपिरंजिष्टभ्यो यण्वत्^ ˆ" ¡ नप्कं धण्क परि
नाशने । पंशयते पांडुः । ^ ` रवदिरहितलिपंशिभ्य उण् ।' रीङ् गतौ । रीयते रेणुः} " दाभारीन््यो †
नुः" 1 धूयते धुनोति इष्टि वा धूलिः । उपचारात् पुष्परजः । सुमनःपाशः । पुष्परेणुः ¦ लतान्तधूललिः ।
परसवरजः । प्रसूलरेुः । इत्यादोनि पुष्परजो नामानि ज्ञातव्यानि ।
कलङ्ावद्यमलिनं किञ्जल्कं रुक्म लान्छनम्
नियोधमधमं पङ्क मरीमसमपि त्यजेत् ॥१५२॥
१. नन षटस्रीलिद्घवाचके तत्तद्वणं विशिष्टे इति वक्तव्यम्) न तु रक्त । तत्तद्वन्ं
भेदो यथा--हरिणौ शुकामा, लोहिनी जाङसुठाशता, सोरी कोकनदच्छविः, गौरी दस्मा, श्येनी
शुदप्ामा, पिशङ्गी पीतरत्ता । २. 'येतैतदरितभरितरोहिताद् वर्णान्तो नः" टेश ० २।४२९ ! 2 ग्ट्येनी
ङुषुदपताभा शुकतामा हरिणी स्मृता । जपाकुषुमल्ह्भाश्ता रोदिणौ परिकीरिता ।'' ऽति प्यः रलोदः।
२. दलाथु° ४।५३1 ४. हला० ५५३ । ५. हला० ४।५३ । ६. धरत प्रद् लीलिदवाचरे तदय
वणविशिष्टे इति वक्तव्यम् । तद्भेदो यथा--सारङ्गश्बरीकरल्याण्यश्चित्रवणीः । साखी न॑ल्यागन्सिः !
पिज्ञसै पीतरक्ता 1 ७. श्च परागकिसल्कशब्यौ पुप्परजोवाचरौ, मघुमदरन्दसन्यौ एष्दरस्वाच्यं, पदुम
शब्दस्तदुभयवाचकः, इति विवेकः | ८. परागच्छति पररत्छपमगति वेति विल्टः सरटः
९. रिद्धिञ्जलति, "जल शछपवारणे" ! वाहुलकात्कः । कििज्यलति उंडीनयति इति सर ग्नर 1
९०. मकरमपि यति कामजनकलवान्मकरल्दः । "दो अवखण्डने" । कः ] मद्रमपि प्ति रनाङहतिदा)
दि बन्धने" | कमण्यण् । शकन्ध्वादिः । इति रामाश्रमः 1 ९१. वान्डर ठ ४५९} ५: =
सूर १।३। १३ वाऽ उण सू<*२।७ |
१०
१५
७ अमरकीर्तिविरचितभाप्योपेता
दश कल्कं । कल्यते लक्षणेन कलद्भुः१ । न व्रं समीचीनम् वयम्: । मल्यते धार्यतेऽप्यशो-
ऽनेन मलिनम् । किं कल्पितं; जल्पति किञ्चल्कम् । लक्तयति परं नान्तम् लक्म । लान्छुयतेऽनेन
लाञ्छनम् । निवुष्यते निवोधम्उ । नञ पूर्वो धाज.। न द्घातीस्यधमः । ^वर्मदीमाप्रीप्माधमाः८" ।
"पञ्च्यते पद्भम् । मलिना कदर्य ण मस्यतेः परिमाणीक्रियते मलीमसः । तं त्यजत् सध्पुरुपः.।
श जनोदादरणं कीर्ति साधुवादं यशो विदुः ।
4 (तिं
वणं गुणाचलि ख्य
सप्त यशसि । जनानां लोकानामुदादस्णं, जनेन लोकेनोदाद्धियते वा जनोदाहरणम् । करत
संशब्दे । कृत्-“ुरादिश्च ° 1” इन् । ृतः< कारिते दर् । किरतिं जातः । नामिनोर्वा ° | कीर्तिं चातम् ।
कीर्तनं कीरिः ।“कीतीपोः क्त्व १ ०" क्तिप्रत्ययः । कारितलोपः । त्रिपु व्यज्चनेपु सज्ञातेपु सजातीयानां मध्ये
१० एकव्यज्ञनलोपः 1 एकस्तकारो लुप्यते! घिः । रेफः । साधूनां सत्पुक्णाणां वादः साधुवादः ।
छशलो योग्यौ हितद्च साधुरुच्यते । यज देवपूजादिपु । इव्यते यशः । “८१ “यजः शिच” श्स्माद्सन्
त्ययो मवति स च यण्वत् । जस्य शिः । इकार उच्चारणाथैः । वर्ण्यते साधुजनेन चैः । गुणानामवलिः
भरणि; शुणावलिः । ख्यायते ख्यातिः । दलोकः । श्रमिख्या । समाख्या ।.
अवधानं त॒ साहसम् ॥१५३॥
१५ सादसे ढौ । यवधीयतेऽवर्धानम् । श्रवदानं च । साद्यते ° -सादसम् 1
्प्यादेशनिदेचाज्ञानियोगाः जासनं तथा ।
पडादेले । मरेण्यते इति परेष्यः । श्रा समन्ताद् दिशतीत्यादरशः ° २। निदिश्यते निदिशतीति वा
निदैदाः । श्राजानातीत्याक्ञा ०४ । नियुज्यन्ते नियोगाः । शास्यते प्रतिपाद्यते शासनम् । शासु
द्रनुशिष्टौ ।
२० सन्देशः प्रिययौः
लरीपुरुपयोः मुलवार्तायां सन्देशः । सन्दिशति ° "सन्देशः । श्रमरसिदनाममालायाम् "^ -
“सन्देरावाग्वाचिकं स्यात् ।
वार्ता प्रवृत्तिः विवदन्त्यपि ॥१५४॥
चयो नवीनवार्तायाम् । व्र्तिर्लोकठृत्तं विच्यतेऽस्या वार्ता । १ प्रन्ञाश्रद्ाऽ्ववत्तिभ्यो णः"
१. क् ब्रह्माणमपि लद्कयति हयीनतां गमयतीत्यन्यत् । २. न वदित योग्यमित्यवयं गयम् ।
‹्मवद्यपण्ववर्यागर्वपरितभ्यानिरोवेपु इति यत् । ३. नात्र प्रमाखान्तरमुपलन्धम् । निवुध्यते
निश्चयेन ज्ञायते कलद्धिजनोऽनेनेति कर्णे घज. । कलङ्किना ` राजशासनचिहितत्वद्शनात् । ४. का०
उ० सृ० १।५३ । ५. पच्यते दुःखमनेन । पचि व्यक्तीकसणे विस्तारे वा 1 कर्मशि घलन्।
६. “मसी षमी परिमणे" ] पुंचि खंज्ञावां घः । यदा मलोऽस्यास्तीति ““ज्योस्घ्लातमिक्ष
त्यादिना मत्वर्थौय ईयस् प्रत्ययः । रीकोच्छविग्रहश्चिन्त्यः। तव मलिमस्त इत्यापत्तेः । ७. का० सूर
३।२।११। ८. कीर्तीपोः क्तेति निरदशतात् कृतः कारिते इर् । €. ^नामिनोर्वा ऽङ्द्ुसोर्व्यने”
खा०सू० ३।८।१४ ] १०. का०सू० ४।५।८६ । १९१. का०्उ० सू० ४८।६० । १२. सदसि बले मवं साद्षम् ।
१३. श्रदेशनम् आदिश्यते वेति विग्रहः । १४. श्रवापि श्राक्ञायते श्राज्ञानं वेति विग्रहः । १५. सन्दिश्यते
इति कर्मरि घन् न्याय्यः 1 १६. श्म० को १।६।१७ ¡ १७. पा० सू° ५।२।१०१।
नाममाला ५७९
समीक्लीमे वात्तं च । प्रवतेते जनोऽनया भचत्तिः । स्त्रियाम् । कं ऊुस्सितं वद्तयत्र किंवदन्ती, 1
वृत्तान्तः । उदन्तः ।
कठोरं किनं स्तन्धं कशं परषं चदम् ।
षड इडे । कठति ङृच्छेर जीवति कटोरः२ । कठति कदिनः । स्तभ्नोति स्म स्तन्धः } कवं
सो्रोऽयं घातु; 1 ककंति करोति निर्दयत्वं ककः । परुष्यति कुप्यतीति परुषः | कुप क्रुष सपर रोपे ।
दृह ददि ब्दो । ददति स दृढः । ““परिङटद्टौ प्धुबरलवतोः ।” ब्रूरः । कक्खदः । खरः ! चण्डः !
निष्टुरः 1 जरठः । मूतिमत् । मूर्तम् । प्रवृद्धम् । मोदम् । एधितम् । सवै त्निु ।
अररोरुं कारु एल्गु
निस्सारे ` वचसि चयः 1 न लीयते न श्लिष्यते सतां चित्तम् रदली लम्” | वचनम् । कं
शिरः शा समन्तात् इलति अशोभमानं करोतीति कालम्; । लोदलख । लुहः सौचः 1 फल निष्पत्तौ ।
पलति प्तरगुः° । "< रजञ्जुतकरुवल्युफल्युशिशरिपुप॒थुलघवः ।
कोरु सदु पेशम् ॥ १५५॥
त्रयः कोमल्ते ।! कौ पथिष्यां मलते कोमलम् 1 मृद सोदे । मद्नातीति सदु * ° । पिश्रति
पराम् ` ^ । सुकुमारः ! मृदलम् ।
प्रतयभ्रं साम्प्रतं नव्यं नवं नूतनसग्निमम् ।
षड् नवीने । प्रतयमरगति प्रत्यश्रम् १२ ¦ सम्प्रति भवं साप्प्रतम् 1 नूयते नव्यम्^3 । नौति
नवम् ४ । नूयते नूतनम्१५ ¦ श्रे भवम् शच्निमम्१९ । ृध्वादिभ्य इमन्वा'' । श्रमिनवम् ।
१. कोऽपि वादः । विपूर्वाद् वदेरौखादिको अच् प्रत्ययः, भप्यान्तः 1 गोरादित्वान्डीपू ।
इति रामाश्रमः! र् “कठिचकिभ्यामोरः का० उ० सू० ४।३७ । “कठ छृच्ुजीवने" 1 ३. वष्टि-
भागुरिरल्लोपमित्यपेर्ह्लोपो नस्वपस्येत्ति टीकोक्त विप्रदश्िन्तयः । रामाश्नमसतु-“पिपत्ति परवति श्रलं
द करोति “पु पालनपूरणयोः" । *"पृनदि'” इत्यादिना उ० स् ४५५ 1 उपच् । र्त्याद् 1"
परणाति पूरयति परं कोपेनेत्ति देमचम््रः। ट. का सू ४६।९५ । ५. न भिचं लातीति
प्लोलम् । कवत्ययः । कपिलक्रादित्वाल्लप्वम् । इत्ति रामाभ्रमः । न श्रौरस्यास्तीति सिप्मादित्वान्म-
त्वथीयो लः। £. कादलोऽस्छुटवागिति हेमचन्धः । ७. एलति विशीयंते इप्यन्वत्र । €. कार उ< २
९।९। इत्युप्रत्ययः गश्च ! ९. कौ पथिव्यां मलते धारयति श्ियम् इत्यथः! भ्मल मल्ल धान्त
पचाद्यच् । परमेवं कमल इत्येव सिध्यति । बष्तुतस्तु "कोमल" शब्दस्य सिद्धिः प्रकारान्तरेखेव साधनीया !
फोतौति कोमलः इति विगरदोऽभिघानचिन्तामणौ 1 काम्यते जनैः इत्यन्य । १०. सयते एति क्मदि छ
पत्यो न्याय्यः । ११. पिंशत्येकदेशेन सवे करोतीति , श्रौरादिकोऽलच् । सामाश्रमसतु-' पिद समाप)
पशनं पेश समाहितचित्तता, सोऽस्यास्तीति सिष्मादित्यादलच् इत्याह । प॑श्चलश्रव्द्रय दद्यां
कोमलारथो गौणः 1 तदृक्तम् “दत्ते चतुरपेशलषयवः सूत्यान उष्लश्च" टलयमसः । २।३०।१९।
दसत् पशक्ञः । इति प्रमि चि० उ४्य ] १२ शत्र गतो" डः 1 प्रतिनवममस्तेति सर्वानि
रमाभृमो । प्रततिगतमगमनेनेति देमचन््धः 1 १३. ' णु स्तवने" । घ्चो सत्! ४. रपम नयम्;
> मव चः =” ~= ए
'दोदप् । एवं कर्मणि विग्रहो युक्तः 1! १५. नवमेव नूतनम् । स्नवत्य नूराद्शरनरतनर य पतयः
८
मई <------
वा° ५।४।३० । इति तनम् प्रत्ययो नूरादेश्चश्च 1 इत्यत्र । ९९. 'स्यादिरष्यादिरमद् वार दति लिमन्
~. भ
चातर पृष्वादिन्यः , इमन् , तत्य भावकर्मंसोविघानात् पष्दादौ पाटानाबान ! स्त्रि
निष्टरूपापक्तेः ॥
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~~
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१०५
७ अमरकीर्विविरचितभाष्योपेता
7)
नूलश्च । वव त्रु । ॥
पुराण जस्र जीण प्राक्तनं युचरन्तनम्र् ॥ १५६ ॥
पश्च पुरातने । पुरा भवम् पुसणम् । जठ दति सीनोऽयं धाः । जटतीति जटयम्^ ] वीरयते
जीर्णम्] परा् पर्व भवम् प्राक्तनम् । दषु चिर मवं सुचिरन्तनम् । ्रतनम् । प्रलम् ।
भोरेदहंदहो दयामन्ब्र ।
एते शब्दा श्रामन्त्रणा्थं वर्तन्ते । भू घत्तायाम् । भोः? । रेपु क्वगतता । रे । दनु दिंसागवयोः।
हं। ददने) हो। हिगतौ।दे।
कदिचत् किञ्चन संशये |
सन्देदार्थञ दौ शब्दौ वर्तेते । श्रविशेपामिषाने चिचनणब्दौ श्रवगन्तभ्यौ । तथा चोक्तम्--
“किमः सवेविमवत्यन्ताचिष्वनौ ।” कथित् । कथन । कौचित् । कौ चन । केचित् । केनचन इत्यादि ।
न्नियां काचित् काचन दयादि । क्लीवे किद्धित् । किञ्चन । इत्यादि ।
शद्राकक्षणेऽहाय" सपदिः
स्तीघ्राथं चयः शब्दा वतन्ते |
निपेधे मा न खल्वहम् ॥ १५७ ॥
निपेवे चत्वारः शब्दा वर्तन्ते 1
उच्चैरुज्याधचं तङ्गएुचणनतय्च्छ्तिम् ।
प्ड् दीँ । उच्चीयते उच्चेख्। श््ययः | उच्चं च श्चवचं च उच्चावचम् । ठजति दैव्य॑मादते
कुम् ° । ऽच्चीयते उच्चम् । उन्नमत्युन्नतम्८ । उच्छीयते उच्छरितम्९ । प्रां्ः१ ° तालव्यः । उद्गरम्
दीर्घम् । श्रायतं च |
[ [ ज च्द, 0 $ [4
नीचं न्यगातनं इष्जं नीचं स्वं नयेत्परम् ॥१५८॥ ।
प्रद् हे । नि चीयते नीचम्." "। न्यञ्चतीति न्यक् | श्रातन्यते श्रातनम्१२। कौति व्याधिं कुन्जः" - ।
१. यद्यपि जरठशन्दौ वीरँ प्रसिद्धो जटरशब्दस्तूदरे, तथापि कचिजठरशब्दोऽपि जीरं
पटितस्तद्ा एयेनाद-जठट तीति जटरत्तिति । यदटुक्तम्--“'जठरः कुचिब्रद्धयोः"' श्रने० स० ३।५५१ 1
२. भातीति भोत्त । डोसपरल्ययः । यथा--भो भार्गव । रिणातीतिरे । विच् । यथारे चेगः। टं
द्रति पृथकसम्धोधनद्वयपुक्तम् । परन्तु नार्कादौ ददं शे" इत्यलण्ड एव सम्बोधने प्रयुज्यते । दं
जहोतीति हंहो । चथा हंहो तिष्ट सखे । दिनोति है । “हि गतौ वृद्धौ” विच्] यथा
देरम्ब । ३. श्रविशेपा्थं इलययशयः। . द्राति द्राक् । शद्रा कुत्सायां गतौ” । बाहुलकाक्तः ।
दकार इत् । स चासौ क्षरो द्राक्कणः। ५. श्राह्वनम् श्राह्ायः “नुड् शपनयने” । धन. । पृपे-
दयादिलवाद् वस्य यः । ६. सम्पद्यते सपदि । "रद् गतो । इन् । पृपोद्यादित्वात्समोऽन्त्यलोपः । ७, ठुज्ति
देये पालयतीति । घज_। ऊृत्धम् । ८. उन्नमति स्म उन्नतम् । ९. उद्व॑ श्रयते उच्छितिम् ।
१५. प्राश्वते दैव्य प्रा । “शश्र व्यातौ” । ११. निकृ्टामों ल्मी चिनोतीति । डः. इति रामाश्रमः {
निम्नमखपि, नीचेरस्त्यस्य वा । श्रयं आदित्व।दच् । ऋव्ययानां भमात्रे टिलोपः । ९२. नावप्रमाखः
मुपलन्धम् । १३. कोति व्याधिविशेपं रते सूचयति | कौ पृथिव्याम् उन्जति क्रजुसवति । “उग्ज श्राजवर।
श्यच् । शकन्ध्वादिः । कु ईषद् उग्जमा्वमत्य वेति रामाश्रमः ।
भामसाला 9
न्युग्जश्च । निचीयते नीचैस् । हसति हस्वः ।
९ [1] ट
अमा सह सम साक सखडढ़ सा सजूः समाः।
श्रो सार्धे । शपति अमा१। सह दन्ति गच्छति सह । सह मिनोति समम् । सद श्रकति
गच्छति साकम् । सद द्धम् खाद्ध म् । सद धायते सत्रा । जुपी प्रीतिसेवनयोः । जप् सदपूर्वः 1 सद
जपते सजूः । किप्च वेलोपः। सिः । व्यज्ञ०२ । सिलोपः । समन्ति समाः? । सद मान्ति वर्तन्ते छतो
यासां वो । स्त्रीवह्वे |
५ # (+ ज [र द [३ [क )} सदं
सवदा सतत नस्य शधदात्यान्तक सदा ॥१५६।॥
प् नित्ये । सर्वस्मिन् काले सवदा । “काले किं सर्वयदेकानयेभ्यः एप द्" । संतन्यते
सततं” सन्ततमः च । नियच्छति नित्यम्: । श्यतीति रादवत् ° । अत्यन्ते भवमात्यन्तिकम् ।
सदा इति निपातः । सर्व॑शब्दात्परो द् प्रत्ययो मवति सर्वस्य समावद्च । सर्वस्मिन् काले खदा । सना-
तन॑,८ सदातनम् । ध्रुवम् । शाश्वतम् । शाश्वतिकम् । श्रनव्वरम् । श्र विनश्वरम् । सवै त्रिपु |
पियोभं मदनावस्थं विरहं पल्लकं विदुः |
चत्वारो विरहे । वियोजनं दियोगः । मदनस्य कन्द्पंव्वावस्या मदृनादर्था । विरद्णं
विरहः । मल मल्ल धारणे ¡ मल्लध्याने केचित्पल्ल इति पन्ति । पल्लते पल्लः 1 दवाय छः
पटलकः ` ।
प्रेमाभिरापमारभ्वं रां स्नेहमतः परस् ॥१६०॥
पञ्च स्तेदे । प्रियस्य मावः कम वा पेमा 1 प्रिय ° 'सिथरेति प्रादेशः } श्रमिलप्यते -भिलापः।
लप श्लेषणक्रीडनयोः ¦ च्ालभ्यते आरभ्यम् "+ । “' + -सकिसदिपवर्गान्ताच्च'' । रञ्ज रागे । रच्च ।
रन्जनं रागः । भावे घञ् |" १ उरन्जेरभावकरणयोः" पच्चमलोपः । च्रस्यो ° दधेः । "चजोः ^ ८ कग घुट् घनु-
चन्धयोः ।” जकारगकारः । प्रसि; । रेफः । श्रथवा रज्यतेऽनेन रागः । “व्यञ्जनाच्च "“ "1 कस्रोधन् । ४
“'व्जेरमावकरणयोः” पञ्चमलोपः । ग्रघ्यो° दीर्घः । चजोः कगावित्ति जकारगकारः । सिन्ते स्नेदः ।
संहितं सहितं युक्त संपृक्त संमृतं युतम् ।
सस्कृतं समवेतं च प्राहुरन्यीतमन्वितम् ॥१६१॥
१. न माति सह म।पिनामनेक्सान्येवतां न गच्छृति। उग्रःययः | च्रत्यया वा। २.
“व्यञ्जनाच" का० सू० २।१।४६ । ३. मसी समी परिमाणे" । समर धातुः । पचाद्यच् । सममिति माननम-
व्ययम् । सहायेकमश्रोक्तम् । तद्भिन्नः समा शब्दो वु्पैवाचको न त॒ सहायवाचवः । तदु -- "रयन री
शरत्समाः" इत्यमरः । पतो ऽस्मिन्नयं एत्य प्रामाण्यं चिन्त्यम् । सद् मान्ति ्रतदो याष्रमिनि पिन
पवा चकसमा शब्द् एव् सञ्ुच्छते 1 तन्नैव प्रुतूनां सदट्मानत् 1 ‰. कार च्< 1६1३1 ^. “नु
विस्तारे" । क्तः । "समो वा हितततयोः" रति नलोपः । €. स्यन्नेशरुवे नि्यमित्ति वार निमव्वाप्य्
नियच्छति नियतं भवतीस्य्थः। ७. ष्यत सशतीति वक्तुः रुक्तम्। यश्य लप्ठमनै
न | ददतव
<. सनातनादिशब्दानां विकेष्यनिप्नानां पथोक्तरास्वदादिशव्दसमानर्यत्या दर टतेहनरम न्य
€. मस्लक्पल्लकणन्दयोर्विरहार्थत्वे प्रमाणान्तरं नोपलन्धम् 1 ६८. पार सूर ६५1१५; ४
पदेशः 1 एमनिचुप्रययः । पृ्वादिभ्य टमनिजा एति 1 ६६. पहन्ययन्दसय सम्या यर
संवादो नोपलन्धः | १२.कार्स्० ४२।१६ ! १३. कार सूर ८१1६६ } ५४. दर र ६९६५५;
९५. का० सूज ४१५।९९ ।
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७८ श्ममरकीर्तिविरचितभाप्यापेता
दश सदिते । संदीयते संहितम् । सितम् ।
८ ्टुम्पेदवश्यमः कृत्ये तुमकामभनसोरपरि ।
समो वा हितततयोर्मासस्य पचि युड्वजोः॥
योजनं युक्तम्> । पृची सम्पक । पृच् । सम्ृरुक्ति स सम्पृक्तम् । धगत्यर्याकमंक० ८” इति
कत॑रि क्तप्रत्ययः । “्वजोः कगौ चत्य कः । सरिप्रियते स सम्भ्रतम् । यौतिष्म युतम् । घं च्यते
स्म॒ संस्छतम् । समवेयते स्म॒ समवेतम् । शन्वीयते स॒ अन्वीतम् । श्रन्वितम् ।
वर्त्माऽध्या सरणिः पन्थाः मार्गः प्रचरसन्चरौ ।
सत्न मागे । वर्तन्ते प्रतिपद्यन्ते लना येन तत् चतम । नान्तम् । “^ःसवघातभ्यो मन्? | गच्छति
श्रतति चलति श्नेन नान्तोऽध्वा । सरत्यनया सरणः । दन्ततालन्यः । खतिश्चास्ियाम् । दौ |
पतन्ति गच्छनि श्ननेन पन्थाः । नान्तः । इदन्तोऽपि | पथिः । पथः | पथानः । पन्य इलयपि । एते पु'सि।
मार्जनं मार्मयन्यनेन वा मामः । पुःचि। प्रकर्ंख चरत्यनेनेति प्रचर । सञ्चरत्यनेनेति सश्चरः
पद्तिः । एकपदी । वतंनी । शयनम् । पदवी । प्या | निगमः ।
[+ ¢
त्रिमागनामया गङ्ख
मागपू्वं चिशब्दे प्रयुज्यमाने गङ्धानाभानि भवन्ति | तरिव्मा । त्यध्वा } वरिसरशिः । चिपया 1
तरिप्रचय | त्रिसच्चस ।
धोपो गोमण्डलं व्रजः ॥१६२॥
रयौ गवां व्याने । घोपरन्ते › शगावौञ घोपः] गवां मण्डलम् गोमरणडलम् । गवो ।
व्रजन्त्यत्र वजः । गोकुलम् । गोएट् ।
न _ ~ ^ (~ _ ©
श्वृद्ध् ह तहूरनाथदययस्तयक्च श्रड्मस्ः |
पञ्च मदिपादिके । परं श्रणाति द्िनस्तीति श्चङ्गः+१" (म्) | त्रिपु । हृञ्। हरये । द रति
पूर्वः | इतिं च्म॑प्रतेवकं जलमाण्डं दरति वदति दतिहरिः । “हरतेद^तिनाययोः १२ पशौ” इप्रययः ।
नाम्यन्तयुखः 1 नाथं स्वामिनं दरतीति * नाथहरिः । ''्टरतेद'तिनाथयोः पशनो" । तिरो उस्चयतीति
१. संदीयते इति विग्रहो न वुक्तः । सम्पूर्वस्य हाक्ल्यागायंकत्वालष्त॒तार्याध्रतीतेः ।
ग्रतः सन्धीयते स्म॒ संदितम् । सपपूर्वाद्ध्राजः क्तप्रयवे धानो ददिरिति ह्यदेशः। २. ६।१।१४४
का० सू०। ६. वुव्यते स्म वुक्तम्। ¢. का०सू० ४।६।४९ । ‰. का० सू ४।६।५६ । ६. का० उ
सू० ४८।२८ । ७. श्रतति सन्ततं गच्छति जनोऽ््र ग्रष्वा । श्रत सातत्यगमने” । “वनिन्तस्य
घः” का० उ० च् ६।५९ । इति वनिप्रत्ययः, तकारस्य धकार । रत्ति बलं पयथिकानाम् । श्रतेधं
शरेति कनिष् धश्चान्तादेश्तः ।” इति रामाश्रमः | ८, “प्ल पतने” । पतेस्थ्रेतीति योऽन्तादेश्वशरेति
अ्रन्याशवः । पथन्तेऽनेन ] "पये गतो” । पथयन्तेऽनेन । “पय गते । पथिमयिभ्यामिनिः । इतिं
रामाश्रमः । €. मुज्यते विद्रणीक्रियते पादैः । मृज्, शुद्धौ । घन् । बृद्धि; । छतं च ¦ मान्यते
इति वा । ^मागं यन्वेपरे'" 1 १०. वाछन्ते गव्दायन्ते वयर्थ “वाक शब्दै" । ११. 'श्यद्गमङ्गाऽङ्कनि"
का० उ० सू० {।४।४८ । “श रदिषायाः प्रत्यये निपातः । श्रद्ध गवादीनां विपाणपिति तत्रेव
दुर्गः । ततः शद्गमस्यास्तीति श्रं ्रादिम्योऽच् । एवं उति मदिपादिक््॑ा संगच्छते । श्रजभावे विषाण
मेवार्थः त्यात् 1. १२. ऋ० स० ४।३।२६ । १३. नायं नाषारच्छं दरतीत्यन्यत्र ।
नाममा ७६
तियञ्चः" । णातीति शम् । “शदुभङ्गङ्गानिः? एतेऽङ्गपलययान्ता निपात्यन्ते । श्ङ्घानि विचन्ते येपां
ते श्ण |
गोरचतुष्पारपशुः
चयोर गवि । पूजां गच्छतीति गोः । च्लारः पादा यस्याषौ चतुष्पात् । सश इति सनो
घाठ़ः । स्पशते [ बाधते ] इति पड्युः। उ्रषषटादयः--"यग्डुुषटुसुषडुदरदिभितद्रशतदु शंङृषनचम-
युपशुदेवयुजटायुङमा्युमृगयवः'' एते शब्दाः कुप्रत्ययान्ता निपात्यन्ते ।
तत्र महिषी नाम देहिका ॥१६६॥ .
दौ महिष्याम् । तन तस्मिन् मह्यतेः* सददिपः । नदादित्वादीः । महिषौ । दिते उपचीयते
टग्धेन देहिका" ।
कृती नदीपष्णो निष्णातः इरी निपुणः पटु; ।
जण्णः प्रधीणः प्रगल्भः कोविद विश्षारदः ॥१६४॥
एकादश कुशले । प्रशस्तं कतं कमस्य छती । नयां स्नात्तीति नदीप्णः । "'निनदीभ्योः
स्नातेः कौशले" इत्ति परत्वम् । नितरां संस्नाति स्म शुचित्वमाप्नोत्ति स निप्णातः ] कुस्तितं
श्यति कुशलः । अथवा कुशान् लाति कुशलः निपुणतीति निपुणः । शोभनकर्म॑त्वात् । परति जाना-
तीति पटः क्षुणत्ति स्न श्चुरणः ! क्षुदिर् सम्पेषणे । श्ङृ्टा वीणास्य भ्रचीणः इति मुख्यार्थं परित्यञ्च
निपुणे रूढा \ तदाहुः-
“° निरूढा लछच्तणा केधित्सामथ्योदमिधानवत् ।
क्रियतेऽदयतनैः केश्िककेश्चिन्नैव स्वशक्तितिः ॥"
प्रगल्मते प्रगद्भः । गल्म धाष्ट्ये | को वेत्ति तदभिग्रायमिति निर्व्या कवते कोविद्ः<
विशेषेण पापं शुणाति विशास्दः^ । क्तेवः । इतदस्तः । टृःतशुलः । व्रतकं । दप्तः । गिद्धितः
विदग्धश्चतुरः
द्धौ चतरे । विदह्यते ^ ° व्रिद्ग्धः } पुरुषाथांन् चत्तते याचते चतुरः ।
धूर्तश्चाटुकृत् कितवः शटः ।
'तिर्यञ्च'' इत्यकारान्तपारश्चिन्त्यः । वप्रत्यग्रान्तेऽञ्चदतविव त्िरयस्तियलोपे'' रद तियदिया
दति चकारान्तस्थेव युक्तत्वम् । चकारान्तसे चा्ाक्षसादे एकाद्रोनलेन मुले न्दोमद्वनय । नयपा-
सान्तस्तिय॑छ शब्दः केनाऽप्यन्यकोपकारेण पर्वर्थेऽभिमतः । तदुक्तम--वशुर्तियद्चरिः चिर
४।२८१ 1 २ सामान्यविश्ेपायथत्वादेषां पयायसराभावालत्रयो यवीत्ति पाठरिचन्त्यः) मोसन्डः पयु
चलीवददौ । चतुप्पत्पशु शब्दयोः सर्वपश्ुवाचकत्वात्पययायल्वमिति विवेकः ! ३. सा< डतर ग् १
ट. “हिस् वरदो । मेहते वर्ध॑ते वा विश्नालकायलात् । प्रेणादविल्रि् । द्यम
स्यानित्यवान्न तुम् । इत्यन्यन्न । ५. नात्र कोपाम्तरसं वाद्: ! €. पार स~ ८।३।.८२
ध्वन्यालोकलोचने १६ कारिकाटीकाःयामेवसुपलम्यते “ निसूालद्तणाः दारि चत्सा
उत्तरार्धस्त॒ न समुपगतः । <. कोति प्रतिपादयति धर्मादि कुःदिदः 1 ङुधातेादिर्
येति कः! कोविदः! द्यपदा क्विवेदे पिदा रस्येत सामारमः। <. ददद दर्दः
प्रत्यमो वा विसासदः। रति टेभचन्धः) विरिप्यी विपरयतेदा सन्द टि नमर} 4.
मैख॑चिसं एति स्म विदग्धः
९०
"^~
९
॥
„९1
च|
१०
१५
दवर्ग": का० सू० ३।८।५। इति धस्य दः । €
ह अमर्कीर्तिविरचितभाष्योपेता
चत्वारो धूर्तं । धूतंति स्म दिनस्तिस् सदाचारं धृतः | चाधः करोतीति चाट्ष्रत्
कितवोऽस्त्यस्येति कितवः । शटयतीति चाटः । दण्डाजिनकः | कंट्कः। कार्परिकः ) जालिकः कस
तिकः" । व्यञ्ञकः । मायावी । मायी |
कापि नागरक ज्ञेयः
कापि कुत्रापि ज्ञेयः ज्ञातव्यः । नगरे भवौ नागरिकः |
गोत्रदाद्नाम तत् ॥१६५॥
चत्वारो नामि । गवा वाण्या स्वाचरे त्रायते सनति प्रालयति गोचम्२ । पानं संक्ञा४ ।
ग्रह च नाम च समाहारत्वादेकवचनम् | ग्रद्भयते लदयते श्र्ुम्” । नमनम् नामः |
यग्धो मूढो जडो नेडो सको मूरंश्च कद्वदः ।
सत मूं । घर्मकरा्थ॑ुु मुह्यति सं शयं प्राप्नोतीति सुग्धः। सह वैचित्ये । मुद्यति स मूढः । -
गय्थ्यादिना क्तः) दो टः } } <तव्गं०। ठेदोलोप०^। धिः | रेफः । जडति न पुण्यं गच्छुतति१
। जाल्मश्च । न ईड्यते न स्तूयते केनापि ^ ^नैडः । मृ बन्धने । मूयते मूकः । १ ` मूकादयः-“मूकयूक-
दर्मकपूथुकवुकखकमूकाः? एते कमरलयान्ता निपादयन्ते । मुह वैचित्ये । मुह्यति कार्थ सूखेः } “पदे-२-
मूच” । कुल्वितं वदति कद्वदः । विधेव; । वालिशः । वाडिशः। वब्रालः । ¬ "्वद्धरः । सलिः१५
> १नालीकः । प्शुः | ।
स॒ देवानां प्रियोऽप्रज्ञो मन्दः
त्रयो मन्दे । देवानां धियः१० | व्रयि (न्थि)ल इयथः । न प्राज्ञः अध्राज्नः | कार्य मन्दते
स्वपितीवेति मन्द्; ।
१. कुसृत्या चरतीति केोखतिकः | ठेन चरतीति ठक् । २. पूर्त॑सामान्यायं इत्यर्थः ।
२. वचसा श्राचारेण च स्वस्य रूपं स्द्यते) नामाऽपि स्वानुरूपाचारवचोभ्यामात्मानं प्रतिष्ठा
पयति । रामाश्नमस्ुद्गूयते शब्दयते उच्य॑ते इति व्युपत्तिमाद । "गुड् शब्दे" । ४. तदुक्तम्--
श्ज्ञा स्याच्चेतना नाम हस्तायैश्चार्थसूचना" इति । श्रम० को ३।३।३३ 1 ५. श्रङ्कयतेऽनेनेति शेषः
नाग्ना जनोऽङ्कितौ भवति । ६. नमनं नामेत्यसङ्कतम् । भावे घञि प्रणामाथक दन्त्यनामशन्दसाधुत्वापततेः
ग्रतः “ना च्भ्यासे'? म्नायते उच्यते ऽभिधीयते ऽर्थो ऽनेनेति विग्रहो न्याय्यः । नामन् सीमन् इति निपा-
तितः ¦ ५. श्रत “मुहादीनां वा” का० सु: २।३।४६ । इति तकारस्य धकारः । ८. “तवगंस्य परटवगा-
"ठे दलोपोदीपरश्धोपघायाः' | का० सू० ३।८।६। इति
दलोपो दीर्घश्च । ९०. जलति तीव्रो न भवति । उलयोरेक्ये जड इति देमचन्द्रः। १९१. नेडशब्दः कोपर
न्तरे नोपलभ्यते । एडमूकरशब्दौोऽवडमूकरशब्दौ वा वाक, तिवजिता्थे लभ्यते । तदुक्तम्--"“एडमूकसत
व्रतु श्रोवुमशिदितेः इति } श्रम को ३।१।३८ 1 “एडमूक त्वावाकृश्रूतो” श्रभि० चि° २३।१२।
ग्रतो <चापि श्रनेडमूक इति पाठः सम्भाव्यते । जडविशेपवाचकत्वेऽपि तस्य सामान्यामिप्रायेर जड
व्रयोगः श्रनेडशब्दौ वा वधियर्थः सामान्या्िप्रायेण प्रयोगः) १२. का० उण स्र० २।५८। १३.
० उ० सू ५।१७। १४. नात्र प्रमाणान्तरसुपलम्धम् । १५. श्रत्रापि नान्वत्ममाणम् । १६. यत्राऽने-
कार्थसस्ग्रदहः ३।५४ । प्रमाणम् । तट्क्तम्-नालीकोऽके श्वरे सन्धे नालीकं पदमनन्दने" इति । १७
622
८ देवानां प्रिय इति च मूर्ख? वा० ३।३।२१। “ष्ट्या श्रलुक्ः' इति पा° सूत्रे |
१९ नामसादल
धीनामवनितः ॥। १६६ ॥
धीवर्जितः } बुद्धिवर्जितः । प्रतिभावर्जितः । प्रललाव्जितः ¡ मनीषावर्यितः । धिषखावर्ितः ।
मतिवजितः । संख्यावर्जितः । इत्यादीनि मू्ल॑नामानि मवन्ति ।
षाष्टिकः कुमः बालिवीहिः स्तस्रकरिस्तथा |
चत्वारः शालिभेदे । षष्टिरात्रेण पच्यन्ते पाषटिक्ाः? । पटिदिवधेर्त्पन्ना इत्यथैः । ५
कलयति पुष्टिमनेन कलमः । शालते धास्ये शालिः ! थवा सहालिना भ्रमरेण युतः सालिः । वर्ति
वर्धते नीहिः ।२ स्तम्बकरिः
वत्सः शकृत्करिजोतः पोडन् पदशचनः स्मृतः ॥ १६७ ॥
चत्वारो चत्से। मात्तरममीक्ष्णं बदति वत्सः । शकृत् करोतीति श्वृत्करिः । (ईः) “स्तम्ब
शकृतोरिति” ब्रीहविवत्सयोरुपसंख्यानादिन् । षड् , दन्ता यस्य॒ स ॒पोडन्। “समासे दन्तदशधासु १०
षष उत्वं दघोडदौः" षड् दशनाः यस्य स षड्द्शनः 1
रौण्डीरो गविंतः स्तन्धो मानी चाहयुरुदरतः।
उद्ग्रीव उद्धरे श
नव गर्विते ! शौण्डतीति सौरडीरः । ““कृशशौण्डम्य ईरः” । गर्वोऽहंकारः पेजातो.ऽस्य
गर्वितः । तारकितादिदर्शनास्संजातेऽथं इतच् । स्तभ्यते स्म॒स्तन्धः । मानः पूनादिलकतणो गर्वो वियते १५
प्रस्य मानी ! अदम् अहंकारो रहस्यस्य श्रहंयुः । "उर्णाऽहशुभभ्यो युः“ । उद्धन्यते स्पेण उम्धतः९। उद्
र्वा ग्रीवा यस्य स उदु्रीवः । उद्धरति गर्वेणान्यम् उद्धरः । प्यते रः
तीचस्च पिञुनोऽधमः ॥१६८॥
त्रयो दुर्जने । नितरां पापं चिनोति नीचः । मेरी पिंशति मैत्री पेशयति वा पिद्युनः८ । तालव्यः ।
. पनिष्ट वा पिशुनः 1 “भ्पिश्युनफाल्युनो” ननुपूरवो घान. । न दधातीत्यधमः । '“१ °घर्मसीमागरीप्ना- २०
धमाः” } दुखंनः 1 क्षुद्रः 1 कणंजपः। दोषग्राही । द्िजिहु
चोरेकागारिफस्तेनास्तस्करः प्रतिरोधकः ।
निशाचरो भूटनरो हैरिकः प्रणिधिश्च सः ॥१६६॥
११नव चौरे । चौरयतीति चोरः 1 स्वायं ऽणि चौरर्व । एकागारं प्रयोजनमस्येतपै कागारिकःः 1
१. "पष्टिः प्टिरात्रेण पच्यन्ते" पा० ५।१।९८ । इति कन् प्रत्ययौ रात्रशब्टुलेदध 1
२ स्तम्बं करोतीति, स्तम्बकरिः 1 “<¦ स्तम्बशकृतोः” । का० सर ४१३।२५ । हदति द पएरदयः 1
काण्सू० ४।३।२५ । ४. का० उ० सूर ३।४८ । ५. ““उणंऽहश्युममोत्” रति ६० ० ७।२१ 51
उत्कण्ठ हन्ति गच्छति हिनस्ति वा० उद्धतः इति देमचन्द्ः 1 ७. हस्वायं उं पाष्दो गतः दपर न्रि
विग्रह उक्तः! शरन पिशुनार्थातुरोषेन विप्रहमेदः । निपूरव॑कादिनोतेषद्िलकार्ः । उररर्दप
सन्यत तु निङृष्टमश्चतौति विग्रहः ! ८. रिश्सेकदे्ेन ष्यति “क्षपिरिसिद्निदिन्दः दिद य्रर
३।५५॥ इत्युनन् । पिशुनयति श्पिशुनति वा } “पियति खण्डयतीति गोलः पति देमनच्न्ः:
९. क्रा उ० चू २।६१ १ ९०. काठ उ सूर १५६ ! ६. सौय: 1खरान्यः प्र् नर । टर्
रादयः प्ररिष्यन्तास्मयो गुप्चरे । स्ति पाठ उचितः दुरम हर्दि सद्र । दसः
भिर चिर २।६६.७
र
=
4
1
ग १.1.
,. द्र प्ममरकीर्षिविरचितमाप्योपेता
९५
` स्तेनयति सयायति वा स्तेनः+ । उभयम् 1 तस्यति परद्रव्यं चयं नयति तस्करः 1 ^तसेः* कर" ।
श्रथवा छन् तत्पूरवः । तत्करोतीति तच्करः3 । तदाययट् । नाम्पन्तगुणः । रदित्व त्तस्य सकरा । परतिखणद्धि
मारय अतियोधकः 1 निशा चरतीति निशाचरः । गृढश्चातौ नरः मूढनरः । हिनोति परराष्ट्रं गच्छति
देशिकः । प्रकास नितं गुप्तो धीयते ध्रियते वा प्रणिधिः। दच्युः" । परराखन्दी । मलिम्नुचः।
मोषकः । प्रतिपोषकः ।
्रस्तरोपरपापाणद्पद्धातुः सिला घनः ।
प्रस्तृणा्याच्छादयति “रसतरः । काटिन्यमपलाति (उपटठम् । उभयम् । पिनि खें
°पाषाणः। पा्ानश्च । दणि चूणयति द्वियते श्राद्वियते वा कार्याय दपत्८। लियाम्। दधाति ^धातुः।
शिनोति तनूकरोति १शिखा । शिन्ली च११। खियाम् । न्यते १ घनः । भर्मन् । भ्रावन् । पुलकशच ^ “1
तत्र जातमयो लोम्
दौ लोहे ! तत्र तस्मिन् पाषारे जातम् उद्धवम् तत्रजातम् । ग्र्तरोद्धवः । उपलोदुभवः।
धातू्धवः । इषदुद्धवः । शिलोद्धवः । धनौद्धवः । इत्यादि लोदनामानि भवन्ति । श्रयते खवं विकारं
सान्तम् अयः । लुनाति स्वं लोहम् ।
शातकुम्भं नयेत्परम् ॥ १७० ॥
तत्र पाषाणे उद्भवानि सुवणन।मानि भवन्ति ।
क्षामं शन्तं कृशं क्षीणं दीनं जीणं च वैरिणाम् ।
शीणावसानं दनं च
नव कृशे । कायति स्म क्षामम् । शाम्यति स्मशान्तम् । छरम् । क्षीरम् । दीनम् ।
१. “स्तेन चौय" । ` चुरादिः \ पचायच् । २. का० उ० स्० ६।३। २. “तदाव्ादन्तनिन्त-
कारहुजाहदर्दिवाविभानि शाप्रमामाश्चित्रकत्त नान्दी फिंलिपिलिविवलिभक्तिततेतरजद्धाधन्वररःसङ्ख्यास च
का० सू० ४।३।२३ । इति जष्प्रत्ययः । ४. दस्युभ्रथृतयः प्रतिमोपकान्ताश्चौरपय्याया न इ
गु्ठचरपय्योयाः । गुस्चरपय्यायास्तु-ययाहवणं; । प्रपसर्षः । मन्त्रविद् । चरः । वारत्तायनः । सखशः
चारः 1 ५. “त्तम् घ्ाच्छादने" } पचाध्रच् 1 ६. श्रवा पलतोति पलः । श्रो; शम्भोः पलो वोप्रलः ।
. “"पिष्ल् सन्चृणेने" । बाहुलकादानच् । पृषोद्यादित्वादिकारस्याकारः । “पष वापे प्रन्ये च” ।
दलश्चेति घञ् \ पपत्यनेनेति । श्रणतीत्यणः । “द्रण शब्दे" । अच् । पाषश्चासावणश्चेति विग्रहोऽ्य
न्यत्र द्र्य: । ८. "'टणतिः पुग् हस्वश्चे" ति साधुः 1 £. '"धादस्तु गैरिकम्" श्रभि° चि० । “घातुर्मनः-
शिलाव्रगैरिकन्ढ विशेषतः" श्रम° को० 1 इत्यादिकोपप्रमाणतः सामाव्यग्रष्तरपयायेऽस्य पाठोऽयुक्तः ।
१०. शिनोतीति तालव्यशिषादनं कचि दुपलम्यते \ “शो तनूकरणे” 1 त्य श्यतीति रूपम् । तनूकरौ-
तीत्यर्थः } ततः शिलेति निपातो बाहूुलकादौणादिका्थैन समायात्ति । रामाश्रमादिव्छुत्पत्तिकारैस्ठ “शिल
उञ्छ" शिलतीति शिला । इयुपघेति कः इत्युक्तम् । तत्रान्तरतम्यं ुषीभिर्विचार्णीयम् । १”. उदुग्बस्धाथ
शिली शिला चापि शिलिः स्मृतः” इति कल्पद्रुकोपवाक्यमवोपोदटलकम् । १२. “मृत्तौ धिश्च” का० सू?
८।५।५०) हन्तेरच घनादेशश्च । १३. तदुक्तम्-“पुलकः कृमिभेदे त्यान्मरिदोपे शिलान्तरे । गजान्नपिण्डे
रोमाञ्चे गल्वकेहरितालयोः ।” वि० को० का० व° ११६ ।
नामसांला ८३
जीय॑ते स जीशेम् । शीय॑ते स रीरणँम् । अवस्यते श्रवसानम् + । दृयते स्म दनं च 1 दे रजेन
तव वैरिणां शत्रूणां भवलु इति प्रयोजनीयम् ` ।
© गयं
धेयं शोयं च पोरुपे ।१७१॥
जयः पौरुषे । धीरस्य भावो धैर्यम् । शरस्य भावः शौयम् । पुरुषत्य भावः पौर्पम् ।
युष्माकं भवतु इत्यध्यादाय॑म् ।
पिप्राञुमद्श्वरं शीघ्रं सहसा स्वरिति द्रतम् |
तूणं जवः स्यदो रंहो रयो वेगस्तरो रघुः ।१७२॥
षोडश> वेगे । किपति* निरस्यति क्षिप्रम् । रकृप्रत्यय उणादौ ज्ञातव्यः } श्नुते श्रु 1
कृषापाजीति उण् । मज्जति मदति वा मङक्षुः* । इयति मान्तमन्ययम् नरम् । अदन्तं च श्रम् । शेते
काये शीव (शिष्क) ति व्याप्नोति वा शीम् । सदते सहस्राः । शरव्ययम् । कटति संवातीभवति
इदन्तमव्धयम् 1 रिति” । द्रवति स द्वृतम् । त्वरते स्म तृखम् । जवनं जवः । ज गतं । स्यन्दते
स्यदः । “स्यदो जवः<” इत्ति साधुः । रंहयत्यनेन रंहः । रयते रणात वा ऽनेन सयः ! वीय (विच्य) ते
वेगः ` । तरत्यनेन तरः । “^ °सवंघातुभ्योऽघुन्" । लङ्घते भूमि लघुः । संवेगः । गत्िवचनो जवो घम-
वचना आ्ुशीघ्रादय इत्यथंमेदः |
सदागतिप्रस्तावादाई--
9 * ^ 9 मि
साधीयोऽत्यथं मस्यन्तं नितान्तं सुष्टु वे मशम् ।
स्त श्रो । साधुभ्यो दितः साए्धोयः?१ । यतु: । श्रत्तिक्रान्तोऽथं वेलां माननाम् न्तं च
श्मत्यथ॑म् । श्चत्यन्तम् । अतिविलम् । ्रतिमाच्ं च । निताम्यति स्म॒ नितान्तम् । रीति सुष्टु ।
१. श्रनावसानभि्ना शछष्टावपि शब्दा विरेष्यनिष्नास्तेन ऊुटुन्वमिति विगेषमष्याायं द
राजेन्द्र॒ तव वैरिणां करटुम्बं दामं भवतु 1 एवं शान्तं कृशमित्यायपि योज्यम् । श्रवसानराव्दत्य भावल्यु-
उन्तत्वात् तव वैरिणामवक्ाने नाशौ भवत्विति विविकः ] श्ररवध्यते इव्षानमिति रीकोक्तविग्रदस्सदुतः ।
श्मवपूव॑स्य “षौ इन्त कमणि” इत्यस्य भावलरि प्रवसीयते इति रूपम्, नत्ववस्यते इति । यर्तरि लटि {यादा
प्रवस्यतीति परस्मैपदमेव । नापि कतृष्तान्तो वसानशब्दः । त्तप्त्यये “श्रविः दति रपव मर्दवम्मत-
त्वात् । तस्मादवसायतेऽवसायो वा श्रवसानमिति विग्रहो युक्तः! >. कोपान्तरप्रमाखतो प्यवह्यमनः
घेयादिशब्दानां परस्परकमममेदात्व्यायानरहत्वेऽपि चलसामान्यविवक्तया ध्यः पौव्पं सृन्दुतम्
चनो जवो घ्म॑वचना आुशप्रादय दत्ययमेदस्य बध्यमारतात् द्धिप्रादपस्दृरस-ता
अवादयो लप्वन्तास्सू् वेगायं हति सुवचम् 1 ध्द्रार् इशेष्टाय ऋरितिपतत्छट्वास्पं
कतव्येऽपि एुथर्य पाठो भटितिश्षब्दपुनरक्तिस्च दोपः। ४. पति विलम्दमिति ङः | ५ “दु मग)
खो" । बादुलकात्छुः । मल्विनशोरिति नुम् । स्कोरिति उलोपः । मञ्डति कालाल्ठे मदः! ६. "तद
मर्षणे 1 घवा प्रत्ययः यद्य सदस्यति ! “पोऽन्तक्म॑रदि"" । षाप्रसयौ दद् 1 विमतयन्दपहिनरण्यरा-
रान्तप््पयम् १ उदाहस्णम्-“खट्खा दिदषीत न॒ लिपादित्वदि" | <. "ड र्हि"! श्य
रतिः! ८. कार चू ५६।३५। स्वन्देघलि नलोरो द्दानादस } त्यन्दने स्स्ट् रद्द मावः
न्यास्यः | €. “सो विली भयचलनयोः 1 १०. कार उर दर ४५६ 1 ६६. ष ध
साघीय एति । सुम्पो हित एति टीकोक्तविषररस्ु न स्स्टडे । हदिया द्वा व्थनर् ! दपर
एति मूललोत्तपरस्य सीरप्वेन रित एति पुंविः्रोऽ३े वच ।
१०
१५
१०
५१
ल्ट प्ममरकीर्तिविरचितभाप्योपता
“्षषटदयः-्रपष्ु दुष्ट ब॒षटु दरिद मित चतद््, गुं धनु इत्याद्यः । वें शरव्ययम् | विभर्विं भृशम्: ।
स्फुटं साधु खलु स्पष्टं विगदं परप्कलामल ॥१७३॥
सत निर्मले । खुरत्यमिश्रायोऽस्मात् स्फुटम् । साधयतीति साघु । खलतीति खलु" ।
सय्यत्ते स स्पष्टम् । विष्ठति चित्ते चिश्चदम् । पुष्णातीति पुष्कलम् । न मलमस्मिन्, ्रमलम् ।
प्रकाशम् । प्रकरम् |
[9 १४ [4 चों (५ [1
चित्रारचयाद्भुतं चोद्यं विस्मयः केतुकोऽप्यो ।
षट् कौठके । चिल. चयने ! चिनोतीति चित्रम् । श्राचरतीत्यादचर्यम्ः । पारस्करादि-
त्वास्छट् । मू. उत्तावाम् । श्रद् पूर्वः । शरद विषितो भवत्वत्र श्रद्भुतः । “शरदि शवौ इतः” । चोगते इति
चोद्यम् । विस्मीयते दति वि^्मयः । ऊढस्य भावः कौतुकम् । शरदो लोका श्रार्चर्थम् इति
प्रथोजनीयम् ।
अभियोगोचघमीग्रोगा उत्सो घिक्रमो मतः ॥१७४॥
पञ्चोध्यमे ] श्रमियोजनम् श्रभियोगः | यष उपरमे । वम् उदपूर्व । “ुरादेद्च "दन् 1
(यरल्योप० + °" -चीर्घः ] उन्ामि इति जातम् । “मानुचन्वानां * १" दृस्वः । उद्मि वातम् । उद्रमनमुद्यमः ।
मवि घज. । “कारितत्य०? > 1” उग्योजनम् उग्योगः । उत्व्नमुर्सादः । विक्रमं विक्रमः ।
रदोऽनुरहसोपां ग रदस्यं च भिनति फः।
चत्वार एकान्ते ¡ रदति व्यवति चनः सद्धं यत्र खान्तं रहः । क्लीवे । श्न्ययं च। श्रनुगतं
रदः श्रनुरदसम् । “उ च्रन्वववम्तम्यो रद्” ! उपारे ्रव्ययघदन्तम् उर्पादयुः । रदषि भवं रहस्यम् |
कः पुमान् भिनच्चि विदारयति । प्रच्छन्नम् । एकान्तम् । । निःशलाक्म् 1 उपरम् । विनम् ।
चिविक्तम् 1 जनान्तिकम् ।
क ट्रे वपु रः ~ क
कीनान्रः कृपणो लुष्धो गृष्यु्दीनोऽभिलपुकः 1 १७५ ॥ `
प्रर कृपणे । लोमेन क्लिश्यति बाध्यते › "कोनाश्चः । की वाणीं याचकानां नाश्वति विनाशय-
तीति कीनाशः । कल्यते रकषिठं न द दा" छृपणः 1 लुम्यति सर लव्यः । खध्नाति नः । शध्ुरित्यपि
त्यात् । लोमेन ग्रोतते शोभते ( दीयते क्षेवति ) दीनः। दीङ् चयं । कचित् दानः इत्ति पठन्ति । लप
कान्तौ । श्रमिपूरवः | ्रभिलप्रतात्येवंशालः श्रभिलापुक्रः । छकमगमदनवृमूत्यालवपतपद् मुकट " ५“ ।
१. का० उ० च० {६।१५ । इति कप्र्वः । २. धातोः यप्रत्ययः किदित्यर्थः | भृद्यतीति
शं वा | “रु श्रय अवःपतने'" | दिवादिः । इयुपवेति कः । शृारत्रान्तर्मावितण्यर्थः | ३, छुव्तीति
कर विव्रहो न्याय्यः, नत्वपादानकः तत्र घनि फोर दत्यापत्तेः 1 शरत्रेगुपवेति कः ] ¢. लल द्ध" |
बाहुलकादुः । वखलुशव्दौ नानायं 1 तदुक्त म्-^“निपेषवाक््याऽलद्कारे विन्नासाञ्दुनये खलु” । श्रम को°
३।३।२२५ । ५. '“चित्र चिव्रीकररो 1“ चिव्रयतीति चिच्रम्र् । पचाद्यच्। दरलन्यघ् । ६. श्रा इति
ऽमिनीयते इतिं विग्रहोऽन्यत्र | 'ध्य्राश्चर्वमनित्ये” दति घुट् 14. का० उ० सू० ४।२५1 ८. चौराव्द
श्राश्रव्थिं । तदुक्तम्--““चोदन्ठ परय प्रर्नेऽदूरुतेपि च” श्नने०° उ० २।३६२ 1 €, का० तरू ३।२।११।
१०. का०व्° ३।६।५ 1 ११. का०्च° 21४६५ । १२. काण्ठ्० ३।६।४८४॥ इतीनौ लोपः । १३. काण्व
३।४।४१ ] शत्र रावादिवृक्तिः २९1 १४. “ क्रिय. विवाधने” ! “क्िमेरीचोपायाः कन् लोपश्च लौ नाम्
च" पा० उ० व° ५१६९६ | १५. का० व्० ८४३४]
समिसा ८५
कदय; । किम्पचानः } मितम्पचः । क्षुरः 1 श्षुष्टकः । क्लीवः । क्षुद्रः । वराकश्च 1
पाशनीतः सितो बद्ध; सन्धानीतो नियन्तः ।'
नियामितः श्ृह्वछितः पिनद्धः पारितो रिपुः ॥ १७६ ॥
नव बद्धे 1 पाशं नीतः पाशनीतः । सीयते स सितः । वध्यते स चद्धः । सन्धां प्रतिज्ञां नीत
प्रापितः सन्धानीतः । नियन्नं संजातमस्य नियर्चितः । नियामो जातोऽस्य नियाभितः शला
जाताऽघयेति श्णट्ुलितः 1 तारकरितादिदश॑नादितच् । पन्ते स्म पिनद्ध: । पाशः संजातोऽस्य पारितः ।
कः रिपुः शुः । |
कान्तं च फमनं कम्रं कमनीयं मनोहरम् ।
अभिरामं र(र)षणीयं रम्यं सोस्यं च सुन्दरम् ॥ १७७ ॥
दश वरिष्ठे (श्रतिखुन्द्रे) । काम्यते कान्तम् । काम्यते कमनम् । कामयते इत्येवंशीलं
कम्रम् 1 काम्यते बाज्छुयते कमनीयम् । “१तव्यानीयौ? । मनोदरति मनोहरम् । मनोदारी ।
मनोरमम् । श्रमभिरमणम् श्रसिसामम् । रणस्य (णाय) दितं समणोयम्२ । रम्यते रम्यम् । सोमस्य
भावः सौम्यम 3 । मुन्दः सोत्रोऽयं सन्दति सुष्टु नन्दयति इति निरुक्या सुन्दरम्» ।
चार् इरुशष्णं च रचिरं प्रस्तं हृयवन्धरम् ।
दश्चनोयं मनोज्ञं च
श्रष्टौ मनोज्ञे । चरन्ति नेचाण्य् चखार । शिष्यते युज्यतेऽनेन दलक्षणः"” । रोचते सर्वभ्यो सरचिरम।
प्रशस्यते स्म प्रशस्तम् । हृदयस्य प्रियम् हयम् । चित्तं वध्नाति चन्धुरम्। द्यते दसेनोयम्।
मनो जानातीति मनोक्षम् ।
चित्तपर्यायहारि च ॥१७८॥
चित्तदारि । मनोहारि । इत्यादीनि मनोहरनामानि ज्ञातव्यानि ।
अवदेयायं तुपारं च प्रार्य तुहिन हिमम् ।
नीहारम्
षड् मे 1 अवश्यायते वदयायः । ^दिरिलिहिरिलपिश्वरिव्यप्यतीररयाः-तां चः"
रप्रत्ययः । तुष्यन्त्यनेन तुषारः । प्रलयादागते प्रालेयम् ° । तोदयव्वर्दयति तुटिनम् । तद्र श्न |
हिनोति वर्ध॑ते जलमनेन हिमम् । निहियते नीहारः । मिरिका । धनिका 1 देरयाम् |
१: का० स= ३।७।९। २. रमणाय हितमिति विग्रहो य॒तः । तस्मै हितमिति चटुः दन्तान: ।
मूत्त छन्दोभङ्गदोपवस्णाय रसणौयमेव रमणीयम् इतति स्वार्यिवो ऽरापि वारयः | ३. नेत्ये जच ह्ु
विग्रहो उयुक्तः । “शकृतिजन्पबोधे प्रकारीभूतो नावः" रति सिद्ान्वाद् संभ्य दत्य रुमदत्य
यापततेः । पतः सोमो देवताऽस्पेति ब्युतत्तिः, "नलोमाद्ट्यख्? । रति दवस ! दपदा म दव म |
ततश्चतुवंणदित्वात्प्यण् इति रामामः } ४. सुष्टु द्वियते श्राद्रियते
प
र 1 ट्पतरय् । पदोः दग-दन्युः ।
सुष्टु उनत्ति भद्वीकरोति चित्तं वा । सपूवकात् “छन्दो पलेदने उन्दधःतनरले दरः ॥ 52"
दित्वात्परस्पम् । इति रामाश्रमः । ५. नेत्रं मनो वेति रोदः ] "र्हि व्यनि" 1 "पदप स्त
उ० सूर ३।१९ । एति पस्लः। उपधाया रसश 1 ६. दार त 1.58
घ्त्ेति प्रलयो दिमादलः 1 तस्मादागतं प्रादेयम् । दय्! भेर्रतिदय ताम स. त
५।३}२ } एति पादेरसिपादेश्वः )
#।
„९१
१५
८६ जमरकीतिविरचितभाप्योपैता
तस्करं विद्वि मृगाद्धुः रोदिणीपतिम् ॥ १७६ ॥
तव्य करस्तत्करस्तम् । दिभशन्दातकरणान्दे प्रयुज्यमाने चन्धनामानि भवन्ति | श्रवदयायकरः ।
तुप्रारकरः । प्राल्ेयकरः 1 त॒द्िनिकरः । दिमकरः ¡ नीहारकरः । मृगाद्भः । रोदिणीपतिः। शी नामानि
विद्धि जानीहि ।
पुन्नागं सन्नरं प्राहुः
दौ श्रधानपुसपे । पुमोदचा्ौ नायः शेः पुन्नागः । खंश्चाठौ नरः सन्नरः ! प्राहुः व्र.वन्ति ।
तिरुकं च विशेषकम् ।
¢ ५
लह्छायिका रलामापि पएूणवादं तथा द्रुमम् ॥१८०॥
पट् तिलके । तिलकाङृतिः तिलकः । तिलतीति तिलकम् । विशिनष्टीति विपः । स्वार्थं कः
पिदोपक्षः । लल्यते ललायम् । के प्रत्यये ललाटिका । लल्यते लल।मा । पूरं वादयतीति प्रवाहः ।
द्रवति बृद्धि गच्छति द्भुमः । तमालपत्रम् । चित्रकम् ।
अञ्जनं कज्जलं नागं गजपाटरमारूणएम् ।
प्रद्: कञ्जले । श्रन्यतेऽनेनेस्यञ्जनम् । कपति नेन्रवेरूप्यं कच्जलम् । न शोभाम्
श्रगति गच्छति नागम् । गजति शोभया माति गजम्) पारल्लाया इदम् पाटलम् । च्छति गच्छति
शोभाम् आरणम्? ।
साहं परिधि वृक्षं च
जेयः श्राकारे । सरति गच्छत्ति कालान्तरं सालः! परिधीयते वेष्टयते अनेन परिधिः
वृणोति नगस्माच्छाद्यति चक्षस् 1
कुल्यां सीं सारणीं विदुः ॥१८१॥
चयः” पानीयनिर्ग॑मनमार्ये । कुले ग्दै साधुः कुल्य । स्वरणाति वैरूप्यमाच्छिनति स्बी । ,
सरत्यनया सारणी । तां विदधुः कथयन्ति धनञ्जयकवयो भाप्यकतारो ऽमरकीत्याचायाश्च ।
चरोऽवस५ः प्रणिधिर्निगूपुरषश्चरः ।
पच्च चारे । चरति शवुमण्डल्ञे चारः०। श्रवर्पति श्रवसः । - अपरर्प॑श्च । प्रकर्पैस
१. श्रत्र तिलकविशेपके रीकोक्ततमालपन्नचित्रके च ललाय्छृततिलकाऽलद्भस्ये । तदु-
क्तम् -^“तिलकफे तेमालपचचित्रपुण्टूविशेपका :” । अभि० चि० ३।३१७ । ललारिका पतरसमूहङृत-
ललाटमूप्रणम् । तटृक्तम्-'पत्रपाश्या लल।रिका"' श्रमि० चि० ३।३१९ । ललामा ठ सीमन्तामे मस्र
मणीभिरिव धायैमां रलनादिकृतभूपणम् । तदुक्तमू-“"पुरोन्यस्तं ललामकम्"' श्मि० वचि० २।३३६।
पूर॑वादद्रुमयोस्ठ कोषान्तरे पाठो नोपलन्धः ¦ २. पर् कनल । इत्यविचारषदम् । शज्ञनकनल
समामा्थौं । नागगजपार्लारणा श्रोएकपोलादिरन्जकलोदितरङ्कविश्षेपवाचकाः । तदुक्तमू-खनेकाय-
सडग्रदे-"नागो मतङ्खने सपं पुन्नागे नागकेवरे” २।३४। "पार्लन्ढ॒कुयुमश्वेतरक्तयोः? >।५०१।
““्ररुणोऽनूरतूर्ययो; । सन्ध्या रणि वुपे कुष्ठे निःशब्दाऽव्यक्तसागयोः"' ३।१९८ । २. श्रर्णमेव असुखम् |
£. बरत्शब्दस्य साला कोप्रान्तरकतवादो नोपलन्धः । ५. शत्र द्वाविति वक्तव्यम् । खीशब्दोऽत्र कुल्या-
सारण्योः ल्ीलिद्धयोधकः; तत्पव्यायः । ६. पूर्वमुक्ते ऽपि सिंदावलोकनन्ययेन चारेऽयंऽन्यानपि शब्दान्
उमुचिनोति ] ७. चरति श्तुमण्डले चरः , चरेरच् । ततः स्वा्थिकोऽण् ¡ चर एव चारः ।
नाससाल ८७
नितसं गुप्तो धीयते प्रणिधिः \ निगूदस्चासो पुरुषः निगूढपुरुषः। चरतीति चः 1 स्पशः । भवाथ.
वः | मन्तर्ञस्च )
तदातुक्तः सहसाक्षः
तस्मात् पूर्वाक्तशब्दात् परं वान. इति प्रयुज्यमाने सहसराक्चनामानि वन्ति । नियूटु-
पुरुषवान् । चरवान् इत्यादीनि ज्ञातव्यानि । ५
सत्याथं सृतृतं ऋतम् ॥१८२॥
सत्यार्थ दवौ । सु सुष्टु तं सवयं सूदतम्। परषोद्रादितवान्नाडागमः। च्छति गच्छंति जनः
रत्ययमन ऋतस् 1 तथा चामरकोषे --- “सत्यं तथ्यं सम्यक् ।»
¢ *
निस्तलं वतु र वृत्तम्
जयो वतु^ले } निर्गतं तलं प्रतिष्ठा ऽस्य निस्तलम् } श्रयवा निर्गतं तलादधोभागाननिस्तल ए
भूमौ न तिष्ठति वा । वर्तते भ्रमति वतुम् । इत्यते स्म चरन्तम् । सँ नपु ।
स्थपुटं विपमोन्नतम् ।
विपमोन्नते स्थपुखम् । स्थ।पयत्यात्मनो विपमोन्नतत्वे स्थपुटम् । प्रायः क्लीवे ।
दीर्घः शु
१५
दरौ3 दीर्घे ! दणाति दीधेम्४ । पाते व्याप्नोतीति ब्रं
विशार च बहुर् पुर प्रथु ॥१८३॥
चत्वारो विस्तरे । विस्तारं विशति विशार्लम् । वहून् लातीति चहुखम । प्रयते वर्घते
पृथुलम् । गुणमात्ृततेलेः । पर्थते पृथुः ! वृहत् 1 उरः । गुखः । वित्तीणंः।
उल्वणं दारुणं तिग्मं घोरं ती्रोग्रषु्कयम् ।
सप्त घोरे 1 उल्वणव्युटवणस्° । प्रपोदरादिखात्पत्ते लः । दारयति दारूणम् । तितिरतीति
तिग्सम्< । पुरति घोरम्^ । तीवति तीचम् । तीव स्थौल्ये रक्। उच्यति उग्रम्) : | उत्यते
उत्कटम् । प्रतिभयम् । भीमम् । भयानकम् । शामीलम् । भीपरम् । मीप्मम् । भैरवम् ।
शीतलं तिमिरं याथं मन्द् विद्धि चिरम्ितम् ॥ १८४ ॥
१. यथाथ यथा श्यः प्रयोजनं वर्णो अतिः प्रसिदिवा यस्येति तदयंः। २. ददर ४
१।७।२२। ३. वस्ुतस्त॒ पाशदीघयोर्थमेदः । दीषंविस्टेतायतशय्दयाः पर्यायाः) नरान्द -
दीघमायतम्* अमर कोभ ३।६।५५ 1. "द् विदारणे" ¦ दाटुलदाद्वक । दाति हरर दिति द ;
५. प्रकृष्टा श्रं शवोऽस्येत्यपि । €. "विश प्रयेशने" । बाटुलकादलः | रामानः दनद
रत्ति पा° सुनरेण विशषब्दाच्छालस्पस्यपमाह् । ७. उदुदसतति उत्वसय् ! पददा दत
पारोजञत्न युक्तः । “वस शब्दे । चद् 1 उल्वणतप्दः दस्ठुतः र्रर |
हुद्वेजको भवति खलानाम् । उत उदेखकत्वसःमान्पानपाट 1 =. नितःरहः |
युक्तम् । "'तिञे निशाने'' । निसानं तिक्णौरर्णम् ! तेखयठौति तिय । प्वन्-व्दय, । <. र
यंसन्दयोः" 1 घोरयतीति घोरम् । ण्यन्तादच् 1 ९०. उस्दति दुधा स्ज्प्दः उनम । ` उद गन
दिवादिः \ “ज्ञेन रत्पदिना रर् गल्ान्तादिसतः ।
^<
१०५
१५
८८ अमरकीतिविरचितभाप्योपेता
पश्च कार्यविलम्ये (भ्विते) । शीतं लाति मन्दो भवति कार्ये शीतलम् । ताग्वति स्वकर
मिच्छति तिमिरम्" । स्तिमितं स्थिमितं वा पाटः । यथा मवं याधम् । मन्धते मन्दम् । विलम्ब्यते
विलम्वितम् । विद्धि जानीरि ।
स्वभावः प्रकृतिः शीलं निसर्गो वि्वसो निजः
पच्च स्वभावे निने । स्वः स्वकीयो भावः स्वभावः । प्रकरणं भररतिः । शीलयते शीलयति
वा शीलम् । निभ्यते निसर्गः । विश्वखितीति विद्रवः । विरवासश्च । विश्रम्मः ]
योग्या गुखनिकाऽभ्या्षः |
च्नयोऽम्यासे } युज्यते योग्या । गुण्यते ऽदर्निशं गुणनिका } च्म्यनमभ्यासः ।
स्यादभीकष्णं युहूरमहुः ॥। १८५ ॥
मुहर्यहुर्वरं वार ॒स्यात् भवेत् । श्रमीक्ष्णम् । श्रभीक्तराम् श्रभीचणम् । श्रमिमुलमीकदते
वा अभीक्ष्णम्" । नितराम् । । ।
मुपारीकं युधा मोघम्
चत्वारो ° पलीकेः । मृष्यते सदते नारकं दुःखमनेन सरुषा । श्रादन्तमन्ययम् । श्रलति स्वस्वाङ्गा- ,
(स्व्गा)ननिवास्यति श्रलीकम् । युति सजति निमित्तं सुधा । श्रादन्तमन्ययम् । मुह्यतेऽतर चित्तं मोधम्। `
विफटं वितथं वरथा ।
निष्फलवचने त्रयः । विगतं फलं विफलम् । विगतं तथा त्यं यस्मात् वितथम् । वृणो
त्याच्छद्यति गुणान् चधा । यञ्ययम् ।
विधुरं न्यसनं कष्टं कच्छू" गहनयुद्धरेत् ॥ १८६ ॥
पञ्च कष्टे | कष्टेन विघुनोत्ि शरीरं विरम् । भ्य्यते श्रनेन व्यसनम् 1 कष्यते
(कपि) क्यम् । कृणोति छिन्त दुःखेन छृच्छ्रम्" । गाह्यत गहनम् । उद्धरेत् निस्तरेत् ।
समस्तं सं सवं कलनं विश्वं तथाऽखिरम् ।
प्रट् समप्ते । समस्यते एकीकरोति समस्तम् । समं ग्रसते समम् । समानं कलयतीति
“सकलम् । सरति सर्वम् । छृन्तति वेटयति व्याप्नोति कृत्स्नम् । विशति तिष्टति सर्वत्र विदवम् ।
नास्ति खिलं शूत्यमस्याखिदम् । निखिलं च ।
१. “तिम चारदरीभावे"" । त्िम्यत्ति च्र््रीमिवति तिमिरः। विलम्बशीलो जनः स्वदार इव
शीतः स्फूतिरहितश्च भवति २. विश्वसशव्दस्य प्रत्रत्यये प्रमाणान्तरं नास्ति । एवं विश्वासो विशधम्मोऽपि।
विश्ववशब्दाऽ्वाख्यानमपि व्याकर्णाद्स्पष्टम् | श्रतोऽच त्रिष्वपि मूलरीके एव प्रमाणम् । ३. योगे
चिततैकाथ्ये वाष्वीति योग्या "'तव्र साधु""रिति यदन्यत्र । ४. गुण्यते गुणना । चुरादिणिजन्ताद् भावि
“ण्यासश्नन्येति युच् ! ततः स्वार्थं कः । गुखनैव गुणनिका । ५. अमिति श्रभीकएम् । “णु तेजने” ।
बाहुलकाड्डमुः । शन्येपामपीति दीषेः । इति रामाश्रमः । ६. त्र मृपाऽलीकशन्दौ वक्यमाणो वितय-
श्चाकषत्यवाचकः 1 मुधामोधशब्दौ विफलब्रयाशब्दौ च वच्यमाणो व्वर्थवाचका इति विवेकोऽ-
न्यत्र । तट्क्तममरे-- “मूपा मिथ्या च वितथे" ३।८।१५ । ''त्रलीके त्व्रिये्धते” ३।३।१२ । “भमौधं
निरथकम्” २।१।८१ । व्य्थके तु त्रया मुघा” ३।४।४। भवितयं त्वन्तं वचः" १।८।२१ } इति।
७. कर्प॑ति ऊन्तति वेति क्ती° स्वा०। ८. समस्यते स्म॒ समस्तम् । श्रु क्षेपो" । कर्मरि छः ।
€. सङ्गतमग्रमस्य समग्रम् 1 १०. सद कलाभिवेतते सकलम् 1
१२ नासमाला
शकर विकर खण्डं शल्क लेशं ख्वं पि
प्रट् खण्डे) शक्नोति कायि शकलम् । शल्कं च । विगता कला यस्मात् तद् चिकर्म् ।
खण्ड्यते खणड; } लिश्यते लेशः 1 लिश विच्छ गतौ । “कर्तरि च कारके संज्ञायाम् 1 रति शब्दं
फरोति लवः । विदुः कथयन्ति । अर्धम् । नेमः । सामि । श्रसम्ूर्णम् । दलं च ।
सम् फोपं च
ठ समसि । भ्रियतेऽनेन ममं 1 नान्तम् । कुष्यते कोषम्४
फलदं परिषादं छं नयेत् ।
; ।। १८७ ॥
करेण हन्प्यत्र कलहः । परिवदनं परिवादः । छलयती (तयत्रे)त्ि खरम् ।
शोणितं रोहितं रक्तं रुधिरं क्षतजासूजम् ॥ १८८
षड् सुषिरे । शोष्यते वण्यते देहोऽनेन सोणितम् } तालब्यः । रोदति देहे जायते लोहितम् ।
रजति रसं रक्तम् । रुणद्धि रुधिरम् 1 कतादु बणाजायते स्षतज्ञम् । रस्यते क्तिप्यते श्रक् ।
सन्ततानारतजस्रान्वह् कन्यापातिवर्ः
८<
चयः (चत्वारः) सन्तते | सन्तन्यते स्प सन्ततम् । न श्रारतम् श्मनारतम् । न जव्यतीययेवंपतील-
मजसखम् | श्रन्थ् । कल्यापतिचेरः नन्दतु इति प्रयोजनीयम् ।
उद्वाहः परिणयनं विवाह निवेशनम् ॥ १८६ ॥
चत्वारो विवाहे । उद्वहनं उद्वाहः परिणीयत्ते परिणयनम् । विवाद्पते पिवादः।
निवेश्यते निध्रेशनम् ।
शुपिरं विवरं रन्धं छिद्रम्
चत्वारर ! शुष्यति जलमत्र "दयुपिरम् । उषशुषीति रः 1 विन्नियते मूमध्यमनेन विवरम् !
रणति वातेन रध्यति ददिनस्ति प्रारिनं वा रन्ध्रम् ! दियते तत् छिद्रम् । ङुदरम् । विलम् । निव्यं
थनम् 1 रोकम् । द्वश्चम् । वपा । शुपिः 1
गर्ता च गहरम् ।
गर्तायां दौ । पतितं प्राणिनं गिरति सर्ता ! गतेः । सूदतीति गरम् ।
श्वभ्र रस्यं च पातां नरं यान्त्यमेधसः ।॥ १६० ॥
चत्वारो नरपे | वयते वर्धतञ्ोपरि चरतो शङ, स्वनिम्रन्तिं वा अ्यश्यम् । रेखायां ध:
शस्यम् | पतन्त्यसिन् पातालम् । नराः कायन्त्यत्न नरकः । नारदः । पुति) धयम
‹"ज्तिशा प्परल्पीभे!ते
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॥ दिवादिः ! ततो पददिपानमया रनम् 1 २. न्द
४१५४ } ३. दूयत द्धिपते लसंवः । श्ृदोरप् ॥ टीकोन.विग्रहस्तु न लउनापदसिप्रायः । ८.
परस्य१्यन्दशः (* >
शाच्ट्ः पेशीवाचफा मेदिन्यां लभ्यते ॥ पेशोनां मृपस्वानन्यम्प्ररः त्द् सम्मनयू
म्मैखभ्युन्नेयम् । तद्रज" कोषो ~सौ कुर्मले पात्र दिसते सदुपिपिःम
शब्दादिसस्ते'' । पार्द ६1५. "्तिमिर्पिपदिगग्दिच(-ददपिरसिददि-दः रः
रुपिरस्यास्तीति विमरेतु ''उपमुपिरृप्छमप) स पार्स ५२१२७ । दूति रः;
उपसुपीति पार सुप्र दन्त्य एव पाटः! दरस्याम्यपि दन्त्यमेद उर
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८८ अमरकीर्सिविरचितभाप्योपेता
पञ्च कार्यविलम्वे (म्विते) । शीतं लाति मन्दो भवति कार्थं शीतलम् । ताग्यति स्वकाय
मिच्छति तिमिरम्" । स्तिमितं सिथमितं वा पाटः । वथा मवं याथम् । मन्यते मन्दम् } विलम्ब्य
स्म विलम्वितम् ! चिद्धि जानीहि ।
स्वभावः प्रकृतिः शीलं निसर्गो विश्वसो निजः ।
पच्च स्वभावे निजे । स्वः स्वकीयो भावः स्वभावः । प्रकरणं प्रकृतिः 1 शीलयते शीलयति
वा शीलम् । निखञ्यते निसर्गः । विर्वषितीति विद्रवसः? । विश्वासश्च 1 विश्रम्भः |
योग्या गुणनिकाऽभ्यासः ।
त्रयोऽम्यासे । वुव्यते योग्य7३ । गुण्यते एदर्निशं युणनिका५ । श्रम्यवनमभ्यासः।
स्यादभीक्षणं य॒ह्महुः ॥ १८५॥
सुहु्महुरबारं वारं स्यात् भवेत् । ग्रभीश्ष्णम् । श्रमीक्तणम् श्रभीच्णम् । श्रमिगुलमीक्तते
वा श्रभीक््णम्^ । नितराम् । ।
मृपालीकं मुधा मोधम्
चत्वारो ;ऽलीके । मृष्यते सदते नारकं टः्लमनेन सुपा । श्यादन्तमव्ययम् । श्रलति स्वस्वाङ्गा
(स्वगननिवास्यति श्रलीकम् । युञ्चति जति निमितं श्ुधा । श्रादन्तमन्ययम् । मुहतिऽत्र चित्तं मोघम्।
विफरु वितथं बृथा ।
निष्फटवचने त्रयः । विगतं फलं धिफलम् । विगतं तथा सत्यं यस्मात् वितथम् । व्रणौ
त्याच्छादयति गुणान् चथा । अव्ययम् ।
विधुरं व्यसनं कष्टं कच्छ" गहनयुद्ररेत् ॥ १८६ ॥
पञ्च कष्टे | कष्टेन विघुनोति शरीरं विरम् । व्य्यते श्रनेन उ्यसनम् । ` कष्यते
(कपति) कण्टम् । कृणोति छिनत्ति दुःखेन कृच्छ्रम् । गायते गहनम् । उद्धरेत् निस्तरेत् ।
समस्तं सफ सवं करस्नं विश्वं तथाऽखिलम् ।
पर् समते । समस्यते एकीकरोति समस्तम < । समं रसते ठमग्रम्९ ! समानं कलयतीति
“सकलम् । सरति सवम् । छृन्तति व्यति व्यानोति छृत्स्नम् । विशति तिष्ठति सर्वत्र विद्रवम् ।
नास्ति खिलं शुत्यमस्या खलम् । निखिलं च ।
१. “तिम शा्द्रीमावे"' । तिम्यति श्रा्द्रीमवति तिमिरः¡ विलम्बशीलो जनः स्वदार इव
शीतः स्पूर्तिरदितश्च भवति" २. विश्वसश्चव्दस्य प्रक्रलयथे प्रमाणान्तरं नास्ति । एवं विश्वासो विश्रम्भोऽपि।
विश्वषशब्दाऽन्वाख्यानमपि ` व्याकरणादस्पष्टम् । श्यतौऽत्र त्रिष्वपि मूलके एव प्रमाणम् 1 ३. योगे
चित्तेकाथ्ये खास्वीति योग्या “तत्र साधुरिति यदन्यत्र । ४. युण्यते गुखना । चुरादिणिजन्ताद् भावे
“ण्वासश्न्येति युच् । ततः स्वायं कः । गुखनैव गुखनिका । ५. ग्रमिचणौति श्रमीच्णम् । “^ तेजने ।
वाहुलकाड्डमुः । अन्येपामपीति दवेः । इति रामाश्रमः । ६. त्र मृपाऽलीकशब्दौ वकच्यमाणो वितय-
शब्दुश्वाषत्यवाचकः । मुधामोधशब्दौ विफलबथाशब्दौ च वकत्यमाणौ व्यर्थवाचका इति विवेकोऽ-
न्यत्र । तटुक्तममरे--श्मृपा मिथ्या च वितथे" ३।८।१५ । “लीक त्वग्रियेऽदते” ३।३।१२ । “मोघं
निरथेकम्” ३।१।८१ । व्यर्थके तु त्रया मुधा ३।४।४। (वितथं त्वदरतं वचः” १।८।२१ । इति।
७. कर्पेतति कृन्तति वेति क्षी° स्वा०। ८. समस्यते स्म॒ चमस्तम् । श्रु चेष" । कर्मणि छः ।
स्गुतमग्रमस्य खमच्रम् । १०. सह कलाभिवेतंते सकलम् 1
$: सामसाला ८<
शकर विकटं खण्डं शल्कः लेशं रवं विदुः ॥ १८७ ॥
षट् खण्डे । शक्नोति काये शकलम् । शल्कं च । विगता कला यस्मात् तद् चिक्लम् ।
खण्ड्यते खरुडः । लिख्यते केशः । लिश विच्छ गतो । ्वरकर्तैरि च कारके संलायाम् स } रौति शर
फरोति उलयः ] विदुः कथयन्ति 1 श्यम् । नेमः । सामि । श्रसमपूर्णम् । दलं च |
समकोपंच । ५
र म्म॑सि । भ्रियतेऽनेन समे 1 नान्तम् । कुप्यते कोषम्* 1
कलहं परिवादं छं नयेत् ।
करेण हन्यत फः । परिवदनं परिवादः । शुल्लयती (तयक्रे)ति छलम् ।
शोणितं रोहितं रक्तं रुधिरं क्षतजासृजम् ॥ १८८ ॥
प्रद रुधिरे । शोण्वते वण्य॑ते देहोऽनेन शोणितम् । तालव्यः । रोरति देदे नायते कोहितम् । १०
रघति रमं रक्तम् । सणएदि रुधिरम् । ताद् बरणाजायते क्षतजम् । श्रस्यते क्िप्यते श्रखक् ।
सन्ततानारताजसान्वहं कन्यापतिवरः
त्रयः (चत्वारः) सन्तते । सन्तन्यते स्म सन्ततम् । न शआ्रारतम् नास्तम् । न जस्यतीत्येवंशील
मखम् । श्रन्वहम् । कन्यापतिवेरः नन्दतु इति प्रयोजनीयम् ।
उद्वाहः परिणयनं विवाद निवेशनम् । १८६ ॥ १५
चत्वारो विवाहे! उद्वदनं उद्वाहः । परिणीयते परिणयनम् । विवाहे विवाहः ।
निवेश्यते निभ्रेशनम् 1
शुपिरं विवरं रन्धं छिद्रम्
चत्वारर ! शुष्यति जलमत्र *श्युषिरम् । उषशुषीति रः । विनरियते भूमध्यमनेन विचरम् ।
रणति वातेन रध्यति दहिनस्ति प्राणिनं वा रन्ध्रम् । दियते तत् द्रम् । कदरम् ! विलम् । निव्यं- २०
शनम् । रोकम् } च्वश्रम् । वपा | शुपरिः।
गर्ता च गहरम् |
गर्तायां दौ । पतितं प्राणिनं गिरति गर्ता । गतैः 1 गूहतीति गरम् ।
स्वर रस्यं च पातारं नरकं यान्स्यमेधसः ॥ १६० ॥
चत्वारो नरके । श्वयते वर्धतेऽनोपरि चरतो शङ्का, श्वमिरमरन्तं वा श्वश्चम् 1 स्वायां भवं ~
रस्यम् । पतन्त्यस्मिन् पातालम् । नराः कायन्त्यन्न नरकः । नारकः ! पुंसि 1 छमेघसः उुद्धिरदिताः
. "लिश श्रल्पीमावे" । दिवादिः । ततो घञूविधानमर्याञनुरूपम् 1 । २. का० सू
५।५।४ । ३. लूयते दियते लवः । ऋदोरप् । टीकोक्तविग्रहस्त॒ न॒ लवनार्थाऽमिधायौ । ४. कोप-
शब्दः पेशीवाचको मेदिन्यां स्यते । पेशीनां ममेश्थानव्वमायुरवेदे सम्मतम् । श्रत उपचारात् कोपोऽपि
मर्मेदयम्बुन्नेयम् । तदुक्तम्“ कोपो उल कुंडले पात्रे दिव्ये खङ्गपिधानकरे 1 चात्िकोपेऽयंसद्वाते वेश्यां
शब्दादिसख्यरहे" । पाऽवगं० ६ । ५. ^तिमिरधिमदिमन्दिचन्दिविधिरुचिधषिभ्यः किरः” का०उ० १।२३ ।
सुपिरस्यास्तीति विदे तु '"“उपयुषिसुष्कमधो रः" पाऽसू० ५।२।१०७ । इति रः । रप्रत्ययपन्ते दन्त्यादिरयम् ।
उपसुपीति पा० सूत्रे दन्त्य एव पाठः) कीरस्वाम्यपि दन्त्ययेवे पपार ।
१०
२५
$
९५० अमरकीर्तिविरचितभाप्योपरता
सम्यक्चारियरदिता यान्ति गच्छन्ति नरकम् । निरयः | दुगंततिः।
उद्भ्र भूरि भूयिष्टं बिषटं बहुलं बहु ।
प्रचुरं नंकमानन्त्यं प्राज्यं प्राभूतपएप्कल्षम् ॥ १६१ ॥
दादश प्रभूते । न दभ्रमदश्चम् । भवति प्राचुयंमत्र भूरि, भूरिः च । श्रतिशयेन ऋ भूयिष्ठम्
“वहो लपि मू च वकः “दृधरस्य विट्चेति" मूरादेशो वरिडागमश्च । श्रतिशयेन बहुला वंदिष्ठः । वहति
भावं बहुलम् । प्रचरति ञरचुसम् । न एकं नैकम् । श्रनन्तत्य माव श्रानन्त्यम् । प्रावतं प्रक
वीयतेऽनेन वा प्राज्यम्। प्रामवति स पराभूतम् । प्रभूतं च । पुप्यति पुष्कलम् | पुप्कं च। पुरुवम् । पुम्।
भवो भावथ संसारः संसरणं च संद्तिः |
त्धक्ञतुरी धीरस्त्यजेज्जन्माजवं जवम् ॥ १६.२॥
टौ संखारे । भवतीति भवः ¡ भवतीति भावः । ^"वा ज्वलादिदुनीषवो रः” । खंठरति
श्रस्मिन् संसारः । संयते शरस्मिन् संसरणम् । संषरणं संखतिः । जनयतीति जन्म । श्रालव-
तीति श्राजवम् । जवति चठुगत्यां भ्रमति (शत्र) जवः।
उरजस्पू्जस्वी तरस्वी तेजरथी च मनस्व्यपि ।
चत्वार (पञ्च) स्तेजोयुक्तपृष्पे । उक_ ऊर्जां वाऽ्स्यत्येति ऊजस्वी । स्पूर्जाऽ्स्यात्तीति
स्परजस्वी ! तरो ऽस्यास्तीति तरस्वी । तेजोऽस्यास्तीति तेजस्वी । मनोऽस्यास्तीति मनस्वी !
भाखरो भासुरः दूरः प्रभीरः सुभटो मतः ॥ १६३ ॥
प्च ख॒भटे । मासते इत्येवं शीले भास्वरः९ । भाद्युरः । “भिदिथमासिमंजां दुरः” । श्रयति
शरः 1 शूर वीर विक्रान्तौ 1 प्रवीरयते प्रवीरः 1 सुष्टु मटः सुभटः । विक्रान्तः ।
तसुं बमं कवचमाघ्तिर्वाणवारणम् ।
पञ्च कवचे । तनु" शरीरं चायते रक्तति तचुचम् । व्रंणोत्यङ्गं चम॑ः। कच्यते वध्यते श्वरीरम्
ग्रनन कवचम् । श्र वरणमाद्रतिः । बाणानां वारणं निषेधनं वाणचारणम् ।
कर्पासं कञ्चुकम् ।
दौ कन्छुके । करोति शोभां क्रुपांसम् । कर्पासं च ] कञ्च्यते वध्यते कञ्ड्युकः।
छत्रमातपत्रोष्णवारणम् ॥ ९९४ ॥
चरयश्छुने । वर्पातपौ छादयतीति छचम् । त्रिपु । छतः, छत्री । आतपात् तायते श्रातपतच्रम् 1
उष्णस्य वारणम् उष्णवारणम् । ठपलदम ।
केशं धिरोखदं बां कचं चिङ्कुरमीदयेत् ।
पञ्च केश्चे । के मस्तके रेते , केशचः । शिरसि रोहति शिसोख्टः । वल्यते संत्रियते वालः ।
मस्तके चीयते कचति वा कचः'। चीयते यत्नेन चिड्गुरः । चि्करश्च । मूर्धजः । शिरस्िनः ।
नि
१. पा०सू० ६४।१५८। २. पा० सू० ६।४५१५६ ¡ ३. भरचौरति मचुसम् । चुर स्तेये 1
चुरादीनां रिल्यैकल्पिकः । दगुपधेति कः 1 ्रगतं चुरायाः प्रुरमिति वा रामाश्रमः । %. प्ाज्यते काम्यते
"ञ्ल. व्यक्त्यादौ" चन्नेः संज्ञायामिति क्यप् । यदृवा भ्रवीयते “श्रज गतिक्तेपणयोः?' स्यप् । वौभाव।
नेति टीकाशयः 1 ५. का० सू० ४।२। ५५ । इति णः 1 ६. "कपिपितिभासीशष्याप्रमदां च" का० च
४।४।४७ ] इति वरः ¡ ७. का० सू० ४)४।४१ ]
नाससाल ९१
भिनः* } कुन्तलः
चृडापाशं च धम्मिल्लं कथरी कैरवन्धनम् ।॥ १६१५ ॥
चत्वारः फेएचन्धने । चुद सं चोदने । "वुरादेश्च'” न् । नामिनो3 गुणः । चोदनं चूडा ।
"'उनध्नृदपोऽमृगयत्तिभ्य दनन्तेग्यः संज्ञायाम्"' श्रड् प्रत्ययः | कारितलोपः । निपातनात् उपधाया
दसवत्वम् । दस्य उत्वम् । चूडायाः शिलायाः पाशः चन्धनं चूडापाश्चः । धम्मिः सौत्रः । धम्यन्ते केशा
वप्यन्ते घर्मिह्लुः । कं मस्तं दृणोत्ति करो नदादित्वादीः । कचरी । इदन्तोऽपि कचरिः । श्रान्तौ वा
या 1 कस्य दन्धनं कैशवन्धनम् । वेणी } भ्वेणी 1 वीणा च
उररीकतमप्यूरीफृतमद्खीकृतं तथा ।
तरयो ऽीकारे । उरीपरमृतीनां इजा सह समासो वां भवति । तथाहि-उरी उररी अङ्गी
करे विस्तारे च । प्पाश्चतम् । प्रतिक्षातम् 1 उपगतम् ।
अस्तुंकार ऽभ्युपगमे
भ्युपगमे ध्पीकारे शरसत्ार कष्यते । अल्ल करोतीति (कर्णम् अस्तुङ्कारः” । " कर्मण्यण्"
श्रु प्रत्ययः 1 श्चस्योप० द्धिः \ व्यंजनम ० । ^(<सत्यागदास्तूनां कारे” । मकारागमः ।
सत्यङ्कारः पणापख ॥ १६६ ॥
सत्यापणे सत्यं करोतीति सत्यङ्कारः^ 1
सोदादं सौहृदं हाद सौहयं सख्यरौौरमम् ।
सत्री सेत्रेयिकाजयं ` सहाय्यं संगतं मतम् ॥ १६७ ॥
दश (एकादश) सख्ये ! सुहृदां मावः सौहादेम् 1 सौहृदम् ' दम् । सौददयमेकमेव
वाद्यम् । सख्युर्भावः सख्यम् । पुरस्येदं (भेरिदं) सौरभम् । मित्रस्य भावो मैनी । सन्धां नियुक्तो
मेेयिकः । न जीर्यते श्रजर्यम् । सदाजी (य्य) ते खदए्यम् । संगमनम् सङ्गतम् ।
सषेसं कल्याणग्रुभयं श्रेयो भद्रं च मङ्गलम् ।
भावुक सविकं भव्यं श्वोवसीयं शिवं तथा ॥ १६२८ ॥
दश (एकादश) कल्याणे } क्षिणोति क्लेशान् क्षेमम् 1 कल्यते ज्ञायते कल्याणम् । कल्यं
नीरजत्वसनिति वा कल्याणम् ! प्रङृषट प्रशस्यं श्रेयस् । सान्तम् । भदते हादते सुलीभवयनेन द्रम् ।
म॑ पापे गालयतीति मङ्गलम् 1 मवनशीलं भावुकम् । 'शकमगतदहनवृषभूस्यालषपतपदासुकन् * ˆ?" प्रशस्तो
भवोऽस्यास्तीति भविकम् । पुण्यकृतो भवितव्यं भवति भव्यम् । श्वः शोगनख वसीयः इवोवसीयः ।
श्वोवसीयसं च । ‹ श्वसो › *वसीयस्”' | शीयते तनूक्रियते दुःखमनेन शिवम् । माष्यविधातणां भीमदमर-
कोर्तौँनां शिवं भव ।
१. इडेजिनश्तव्दो भङ्गुरवाचौ । तदुक्तम्--'इजिनं भङ्गुरं॑से्मरालं जिदयमृत्तिमत्
रमि चि ३।९३ । ल्तणया मड्गुरकेशेऽपि दृजिनशब्दप्रयोगः । २. का० सू ३।२।११ ।
३. का< बऽ ३।५।२। ४. का० सू० ४।५।८२ । अत्र दुगवृत्तिः “उनचुदपीड ९ गयतिन्य ₹नन्तेभ्यौ यौ
प्राते वचनम्” इत्येषरूपा । ५. यस्वुकरणमस्तद्ारः । €. का० सू ४1३1१ 1 ७. ^व्य्ञनमस्वरं परव
नयेत्” का० सू १।१।२१। ८. का० सू० ४।१।२३ 1 ९. सत्यस्य कर्णं सलयङ्कारः । नवि घञ्] क्न ~
विग्रद्टीकोक्तसत्वयुफः । १०. का० सूर ४४३४1 ११. का९ चूर २।६।४१ । उत्ति: २७]
|
५
९०
१५
२५
१०
१५
९२ , अमरकीर्सिविरचितभाप्योपेता
वक्ता वाचस्पतिर्यवर श्रोता शक्रस्तथापि तो |
शब्दपारायणस्यान्तं न गतौ तत्र के वयम् ॥ १६६ ॥
श्रप्य दलोकस्य सुगमन्याख्या 1 ,
तथापि किश्चत् कस्मैचित् प्रतियोधाय घरचितम् ।
बरोघयेत्कियदुक्रिज्ञो माग॑ज्ञः सदह याति किम् ॥ २००॥
तथापि मया घनन्जयकविना सूचितं कथितम् कस्मैचित् प्रत्ि्ोधाय -श्ानाय। उक्ति
चोधयेत् जापयेत् } मागः किं स याति गच्छुत्ति, श्रपि ठ न गच्छुति। \
ग्रमाणमकलङ्कस्य पूज्यपार्दस्य लक्षणम्
दविःसस्धानकवेः काव्यं रत्नत्रयमपधिमम् ॥ २०१ ॥
एतद्रलन्रयमपश्चिमं नवीनमपूरवं वतते ।
कवेध॑नञ्जस्येयं सत्कवीनां शिरोमणेः ]
प्रमाणं नाममारेति रलोकानां हि शतद्वयम् .॥ २०२॥
धनज्नयस्य क्वेः सत्कवीनां भिसेमरेः इति श्रना प्रकारेण इवं नाममाला य्लोकानां
शतद्ययं २०० प्रमाणमस्ति ।
। ब्रह्माणं सथुपेत्य॒वेदनिनदन्याजात् ठपाराचल-
स्थानस्थावरमीश्चरं सुरनदीव्याजात् तथा केशवम् ।
अप्यम्भोनिधिश्ञायिनं जलनिधिध्वानोपदेशादहो
फूतकरवन्ति धनञ्जयस्य च भिया शब्दाः सयुत्पीडिताः ॥२०३॥
दरदो लोकाः घनञ्जयस्य च भिया छत्वा शब्दाः समु्पीठिताः सम्यकू प्रकारेण पीडिताः
पूर्यन्ति । किं कृत्वा पूवं वेदनिनदन्याजात् मिषात् ब्रह्माणं शुपेत्य ध्राप्य, इदवरं ठपाराचलस्यानः
स्थावरं सुरनदीव्याजात् प्राप्य, केशवं श्रीविष्णु किं विशिष्टं श्रम्भोनिधिशायिनं जलनिधिष्वानोप-
देशात् समुपेत्य सुगमोऽयं दलोकः ।
इति महापण्डितश्वीमदमरकीर्षिना तचेविद्योन
श्रीसेन्द्रव॑शोखन्नेन शब्द्वेधसा कृतायां
धनञ्जयनाममाटखायां प्रथमं काण्डं
व्याख्यातम्
श्रीमद्नञ्जयकविविरचिता
अनेकाथ नापमारा
~----0---
जिनेन्द्र पूज्यपादं च चेखाचार्य' श्िवायनम् ।
अर्हन्तं शिरसा नत्वाऽनेकार्थं' विधरणोम्यदहम् ॥ १ ॥
गम्भीरं रुचिरं चिरं विस्तीर्णाथंप्रसाधकःम् ॥
शाब्दं मनाक् प्रवक्ष्यामि कवीनां हितकाम्यया ॥ २ ॥
गम्भीरं रुचिरं मनोज्ञं चित्रं विस्तीणोधेप्रसाधकप् । सुगमव्याख्याऽस्ति। ` ५
अरहस्विनाकिनो शम्भू
शास्र इति द्विवचनान्तं पदम् ।
जिंनावर्तथागतौ ।
जिनौ कथ्येते |
: वेद्यो विवस्व॑न्तौ १०
वेदश्च सूश्च वेदसूयो चिवस्चन्तो सथो कथ्येते ।
पिष्णुरुद्रौ वृपार्कपी ॥ ३ ॥
विङ्कण्डाचिन्द्रमोषिन्दौ अनेन्तौ शेपशर्बिणौ ॥
शेषश्च धरशेद्र, शाङ्गी च विष्णुः शेपशा्खो ।
जीमूतौ तु करिक्रीडौ पँजेन्यौ शक्रवारिदौ ॥ ४ ॥ १५
यनंमम्भसि कान्तारे
म्भसि कान्तारे वनम् ।
युवनं पिष्टपेऽणंसि ।
सुगमव्याख्या 1
। १. शं कल्याणं भवतीति शम्मुः । इप्रत्ययः । केशवन्रह्मवाची च । तदुक्तम् -'शम्पुः
स्याद् व्रह्मशिवयोरर्हत्यपि च केशवे, । इति विण लो० भा० च० ९। हेमे च -““्राम्मुव्रह्याहतोः
शिषे” । २१६1 इत्ति च । २. विष्णु, अतिदद्ध, जित्वर, इत्येतेष्वपि जिनः । तदुक्तम्--“"जिनस्त्वर्दति
वुहेऽतिवृद्जित्वसयोक्लिषु" वि° लो० ना० वऽ ८ । दहैमे- "जिनोऽददूवुदविष्टुपु' २।२६९ } ३.
"विवस्वान् देवसू्यंयोः छने० स० ३।३१७ । शरन देवशब्दपाटास्प्रस्तुतेऽपि देवश्ब्द् एव युक्तः ।
. ४. श्मग्निश्च । तदुक्त म-''इषाकपिर्वासुदेवे शिवेऽग्नो च" श्रते सं ४।२१६ । ५. द्ननवधिरप्यनन्तार्थः ।
"“छ्ननन्तः केशवे शेषे पुणाननवधौ त्रिपु" इति मेदिनी । &. “जीमूतो वापवेऽम्बुदे । धोपकेऽरौ तिकः
इति श्रने० सं° । ७. पर्जन्यो मेवगरजितेऽपि । तटुक्तम--“पर्जन्यो मेवशब्देऽपि ध्वनदग्बुद-
क्रयो" इति मेदिन्याम् ।
५९
[॥
< अमरकीर्तिविरचितभाष्योपेता
घृतं सर्पिपि पानीये विषं हलादे जङे ॥ ५॥
तल्पं दारेषु शय्यायां ज्योतिधक्षुपि तारके !
घव सुन्दरे रामो वामो वक्र मनोहरे ॥ ६ ॥
नक्षत्रे मन्दिरे धिष्ण्यम्
देधेषटि शब्द् करोव्यत् जनौ धिष्एयम् । नपुंसकम् । धिप शब्दे ।
वसने गगनेऽम्बरम् ।
वसने गगने श्रम्चरं वर्तते । श्रम्बं शब्दं राति ददातीति श्रम्चरम् ।
परिधौ पादपे साः `
परिधौ पादपे सालो वर्तति । सां लकषम लातीति सालः
“साट शजतर ब्र क्षमाचप्राकार्योरपि?” इति दैमः* ।
सिन्धुः घोतसि योपिति ॥ ७॥
स्रोतसि योपिति सिन्धुः ।-स्यन्दते सिन्धुः।
सारसः शक्न प्ते
सरसि तडगे भवः -सारसः।
। केतनं दीधितौ ध्वजे ।
केतन्ति जानन्त्यच केतनम् । तथा च--
“रत्ये निमन्त्रणे चिदह मन्दिरे केतनं विदुः 1"
मयूखः कीलके दीप्त
मयते विस्तारं यातीति मयुखः । ॥
पतङ्कः शलभे श्वो ॥ ८ ॥
एततीति पतङ्धः । पल्ल गतौ ।
अञ्जनः कज्जले नागे
कले नागे श्रज्जनो वर्तते। च्न्न्ू व्यक्तिग्रक्षणकान्तिषु। विक्रमेणउ अज्यते अकरी-
क्रियते श्रञ्चनः ।
सारङ्धः प्रपते गजे |
सरतीति सारद्धः ।
सरलः प्रगुण चक्षे
त्ऋरत्वात्मरलः ॥ |
पुन्नागः” सन्नरे तरौ ॥ 8 ॥ `
पुमोँ्वासौ नागः कः। ध
त
१. यने° स० २।२२७। २. धूरत॑प्ते तु श्रतेन देपेण उषितः सारस इति वितेकः।
३. गजोऽपि विक्रमेण ज्ञायते, कललोऽपि विक्रमणव्रलञेन म्रद॑यते । ४. खारं ददम्भ यस्येत्यपि । सरतीत्यस्य
स्याने सारयतीति वुक्तम । ५.८पुनागस्ठ सितोत्यले 1 जातीफले नरभ्रे्ठे पण्डुनागे द्रुमान्तरे" ति मेदिनी
"~------~-+-*---~-----~
अतेकाधे-नाममातता
पाश्चंनत्योऽनके श
पसंजने पाताले भवः पा्चजस्यः ।
कम्बुः: श्तं सतद्धजञे |
कम्बुः सोजः कम्न्यते वण्यते कंबुः । प्रथ वा कतर वशँ उणादित्वादर्मादेव नकारागमश्च |
फस्यरो युभवे चूम्ने
युभवे स्वगोदधवे चयुस्ने सुवणं कध्यरः । ऊुत्तिते स्वरति कर्वरः |
स्यन्दनं श्रकटेऽस्बुनि ॥ १० ॥
स्यदन्ते स्यन्दनम् ।
अद्विर्भिरििनस्पत्योः
गिरिश्च बनसतिश्च गिरवनस्ती तगरोर्भिरिवनर्पस्योः । अत्ति श्राकाशमिवयद्धिः।
शिखरी तरुभूध्रयोः
शिखरमस्या.रीति शिखरी ।
"राजा चन्द्रमहीपस्योः |
राजते इति राजा ।
द्विजो दशनविप्रयोः ॥ ११ ॥
दितो द्विजः ।
मोचामरखियो रस्मा
व्रसपीनपि रमयतीति रस्भा।
कदरी ध्वजमोचयोः ।
कैन वायुना दल्यते विदायंते कदली 1
अजलोकः सुपनस्तर्घोः
न शोको यस्मायस्य बा शरर्तेकः ।
-सुसनाः सुरपुष्पयोः 1 १२ ॥
सुरशच पुष्पं च सुरपुष्पे तयोः सखुरपुष्पपोः 1 शोभनचित्तः सुमनाः ।
युक्तारजतयोरतारः
तीर्यते तारः ।
, भरि मृयःसुबणंयोः ।
पुण्यवत्सु भवतीति भूरि ! क्लीवे । `
पानीयदुग्धयोः क्षीरम्"
.घस्लः अदने } सौत्रोऽयम् 1
99
९. “"पाञ्चजन्यस्वु विष्युशङ्घे दमान्तरे इति मेदिनी } २. "कम्बुः पुमान् गजे 1 वलये शाद्ध-
१९०
३
॥१।
१११
१।
शम्बूककन्धयमलङ़े सियाम्" इति वि° लो० बा< वर २। ३. '््यन्दनं प्रसवे नीरे स्वन्दनस्तिनिभे स्ये"
विऽलो० ना० बर १५१। . राजा प्रभौ च दरपतौ क्त्रिये रजनीपतो । पत्ते शरे च पुंसि स्यात्” इति
मेदिनी 1 ५. घस्यतेऽयते हीरम् ! “धस्ल् अदने” । घते किच्चेति कीरः 1
अमर्कीरत्तिविरचितभाप्योपेता €६
पयः सरि्दुग्धयोः ॥ १३ ॥
पीयते परः ।
कर्ययो
काटप्रकपयोः काटा
कालद्च वुखरादिलक्षणः ।
८ “स्वस्थे नरे दुखासीने यावर्षन्देत कोचनम् ।
तस्य॒ रविश्तत्तसो भागस्परुटिरित्यमिधीयते ।।*
श्रथवा-- “सर्षपस्य प्रयल्नेन चिप्ठस्य पततोऽम्ब रात् ।
# रयं याचदध्वानं काटः स (च) च्ररिः स्मृतः |+”
व्रकर्प्च प्रकर्यत्ता उच्छृषटता वा । कालश्च प्रकर्षश्च कालप्रकपौं तयोः कालप्रकपयोः काष्टा
१० कथ्यते । काशते भासते काष्टा । एन्तोऽयम्र । `
[^ न् क
कोटिः संख्याप्रकपयोः |
कुरतीति कोटि; । †
“कियती पञचसहस्री कियती लन्ञा च कोटिरपि कियती ।
जं।दार्योन्नतमनसां रत्नवती चटुमत्ती कियती 1
९५ । रन्धरसंशछेपयोः सन्धिः
सन्धानं सन्धिः |
= ९ ५५, ५ ५ ह भ <
““सन्धियनि। सुरह्मायां नास्ये ऽङ्गे श्लेपभेदयोः? इति दमौ" ।
[+ ©
सिन्धुनदसषद्रयोः ॥ १४ ॥
स्यन्दते सिन्धुः ।
२८ निपेधटुःखयोर्वाधा
वन्धनं ( वाधनं ) वाधा । वाघ प्रतिघाते ।
¢
व्यामोहो मूखमोव्ययोः ।
व्यामुद्यते उ्यामोदधः? ।
कोषीनाकारयोगुदम्
गुद्यते गुह्यम् । गुदर संवस्े । “गद्यमुपस्थे रहस्ये च” इति दैमीः ।
कीरं रुधिरम्भसोः | १५॥
कीला लातीति कीलालम्“ । “कीलालं रुधिरे नीरे” इति दमी"
0
मृल्यषत्कारयोरघः
र्ते पूञ्यतेनेनेव्यघः । ^“: व्यज्ञनाच” वन् । दोपधत्यादीरघा न। "न्यङ्क्वादीनां हश्च घः” ।
३० - जात्यः प्रेष्टङुरीनयोः ।
९)
षद
१. श्रने° स० २।२५७ । २. व्यापोदणव्दस्य मूर्खां मूलं मृग्यम् । ३३. रने स० २।३५न ।
‰. कीला ्वालामलति वास्यति । श्रल पय्त्यदूौ | इति चले विग्रहः । ख्धिरायं ठ रीकोक्तः । ५ श्न
० २।६८३ । £. का० सूर ४।५।९९ † ७. का० सू० ४।६।५७ | - ।
अनतेकाथ-नाममाडा ९७
शरे्ङ्ली नयोजौत्यः जात्यां भवो जात्यः ।
मेषवत्सरयोरब्दः
श्रवतीति श्यन्द्ः । कुन्दादयः१-“ुन्दतन्दमन्दाब्दाः' । “अब्दः संबत्सरे मेचे मुस्तके
गिरिभिद्पिः ।
तायां हयगरुत्सतोः ॥ १६ ॥
तषस्या्ययं तायः । पुंसि ।
स्तन्धतास्थूणयोः स्तस्भः
स्तम्म एति सौत्रोऽयं धातुः ।
चर्चा चिन्ताषितक॑योः |
च्च॑णं चचौ
हरकीरुकयोः स्थाणुः
तिष्ठतीति स्थाणुः ।
स्वैरः स्वच्छन्दमन्दयोः ॥ १७ ॥
स्वस्य द्रः स्वैरः । उस्वस्यात रेतमीरेरिणोरपि वक्तव्यम् तथा चालङ्कारे--
“स्वैरं विहरति स्वैरं शेते स्वैरं च जल्पति ।
भिक्षुरेकः सुखौ छोके राजचोरभयोञ्ितः ।”
“स्वरो मन्दे स्वतन्त्रे च” इति हैमी ।
रङ्कः सङ्कीणबिवरे पलारपरो च कीर ।
संख्यायाम्
शं कायति कूयते वा “शद्धः; ।
का।ननोदभते बहौ दावो दवोऽपि च ॥ १८॥
काननोद्भूते वहौ द्वो दवोऽपि च \ दुनोतीति दवः । दावः । “वा < उलादिदुनीसुवो णः”
कीनायः कृपणे भये कृतान्ते पिरिताशिनि ।
तथा पुण्यजनान् प्राहुः सज्जनास् राक्षसानपि ॥१६॥
लोभेन विलस्यते वाध्यते कीन; । तालव्यः 1
विरोचनो रवो चन्द्रे दतु्एनौ इताशने ।
विरोचते इत्येवं शीलो विशोचनः।
हंसो नाराये न्ध्ने यतावस्वे सितच्छदे ॥ २० ॥
हन्तीति हंसः ।
सोमश्वन्द्रोऽस्तं सोमः सोमो राजा युगादिभुः
सोमः प्रतानिनीसेदः सोपपोऽगस्त्यदिग्पतिः ॥ २१ ॥
१. का० उ सू० ३1६४ इत्ति दप्रत्ययः । २. छने० स० २।२२६ । ३. स्वस्येरेरिणीरिपु"
का० रू० पू० ३८ । ४. अने° कष° २।४८२ ! ५. शद्भते ऽस्मात् शङ्कुः । “श्तकि शद्भायाम् * 1 श्रीणा-
दिक उः। ६. कार सू० ४२५५] इति णप्रत्ययः “ददु उपतापे ।
१०
१५
२५
१०
१५
९
9
२५
३०
€ ` अमरकीर्तिविरयितभाष्योपेता
पुस् श्रभिषरवे । प्रनेन सर्वेपां साधनिका ज्ञातन्या ।
अजो विधिरमो विष्णुरजः श्म्भुरजस्तमः |
, ` अनच्नैवार्पिको व्रीहिरजो रामपितामदः॥ २२॥
न जाग्रते नोसद्यते श्रजः ।
शृद्धेऽनुपहते बहौ ब्राह्मणे सचिचोत्तमे ।
आपादेऽभ्यात्मसंवित्तौ ब्रह्मचर्ये शुचिमंतः ॥ २३ ॥
मतः कथितः | पतेष्वयंपुं शुचिशव्दः। शोचति जनो देदलगनेऽ् चिः । तथा च यश-
स्तिलकचम्पूकान्ये-
“न स्लीभिः सङ्घमो यस्य॒ सवदन विवर्जितः ।
तं शुचि सवेदा प्राहः मारतं च हताशनसिति ॥”
अर्थोऽभिधेयरेवस्तप्रयोजननिध्रत्तिपु ।
श्रथशब्दः पठ्यते । श्रभिधेयश्च शब्दो वाचकः, शब्दमध्ये योऽ्तावर्थः स वाच्यः श्रभि-
घेयश्च कथ्यते । राः सुवर्णम् । वस्वु--श्रस्थ्या दिर्लोदितादि्वां । गैरिकान्वितं ( दिकं च ) वस्तु । प्रयोजनं
कार्यम् ] निवृत्तिश्च मुक्तिः । ताघु । ऋ गतौ । यते दरयर्थः ।
भावः पदाथचणए्रात्मसत्ताभप्रापजन्मपु | २४॥
एतेष्व्॑पु भावः पठ्यते । भवतोति भावः । "वा? उ्वलादिदुनीशवो णः 1"
प्रायो मुमोपमातकयप्रभृस्यन्ननिवृत्तिषु ।
एतेष्वयेपु प्रायः* शब्दः ।
अन्तः पदार्थसामीप्यघर्मसग्यतीतिपु ॥ २५॥
एतेष्वर्थ॑पु अन्तः । ।
अक्षो चयते वरूथाङ्खं नयनादौ विभीतके ।
द्यते वरूथाल्ने स्थचक्रावयवे, नयनादौ, विभीतके पृतनायाम् श्रक्षो वर्तते । '
सारः श्रेष्ठे वके वित्ते कोशे जचरे स्थिरे ॥ २६ ॥
रष्टे, बल्ले, वितते, कोशे, क्रोशे वा पाठः । जलचरे, स्थिरे सारो वर्त॑ते 1 सरत्थनेनेति सारः ।
उव्रलमत्स्ययोरच"" इतिं परसूत्रेस घञ् | स्वमते (क्रत॑रि च कारके पंज्ञायाम्*'“ इति घन् | “सारो
मजस्थिरंशयोः, वले श्रेष्ठे “च” इति हैमी ।
वाचि वारि पो भूमौ दिरि लोम्नि रौ दिवि।
विधिखे दीधितौ च्टवेकादश्षसु गौर्म॑तः ॥ २७ ॥
पूजां गच्छतीति गोः । गमेर्डोः ।
चन्द्र रये यमे विष्णो वासवे दुरं हये ।
मृगेन्द्रे बानरे वायौ दशस्वपि हरिः स्मृतः ॥ २८ ॥
हरतीति हरिः 1
१. का० सू० ४।२।५५ । २. ्रकरष्टमयनं प्रायः । “इण गतौ” 1 एस्च् । ३, “परतैःसिथर्याधि-
मत्स्ये” दे° श ० ५।३१७ 1 ४. कां० सृ० ४१५)४ 1 ५, छ्रने० स २।४७८ |
अनेका्ध-नाससाला <€
पते करिकरप्रान्ते व्योभ्नि खद्धफरे गदे
` र्यभाण्डमुखे तीर्थे जके पुष्करमष्टसु ॥ २६ ॥
पुष्णातीति पुष्करम् ।
शृद्धारादो कषायादो घृतादौ च विपे जके ।
निर्यासे पारदे रागे दीर्येऽपि रस इष्यते ॥ ३० ॥
गज्षरदौ- ॥
“न्भ रहास्यकरुणाय द्रवी रभयानकाः ।
चीभत्साऽदभुतस्ान्ताश्च नव नाटथे रसाः स्पृताः ॥"
कपायादौ--तिक्ताम्लमधुकंडकषायेपु । धृतादौ--दुग्धदधिधृततैललवरेष्चर्सेषु ।
विषे उले, नियाति घररसविरेषे, पारदे रागे, वौयेऽपि रस इष्यते ।
तीथं प्रवचने पत्रे रुष्वास्नाये विदांषरे ।
पुण्यारण्ये जलोत्तारे सहासस्ये महाछुनौ ॥ ३१ ॥
एतेष्वर्थेषु तीथेम् ।
घातु; पञ्चमु रोरु शरीरस्य रसादिषु ।
पथिग्यादिचतुष्के च स्वभावे प्रृतावपि }} २२५
पश्चत् लेदिषु सुवण॑रजतताग्ररीतिकास्येषु । शरीरस्य रसादिषु रसाखर्पांसमेदो ऽस्थिमलशुकरेषु ।
पृथिव्यादिचतुप्के च पृथिव्यसेजोवायु ( वनस्पति) घु, स्वभावे, वातपित्तश्लेष्मादिषु एतेष्वथैषु धातुः
पठ्यते } दधातीति धातुः ।
प्रघानभृङ्गखाङ्रमृषापुण्ड्प्रमावना |
ध्वजलक््मतुरद्खेष लरामो नवसु स्मतः ॥ ३३ ॥
एतेष्वर्थेषु रललामः । ललामन् ।
आङ्धतावक्षरे सूपे ब्राह्मणादिषु जातिषु ।
माल्याुङेपने चैव वर्णः पूरु निगद्यते ॥ ३४ ॥
श्राकृतौ, श्रते, रूपे, ब्राह्मणादिषु जातिषु, माल्यानुक्तेपने च वर्णो 3 निगयते ।
अक्रारादावुदात्तादौ षडजादो निस्वने स्वरः
एतेष्वर्थेषु स्वरः कथ्यते । अकारादौ--अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, छ, श, एरेच्रोश्रौ,।
उदात्तादौ-° ४उच्चैरुपलम्यमान उदात्तः,” “नीचैरनुदात्तः "समवृत्या स्वरितः” । पडजादौ--
“निषादषभगान्धारषडजमध्यसधेवताः ।
पञ्चमश्चेत्यमी सप्त॒ तन्त्रिकण्ठोत्थिताः स्वराः 11"
निस्वने शब्दे ।
सङ्घ्ताचारसिद्धान्तकारेषु समयः स्यतः ॥ ३५ ॥
समयते समयः |
१. तरति दरगे वाऽनेन तीर्थम् । २. "लड विलासे । उलयोरभेदात् ललतीति ललामः ।
३. "वरं शब्दे" । बणंयति वण्यते वा वणः | घञ् कमि, श्रजञ्वा कर्तरि 1 ४. सारस्व° द्० २। ५. श्रम<
को० १।७।१ 1
१०
९५
२०
१०
१५
३०
१०० अमरकीर्तिचिरचितभाष्योपेता
तन्ध्रं प्रधाने सिद्धान्ते सैन्ये तन्तौ परिच्छदे | `
तन्न्यन्ते ब्युत्पायन्ते शब्दा श्रनेनेति तन्म् । श्रप्र्ययः 1
स्वमोजसि सत्तायायुत्साहे स्थे जन्तुपुं ॥ ३६ ॥
एतेष्वर्थेषु सरम् ।
रूपादौ तन्तुषु उयायामभ्रधाने नये गुणः |
गुणयतीति गुणः ।
्ञानचासिमोक्षात्मश्रुतिपु व्रह्मवाग्वरा ॥ २७ ॥
वरा विशिष्टा ।
अवकारे क्षणे वस्रं बहियंगि व्यतिक्रमे ।
मध्येऽन्तःकरणे रन्ध्रे विपे रितेऽन्तरभ् ॥ .३८ ॥
एतेष्वर्थेषु न्तर: ।
हेतौ निदशने प्ररे श्रुतौ कण्ठसमीकतौ ।
आनन्तर्येऽधिफाराथं माङ्गल्ये चाथ इष्यते । ३६ ॥
ध दृष्यते कथ्यते । श्रथ एष्वथषु |
हेतावेवंप्रकारादौ व्यवच्छेद वि पयये ।
प्राुमवि समाप्तौ च इतिशब्दः प्रकीतितः ॥ ४० ॥
प्रकीर्तितः कथितः इतिशब्दः एतेष्व्थैमु । इण गतौ । इ । एति एवमादिकमर्थमिति ।
„इति *च्रमुर्मणि श्रभतिम्यो यण्वत्” इ्यनेनेतिपत्ययः । इति जातम् 1 प्रथ०
"याच्च" सिलोपः ।
धर्मो धद्धप्यदिसादाबुतपादादावये नये ।
द्रभ्यक्रियाश्रये वित्ते जीवादौ दार्वेकृते ॥ ४१ ॥
एतेष्व्थपु घमः । धरतीति धमः
मूरतिमत्छु पदार्थपु संस्तारिण्यपि पुद्रलः
एतेष्वर्थेषु पुदूगलःउ ।
अकरमकर्मनोकमंजातिमेदेषु वगणा ॥ ४२ ॥
( श्रकमे-पुदृगलस्कन्धः ) कर्म -श्ानावरणादि, नोक्त - शरीरादि । जाति्गौत्रादि । एतेषु वगणा
वर्तते । ४
एेदवर्यस्यासमग्रस्य वीर्यस्य यशसः भियः।
वेशग्यस्याववोधस्य पण्णां भग इति स्मरतः ।॥ ४३ ॥
भजन्त्यस्मिनिति मगः
प्राहुः केवल्यमारहन्त्ये विविक्ते निर तावपि ।
१. कातन्त्रेऽप्य शुदुधं रूपं नोपलन्धम् | २. का० स्.० २४४ । ३, पूर्यन्ते पुनः पुनः सत्यमे
“ इति पुरः । गलन्ति विलीयन्ते गलाः । पुरश्च ते गलाश्च, पद्रलाः । परषोदरादित्वादरस्य दः | ४. भव्यते
सेम्यते धार्यंते वा भगः।
अनेकाथे-नाममाला । १०१
केवलस्य भावः कवल्यम् ।
रुष्िः देवरुषोधादाविष्टाप्ौ नियतौ धियाम् ॥ ४४ ॥
लम्भनं लब्धिः ।
अनेकान्ते च वि्यादौ स्यानिपातः श्रुते क्वचित् ।
° स्यात् भवेत् एतेष्वयेषु निपातः ।
` भेर्टारक्नो धर्मचन्दरस्तसपट्टे धर्मभूषणः |
तत्र देषेन्द्ररीर्तिः भ्रीडुयुच्चन्द्र सतः परम् ॥ १ ॥
धस॑चन्द्रस्ततो ज्ञानसागरस्तत्पदेऽभवत् ।
तेन पुस्तकमेतद्धि दत्तं ( रोकदितेच्छया ) ॥ २॥
इति
धनञ्जयनायमपाला सटीका समारा
१. स्यात् इत्याकारको निपात एतेष्वथेषु इति सम्बन्धः । २. इतः परं सुद्ितपुरस्तकेष्वधिकः
पाठ उपलभ्यते, तयथा--'दशंनादौ मणौ रलं भव्यः शत्ते प्रसेत्त्यति ॥\४५॥ परमात्मा जिने दिदूवे पर-
मेषटयदंदादिषु \ षिद्धाः सिद्धनिषदायामर्हस्सद्घभ्नियामपि १४६1 अर्दस्छद्धमिति द्रावपवरदसिद्धाभिधा-
यिनो 1 अहंदादीनपि प्राहुः शरणोत्तममङ्कलान् ॥४४७। इति । ३. छत्राष्युद्धिदोपात्क्िद्धिताठमेदः,
स च शोधित द्त्थंस्पः कच्तः ।
9
अनेका्थं-निषण्टुः
गम्भीरान् संचिराश्चित्रान् विस्तीणार्थप्रसाधनान् । कष्टश्ब्दान् प्रवक्ष्यामि कवीनां हितकाम्यया 11 १॥
वाग्दिरभूरक्मिवच््ेपु पदवक्षिस्वर्गवारिषु । नवस्वर्थेु मेधावी गोश्न्दमुपलक्षयेत् ॥२॥
कः प्रजापतिरुदिष्टो कफो वायुरभिधीयते । कः शव्दः स्वर्गमास्याति क दत्यात्मा मतः षरवचित् ।२॥
सलिलं कमिति ज्ञेयं शिरः कमिति चोच्यते । देवाननिमिपानाहूर्मत्स्याननिमिपास्तथा ॥४॥
अग्नि्च रबाहुणः चैव वृक्षः कुक्कुट एव च । शिखिनोऽभिहिताः शास्त्रः पृथुकक्च मतः शिली ।५॥
हंसो नारायणः प्रोक्तः क्वचिद्धंसो दिवाकरः । हवदचापि स्मृतो हंसो हंसदचापि विहंगमः ॥६॥
सारसस्सरसिजेन्ोः पतत्यपि च सारसः । राजाऽपि नुपति्ञेयो राजा चोक्तो निशाकरः ।५७॥
विभावमुहंताशः स्याच्छवेतच्छन्रं बवचिन्भूवेत् । हिमारात्तिः स्मृतो वह्भिः हि्माराततिश्च भास्करः ॥८॥
धनञ्जयोऽन्नि्व्यारयातो पार्थ्चापि धनञ्जयः । वीभत्सक््च मतः पार्थो बीभत्सो विकृतः स्मृतः ॥९॥
अग्निविरोचनः प्रोक्तो भास्करस्तु विरोचनः । विरोचनश्च चन्द्रः स्यात्वचिहत्यो विरोचनः ।१०॥
पाञ्चजन्यः कनचिदद्भिः षयचिच्छद्खो निगदयते । कम्बुरच गदितः शद्रः कम्बुरिष्टञच कुञ्जरः ॥११॥'
भास्करोऽग्निः समुदिष्टः सहत्रांशुरपि क्वचित् । पतद्धो दिनक्रद् जेयः पतद्धः शाल्भः स्मृतः ॥१२॥
फौक्षिको देवराजः स्यादरलूकङ्चापि कौशिकः । शम्भूर्रह्या च विष्णुक्च शम्भुश्च॑व महैदवरः ॥१३॥
वृषकेतुमतः शडकुः अ इक्: कील इहोच्यते । जम्बुको वरणो जेयः शुगालश्चापि जम्बुकः ॥ १४॥
सकं इष्टस्तु मघवान् घर्माशुरकं उच्यते । मन्यौ राहुक्च चन्द्रश्च ग्रहो मन्थी निसच्यते' ॥ १५।
केतवो रक्मयो ज्ञेयाः केतवदच महाध्वजाः । तमोनुदः सहस्ंशुरग्निरचापि प्रकीत्येते ॥ १६॥
मयूखाः किरणा ज्ञेया मयूखार्चापि कीलकाः । सप्ति रत्सवः प्रोक्तः सप्तान्धे ऋषयः छवचित् 1} १७11
वसवः श्ंवरा उक्ता देवारच वसवो मताः । नक्षत्रं धिष्ण्यमित्युवतं गेहं धिष्ण्यं मतं षवचित् ॥१८॥
वासोऽम्बरमिति श्यातमम्बरं च नभःस्थलम् । पयः सकिलिमृद्िष्ठं पयः क्षीरं मतं क्वचित् ॥ १६
शिवं पानीयमुद्दिष्टं शिवं श्रेयः शिवं सुखम् । शिवं व्योमपति प्राहुः शिवं श्रेष्ठं प्रचक्षते ॥२०॥
क्षरं जलं विजानीयात्क्वचिन्मेधं विदुः क्षरम् । स्यन्दनं चाम्ब्, निर्दिष्टं स्यन्दनश्च महारथः ॥२१॥
कृष्णं तमः समाख्यातं कृष्णदचाधोक्षजस्तया । ममृतं क्षीरमित्युक्तं क्वचिच्चेष्ट' समुद्रजम् ॥२२॥
श्वं च सक्लिलं प्रोक्तं मृतमाहुः ज्वं तथा । तोयं घृतमिति प्रोक्तं चुतं सर्पिः क्वचिद्भवेत् ॥२३॥
पानीयं च विषं प्रोक्तं क्वचिद्धालाहलं विषम् । हस्तिहस्तः करः प्रोक्तः करो हस्तः प्रचक्ष्यते ॥२४॥
कौलालं रुधिरं प्रोक्तं नीरं चेव प्रशस्यते ! भुवनं सचिलं प्रोक्तं आकाशं भुवनं स्मृतम् ॥र५ो
प्रवालं कोमलं ज्ञेयं कोमलं स्पष्टवाचकम् । सदनं च स्मृतं तोयं सदनं वेकम उच्यते ॥२६॥
तोयं सदयेति गदितं निलयं सद निगद्यते । संबरं च जलं प्रोक्तं संवरः पवतो भवेत् ।॥ २५७॥
संवरचाऽयुरः ख्यातो यो विभतिं रसां प्रियाम् । स्वरवाकृक्ष्मास्विडां प्राहुरिडा चाम्वरदेवताम् ॥२८॥
पटनीं चन्द्ेरिडां प्राहुरिला तत्समतां गता । अदितिः पृथिवी ज्ञेया देवमाताऽदितिः क्वचित् ॥२९॥
अध्यृढा भार्या परित्यक्ता त्वद्भिदिक््च निगद्यते । वृषो धर्म्मः क्वचिज्जेयो गवामपि पतिवृ षः ।२०॥
वृषा कर्णश्च गदितो वृपा चोक्तः शतक्रतुः । रौहिणेयो चलः प्रोक्तौ रौहिणेयो बुधः क्वचित् ।३१।।
वक्देवो मतः शेपो नागो वा शेष उच्यते । रामस्तु लांगली ज्ञेयो रामो दाज्ञरथिः क्वचित् ॥३२॥
रामदच शुक्लो वर्णो रामच क्षत्रनाशनः । वराहः केदावः स्यातो वराहो जलदः क्वचित् ।\२३॥
वराहः करो जेयो विष्णुर्मेघो हरिस्तथा । अजाराट्स्मरेन्दवो ज्ञेयास्विनेत्रदचाप्यजौ मतः ।)३४॥।
अजः पञ्च विख्यातो" तथाजौ ब्रह्मकेशवौ । शरीरजः स्मृतो रोगः पुचरक्ष्चापि शरीरजः ।३५॥
५ ९
अन काथ-निघण्डुः १०३
स्तयं पूुष्करमव्जं च नागनासाग्रमेवं च । कूलं नभः समाख्यातं कूलं रोधः प्रचक्षते ॥३६॥
सं चानन्तमिति प्रोक्तमनन्तं च वलं पवचित् । विऽ्णुः क्वचिदनन्तः स्थान्नागर्चानर्त उच्यते \३७।।
प्रजापतिः स्मृतो राजा ब्रह्मा चापि प्रजापतिः । प्रजापतिः स्मृतः क्षत्ता क्षत्ता च चर उच्यते ।३८।।
वामः पयोधरः प्रोक्तो वामः स्यादद्रविणं हरः । वामश्च मदनः पोक्तो वामश्च प्रतिकूलके ।३९॥
आगोपो गोपको ज्ञेयः ववचिदागोपको ध्वजः । उरदचाद्धुः समास्यातः स्थानमद्धुःः स्पृतस्तथा ।४०1
वासरस्तु स्सृतो नागो वासरो दिवसो मतः । विभावसुनिंशा ज्ञेया गन्धर्वश्च क्वचिन्मतः 1४१
श्वर्यं रात्रयः प्रोक्ताः श्र्वयश्च स्त्रियो सताः । सान्द्रं घनमिति प्रोक्तं स्निग्धं सादरं निगद्यते ।४२॥
स्वः स्वगेस्य मते नाम स्वः सुखं फ्वचिदुच्यते । स्व आत्मा चेव निर्दिष्टः स्वः प्रोक्तो गृहमूषिकः ।४२॥
कङुःशछन्दोविशेषज्ञो मतः शास्त्ेपि ना ककुप् । ककुम्महीरुहः प्रोक्तो ज्ञेयास्तु ककुभो दिशः ॥४४॥।
क्षयं वेश्म समुदिष्ठं क्षपं रोगं प्रचक्षते 1 जलदस्तु प्लवो ज्ञेयः प्लबो ज्ञेयस्तथोड्पः ।(४५॥।
प्रासादो मण्डपः प्रोक्तो विहारइ्चापि कथ्यते ! घनं . घनं विजानीयाद् घनं वियुलमुच्यते \॥४६॥
प्रयुज्यते च कस्सिश्िचद् घनं सद्खातवादयोः । वरूथं स्यन्दनाम्रं स्यादरूथं वेडम उच्यते \४७।।
चम्ऽ्च वम सहसा प्रवदन्ति. मनीषिगः । असुराञ्च सुरा ज्ञेयाः क्वचिदेवारथोऽसुरःः ।\४८॥
नागाहच द्विरदा ज्ञेयाः पन्नगाश्च क्वचिन्सताः । गन्धर्वश्च तथा वायुः क्वचित्स्याद् देवगाथनः ॥४९।।
ताकष्पो हयः सपुदिष्टस्ताक्ष्यश्चापि पतन्नि राट् । बालेयानसुरानाहं बलिया इच क्वचित् खरान् ।॥५०॥
तृणी वनस्पतिः प्रोक्ता क्वचिदाद्राह्च कथ्यते । किखरी वृक्ष उदिष्टः शिखरी पन्वेतः स्मृतः ।५१॥
द्विजो विप्ररच दन्तच द्विजः पक्षी निगद्यते । चौरो सक्तिम् चो ज्ञेयो वातशचापि मलिम्घुचः ॥५२॥
आत्मजं रक्तमुरिष्टं, सुतः कामस्तथैव च । कीनाशो मृतको ज्ञेयः कोनाशश्चापि राक्षसः 1५३
कौनाक्ञोऽग्निः कृतघ्नश्च कृपणो यम एव च । कोना; क्षंको ज्ञेयः कौनाश्ञरच वृकोदरः ॥५४।।
अवदातं प्रधानं स्यादवदातं च पाण्डुरम् । ज्योत्तिल्लोचनमुदिष्टं ज्योतिर्नक्षत्रमुच्यते \५५॥
ज्योतिश्च गदितो वद्भिः काव्येषु मुनिपुङ्खवेः । प्रधानं सज्जनं जेयं प्रधानं उवेतमुच्यते ।\५६।।
अब्दः संवत्सरो ज्ञेयो मेघरचापि क्वचिन्मतः । वलाहूका महामेघाः शिखरो च वलाहकः ।१५७।।
तोयदं जलदं प्राहुस्तोयदं कथ्यते घृतम् । जीमूतच मतो नागो जौोमूतः क्वचिदम्बुदः \\५८॥!
पौलस्त्यं तु मतं युद्धं पीलस्त्पं पौरुषं विदुः । दु चिकृद्रजकड्चैव प्रोक्तो नित्यं बुधं रसः ॥५९॥
पजेन्यं जलदं प्राहुः पन्यं तु शतक्रतुः ! शिलीमुखाः स्मृता वाणा मराइच शिलीमुखाः ॥६०॥।
ठेखा सोमेति विज्ञेया लेखा चिन्रङकृतौ मता । अम्बरीषं क्वचि द्श्राष्टं क्वचिचुद्धं निगद्यते ॥६१॥
पुस्त्व' चापि मतं . युद्धं पुस्त्व पौरुषमुच्यते । विद्वां सोऽरिपवो हेया विदां सस्त्वसवो मताः ।६२॥
मायाऽविद्येति विक्षेया क्वचिन्माया तु सांवरी । मधु दराक्षीति विज्ञेया क्वचित्स्यान्मधु माक्षिकम् ॥६२॥
सधु चाम्बु समाव्यातं सुरा च मधुसंज्ञका । खं रंधमिति विज्ञेयं खं गृहं नभ एव च ॥६४॥
खमिन्दरियमिति स्यातं खं च नक्षत्रमुच्यते।! घा्तराष्टरा महाहुंसा धृतराष्टरसुताः क्वचित् ॥६५॥
अभाकरो मतः सूर्यो वह्धिश्चापि प्रभाकरः । सितं शुक्लमिति ज्ञेयं सितं वद्धं प्रचक्षते ॥६६॥
असितं कृष्णसित्युक्तं अक्षितं भक्षितं स्मृतम् । बभ्र स्तु नकुलो ज्ञेयः पाण्डवो नकुलस्तथा ॥६७१
त्रिश्च ङकुमाहर्मार्जारमूषिश्चापि तयेभ्यते } यमस्तु वायसो ज्ञेयो यमः प्रेताधिपस्तथा ॥६८।
लक्ष्मणं सारसं विद्यात्तथा दशरथात्मजम् । लक्ष्म चन्द्रस्य काष्ण्यं स्याल्लक्षम्यः केतुः प्रकौत्ितः ।६९॥
` केतुख्चापि मतः काव्ये लक्षमेति मुनिषु द्भवेः ! आरुणेयः स्मृतो दक्षो दक्षश्चाचेतसः क्वचित् ।७०।।
आशुकारी भवेदक्षः स्यादौ तोमरः स्मृतः 1 आदित्यं च रवि विद्याद् दत्यश््चाप्यदितेः सुनः 11७ १॥।
रोगो रजस्तथा रेण रजो छोहितमुच्यते । स्कन्धो नितम्बसं्ञः स्यान्नि्म्बं जघनं तटम् १७२
हेम वस्वि विक्तेयं वसु तेजो निगद्यते । सारङ्धः चातक प्राहुः स्वणं चापि सितासितौ ॥\७३॥
रम्भार्च कदलः प्राहू रम्भा स्वगीद्धना मता ! ग्रावाणो गिरिजाः प्रोक्ता मेघारचापि मनोषिनिः॥७८॥
१०४ अनेका्थै-निवण्टुः
० "+~. निगद्यते । सीपभं रसमृद्िष्टमूतं सत्यमपि पवचित् ॥७५)1
मक्ष मात्मेति विक्ञेयः केचिदाहुविभीतकम् । ज्ञेयमिच्धियमक्षं च शाकटं कर्य एव च 11७६॥
यक्षं च पाशकं विद्याहयावहारिकमेव च । पदममिद्धियमित्युदतं प्रं तामरसं विदुः ।|७७॥
चत्यमायतनं प्रोक्तं नीडमायतनं तया । पुव्पं लोहितमुष्टिष्टं पुष्यं च कुथुमं तथा ॥७८॥
चाजौ तुरद्धमो ज्ञेयो वाजी श्येनो विहद्धमः । विष्णवि सिहुनण्ड्कचन््रादिर्यास्तु वानरान् ।७९॥
वश्रुशिवानिलहयान् हरोनिच्छन्ति कोविदाः । पुरुपव्वजलिद्धेपु हयभूषणलक्ष्मवु ॥८०॥
रामोषावनींदेषु ललामं नवसु स्मृतम् । शुक्रा स्मृताऽक्षिदोपौना कवरी मञ्जरी तया ॥८१॥
यद्रवकरः शुको ज्ञेयः कोफिला वचनप्रिया । पुखिनं जलविच्छेदः पद्धुजं स्यात दायम् ।।८२॥
रतं पापमिति ज्ञेयं सत्वरं श्रीधरमुच्यते । पिश्द्धं रोचनाभं स्यान्मेचकरस्तिलको मतः ॥८३॥
लकटेऽवस्यितं चिह्वं विष्ठद्भिस्तिलकं मतम् । परिवचर्य' च कटकं निकपस्तु कयो मतः ॥८४॥
नानारत्नैरपविता मञ्जूष रागिणी स्मृता । दिनृदाजितिहैषु केसरित्वं विवीयते ८५1
व्यक्तो मधुरः शव्दः कल' इत्यभिधीयते । अलातमुत्मुकं ज्ेय' छेदो नाम॒ भयङ्करः ॥८६॥
भावः श्युद्धारमावुर्यं' भावौऽवस्याप्ररूपणम् । चितासः कामजो दोपस्तदेव लितं मतम्. ।८७॥
उत्तमां विना देहं कवन्धं चेति शस्यते । शिरसो वेष्टनं यदं तदुप्णीपं निगद्यते ॥८८॥
आहतं समवीर्ध' स्यान्निविडं पौडितोन्नतम् । मण्डूको मेकसं्ञः स्याटर्याभूश्चातको मतः ॥८९॥
शिवा पिद्धवती ज्ञेया विदां सचलं मतम् । दुडचर्मा शिपिविष्टः स्यात्कर्वकस्तु एपीवलः ।९०॥
कन्याजातहच फानीनो पण्डः क्लीव इति स्मृतः । उत्कृष्टः वसुर स्यातां म्किप्टमन्यक्तयायकम् ॥९१॥
रदनो हस्तिवन्तः स्याहानं कटकसंक्चितम् । तोदनं चाङ्कुशं विद्यादारानं हस्तिवन्धनम् ।९२॥
घनाघन इति ख्यातः श्नास्त्रेप्वधिकपीरपः । भपाचीनं मनोन्नं च वुदधर्तेयात्रु ओेमुपी ॥९३॥
अर्कस्तु पादपे ज्ञेयो नदी स्यात्फेनवाहिनी । यरवारोहौ मरद्यानोऽर्वानां हृदये ध्वनिः 11२५॥
मआक्रन्व इति विन्नेयः खुरा्च दाफंक्ञिताः 1 भाममासं भवेत्कव्यं पकं पिशितमुच्यते ॥९५।
शरुष्फरं तु विरसं जञेयं मृष्टं सरसमुच्यते । शद्धजं शुक्तिजं च॑व वाराहं तिमिमौपितिकम् ।९६॥
वंशादाज्ञीविपान्नागाज्जीमूताच्च तवाष्टमम् । लोकन्नो दक्षिणो चेयो दक्षिणश्च तुरः स्मृतः ।९७॥
माक्तं तु मतं विद्याक्तण्टकं गहनं मतम् । माननं चाक्रुले नेत्रे चिकुरं चापि शास्यते 11९८॥
पापः इयाम इति प्रोक्तो वभ्रुस्तु कपिलो मतः । स्थविष्टं स्वावरे चैव दविष्ठं दरमुच्यते ॥९९॥
परमेष्ठ मतः शरेष्ठः प्रेम श्रियमुदाहतम् । प्रकादाः स्व्रीगृहैरक्तः होप इति संज्ञितः ॥ १००॥
पदश्च्चर्म्मेफारः स्यान्नापितस्त्वनयः स्मृतः 1 लावण्यमाहुमरुरय' चित्रं च श्ुभकतम्मजम् ।१०१॥
व्याधयक्चामयाः प्रोक्ताः पानीयं तु समुच्चयः । भाधयस्तु स्मृताः प्राज्ेदरिचत्तोत्पन्ना उपद्रवाः 1 १०२॥
रंहो वैगः समाख्यातः सव्र सच्चरितं स्मृतम्. 1 जाल्वाल स्मृतं सदूभिरपां वेगनिवारणम् ॥१०३॥
चटकः फलविद्कूः स्यात्तुल्यं सवृशञमुच्यते । किलासं पाण्डुरं ज्ञेयं दोला प्रद्धंति शस्यते ।(६-०४॥
मन्दिरं नगरं ज्ञेयं निलयं चापि मन्दिरम् । सहललनयनोऽगारिः प्रधनं युद्धमुच्यते ॥ १०५॥
पलाद हरितो वण्णो मेचको नीलयिज्जरः 1 उक्षाणं वृषभं विद्याल्टृलायो महिषो मतः ॥१०६॥
उस्रा वंध्या वसा वेहत् पृष्ठोहम यभिणी हि य! 1 व्याख्यातो मस्करो वेणुस्त्वचिसारः परिकोतितः।\१०७॥
हिकं कामं शपं चैव॒ रोपमाहू्मनीपिणः 1 कलभोऽल्पवयो नागः कुषं चाविकं मतम् ।1१०८॥
व॒जिनं कुटिलं विच्ात्सम्राट् राजा च भूभुजौ । रत्नं वज विजानीयात्तरियामा क्षणदा मता ॥[१०९॥
दीधः पर्यु विजानीयात् हृस्वं नीचकमुच्यते। भूरि प्रभूतमुहिष्टमभितः सर्ववाचकम् ।।११०॥
पवनरइचानिलो ज्ञेयः पवनशचाधमो जनः । प्रियवाक्यो भवेदयं; स्नातश्च परिकीर्तितः ॥१११॥
साडम्बरख्च पटहो व्यञ्जनं वोचनं मतम् । विपंची वल्लकी स्याता वीणां चैव निगद्यते ।।११२॥
मालती सुमना जेया सुमना मृदितो जनः! वल्लरी मञ्जरी ख्याता प्रपाऽष्शाल्् प्रकीतिताः ॥११२॥
४
९४ अनेकाथे-निघण्टुः १०५
ञवुनिरुच्यते तोयं तेन॒ जीवति प्यकम् ! तस्य पत्राक्षिमानेन रामो राजीवलोचनः । ११४।।
उत््त्य वचं देहादसुग्दग्धं च यत्पुरा । इन्द्राय दत्तवान्कणस्तेन वकर्तेनः स्मृतः 11 ११५॥1
तोकष्णश्चेव प्रचण्डडच वृको नासानरो मतः! स पाण्डवस्य उदरे तेन भीमो वृकोदरः ११६)
यस्य भुतिमुखा वाणी पुण्य-श्लोकः स उच्यते । यः खेदी चानिव्त त युद्धशौण्डः स उच्यते 11११७17
महासंसगंसद्धाते महेष्वासं प्रचक्षते 1 स्वविक्रमेस्तापयेच्च परे... ...यूथं तापयेत् ॥११८॥
यूथं तापये्स्तं विज्ञेयश्च स यूथपः 1 तस्मादपि च योवयेः स तु यूयपयुथपः । ११९]
सिहान्नितान्तसौवीरः स तूसिह इति स्मृतः 1 ये हि स्पष्टप्रवक्तारो मतास्ते व्यक्तवादिनः ॥ १२०॥
यो यसित्यं च नाम्नाति स फौनाक्च इति स्मृतः । योऽप्रचुद्धो उल्पदुद्धिश्च स तु मन्दं इति स्मृतः । १२१।।
उपकारंतुयो हन्ति स एृतघ्न इति स्मृतः! हं गवं सुखे खेदे वुद्धौ च प्रतिभासते । १२२
स्तेहभाग्यक्षये चेव मन्दकश्षब्दो निगद्यते 1 नातीत्य वर्तेते यत्र॒ तदध्यात्मं प्रचक्षते \।१२३॥
चेतसश्च समाधानं समाधिरिति गदते ! सर्व्लेशविनिसु क्तो सर हि दान्त इति स्मृतः ।1१२४॥
निमंमो निरहङ्धारो विज्ञेयः छिन्नसंशयः । प्रदाता देशकालज्ञः समाधिस्थः स॒ उच्यते ॥ १२५
- मुखरोऽल्पसति्यस्तु॒सक्रोधरचेव कीटकः । वृत्तिर्यत्र तु गृहयानां परोक्षे वहिः तत्क्रिया । १२६
आहारव्यवहारेषु सा पभरीतिनिरूपस्करा । परस्परं स्वदारेषु सतां येषां प्रवतंते १२७]
विभरम्भातख्मणयाद्वापि सा प्रीतिनिरद्रवा । यजः ख्यातिरिति प्रोक्तं तद्योगात्प्राहुर्च्यते ॥ १२८1
कोतिस्यातियशषेयोगाद् भेगवन्तिति चोच्यते । प्रियदानेषु यः शुद्धः स उदार इति स्मृतः । १२९॥
रजस्वला तु या नारी सा चोदक्या प्रकोतिता " प्रीतिर्भावक्निये स्वच्छरक्तालगितनु विपुम्१।।१३०।
तेजो रेतसि दीप्तौ तपो हि स्याद् वुषार्थकः । योऽन्यजात्तो हनो जौवः स शरारू इति स्मृतः ।१३१॥
भिय्यादृष्टिरहंमानी नास्तिकः सः प्रकीतितः । कामः क्रोधश्च वे पुवे जोभोऽसत्यं च मध्यमे ॥ १३२॥
अत्ते मोहो विषादश्च यस्य ज्ञेयः स षड्वदः 1 अमृते जारजः कुण्डो सूते सत्तर गोलकः ।॥ १३३1
अनयोर्योऽन्नमरनाति स कृण्डारी निगद्यते ! श्रूणस्त्री गभिणी बाल ब्राह्मणी ब हय जो विनी \। १३४।।
परचित्ते यवोयान् योः ज्येष्ठपल्नीं परामृशन् ! यः पर्चिमश्च ज्येष्ठोऽपि परचित्तः स उच्यते ॥\१३५॥।
पुष्पजं क्षोमजं चम्मकोशजं भम्मेजं तथा ! गुणनं च समुद्दिष्टं तद्भेदा दस्त्रजातिषु ।॥ १३६]
विभ्बारक्तघरा या स्वरौ विम्बोष्ठों तां विनिर्दिशेत् ! या स्थात् संकौडनपरा ललन तां विनिदिशषेत् ॥। १२३७
दव्दकिण्डप्तीकार कुंभौ यस्यास्तन् कुचौ ! सदरूपविविक्ताङ्धी सा भवेद्ररर्वण्णनी ।1१३८॥।
लाच्ण्ययुक्ता या नारी रक्तां तां विनिर्दिशेत् । या मत्ता मत्तचज्ञ्योतिः सा ज्ञेया मत्तकाशिनी।। १३९
भूरिर्च भूरिसुदिष्टं अन्नं श्व इति स्मृतम् 1 भूरि श्रवो ददातीह् तस्माद् भूरिश्चवो हि सः 1 १४०॥।
चतुष्पाद्विशतिभुजो लोहितग्रीव एव च । निसर्गद॒रणात्कूराद्रवणाद् रावणः स्मृतः ।1१४१॥
रोषणा या भेवेत्नारी भासिनी तां विनिर्दिशेत् । न्यग्रोधलक्षणं विद्याहधाना परिमण्डलम् ॥। १४२॥
ताभ्यासुपेता वनिता न्यग्नोघपरिमण्डला 1 तत्तुल्ये चाक्षिणी यस्याः सा स्त्री राजौवलोचना 11 १४३॥
व्णेभ्रमाणनिर्घोष्ठेऽछिन्नसंपद्भिरन्वितः । राजीवमन्ये शंसन्ति स्निरधव्णं सितासितम् 11 १४४।।४६
किचिदुत्तरतयोगात्सीता राजीवलोचना । वकभिर्यास्िभियु क्ता चद्खकण्ठो उदाहूता \॥१४५॥
-..-..जराकराकारं स्यन्दनाग्रमिवाग्रतः 1 चरस्त्वे...ति तज्जेयं त्तस्यैवाप्रं-..... 11 १४६1;
.....ततं म्संयुद्तं तत्तथालिनिमुच्यते 1 प्रहणे धारणे सामे वाहने घमेसंयुता ।॥ १४७१
रमणे क्रीडने स्ख भार्या नाम प्रदत्त॑ते ! सूटतायां सविदायां ्प्तारवत्त्वंशुमालिनि 1 १४८।।
विषमाक्षदरा एते ज्ञेयाप्रं तैः विसंस्थिता;ः ! कोटरस्या इति ज्ञेयाः सप्पेकोटखगादयः 11 १४९।।
आतास्नपत्ल्वो यस्तु वृक्षाणामविरोद्गमः 1 .-..----- 1१५९1
सौकुमाय किसलयं कोमलत्वं च तत्स्मतम् । हतानां च चतुर्हस्तं नल्वं तदिहत्ज्ञितम् ॥ १५.१1
ॐ नोट--मूर प्रतिमे १४४ चे १४८ तक्के पद्योपर उनके नम्बर न्दु पड़ हु ।
१०६ अनेकार्थ-नाममाटा
कुम्भो वाहः प्रस्थः समं नल्व इति विधीयते । विपिनं रून्यमित्युक्तं विपिनं गुहुमेव च ॥१५२॥
रक्मयरण्णेः च घामं च दज्ञनीयार्थवाचकः । सर्वायक्चाप्युवर्णश्च पानीयं शीतमुच्यते ॥१५३॥
नीहारं श्ोतमित्युकतं प्रवोषान्तो निक्ीकः। ५१५०००५०. ०५.००. ॥
इति महाकविश्रीधनञ्जयकृते निषण्टुञ्मये शव्दसंकीर्णे यनेकारथग्ररूपरणौ द्वितीयपरिच्छेदः ॥२॥
एकाक्षरी-कोपः
विश्वाभिधानकोज्ञानि प्रविलोकय प्रभाष्यते । ममरेण कवीन णैकाक्षरनाममाछिका ॥१॥
अः एृष्णः भः स्वयंभूरिः काम ई श्रीरुरीहवरः । ऊ रक्षणः ऋ ऋ ज्ञेयौ देवदानवमतरौ ॥२॥
लर्देवसुं वाराहौ भवेदेविष्णुरेः शिवः । बोर्वेषा भीरनतः स्यादं ब्रह्म परम्अः शिवः ॥२॥
को ब्रह्मात्मप्रकाश्ाके कः स्याद्वायुयमागनिप् । कं शी सुसुखे कुस्तु भूमी शब्दे च कि पुनः 1।४॥
स्यातक्षेपनिन्दयोः प्रश्ने वितकं च खमिन्िये । स्वग्गं व्योम्नि मुखे शन्ये सुखे संविदि खो रवी ॥५॥
गस्तु गातरि गंघर्व्वे गा गीती गो विनायके ) स्वर्गे दिशि पञी वचर मूमाचिन्दौ जके गिरि 1६
धस्तु सुघटीशे घा किकिण्या च घूर्घ्वनी। डं मज्जने डो वृप भेजिने चः चनद्रचौरयोः 1७
चःसूर्ये कच्छपे छं तु निर्मले जस्तु जेतरि । विजये तेजसि वाचि पिश्याच्यां जिः जवेऽपि च 11८॥
ञ्लो नष्टे रवे वायौ मो गायने घर्घरध्वनौ । ठं पृथिव्यां करटे च टो घ्वनीढठो महेदवरे 11९11
शृन्ये वृहद्वनौ चंदरमंडले डं शिवे ध्वनौ ! ढो भये निगुणे शब्दे' ढक्कायां णस्तु निड्चये ।१०।।
ज्ञाने तस्तस्करे कोडपुच्छयोस्ता पुन्देया । यो भीत्राणे महष, दं पल्यां दा दातृदानयोः \\११॥
वन्धे च घा गृुहूये केञ्ञे धातरि धीर्मतौ । वर्भारकंपचितासु नो नरे बन्धुवुद्धयोः ।॥१२॥
निस्तु नेतरि नुः स्तुत्यां नीः सयं पस्तु पातरि । पावने जल्यानें च फो क््नाजलफनयोः ॥१३२॥
भाः कांती भूर्भुवः स्याने भीर्भये मः शिवे विधी । चंदे शिरसि मा माने श्रीमात्रौर्वारणेऽन्ययम् ।\१८॥
मुः पु तिर्व'धने यस्तु मातरिङ्वनि यं यञ्चः । यास्तु यातरि खट् वागे याने लक्ष्यां च रो धृतौ 1१५१
तीव्रे वश्वानर कामे राः स्वर्णे जलदे ध्वनी । रौञ्रमे रर्भये सूर्ये इद्रे चलनेपि च ॥१६1
लं तले लीः पुनः श्लेषे ली भये वौ महेषवरे । वः पशचिमदिज्ञास्वामी व इवार्थे स्मरेऽप्ययम् 1१७1
शंशुभेश्ातु श्चोभायां शचौ श्रयने शु निज्ञाकरे। पः श्िलष्डे पुनर्गर्भे विमोक्षे घः परोक्षके 11१८॥
सा लक्ष्यां हो निपाते च हस्ते दारुणि शुक्िनि । कष क्षेच रक्षसीत्युक्ता माला प्राकूसुरिसम्मता । १९1
इति एकाक्षरी नाममाला समाप्रा ॥७॥
[1
रास्व पष्ट
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अशू २३
अंसुक ५९
अंस ५५९
अंहस् ६
अंह्िप ॥
अक्षार ९१२
अक्ष { ९९
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अक्षि ४९
अक्षौहिणी ४३
अखिल ८८
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अग्निसूनुः रे
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अङ्ग १९
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अङ्खराग ६९
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अन्तकं ७९१
अन्तरिक्ष २८
अन्त्य ६३
अन्त्यकार्यप ५८
अन्तवासिन् ३
अन्धकार ७२
अन्वय ६३
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करवालक ४३ ८५ | कामिनी १ “ ५ । क ५ ४७
कराडगुकि ५० १०१ कामुक १ ४ | य् १७ ५१
करिन् ४५ ८८ | कामुकी { १५ १ कुम्भिन् ४्प् ८८
करण पय ११० (८ १७ ४ कुम्िनी ५ ६
करेणु ४५ ८1 १९ कुख्यात ८४ १४५
क्या ७. १५४. | कालस्वरः = ९४ | कुट ३ श्य
कर्ण ४९ ९८ | कार्तिकेय दे ६७ कुट्टा १७. ३५
कर्णदूलिन् ७० श्ण्य | कामुक (र ७९ | कल्या १६ ३२
कदम १० २० | कामुकिन्. ७० १४२ | कुवलय ११ २२
क्षं र् ५९ ११८ काट { ७१ १४५ कुश ७ १५
कलङ्क ७३ ५२ 0 ७२ १४८ | कदाचिन् ७९ शय
कलत्र १६ २३२९ | कालेय ६२ १२२ | कुसुम ४० ८०
कटधीत ४७ स्य | कारी ७३ १५० । कूपार १२ २५
कलम ५२ १०५ | काद्यप् ५८ ११५ | कूपसि ९० १९४
कलम् ८१ १६७ | काक ७५ १५५ | कच्छ ट ‡८&
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क्या ६१ ४
ध ३ १२६ | काष्टापाट डर ६१ ७१ १४५
+. त ४७ | काष्ठाम्बर ३२ ६१ | कृतिन् ˆ ७९ १६४
कलामृत् १३१ | किवदन्ती ७४ १५४ | कत्ल ८८ १८७
कलिल पै प्किकर १४ २९ | कृपण ८४ १७५
1 १ ९; | किचन ७६ १५७ | छपा ५४ ११०
9
कत्मापी ७३ १५ ( ७३ १५१ | दृपाण ४८३ ८५
क 1 व " 8 ८ १७१
कल्क १३ १५ कितवं ५९ १६५ कणान् २३ ६५
कृत् ९० १९४ किरण २३ ४५ २३९ घ
कष्ट ८८ १८९ `| कितं 8 १४ | कृष्ण ७२ १४८
कस्तूरी ५९ ११७ | किरीटिन् ७० श्य | केकर ४. ९
कस्वर् ४७ ५९ | किल्विष ६६ १३१ | केकिन् ६ १२५
कञ्चन 4 ९३ कीचकशत्रू ७१ १४५ । केतु ४२ ८४
काञ्ची ६० ११९ | कीर्तिं ७८ १५६३ | केविनं ५८ ११६
काण्ड ३९ ७८ | कीनादा ८४. १७५ | कहा ९० १९५
कादम्बरी ६१ १२० | कु ३. + धः
= रावन्धनं ९१ 2
कृनन ६ १३ कुक्तरुर ४६ ९२ तारितं ४५ ९०
के(नीनजनक २७ ५१ कुक्षि ५१ १०२ केशव ॥ ३७ छ
३७ |
कान्त क १७७. | ` इडम् १९ १९७ | केदावाग्रन ७० १४
॥ ् कूच ५.४ १०२ केथिन् ३६ ५
कान्ता १ ९ कवेर ४८ ९५: | कैरव ११ २२
कान्तार ५ ज १५८ | कोक ६ १२७
क्गन्तिमत् २४ 4 स | कोकनद १० २१
क कुमार (भ +.
काम ३९ व
चमूर्
चर
चमप
चरग्य
चन्न
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चादटुकरत्
चाप
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चिन्न
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चीच्करुत
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धानुष्क ७
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धिषणा ५५
धिष्ण्य ६६
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धूनी १२
भयं २७
धूम ७२
धूजंटि ३५
धूतं ७९
धूलि ७३
धूलि ६७
धेनु ५२
धैय्यं ८३
ध्वजा ४३
ध्वजिनी ४३
ध्वान्तारि २६
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नक्षत २५
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नगरी ४८
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नदीर्वरी-नदीरवर ३६
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१५०
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२२
१७९
१५६
१०७
२८
` २८
राब्दानुक्रमणिका ११५
शब्द प्रष्ठ रसकोक | शव्द ` प्रष्ठ इलोक | शब्द् प्रष्ठ रोक
नृपक्त् ५६ ११२ । परासु ५४ १०८ | पाशित ८५ १७८
= 9 १९६ | परिखा ६७ १३४ | पारानीत ८५ १७६
= ४९ ९९ | परिचित + ३1 १०८ | पाषाण ८२ १७०
नैक ६० १६१ परिणयन ८९ १८९ पितामह ३६ ७२
तैयायिक ५५ १११ | परिधि ५ १ ति 96 ६
त्यच् ७६ १५८ | परिवाद 1 ८ ॥ ् पिनद्ध ८५ १७६
प परि पिनाकिन् ३५ ६८
पक्षिन् २९ प स ॥ ४ ; | पिशित २९ ११
पङ्क ` {१० २० | परुष ५५ । ९५५ 1 + ५
# (७३ १५२ | पज॑न्य ८ १८ | पिशंगी ७३ १५०
पक्ति ते १४० | पवेत ४; ८ | पीठ ५६ ११३
पटु ७९ ६४ | परक २९ ५५ | पीत ७२ १४९
पट्टन ५८ | १ ४ ९६० | पुश्चली ` १७ ४,
पण्डित ॥ १११ त पुत्र र ध ४ व ८ न
प्ण्यस्म्ी १७ 1 ३२ | पुष्य ९५ १२९
न € ४६ ध इ ६ „ | पुण्डरीक १२ -२१
॑ २६ प४ पुत्र १९ ३९
पतत्रिन् २९ ५४ । भ, त ५ पुनभ १७ ३५
पताका ४३ ८४ | 1 । | पमस् १३ २८
पति ष १० न पुर् ४८ ९७
- पतिवत्नी १७ | ५ ५ प्र ४८ प
पतित्रता १७ ३४ ५ ४ ४ प्रन्दर ३० ५८
तनं ४ ९७ पाणि ५० १०९१ पुरध्री-पुरन्ध्र १६ ३१
पत्ति श २९ | भण्डु ७१ न प्राण ७६ १५६
पत्नी ९ ३२ ` । प्ड्र 9९ ५८. || बसी ४८ ९७
पत्रिन् २६ ५४ | परताल ८ 9 ५ धु ५७ ११४
पथिन् 94 १6 {१ ७ ९५९ | पुरूष ३ २८
५१ १०३ | पाद { २३ । पुरुषोत्तम ३७ ७४
पद ६ १३३ (५१ १५२
1 ६८ १३८ | पादप ५ ११ | शष्ट श:
पदग १४ २९ पाप ६६ १३१ पुरोगति ४६ ४
पदाति १४ + | पाप्मन् ६६ „ | पूर्णं ६२ १२३
पद्म १० २० | पार १३ 1 पक ५ क
पद्मनाभ ३७ ७५ | पारावार १२ २५ | पुलोमारि ३० ६०
पन्नग ६४ १२८ | पारिषद ह > | शन १६ २१
१ { ७ १५ | पाश्वं ् ९ | पुष्करिन् ४५ ८९
५ ६२ १२२ पालाश ७२ १८६९ ष्कल ८४ १७३
पयोधर ५१ १०२ | पाली १३ २७ ६ {1 ९० १९४
पराग ७३ १५१ | पावक २३३ ६४ | पुष्प ४० ८०
११६
ख्त्द् प्रष्ठ
पुप्पहेति ४२
पूग ६ ९
पुपन् २६
पृतना धद
पृथिवी य
पृथूरोमन् ८
पृथुल ८७
(1 ८७
पुश्वी ३
पृषत द्य
पेशल ७५
पेचिन् २९
पोत २०
पौत्रिन् ४६
पौरुष ८३
प्रकर ६९
ग्रकृति ८८
म्रगत्म ७९
प्रचर ७८
प्रचर ९०
प्रजा १९
७
प्रजापति 1 ४ ८
ग्रज्ञा ५५
प्रणयिनी १६
प्रणिधि 1 ध
प्रतिरोधक ८१
प्रतीत इ.
प्रतोदी ६७
प्रत्यग्र ७५
अभञ्जन ३२
प्रभा २३
प्रभु ५
प्रमथाधिप ३५
प्रमद ध
प्रमदा १६
प्रमोद ष
म्रव्रीण ७९
१.1
1
श्टोक
८३
१३९
१८३
१२७
१५५
४
४४०
९१
१७१
१४०
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३९
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१८२
१६९
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१२४
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६३
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१०
६८
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म्
१०९
१६
१९३
धनञ्जय-नासमसल
शब्द्
प्रवृत्ति
प्रशस्त
प्रसन्ना
प्रसव
प्रसाधन
प्रसून
प्रस्तर
प्रस्थ
प्रसन्ना
प्राशु
प्राकार
प्राक्तन
प्राचीनर्वाहि
प्राज्य
प्राज्न
प्राभूत |
प्रायस्
प्रारभ्य `
प्राखेय
प्रात्रुपिक
प्रासाद
प्रिय
प्रिया
प्रियाम्विका
प्रीत
प्रेमन्
प्रेयस्
प्रेयसी
प्रेरित
प्रेष्ठा
प्रेष्य
प्टवग
फणिन्
फलिन्
फले ग्राहिन्
फल्गु
^>
फात्गून
प्रष्ठ
७४
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रोक ।
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दाव्दट् प्रष्ठ
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वन्वकी १७
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बन्धुर ८५
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वर {५
वलदाचर ३०
वाहक ,८
वलसूदन ३७
वंहिष्ठ ९०
वहु - ९०
{ ८७
4:4६
वाण (वाण) ३९
वाणवारण ९०
वाणसूदन ३७
वाणी (वाणी) पय
वा ९०
वाखा १५
वाहु ५०
वाहुशिरस् ५०
विस्निनी ११
वृध पद
वरघ्न २६
ब्रह्मन् ७२
ब्रीहि ८१
भ
भ „`. ५4
भग १३
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भट { ध
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भतुपस्वस्ा २१
भर्मन् ४७
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भरत्ान्वस
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भविक
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भागीरथी
भाग्य
भानु,
भामा
भागिनी
सारती
भार्या
भाव
भावुक
मास्
भासुर
भास्कर
भास्वर
भिक्ष,
भीष
भूज
भूजंगम
भूवन
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खच्दानुकमणिका
शाच्द् ष्ठ
भ्रात्रूजानी २९१
भ्रातृव्य २२
म्
मकरध्वज ३९
मकरन्द ७३
मक्षु दे
मंगलं ९१
मदवत् ३०
मंजीरक ५३
सड ४९
मंडटाग्र ४३
मणित ५
मतंगजं ॥ 8
मतालम्ब ६७
मन्स्य ८
मत्तवारण ६७
मधित ६२
मदन ३९
मदिरा ६१
मद्य ६१
मद्यप ६
मपु ७३
मधूवारा =
मधु्नत ४२
मधुसुदन ३७
मध्यमपाण्डवे ७०
मनस् 8.
मनस्विन् ९०
मनस्विनी १७
मनीपा ष्प्
मनुज १३
सनुप्य १३
मनोज्ञ ८५
मनोहर ८५
८ ८०
मंद { ^
मन्दाक्िनि ३९६
मन्दिर ९६
मन्मथ ३९
श्छोक
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१३२
५७
राच्द्
मन्पु
मन्पूतात्मन्
मय
मपूखचत्
मयूर
मराल
मरीचि
मरुत
मरुत्
मरुत्वत्
मरत्पुतच्र
मर्त्ससत
ममं
मलिन
मल्लिका
सखीमस
महति
महत्
महावीर
महाह्व
महिला
महिषी
मही
महेद्वर
महोत्पलं
मासि
मा
नातंग
मातरिदवन्
मातुलानी
मात्
मानव
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मानिनी
मान्
सार
५ [4
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रोक
१०९
१२९
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११५
१९३
१५१८ . धनञ्य-नाममालखा
रार य ध ५ भ [नप
राच्द् प्रू टाक | शब्द् प्रर पटक | टाब्टर प्रग्र श्टोक
मागे ७८ १६२ ¦ मत्री ९१ ६९४ | रधम् २९ . ५८
मार्गण ३९ ७८ | मत्रेयिक ९ १९७ | रजत ४७ ९४
मार्तण्य २६ ४९ | मैरेय ६१ १२० | रजनी रषु ४८
माला ६० ११९ । मोघ ८८ १८६ | रजम् ७३ १५१
माल्य ६० 9 मौण्ड्य द ४५ ¦ रण चट ८७
मितंगम +, ८८ | मौक्तिक ४७ ९४ : रत्नाकर १२ ५
मित्र २० ४१ | मौर्वी ४६ ८२ | र्थ्य २७ ५२
मित्रयुक् २० 7. य | रन्ध ८९, १९०
|
मिहिर १८ । यज्ञारि ३५ ६९ ¦ रमण १८ ३७
मीन ८ १७ | यति २ ३ । रमणी १६ ३२
मीनाकर् १२ २५ | यन्तृ + ८९ | रमणीय ८५ १७७
। (९4 ॥
मुख ९ ९ | यम 1 २ २ | रम्य , ८५
मू ८० १६६ | ७१ ६८५. ; स्य ८३ १७२
मुग्धा १४ ह शकत ५ ५१ ¦ रवि २६ ४९
मुक्ता १७ ३५ | पवर ॥ # | दिनि २३ ४६
मद ५४ १०९ यमूनाजनकः २७ #॥ र्सुना ६० ११९
मूधा ध = 4 (य् ८१ १९०
यातुवान ९ ५५ ष ७५
मुनि २ ३ ध „ | सहस् ८ १७५
मुरमूदन ३७ ७५ | बात ४५ ८ | रहस्य ८४ ७५
मुमुहुः ८८ १८५ | वाध €<“ ^ ^ ७७ १६०
मूक ८० १६६ | बाचन् १५ | राजन् ५ १०
मूर्खं ४ ५ | युच्त ७७ १९६१ । राजयद्ेमन् ७१ १४९६
यग् {९ २
मूढ ह 91: | र | राजराज ४८ ६
मूति १९. 4 | ॥ २ | राजसूय ५६ ११२
[4 ् ग्म २
मूटन् ५२ १०४ ¦ दम ५ ४ ¡ राव्रिचर् २९ ५५
£ ७ |=
मृग ६४ १२७ | बून ७ ६६१ | रावरिजागर _ ४६ ९२
मृगनाभिजा ५९ ११७ ' ष्ट ४ ५ 3 | रामा १५ ` ३!
मृगांक ८६ १७९ ¦ 4 १४९६ | राष्ट ४८ ९७
< । 4
मृगेन्द्र . ४५ इ ९५ ६१ | रिपु २२ 41
€ गि प्र
मतं ५४ १०८ #९ । यामन् ¶ दे | ठचिर् ८४ १७८
४ | योग्या ८५ १८५ | सि २३ ५
मृत्यु ७१ ५८५ ॥ बत \ १८ ३० [च (( ^ ५
मद ७५ १५५ (१ र्च्य ६० १६९
6 योपित् १८ २० ध ४
मृषा ८८ १८६ सद्र २३५ ६९
४ यौवन ६२ १२४ ११८
मेखला २ | योवनिक ६२ १२३ रविर् म
>~“ ६० १ १ ९ ५ ध 1 ~ ८९ १ ८८
मव ८ 1 र र् ५४ १०९
। रंटस ८३ १८२ 3 ©
मेघपथ २८ ५३ ४ स्पाजीवा १७ .३६
स (1 9
नं २ धू | स्त ७२ १४९ | रं ७ र
मेघावी ` ५५ १११ । ८१ १६८८ | रे ७६ १५४
राच्द्
रेणु
रेवतीदयित्त
रोधस्
रोपण
-रोहिणीपत्ि
रोहिताश्व
रद्मन्
लद्मी
ऊद्धपीपति
लधु
-लेजिका
रता
ऊतान्त
लपन
ख्ग्य
ललना
ख्व
लागल
लांच्छन
व्व
रठ्यक
लेखिहान
लेश
सोक
लोह्
-लोहित
लोहिनी
वक्ता
वन्न
वक्षस्
वक्षोज
वचन
चन्तस्_
वज्ञ
विन्
प्रष्ठ
७३
४७
१३
३९
८६
३३
७२
२३८
३८
+
१७
१९
४9
४९
ष्पद
94
८९
७३
८४
1
८६
५७
{५4
शब्दानुक्रमणिका
श्छोक | शाब्द पृष्ठ इरोक
१५१ ¦ वत्स ८१ १६७
१४२ वेदन ४९ ९८
९८. क ९४ ३०
६ ६ १३
१
वनस्पति ४१ ११
५ वनिता १४ ३०
` ` | वनेचर ६ १३
वहि ३३ ६४
१५२ | वपुस् १९ ३८
+. ६७ १३४
16, & र
१७२ वयत् ४
९ वयस्या २० ४१
२३ वर १८ २७
ह । ८९ १८९
९८ वरटा ९४ ९१७
१०८ त्राह ४६ ९१
त वरूथिनी ४३ ८९
१९७ वगं ६३ १२५
१४२ वणं र्ठ १५३ |
१५२ वणिन् २ „ड
१७५ वतुल ८७ १८३
५ वत्मन् ७५८ १६२
४ वद्धेमान ५५७ ११५
६ वमेन् ९० १९४
वर्षीयस् ५७ ९१४
९९१ वहिणि( बहिण )६३ १२६
४ वलक्ष ७९ १४७
ष प वलिम्ख (बलीम्) १२
१५० | वह्लभ १८ २७
वल्लभा १९६ ३३
१६९ | वल्लरी ११ २३
९८ | वल्ली ११ ४.
१०२ | वक्षति ६६ १२३३
१०२ | वसु ४७ ९५
१०४ | वसुवा र ६
१०४ | चसुन्यय द् ६
१९ | वसुमत ` ३ ५
५७ । वस्तु `. ९१६
(
विहीन
र
राच्द् ४1
वस्त्य ६६
वस्नं ५९
वाग्मिन् ५५
वाच् ५२
वाचस्पति ९२
वाजिन् २७
वाति ३२
वातायन ६७
वानर ६
वाण( वाण ) ३९
वाणवारण ९०
वाणस.दन ३७
वाणी (वाणी )५२्
वामलोचना १५
वायु ३२
वापूपथ २८
वायुपुत्र ७१
नार् ७9
वार्ता ७४
वारण ॥ +:
वारली ६४
वारि
वारिपि १२
वारिराशि १२
वारुणी ६१
वारद्धोनि €
वासर २६
वासव ३०
वासष् ५९
वासुदेव ३७
वाह् २७
वाहिनी ४३
वि २९
विकल ८९
विक्रम ८४
पिचक्नग ५५्
विट १८
` चि पिन् १
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9
१५९
श्छोक
१३३
११७
१११
१०४
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प
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(३1
१११
४
=
५५२
५२० धनञ्जय-नाममाटस
स प्रष्ठ दष्टोक | ङ्द प्रष्ठ ददोक | शव्द षठ
क ८८ १८६ | विदवरूपर ३५ ७० | वशारिण ८
वत्त ४७ ९५ | विदवक्ष ~~ ८५ वंश्रवण ४८
र ७९ १६६ | विदवम्भरा ३ ५ | वैदवानर ३३
४ ~ "
। 1 ८६ १३७ | विप ७ १५ , कंच ६३
१ ९ १९ | विपक्षय ६५ १२८ ¦ व्यतिकर ६
व ५५ ५११ विप्र ६८ २७ व्य्रपदेय ६८
३६ ५७२ | विपय तं ९७ | व्यसन ८८
व २६ ५८२ | विप्किर् २९ ५४ | व्यात्र ८६
वधिपुत्र ३७ ७१ | विष्टप ५७ ११३ । व्याज ६८
विनं रध ४७ | विष्टर ५६ {१३ ¦ व्याध ७
॥ ॥ =
विघुर ८८ १८६ | विष्णु ८ 6 ६९
विनतात्मज ६५ ६२७ विस्मय दथः १अ४ | , ६९
विन्मान्व ९ १३७ . विहायस रत ५३ | +
विपिन ६ १३ , वीचि ३ २७ । ह ९
व्रिफ् ८८ १८६ | वीतराग ५ ११६ , = (१
विभावसु {२३ ॥ | वीर ५८ ५.५ =
< {३ ६५ | ६६५ | ब्रात ६९
विम् 4 ६४ १२७ । व्योमन् २८.
द [9 ४ €~
ध ॥ ० | वृकोदर ७१ १४५ ॥ श
१३ २७ व ङ ` =
विभ्रम ध ६ क + ७ | दाकंट ८९
खन && % कनि
विवत् ३८ ५३ त न 1 | द २९
वियोग ७७ १६० ध १ १८२ | यक्ुनौश्वर ६५
विरंचिन् ३६ ७२ < १३८ | कुन्ति ९
चिरद् । ८. |
वरह ७८ १६० । वथ ॥ यफ़ृत्करि ८१
विरूपाक्ष ३५ 1 ८ ९८६ |. शक्तिमत्
२५ 5० वपन ३० | = क्तमत् ३५८४
विरोचन २६ ५० | पन् र {३०
लम्बित ¡ वृप्रभ १ राक्र ध
विल ८. 3 | अ ५ ८ 1 (९२
विद्धेपन ६० (८ ३५ ६९ ¦ दाक्रनन्दन ७०
विष्टोचन ४९ ९९ | 5 ध ५९९ (श्र २५
विवर् ८९ (५ | वृप्रलन ७० २१४४ शपा ९
विवाह ८९ १८९ | ह व ६६ ¦ शमु ३५
ड क ५९ १०५ | दांभूविष्नकर् ४३
विगद 1 ६ ¡ वेग ८३ १७२ ¦ च्य
८४ १७३ | ~ ध र =
विदा 41 ६ व्स् ३६ ७२ | गरतक्रतु ३०
विशारद ७९ १५६ | वेला ६३ २७ ¦ उतपत्र॒ ` ११
विदारिन् ८ १७ | वेदमन् ६६ १३२ | दात्रमन्यु ३०
विदा ८७ १८३ | वेग्या १७ ३६ | यवर २२
विदालाक्न ३१ - ६९ । व॑जयन्ती ४२ , ८४ | दकटी ८
विरिख ४१ ८१ | वेनतेय ६२ १२९ | दात्री - ७३
विद्व ८८ १८१ । वैरिन् २२ ४ | राव्दमेदिन् ७०
०५ =
०९४
(*)
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9 4१ ५
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१६
शव्द पठ
हि
शरण
शरभ ४६
शरवणोद्भव ३४
शरीर १९
शवं २३५
यर्वेरी ६४
शवेरीकर ९४
शत्क ८९
शवर ७
दशिन् २३
रारिप्रभ ७१
दावत् ८७
शस्व ४२
शस्त्रजीयिन् ५४
शाखिन् पु
शातकूम्भ ८२
शान्तं ८२
रारंगी-सारंगी ७३
शाङ्गिन् २३७
शादूंल ४६
शालि ८१
शासन ७४
शास्त्र „ २
शिखरिन् र
~ ३३
शिखिन् ६३
शिखिवाहन ३४
शिखंडिन् ९६३
शिपिविष्ट ३५
श्षिरस् ५२
शिरोघर ५०
शिरोरूह ९९
शिला ८२
ख २३९
क्षिरीम्ः ५२
शिलीमुलासन ४०
शिलोच्चय ४
शिलोद्भवे ४७
इलोक
९१
७८
९३३
१७२
१७१
१५०
७.८
९०
१६७
१५४
६४
१२६
९६
१२६
७०
१९०४
१००
१९५
१७०
७८
८२
७९
९४
राब्दानुक्रमणिका
रव्द्
रिव
शिष्य
शीघ्र
शीघ्रणामुक
शीतल
सीधु
सीणं
शील
शुव्तिज
शुक्ल
शुचि
शुडा-शुड
शुडार
श्नासीर
शुभ्र
शुषिर
दूकर
रुर
शूचिन्
शु खलिक
श्रृ खलित `
शशिन्
रोमूषी
- दील
रौलधर
रोणित
शोणी
शौड
शौडीर
शौरि
शौर्ये
श्यामा
श्येत
श्येनी
श्रव
श्रवण.
श्री
घर
{ ३५
९१
३
. ८३
४६
८८
[ज
५
८२
८८
४७
७१
७१९
६१
४५
४
0
3 ५
{ र
३८
३८
८९
५२
६९१
८ १
२७
८२
२५
७१
७२
४९
४९
३८
लोक
६८
१९०
४
१५६
9
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१७१
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११०
७
७६
७६
१८८
१५०
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श्रुति ४९
श्रेयस् ९१
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श्रोणीविव ६०
श्रोतस् ६३
श्रोता ९२
श्रोत्र ४९
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दवभ्र ८९
र्वसन् ३२
श्वेत ७१
श्वेतवाजिन् ७०
श्वोवसीय ९१
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षट्पद ४२
षपड्दशन ८१
षडक्षीण ८
पप्पू द
प्राण्टिक ८१
षोडन् ८१
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संयत ८४
संयमिन् २
संयुग ४01
संशित २
संस रण ९०
संसार ९०
संसृति ९०
संस्ृत ७८
संस्तुत ५
संस्थित ५1
संहनन १९
संहित ७७
सकट ८८
सक्त ६१
सखा २९
सख्य ९५
१७८
१४७
१४३
१९८
८२
१६७
१७
६७
१६५
१६७
सदुचित
सद
तद्य
सहर
सद्मन्
सधर्मं
सवूची
सनातन
सनाभि
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सन्तति
-पन्तमन्न
-सन्तान
सन्देया
-सन्वानीत
सत्तिधि
सन्मति
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सम्पृक्तं
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सरसीख्ट्
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सवित्री ` १८
सव्यसाचिन् ५०
सह् (५.
सदट्कारिन् २१
सटृषत्वन् २१
सटचरी २०
महता ८३
सटाय २१
सट्च्रपात् २६
सटन्राक्ष २०
सहित <७
साकम् ८७
सागर १२
साधन ४
साघीयस् ८२
साबु {८२
साघु ८०
साघुवाद छ
साघ्वी १७
सानु . ५
सानुमत् 1
सामज ६५
सीम्प्रतम् ७५
सारमेय ४९
माद ५७
साट { भ
॥ ८६
साहस घट
साहाय्य ६२
सित्त { 2
सिद्धान्त ५
सिन्वु १६
सिन्धुर ८५
सिह ५
शब्दासुकमणिका १२द्
श्य प्रष्ठ श्छोकं | राब्द . प्रष्ठ इरोक | शब्द प्रष्ठ श्ोक
सीत्कृत ५३ १०६ | सौहृद ` ९१ १९७ | स्वाहापति ३३ ६५
सीमन् १३. ६ | सौहद ९१ १९७ | स्वैरिणी १७ ३५
सीमन्तिनी ९१४ ३० | स्कन्द ३४ ६ ह
सीर ७९ १४२ | स्तन ५१ १०२ हंस ६३ १२५
सुत ६५ १२१ | स्तनंधय ` २० ० | हंसवाह ६३ १२५
स॒चिरतन ७६ १५६ , स्तनित ५३ १०५ | सी ६४ १२७
सुत इ | 1 ७५ १५६ ] दहो ७६ ५७
सुधासूति २४ ४७ ८१ १६८ | हन्तोक्ति ५४ ११०
सुनाशीरः २० ५७ | स्तस्बकरि ८९ १६७ ह्य २७ #
सुनिर्मोकि ७० १४४ | स्तम्बेरम ४५ ८८ | हर ३५ ७०
सुन्दर ८५ ९७७ ह स्तेन ८१ १६९ { = १२
सुन्दरी १५ ३९१ | स्वी ध ~ ॥ ५ ध
सुपणं ६ १२९ | स्थपुट ८७ १८३ | ३७ ७
सुभट ९० १९६ | स्थविर ` ६३ १२४ (प ९०
सुमन ४० ८० | स्थाण् २३५ ६८ | ह्रिण द १२७
सुर ३० ६ | स्थान ६६ १३३ हरिणी ७३ १५०
सुरा . ६ १२१ | स्तेह ७७ १६० ३२ ६१
सुवर्ण ४७ ९३ | स्पर्शा १७ ३५ | हस्ति ७२ १४९
सुष्टु ८३ १७३ | खष्ट ८४ , १७३ | हरित ७२ १४९
स॒द्त् २० ४१ स्फीत्छृत ५२ १०५ हरिद्राभ ७२ १४९
सूत्नामन् , ३० ५७ -| स्फुट ८४ १७२ | हरिवाहन ६० ५९
सून् १९ ३९ | स्मर ४० ८० | ह्यं ६७ १०५्
सून॒त ८७ १८२ । स्मृत ५ १०८ ट्ष प १०९
सूरि ५५. ९१९ | सपद ८३ १७२ | हर ७० १४२
सूयं ६ ५० स्यन्दन ५२ १०६. हलि ७० ४,
सूपं कारि ३९ ७७ | सन् ॥. ११९ | हव्यवाह ३३ ६६
सेना ४३ ६ | स्तष्टू ३६ ७३ हस्त ५० १९१
सेनानी ३.४ ६ सवन्ती १२ २४ हस्तशाखा ५० १०९१
सेनानीपित् ३५ ६८ | स्रोतस्विनी १२ २४ | हस्तिन् ४५ ८८
सेन्द्र ३० ५६९ । स्रोत स्विनीपति १२ २५ हाटक ४७ ९२
सन्य | ४३ द्द | स्व ४७ ९५ | हाद ९१ १९७
सादय ४1 ४९२ | स्वभाव ८८ १८५ | हाखा ६१ १
सोमवंश ७९१ १४६ | स्वर् ३० ६ (५९ ११८
सौदामिनी ९ ९. ह व हिम [८५ १७९
च ६७ १३५ | स्वर्णं ४७ ९३ | हिमवत्सृता ३६ ७१
सम्य ८७ ९७७ स्वसु २१ ४३ हिरण्य ४७ ९६
सारभ ४९५ १९७ | स्वान्त ४१ ८१ | हिरण्यकश्चिपुसुदन = ५७
सोरि ३८ ७५. | _ त ५ १८ | स ६ ७
सहाद ९१ १९७ | स्वामिन्. { ३.४ ७ ¦ दिस्यण्रेतत्् ३३ <
साप्यस्थङ्ञब्दलुक्रमणिका १२५
शाब्द प्रष्ठ शोक } शब्द प्रष्ठ रोक ¦ शव्द पृष्ठ इलोक
स् विवस्वत् ९३ ३ | सारंग ९४ ९
मय्ख ९४ =< ; विष ९४ ५ । सारस ९४
॥ र । वृषाकपि ९२ ३ | साल ` ९४
रम्भा ९५ १९ ¦ वैकुण्ठ ९३ ५ { ९४ ७
रस ९९ ३० ` व्यामोह ९६ १४ | दु „ ` 28 ९४
राजन् ९५ १९१९ ` श | मनस् ९५ १२
राम ६५ ६ , शङ्ख ९७ १८ । सोम ९७ २१
२) शम्भु ९३ र | स्तंभ ९.७ १७
लच्धि १०१ ४४ , शिखरिन् ५ १९१ ¦ स्थाण ९७ १७
च । ध २८ २३ | स्यन्दन ९५ ११
चं - , स् | स्यात १०१ प
वन ३ ५ : सस्व ९५९ ५३६. । स्वर् ` ३
¢ 1 ॥ ९ ९९ ३५
वगणा १०० ४२ , सन्धि ९ १४ स्वैर् ९७ ` १७
वणे ९९ ३४८ । समय ९२ ३५ | ह
वाम ९ € , सर्य ९४ ९ | दह ९७ २०५
चिरोचनं ९७ २० । सार ९४ ८ । हरि ९८ २८
नाममालासाष्यस्थशब्दानासकारादिसूची
र्द प्रष्ठ पंक्ति | शब्द् पर॒ "पंक्ति | खच्द् प्रष्ठ पंक्ति
अ | अचिरांसु ९ २५ | अन्धकरिपु ३९ ४1
अंश २६ २१९ ¦ अच्यत ३८ १५ । अन्धत्तमन ७२ ६२
अंशमान् २६ २९१ | अण्डल ८ २८ । अपथी २३ क
अंशुमाली २६ २० ` अतिमान ८३ १८ ¦ अपर ८६ २६३
अत ४९ २३ ; अत्तिवेरः ८३ १८ . अपःपित्त २४ १६
अग ६ ६ ञत्रिने्प्रसूत २४ इषः + 4
अग्निभ् ३५ ३ अधिष्ठान ४९ < अब्जं ६. २५
अगरघन्वन् ३१ २६ › अनन्त २८ ९५. अब्द २ १६
अभ्रिय २१ १८ ' अनन्ता ४ ६ , अन्धिगा ३८ २२
अद्खन ३९ ९१२ ¦ अनस्वरः ७७ १९ अभिन १८ त,
जङ्घूर ५९ २४ , अनिमिष ३० श्य अभिरयः ८४ क्क
अङ्घस ५९ रे ¦ अनीक ४९ र अभिजन &3 -
अचल ४ ६ अनीकिनी ४४ स. < 1
१२६
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अभ्यागम
अमुक
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अमूतनिर्गम
धमृतागन
अम्बा
५
अयन
अरण्यद्वा
अरण्यानी
अरिष्ट
अचिष्मान्
अर्दनि
अर्व
वर्भक
यकार
अवतमस
अवदान
जवयव
अविनश्वर
अविनीता
अव्यय
यदुम
अद्मन्
अम्टीवान्
असती
असम्पूर्णं
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घर्मुहूत
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अदहूर्पेति
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घात्मीय २१ १०
आदित्य { २ ध ५ १
आधार ६२ ७
आनर्तं ८ ५
भप्त ९१ १०
अआप्तस्प ५६ २
जआाभीट ८७ २२
आमिष २९ २१
आयत ७६ १८
आायोवन ८५ १
भारात् ६९ २२
आरोह ५.१ ९
ञादीविप ६५ १
आशुग २३३ ८
आश्रया ३४ १६
मारुत ९१ (9
आसन्न ७० १
आसव ६१ १५
यआस्कन्दन ८५ १
आहार्यं ८ ३०
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इक्षूद १३ २
इचिकिट १० १०
इत्वरी १७ १७
इन्दिन्दिरः ४२ ९
इन्दु २४ २४
इन्द्रावरज ८ १५
ई
ईं ८ २२
ईशान २३६ र
उ
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उदर्कः ८ १
उदग्र ७६ १८
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उपमा
उपटच्वि
उपहूर
उपाधि
उरसिज
त्क्य
ऋक्षेग
च्छु
चरटद्य
ऋष्टि
तऋ्प्य
एकपदी
एकान्त
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कद्धुपत्र
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कंन्याङ्ख ५२
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कन्ध ८
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केभिता १८
कम्बल ६५
कर्णजप ८१
कर्दमज १०
कर्पट ५९
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कलत्र ५१
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काक्वेदर ६५
काच्चीपद ५१
कान्ता १६
काफिशयस ६१
कामष्वसी २९
कापटिक ८०
फाटसार ६
कालिङ्ग ४५
कालिन्दीकपंण ७०
१९
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कुजं
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कुध्र
कुन्तल
कमुदविवल्लम
कुम्भीनस
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करुरेगम
कुर
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सृल्टक
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सजूर
गन्धदारिका
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गरिष्ठ
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गोपति { वः भ / २६ त्वान्
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गीर् २ 1 ज | तप्तकीं
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वि . ` | जगत्कर्ता ३७ _१० | तमस्विनी
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ग्रीवी ८६ १९ त्प्राण ९ तमालपत्र
जघनं ५५ १९ । तमिस्र
४ जङ्घा ५६ २२ | तमि
घ्न २९ ५६ | जनान्तिकं ८४ १८ तमी
घनरस ८ ३ , जन्य ५ | न
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घल्ल ५६ ५८ | जम्बा १० १० । =
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चक्रवाल ६३ १३ | जलरादि १३ २ नि
चक्राद्धवाह् ६२ २५ | जलरयन र व ५८ तिमिररिप
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चक्री ९५, ; €} शाल { ७ २३ तीर
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चञ्चवरीक ८२ ९ | जालिक ८० २ | तुन्द
चल्न्वदा ९ २१५ | जिघांसु २३ २ : तोयनिधि
चटा ४ २१ | जिन ३८ १५ { तरयीतनु
चन्द्रकी ६४ ३ | जिप्ण् २२ २५ ¦ तिक
चन्द्रवसु ८७ १५ ¦! जिद्यग ६५ २ | वरिकस्थानक
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१७
वरिदशदीधिका ३६
चिदिव २८
त्रिपथा ७८
त्रिपुरान्तक ३६
तरिप्रचरा ७८
त्रियामा २५
त्रिवर्त्मा २७
त्रिविष्टपसद् ३०
त्रिसंचरा ७८
चिसरणि ७८
त्रिस्रोता ३६
त्र्यघ्वा ७८
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दक्ष ७९
दक्षाध्वरध्वंसक ३६.
दक्षिणापति ७१
दण्डधर ७१
दण्डाहत ६२
दध्युद १३
दन्तावक ४५
दन्दशूक ६५
दमूना दे
दमूना द
दयिता १६
दर्वीकर ६५
दल ८९
दशमीस्थ ६३
दस्यु , {२३
८२
दाक्षायणीरमण २५
दाण्डाजिनकं ८०
दाव १६
दाशाहं ३८
दासेरकः ४६
दिगम्बर ७२
दिनकर् २६
दिनमणि ६
दिवस्पति ३९१
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२७
- भाष्यस्थदब्दालुक्रमणिका
दीघं
दीघेजङ्घ
दीघंपृष्ठ
दुर्गति
दुर्जन
दर्वणं
दृह त्
दुश्च्यवन
दुक्श्रुति
देवता
दैवत
दोषग्राही
दोषज्ञ
चु
चयम्न
त्रदं
दु
दरुणा
दन्द
दादश्चात्मा
द्विजराज
द्विजिदहध
द्विरसन
दरीपवती
द्वीपी
देषपण
धनञ्जय
धरणिधर
धमराज
घपंणी
धव
घाम
धाराधर
धीर
धूपक
धूमध्वज
धूमयोनि
घूम
७६
४६
६५
९०
८१
४७
२३
२१
६५
२०
2३०
८१
५६
२६
14
४९
६
२
४५
२६
२५
८१
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१२
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२२
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३४
३८
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१७
१८
२३
१८
१९
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१४
१९
१७
१९
९9
१२
९४
९५
१३
धूमिका ८५
धृष्णि २३
ध्रुव ७७
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नक्तमुखा २५
नखरायुध ४६
नलिनी ११
नाक २८
नागान्तक ६५
नालीक ८०
नासिका ५१
निःशलाक ८४
निकाय ६३
निकुरम्ब ६३
निखिल ८८
रि ॥ 1
नेगम { ध ट
नितराम् ८८
निरय ९०
निजेर ३०
निज्ञरिणी १२
निव्य॑थन ८९
निवहं ६३
निशीथिनी २५
निशीथिनीनाथ २५
निषपद्वर १०
नूत्न ७६
नृपल्चद्म ९०
नेम ८९
नेस्ना ५१
नेकपेय २९
नैकसेय २९
नैऋत २९
न्यद्धु. 21
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पद्धु ६६
पद्धुज १०
पञ्चटाख ५०
पञ्चानन ४६
११
२५
१९
११
१३०
पञ्चेषु
पट
पटी ,
पटसुत्र
पताकिनी
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पदजेय
पदवीः
पदाङ्गद
पदिक
पग
पद्धत्ति
पञ्चगादन
पद्मवासा
पद्मा
पद्मी
पद्या
पयूप
पयोधर
पर्
परमेश्वर
परमेष्टी
परास्कन्दी
परिपन्थी
परिप्टृता
परिपज्ज
परिष्कारे
पर्जन्य
पयवस्याता
पटादी
पल्ल
पवनाशन
पशू
पञ्ुपनि
पशखा
पाकः
पाकशासन
पानीय
पार्वेतीनन्दन
पिचण्ड
२९
५९
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३५
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१२ | पिण्ड ९
१३ पितृपति ७१
१३ | प्रीतवात्ता २३८
१ | पीति २७
२० पीयूप ६
१९ पीयूपरचि २५
२० पीट ४५
१२ | पुञ्ज ६३
१४ पुटकरिनी ११
९० | पुण्डरीकः ४६
6 पुत्री २५
४१ | पूषुमक १५
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२१ | प्रर { ६७
२१ | पुरन्ध्री १५
१६ , पुरुज ९०
१२ । पुलक ८२
१३ पुल्ष १४
१२ पुप्कर ९०
ह | एष्कर ६
१० | पुष्ट ९०
८ / पृप्पचिट् ४२
पुग ९३
पूर्वज २१
| २ | पृरवदिःपत्ति ३१
1 1 ६४
२६ । पृदाछ ९प
५ । पृपदक्व >
१४ | पृपत्व २९
३ | पोत ५९
१५ | प्रकट ८४
३ । प्रकार ६८
ध कादा 1
२७ | प्रकोष्ट ५०
८ । भ्रस्य ६८
् प्रग्रह २३
१० | प्रचलाकी ६४
| ६ | प्रच्छन्न
११ | प्रतन
१२३ | प्रतानिनी
१५ | प्रतिकरिषटट
१३ | प्रतिन्ञात
१ | प्रतिपक्ष
१६ प्रतिभय
१७ | प्रिमा
२२ । प्रतिम
७ | प्रतिमोपक
९४ | प्रतीक
१६ | प्रतीपदश्चिनी
१६ | प्रत्न
२ | अत्यनीक
२८ | प्रदह
७ | प्रद्युम्न
९ | प्र्योत्त
९ । प्र्योतन
७ | प्रधन
३ | प्रपात्त
१८ | प्रबुद्ध
७ | प्रभाकर
९ | प्रमदा
१२ | प्रम्वध्ने
१८ भ्रवयाः
२६ | प्रविदारण |
| | प्रवृत्ति
१ | प्रवेणी
९ | भ्राज
८ । श्रणाधिनाथ
२१ | प्रयाग
१३ | पावर
५ | प्रावार
ध परीति
८ | ग्क्त
ध | प्रत्तपति
१६ । प्लवङ्गम
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| फटक
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भृच्छाय
भूतधात्री
भूतेश
भैरष
भोक्ता
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मण्डन
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१ १ मिहिका
१ २ मिहिर
८ मुकुन्द
२ | मदिर
२८ सृत्िजे
१५ श घज
८ । मृगदश
१२ मृगरिषु
११ | भृयाद्ग
२ । मृगारि
२ | मृणालिनी
११ | डु
१९ | मृ
२५ | के
१३ | मेषपुष्प
९ । मेधा
१ | मोपरक
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{दरवदधपाणि ३८ १४ | वरथिता १८ १९ | विल ८९ २१
"णी १५ २८ | वरटा ६४ ११ | विटय ६५ २
स्मा ३ २२ वराक ८५ १ | विवसन - ५९५ १०
रवण द ९ | वर्टिष्ठ २१ १८ | विवस्वान् २६ २०
रषिम २३ ९ | वणिनी १५ २८ । विविक्त ८४ १८
रसा 1 ६ | वर्तनी ७८ १२ | विशारद ५६ २
राक्षस २९ २७ | वर्पीयान २१ १८ | विरिख ३९ २०
रागसूवर ६१ १ | वर्मं १९ १६ | विश्वम्म ८८ ६
राजसर्षं ६५ वर्टुण ५२ २८ । विद्वर्प ड १३
राजा र २४ | वदा १६ १ | विदवास ८८
रात्रि २५ २६ । वसति २५ २६ | विष्टर द ६
५ रि ६३ १२ वमु { २३ १९ । विष्टरश्रवाः ३८ १५
रिष्य ६ १७ द १५ विष्णुपद २८ १५
रुक्म ४७ छ | ५९ १२ | विष्णुपदी ३६ ११
द्भ ४७ १५ व ९५ १० विष्णूर्थ दप १६
र्वि २३ १९ | वर्लिरता ३६ ४ ¦ विष्वक्सेन ३८ १२
रुच्य २९ इ. "^ १७ ¦ व्रि्रर ६३ ११
रण् ६४ १७. ३६ ५ | विसार ८ २९ "
रोक ८९ २२ | वामनेदा १५ २८ | विन््तीर्ण ८७ १८
५ २३ | ५५ ध १२३ | वीचिमाटी १३ २
रोधोवक्रा १२ | वार्ता ६८ २० | कौगा ९ ष
रोप ३ क वासतयी रष २६ | वीतदोत्र ३४ १६
रोटम्ब २ | वातिता १५ २८ | कीति २७ २५
रौदिणीवत्ट्म रथ २५ । वास्तोष्पति ३१ २६ | वीरुवं १९१ २७
छ | विकर ६ ११ | वृत ६ ५
व 4 ५ विक्र २९ १७ | वृजिन ९१ १
ध विकतन द २० | ब्रत्तान्त ५५ २
क { | निकान्त ९० १८ | युचारि ३१ २५
लवणोद १३ २ ध क, ह |
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ग्ट्री १३ १७ | विग्रह { ४५ २ | वृद्ध { अ
प ध १२ | विजन थ १८ | वृद्धश्रवाः ३१ २५
टेड्वट् ४७ २ | विवा ६८ < | वन्दारक ३० १३
1 विवेव ८० १४ | वुपाक्पि ३८ १५
वक्ौरह् ५ १४ | विपदविचत् द् २ वृषाभ 2२६ ५
वजवर् २ २६ | विपुला # ६ | वेणी ९१ ७
वट २० २ विवुव ३० १३ वैकुण्ठ २३८ १४
वनमाटी ३८ १५ | विभव (ए ७ | वजन्त ४३ ५
वनीकश ~ १५ विमा २३ १९ वैवस्वत ७१ ११
दपा ८९ २२ | विमावरी २५ २५ | व्यक्त ५९ ॥
वयसी २० १६ ¦! विरोक २३ १९ | व्यञ्जकः ८० र
गाप्वस्यसव्दालुकसणिका
व्यार ९८ भुक्पाङ्ग ६४ सदेश ६९
व्यूह १३ शुक्ति ३४ १५ सन् ४६
उ्योमकोशच ३६ शुण्डा ६१ १५ सनातन { ध
नरज १२ १९ रुषि ८९ ४
न्ते ११ २७ शूर ६ २० / सनामेय २१
श रोक स ` 5 क ६९
रोवक्तिनी १२ ११ | सन्निकट 9
सकी २८ शैल २० / स्निभ ९८
क्तिपाणि ३५ 90 ण्ड
स्याम त सपिण्ड ५५;
शतधृति 8 १० ण्ठ ९४ २ स
शत श्राद्धदेव ७१ ११ त्तास्व २६
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शतानन्द ३७ १० | श्रीकष्ठ २६ २
रावे ९४ १७ श्रीनन्दन २९ ६९ | सभस्तार ५ ६
शेम ˆ ५. १९ । श्रोपति ८ १३ त ३
शमन ७९ ११ | शरीवत्सा्ु १८ १३ / सम ८
शम्बर प १७ श्लोके ०४ १३ | समवाय ९३
३ ६ ३ रेवभ्र ८९ २ २ $ समास्या ७४
५ ३८ १५ | सवेत ४७ १९ समानोदर ४.
राय ५० १९ | स्वेतच्छद ६३ ९२ / समानोदर्यं २९१
श्वरौ ९५ २५ | उवेतसोचि ५ {१ | रमिति ५५
शल्की ८ २९ प । समीक ष्पु
शओशष्वज १३ ' समीर २३
शशाङ्क २५ १ / प्रर्चरण ४२ ९ | समुदय र ३
शचिरोसर ३ ६ १ | १३ङ्घि +. त समुदाय { ह
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शारिवा ११ १० तत् । सम्मित ५५
संगर षु ३ ॥
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गाल्मवृके ४७ < विग 1५ ५ सरिदिरा २६
गाव २० ३ स ८३ १३ सरीसृप ६५
शार्वत ७७ ११ | सव्यान ५९ १३ सपदिन ६४
साङ्वत्तिक ७ 4 ११ / स्स्त्याय ६७ ४: सवं सहा ८
शिक्षित ७९ २० | स्फोट ७ २ | सव २६
शिखावल ६४ ३ | ४1 २१ ६५ । ेव॑तोमु ८
शिक्जि { ५३. १३ । सेगभं ९६ १० सलि ८०
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शिरसिज ९० २९ । सञ्चय ६३ ११ ¡ सहचरा १
शिशु २० रे / सत ६ २३
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ग्निपर्यायसन्ः सेनानी ६६
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अदितिशन्दात्परं सतपर्याय
प्रयोगे देवनामानि ५६
अाकाशपर्यायगः खगः प्ट
आकाशपर्यायचरः सेचरः ५४
उड्पर्यायपतिः चनः ४८
क(ष्ठादिनामतः परं पालप्रयोगे
गजप्रयोगे अम्बरप्रयोगे चं
दिगपाख नामानि ६१
कायपर्यायरहितः मन्मथः ७७
~ काम्.कप्ययिकोटिः अटनी ७९
किरणवाचिभ्यः पूर्वं शीतशब्द-
प्रयोगे चन्द्रनामानि,- यथा-
रीतक्रिरणः ४६
किरणशब्देभ्यः पूरम् उष्णशब्द-
पयोगे सूयनामानि , यथा-
उष्णकिरणः ४६
कृष्णपर्यायपुत्रः मन्मथः ७७
गद्धानदीदवरः सिन्धुः ७१
तित्तपर्यायहारि मनोहरम् १७८
जा द्गलपर्यायभ्रियः राक्षसः .५५
| भूमिप यौपरुहः वृक्षः
योभिर्काब्दालुकूपणिका
जित्यापयायकरः वः १४२
य षाया दिः ध्वजायन्तःस्मरः ८४
तामरसपर्यायवती विसिनी २३
दिनपर्यायकरः सूर्यः ५०
देवपर्यायपति इन्द्रः ५७
देहप्यायभवः सुतः ३९
दुपययधूनी गंगा ७१
धनपर्यायदायकः कुवेरः ९६
धीनामवजितः मूखैः १६६
नागपययिारिः मृगेन्द्रः ९०
निंशापर्यगयकंरः चन्द्रः ४८
पन्नगपय्यवैरौ गर्डः १२८
परिषत्पर्यायजं कमलम् २०
पवनपर्यायपुत्रः भीमः ६६
पवनपययपुत्रः हनूमान् ६३
पवनवाचिसखा अग्निः ६४
पुष्पपर्यायज्ञरः स्मरः ८०
पुष्पपर्यायास्तः स्मरः ८०
प्रस्थपयधिवान् गिरिः ९
भूभिपर्यायवरः शं लः
भूमिपर्यायपतिः नृपः
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मनुष्यपर्यौयपतिः नृपः
मयूरपयौायपतिः गृहः
मेवप्यायपथः अकारः
रात्रिपर्यायचरः राक्षसः
लक्ष्मीपर्यायपतिः हरिः
वायप्य्यपथः आकाशः
वार्प॑ययच रः मत्स्यः
वापंययधिः अम्बुधिः
वाययंययोद् भवं पद्मम्
वित्तपययिपतिः कुवेरः
विधिपर्य्यपृच्रः नारदः
विपिनपर्यायचरः वनेचरः
विष्टपपयप्यपतिः जिनः
लम्पापर्यायपतिः अम्बुदः
शोरभम्यादिधरः हरिः
सेनानी पर्यायपिता शङ्ुरः
स्रोतस्विनीपर्यायपति
च्धिः
स्वर्गपर्यायपतिः इनदरः
स्वगं प्यायवः सः त्रिदयः
| स्वान्तपर्यायोद्भवः माः
हिमपर्ययकर चग्द्रः
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वराह १०२
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वर्पामू १०४
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उद्धृतवाक्यानामकारादिपची
अद्धुनाच्च तदेक्षूणां ५
अतिप्रकापभावेन ६१
अनहनावमौदयवृत्ति- २
असूययागग्य निशाम्ययां ३३
आत्मनि मोक्षे ज्ञाने ५२,५८
नि
आपो नारा इति प्रोक्ता; ३७
आयुः पीयूषकुण्डैः स्मृत्ति- ६२
आहुनेनोत्थमवरः सूृत- = २४.
उड्डीय वाञ्छितं यान्ति शय
एको रथो गजदचैको ४५
एेश्वयंस्य समग्रस्य ६५
कपिर्वेराहुः श्रेष्ठद्च ३४
काश्यमित्युच्यते तेजः ५७
कियती पञ्चसहसी ९६
कुमारकाङे मामरुकी- ५९५
कोकिलानां स्वरो रूपं ५५
क्वंचित्प्रवृत्तिःक्वचिदप्रवृत्तिः ६०
गिरिकन्दरदुगेष् ३२
गोसवे सुरभिं हन्यात् ५५६
गौः स्वंगः सम्ररृष्टात्मा ५८
गौगौ; कामदुघा ५२
चतुःषष्टिकलाभिन्ञा १८
चत्वारः परुवंशजा ५८
जातमा्रोडथ भगवान् ३१
णमो अर्ह् ताणं
तत्तु हय द्धवीनं यद्
तत्सं देहे गते ताभ्यां
दुज्जणं सुहियउ होउ
दुर्जनानां विनोदाय
दित्रव्योम्नि पुराण-
न कुः पृथिवीं पिपति
नक्षत्रमृक्षं भं ताय
नक्षत्रे वाक्षिमध्ये च
नभन्तु नभसा सार्धं
नवमे प्राणसन्देहो
नासाकण्ठमुरस्तालु
निषदरस्तु जम्बाल-
निषादषभगान्धार
पञ्चमे दह्यते गात्रम्
पञ्चाचाररतो नित्यं
पट्नं शकटगेम्यं
पतत्रिपत्रिपतग-
पत्त्यद्धंस्तिगुणेः सर्वः
पुण्डरीकं सिताम्बुजम्
पृष्पसाधारणे काले
प्रथमे जायते चिन्ता
प्रशस्या न नमस्यापि
प्रायदिचत्तविनयवैयावृतत्य
६१
५८
४५.
६२
र
६
9१
५.
५५५.
१
प्ट
१०
५३
॥ ३.1
१५
४९
५
॥81
१०
५३
पष्ट
२२
२
भर्ता संगर एव मत्य वस्तिः १५
मान्यत्वादाप्तवियानां २
मुदन्ति मिश्रीभवन्ति १२
यः: पापपाशनाशाय २
य उत्पच्: पुनाति वंशं १९
यत्सवात्मि हितं न वणं सहितं ५९
रेषणात् क्लेद राशीनाम् र
लक्ष्मीकौस्तुभपारिजांत्तकसु रा ६१
वरं क्षिप्तः पाणिः . २२
वर्णागमो गवेन्धादौ
२३,२९,४६ ५९.६५
वाजं वाजस्तु पक्षेऽपि २७
वाहौ वुग्यं घनो वाहो २७
वृषाकपिवसुदेवे ३४
द्यामा रात्रिस्तु विद् इ्यामा २५
षड्जं मयूरा ब्रूवते ५३
सत्यं दुरे विहरति समं १४
सन्धियनिौ सूरङद्गाया ९६
सर्षपस्य प्रयत्नेन ९६
स व्याख्याति न शास्त्रम् ३
स्वस्थं नरे सुखासीने ९६
स्वान् भृत्यं भवेद् १
हावो मुखविकारः स्यात् १७
हिसानृतस्तेया- २
हिरण्यगभमभेवत् ३७
भाष्यगता भ्रन्था भ्रन्थकारार्व
अकल १
अनेकाथध्वनिमञ्जरी-
२५. २१
२७ १३
अमरकोषः ८७ ८
१०५
सिह, १२. १५
अमरसिहः -१ ५३ ६
५३ २०
अमररसिहनाममाला २९ ६
अमरसिहभाष्यम् १९ १२
आश्षाधरमहाभिषेकः ९२ १
इन्द्रनन्दिनी तिशास्तम्
कल्याणकीतिः ध
क्षीरस्वामी ६२
डात्कणिकः २९ €
40
द्िसन्धानकान्यम् ३३
१
द्विसन्यानभाष्यम् ६१ १०
नाममाला ७२ २०
पद्मनन्दिशास्वम् १ १९
पूज्यपादः १ १
वृहत्रतिक्रमणभाष्यम् ५८ १५
भरतनारटकम् ५३ २२
भारतम् श्छ ४
महापुराणम् 1 ५४ ४
यकि २२ १५
1 २ १६१९
४ २१
यद
स्तिखकम् २४ ५
६३ १५
यदास्तिटकचभ्पूकान्यम् ९८ ८
वियानन्दी १ १
शब्दभेदः १ १७
दादवतः २५ ९
श्रीभोजः २५ ९
समन्तभद्रः १
१
सूकितिमुक्तावली २२ १८
सोमनीतिः {1 ४८ १९.२४.२७
१
र
$ १०
6 {1 १२ ध
हरयुधभाप्यम्-
, २९५
द्मः ९४ १०
म॒ना ममाला २७ १९
मी ९६ १७ २५.२७
हंमीनाममाय ३४ १२
ॐ० चि० अभिधानचिन्ताममि
अनेका० सं० अनेकाथंसङ्ग्रह
अ्म० को० अमरकोदा
अम० को० क्षी भा० अमर-
कोशा क्षीरस्वामी भाष्य
धमर० अमरकोश
अ० सं० अनेका्थंसंग्रह
उ० सू० उणादिसूत्र
कल्प० को० कत्पदुकोगर
का० उ० कातन्त्र उणादि
का० 5० उ० कातन्त्र रूपमाला
उत्तरां
का० ० पू० कातन्व रूपमा
. पूवां
काण ० पू० सू० कातर्त्रर्प-
माछ पुवे्िसूत्र
प्र॒ प० अचुद्धयः युद्धयः
७ ` १४
५३ २
५४ २१
ऋ
सङ्केतविवरण
का० सू० कातन्त्रसूत्र
क्षी° भाण क्षीरस्वाभिभाप्य
क्षी° स्वा० क्षीरस्वामी
जन ० समु० जनपदसमृदेदा
जै० मू० जेनेन्द्रमूव
त० मूरतत्त्वारथसूत्र ,
नीतिसा० नीतिसार
नीवार समु° सू० नीति वाक्या.
यामृत समुदेशमूक्ति
पऽप० पद्मनन्दिपञ्चविश्ंतिका
पा०उ०्पाणिनि उणादि
पा० गणसू° प्राणिनि गणमूतर
पात ० भाष्य पातञ्जलमह्ाभाप्य
पा० सू० पाणिनिसूत्र
भो० उ० भोजडणादि |
मे° को०्वा०व० मेदिनीकोदा |
यदा०ति०आ^ क० य्रस्तिल्कः
आदवास कल्प
वि० को० का० विद्वछोचनकोश,
कान्तवगं
| वि० छो विदवोचन कोद
द ०च० दान्दार्णवचच्दिका |
श्०च ० मू० गब्दाणंवचन्दिका
. सूत्र
श्रा० कारिका शाकटायन कारिका
दा० सू० शाकटायन सूत्र
सर० क० सरस्वतीकण्ठाभरण
स।(र० समा० सू° सारस्वत
समासं सूव्र
दे० च ० हेमचन्द्र
वान्तवर्गं . | द° श देमगन्दानुशासन
ध ।
शब्िपत्रम्
प्र॒ प०. अद्युद्धयः शद्धयः
शरं | ६५ ९ चविपायः विपक्षः
स्तमितः स्तनितं | ६९ २ निकूरो निकरौ
मक्तोपा- मृकत्तोपा- | ७१ २९१ प्वेतो येतौ